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Saturday 18 Nov 2017

शकिस्ते जिन्दा का खाब1


शकिस्ते जिन्दा  का खाब1
2शब्बीर हसन खां ‘जोश’ मलीहाबादी
क्या हिन्द का जिन्दा  कांप रहा है, गूंज रही है तकबीरें।
उक्ताए हैं शायद कुछ कैदी और तोड़ रहे हैं जन्जीरें।।

दीवारों के नीचे आ आकर यूं जमा हुए हैं जिन्दानी2।
सीनों में तलातुम3 बिजली का, आंखों में झलकती शमशीरें4।।

भूकों की नजर में बिजली है, तोपों के दहाने ठंडे हैं।
तकदीर के लब को जुन्बिश5 है, दम तोड़ रही हैं तदबीरें।।

आंखों में गदा6 की सुर्खी है, बे नूर है चेहरा सुल्तां7 का।
तखरीब8 ने परचम खोला है, सजदे में पड़ी हैं तामीरें9।

क्या उनको $खबर थी जेरोजबर10 रखते थे जो रुहे मिल्लत11 से।
उबलेंगे जमीं से मारे सिय:12 बरसेंगी फलक13 से शमशीरें।।

क्या उनको खबर थी, सीनों से जो खून चुराया करते थे।
इक रोज इसी बेरंगी से झलकेंगी हजारों तसवीरें।।

क्या उनको खबर थीं, होठों पर जो कुफ़्ल14 लगाया करते थे।
इक रोज इसी खामोशी से टपकेंगी दहकती त$करीरें।।

संभलों, के वो  जिन्दा  गूंज उठा, झपटो के वो $कैदी छूट गए।
उट्ठो के वो बैठीं दीवारें, दौड़ो के वो टूटीं जंजीरें।।
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1. कारागार टूटने का सपना, 2. बंदी 3. हलचल, 4. तलवारें 5. हिलना, 6. भिखारी, 7. राजा, 8. तोडफ़ोड़, 9. निर्माण कार्य, 10. ऊपर-नीचे,11. राष्ट्र, आत्मा, 12. काला सांप, 13. आकाश, 14. ताला।