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Saturday 18 Nov 2017

ब्रिटिश राज


2‘अकबर’ इलाहाबादी
बहुत ही उमद: है ऐ हम नशीन1 ब्रिटिश राज।
के हर तरह से जवाबित2 भी हैं उसूल भी हैं।।
जो चाहे खोल ले दरवाज: ए-अदालत को।
के तेल पेंच में है, ढीली उसकी चूल भी है।।
निगाह करते हैं हाकिम बहुत तअम्मुक3 से।
तुम्हारी अर्ज4 में गो कुछ ज्याद: तूल5 भी है।।
जगह भी मिलती है कोंसिल में आनरेबिल की।
जो इलतिमास6 हो उमद: तो वो कुबूल भी है।।
तरह-तरह के बना लो लिबासे रंगा रंग।
अलाव: रुई के रेशम भी और वूल भी है।।
चमक दमक की वो चीजे हैं हर तरफ फैली।
के आंख महव7 है खातिर8 अगर मुलूल9 भी है।।
अंधेरी रात में जंगल में है अयां10 इंजन।
के जिसको देख के हैरान चश्मे गूल11 भी है।।
शगुफत:12 पार्क हैं हर तर्फ रहरबों13 के लिए।
नजर नवाज14 है पत्ती हसीन फूल भी है।।
जब इतनी नेमते मौजूद हैं यहां ‘अकबर’।
तो हर्ज क्या है जो साथ उसके डेम फूल भी है।।
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1.  साथी, 2. निधियां 3. गहराई, 4. चौड़ाई, 5. लम्बाई, 6. याचना, 7. लीन होना, 8. मन, 9. उदासीन, 10. स्पष्ट, 11. प्रेत की आंख, 12. खिला हुआ, 13. रास्ता चलने वाले, 14. लुभावने