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Saturday 18 Nov 2017

शहीदे काकोरी अशफाकुल्लाह खां की आखरी नज़्म

शहीदे काकोरी अशफाकुल्लाह खां की आखरी नज़्म
(यह नज़्म शहीद अशफाकुल्लाह खां ने गिरफ़्तार
होने से पांच दिन पहले लिखी थी।)
बहार आई है शोरिश1 है जुनूने $िफतन: सामां2 की।
इलाही खैर रखना तू, मेरे जेबो गरीबां की।।

भला जजबाते उल्फत भी कहीं मिटने से मिटते हैं।
अबस4 है धमकियां दारोरसन5 की और जिन्दा 6 की।।

वो गुलशन जो कभी आजाद था गुजरे जमाने में।
मैं हूं शा$खे शकिस्त:7 हां उसी उजड़े गुलिस्तां की।।

नहीं तुमसे शिकायत हम स$फीराने8 चमन मुझको।
मेरी तकदीर ही में था कफस9 और कैद जिंदां की।।

जमी दुश्मन जमां दुश्मन, जो अपने थे पराए हैं।
सुनोगे दास्तां क्या तुम मेरे हाले परेशां की।।

यह झगड़े और बखेड़े मेट कर आपस में मिल जाओ।
अबस तफरीक10 है तुम में यह हिन्दू और मुसलमां की।।

सभी सागाने इश्रत11 थे, मजे से अपनी कटती थी।
वतन के इश्क ने हमको हवा खिलवाई जिंदां की।।

बे हम्दिल्लाह चमक उट्ठा सितार: मेरी किस्मत का।
के तकलीदे हकीकी12 की अता13 शाहे शहीदां14 को।।

इधर खौफे खिजां15 है, आशियां16 का गम उधर दिल को।
हमें यकसा17 है तफरीहे चमन और कैद जिंदां की।।
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1. तेजी 2. आतंक उठाने वाला पागलपन, 3. मुहब्बत 4. बेकार 5. सूली-बेड़ी, 6. कारागार 7. टूटा हुआ 8., साथ चहचहाने वाले 9. पिंजरा, 10. अन्तर करना, 11. खुशी, 22. वास्तविक अनुसरण 23. प्रदान करना 14. शहीदों का राजा अर्थात इमाम हुसैन 15. पतझड़ 16. घोंसला 17 बराबर