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Wednesday 23 May 2018

नौकरी के क्रम में लंबे समय तक बाहर रहा, लौटा तो अक्षरपर्व के कई अंक एक साथ मिले।

 

डॉ.वासुदेव, रांची

नौकरी के क्रम में लंबे समय तक बाहर रहा, लौटा तो अक्षरपर्व के कई अंक एक साथ मिले। कहानी विशेषांक देखकर सारिका के कहानी विशेषांकों की स्मृति ताजा हो गई। ललित जी ने कहानी विधा पर एक जबरदस्त भूमिका लिखी है और गुलेरी जी पर विस्तार से लिखा है। प्राय: लोग यही मानते हैं कि गुलेरी जी ने अपने पूरे जीवन में मात्र तीन कहानियां लिखी हैं- बुद्धु का कांटा, सुखमय जीवन और उसने कहा था। पर सच्चाई यह है कि उनकी एक चौथी कहानी भी है - पनघट। 91, पंढरीनाथ पथ, इंदौर -4 से निकलने वाली पत्रिका, जिसके संपादक रमेश अस्थिवर थे, के जुलाई 1985 (वर्ष-3, अंक-7) में वह कहानी छपी थी। जिसमें कहानी के साथ संपादक की टिप्पणी भी है - यादें, गुलेरी जी की जन्मतिथि 7 जुलाई के अवसर पर प्रस्तुत है उनकी विवादास्पद कहानी। उसी अंक में मेरी भी एक कहानी- मोहभंग, छपी थी। आज भी वह अंक मेरे पास है, आप चाहें तो उसकी छायाप्रति आपको भेज सकता हूं।
कहानी विशेषांक-2 में ललित जी ने जो प्रस्तावना लिखी है और आतंकवाद के मूल में पूंजीपति शक्तियों की ओर जो संकेत किया है, वह चौंकाने वाला ही नहींबल्कि डराने वाला भी है। मेरी समझ से इस विश्व-सरोकार की ज्वलंत समस्या पर धारावाहिक लिखने की जरूरत है। ललित जी की अध्ययनशीलता की दाद देनी होगी।