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Tuesday 21 Nov 2017

अत्याचारी से


2हरिकृष्ण विजयवर्गीय ‘प्रेमी’
जिस पर आंखें गड़ा रखीं, हम लिये हथेली पर आते।
धन, वैभव, स्वातंत्र्य, छिने अब सिर छिनवाने को लाते।।

एक नहीं बहुतेरे हैं  हम मां के मस्ताने, प्यारे।
शीश काटते थक जावेंगे, कि देखेंगे हत्यारे।।

संध्या समय मिलाने जगती, ऊपर नीचे की लाली।
कौन अधिक है लाल गगन या मां की गोदी मतवाली।।

यह मत समझो व्यर्थ चला जावेगा पगलों का बलिदान।
शुष्क  हड्डियों के कल ही, फिर बज्र बनेंगे काल समान।।
(‘महारथी’-अक्टूबर, 1927)