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Tuesday 21 Nov 2017

मई 2016 का अक्षर पर्व मिला। हमेशा की तरह मैं प्रस्तावना से पढऩा शुरू करता हूं, क्योंकि उसमें कुछ खास होता है ऐसा जो सोच को जगा देता है।

 

   -डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही’

मई 2016 का अक्षर पर्व मिला। हमेशा की तरह मैं प्रस्तावना से पढऩा शुरू करता हूं, क्योंकि उसमें कुछ खास होता है ऐसा जो सोच को जगा देता है। अरविन्द कुमार सिंह की पुस्तक की प्रस्तावना में आपने हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं-साप्ताहिकों और मासिक पत्रिकाओं का जो इतिहास दिया है वह नई सूचनाएं देता है। मैं अब भूलने लगा हूं। कुछ देर सोचने पर यह याद आया कि ज्ञानोदय से बहुत पहले कलकत्ता से एक मासिक पत्रिका निकलती थी, जो बहुत कुछ ‘सरस्वती’ की लाइन पर थी। उसका नाम था ‘विशाल भारत’ । जिन दिनों मेरी रचनाओं को उसमें स्थान मिला, उन दिनों श्री बनारसी दास चतुर्वेदी उससे अलग हो गये थे। जब वे सम्पादक थे तब प्रगतिशील साहित्य पर हिन्दी में पहला लेख ‘विशाल भारत’  में छपा था। सन् 1936 में शिवदान सिंह चौहान ने एक लेख लिखा था ‘हिन्दी में प्रगतिशील साहित्य की आवश्यकता’।  सन् 1936 के किसी महीने के अंक में चतुर्वेदी जी ने उसे प्रकाशित किया था। सम्पादकीय टिप्पणी के साथ। टिप्पणी में लेखक से असहमति व्यक्त की गई थी, फिर भी प्रकाशित करने का कारण उसके नए विचार थे। उस समय की पत्रकारिता में एक आदर्श का पालन किया जाता था। एक और पत्रिका मोहन सिंह सेंगर के सम्पादन में कलकत्ता से निकली थी,जिसका नाम याद नहीं आ रहा। कृपया यह न समझें कि मैं आपकी कमी निकाल रहा हूं। आपको पढक़र मैंने केवल अपनी याद को कुरेदा है।
                                         -डॉ. परशुराम शुक्ल ‘विरही’
भारतीय विद्यालय मार्ग, देवीपुरम् शिवपुरी (म.प्र.)
फोन- 07492-223133, फोन- 08989007999
टिप्पणी  - मोहन सिंह सेंगर नया समाज निकालते थे। एक मित्र ने दिनमान का उल्लेख न होने की ओर ध्यान आकृष्ट किया है और एक अन्य ने सरिता का। इन सुझावों के लिए धन्यवाद।
ललित सुरजन