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Saturday 18 Nov 2017

इस स्वतंत्रता दिवस भारत को आजाद हुए 69 बरस पूरे हो जाएंगे और अगले साल यानी 2017 में सत्तरवींवर्षगांठ मनाई जाएगी।

 सर्वमित्रा सुरजन

इस स्वतंत्रता दिवस भारत को आजाद हुए 69 बरस पूरे हो जाएंगे और अगले साल यानी 2017 में सत्तरवींवर्षगांठ मनाई जाएगी। एक व्यक्ति के लिए यह उम्र का एक बड़ा पड़ाव होता है, जिसमें वह अपने जीवन को भरपूर जी लेने की बातें कर सकता है, लेकिन एक देश के लिए आजादी के 70 साल कुछ पलों की तरह ही होते हैं, विशेषकर तब जब उसने गुलामी की पीड़ा 2 सौ साल तक भोगी है। विदेशी गुलामी ने भारत के लोगों को ही नहीं, हमारी आत्मा को भी जंजीरों में जकडऩे की पुरजोर कोशिश की। हम क्या थे, क्या हैं और क्या हो सकते हैं, ऐसे विचारों को कुचल कर हम जो चाहेंगे, तुम वही रहोगे, जैसी भावना भारतीयों में भरने का प्रयास विदेशी आक्रांताओं ने किया और अंग्रेजी शासनकाल में तो मानो भारत के आत्मसम्मान को सिर उठाने का अवकाश ही नहींदिया गया। अंग्रेजों ने हमारे देश पर मनचाहा राज किया, मनमाना शोषण किया, लेकिन अपने तमाम प्रयासों के बावजूद वे भारतीयों के आत्मसम्मान, निज गौरव की भावना को पूरी तरह कुचल नहींपाए। अपने देश को आजाद कराने के लिए सबने अपनी क्षमता से अधिक योगदान, त्याग और बलिदान किए। यूं ऐसे लोग हर मुल्क में रहते हैं, जो निज स्वार्थ से ऊपर उठकर देश को नहींरखते, लेकिन उनका नाम इतिहास में दर्ज नहींहोता। देश उनका ही ऋणी होता है, जो अपना सर्वस्व देश के लिए दांव लगा देते हैं। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में एक ओर अलग-अलग विचारों से प्रेरित राजनेताओं ने जनता को जागरूक करने का काम किया, तो दूसरी ओर कलम के सिपाहियों ने भी अपनी भूमिका बखूबी निभाई। इनके लिखे जोशीले गीतों, गज़़लों, नज़्मों का वह असर होता था कि आम जनता, जो शांति से अपना जीवन बिताना चाहती थी, वह भी समरभूमि में उतरने से नहींहिचकिचाई। आजादी के लिए लिखे इस साहित्य से अंग्रेज उसी तरह घबराते थे, जैसे वे भारत की अनूठी सांस्कृतिक, सामाजिक एकता से खौफ खाते थे। अपने डर को काबू में करने का सबसे अच्छा विकल्प उन्हें सूझता था कि उस किताब, उस पर्चे को ही प्रतिबंधित कर दो, जिससे जनता में अपनी आजादी के लिए जोश पैदा हो। आज सात दशकों बाद भी उन गीतों, नज्मों, गज़़लों को गाने-गुनगुनाने या साधारण पाठ करने पर भी असाधारण अनुभूति होती है। आज की पीढ़ी बहुत से प्रचलित देशभक्ति गीतों से परिचित है, लेकिन बहुत से गीत, कविताएं समय के साथ पीछे छूट गई हैं। अक्षरपर्व के इस विशेषांक में हमने ऐसे ही कुछ गीतों, गज़़लों, कविताओं, नज्मों का संकलन किया है। यूं तो आजादी का साहित्य सागर की तरह है, जिसे कुछ पन्नों में समेटना नामुमकिन है, फिर भी गीतों के कुछ मोती पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं। उम्मीद है पाठक इन्हें पढक़र एक बार फिर वही रोमांच, जोश और देश से प्रेम की अनुभूति करेंगे, जैसी आजादी के संघर्ष में लगे लोगों को होती थी।