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Monday 20 Nov 2017

जनवरी 16 के अंक की प्रस्तावना में ललित जी ने अलाव पत्रिका के समकालीन गज़़ल विशेषांक के बहाने गज़़ल के कल और आज का एक सुविचारित लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है।

 युगेश शर्मा, भोपाल

जनवरी 16 के अंक की प्रस्तावना में ललित जी ने अलाव पत्रिका के समकालीन गज़़ल विशेषांक के बहाने गज़़ल के कल और आज का एक सुविचारित लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है। बिना लाग-लपेट के आपने जो टिप्पणियां गज़़ल की यात्रा, पड़ाव और उसके भविष्य के बारे में की हैं, वे यथार्थ और निष्पक्ष हैं। अवधूत जी ने वर्तमान परिवेश में वंदे मातरम का जो रोचक विश्लेषण किया है, वह पठनीय और मननीय दोनों है। जहीर कुरैशी के गज़़ल संग्रह कदम कदम पर चौराहे की समीक्षा पढक़र मूल गज़़लों को पढऩे जैसा लुत्फ आया। रमाकांत जी साहित्य की कौन सी विधा के मास्टर हैं। उनकी कथाओं में भी कमाल है और यात्रा वृत्तांत में भी। उनके साथ-साथ एक बार जैसे मैं भी पुरी हो आया।  जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था, तब एक बार जगदलपुर से किरंदुल तक की और अबूझमाड़ में इस छोर से उस छोर तक डा.ब्रह्म्ïादेव शर्मा के साथ दौरे का अवसर मिला था। वे तब बस्तर में कलेक्टर थे और मैं आदिम जाति कल्याण विभाग का अधिकारी हुआ करता था। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। तब बस्तर केवल जिला मुख्यालय था। किरंदुल में तत्कालीन आदिम जाति कल्याण मंत्री बलिराम कश्यप की अध्यक्षता में संवैधानिक संस्था-मप्र आदिम जाति मंत्रणा परिषद की बैठक हुई थी, उसी में बस्तर को संभाग बनाने एवं उसको जिलों में बांटने का प्रस्ताव पारित हुआ था, जो बाद में राज्य सरकार का निर्णय बना। मुझे प्रसन्नता है कि प्रस्ताव का मसौदा मैंने बनाया था।  मार्च अंक में कल्पनाशील आवरण पृष्ठ ने ही खुश कर दिया। प्रस्तावना में ललित जी ने आम आदमी की जिंदगी को नाम मात्र खर्च पर गतिमान रखने वाली साइकिल को खूब तबियत से महिमामंडित किया है। भूली-बिसरी साइकिल को पत्रिका के तीन पृष्ठों पर शिद्दत से याद करने-कराने पर ललित जी को बधाई। उपसंहार में आपने आम आदमी के जज्बातों को अभिव्यक्ति देने वाले निदा फाजली को जिन अल्फाज़ में श्रद्धांजलि अर्पित की है, वह खासतौर पर ध्यान आकर्षित करती है। डा.राजेश्वर सक्सेना का शोध एवं अनुभवपरक आलेख मायाराम सुरजन की चित्त रचना पढऩे न मिलती तो सम्मान्य बाबूजी के व्यक्तित्व और कृतित्व के कई विशिष्ट पक्षों से हम अनजान रह जाते। अनुपम मिश्र ने जीवन के अर्थ को सहज-सरल ढंग से समझाने का प्रयास किया है। उनमें गांधी चिंतन साफ झलकता है। मनीष वैद्य की कहानी सम्मन आज की असंवेदनशील व्यवस्था पर कोड़े फटकारती सी लगी। कस्तूरी दिनेश की कहानी आखिरी चिट्ठी बहुत मार्मिक है। सुंदर, पठनीय अंकों के लिए बधाई।