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Tuesday 21 Nov 2017

‘अक्षर पर्व’ का पूर्णांक 199 (अप्रैल 2016) यथा समय मिला।

 

-प्रो. भगवानदास जैन, अहमदाबाद-382445 (गुजरात)

‘अक्षर पर्व’ का पूर्णांक 199 (अप्रैल 2016) यथा समय मिला। अंक स्तरीय सामग्री से सुसमृद्ध है। इस बार आपने ‘प्रस्तावना’ के अंतर्गत ‘नीरजा’ नामक बायोपिक हिन्दी फिल्म पर अपने स्पष्ट और सकारात्मक विचार व्यक्त किए हैं और उसे हर दृष्टिकोण से सफल व सुन्दर फिल्म बताया है। ललित जी के इस तटस्थ मूल्यांकन ने मुझे फिल्म नीरजा देखने के लिए प्रोत्साहित किया है।
‘उपसंहार’ में ‘हम किसकी जय चाहते हैं’ शीर्षक से आज के चर्चित मुद्दे भी तटस्थ समीक्षा की है। सर्वमित्रा जी ने पं. नेहरू के विचार और विधान के हवाले से अपना निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि हम वस्तुत: भारत या हिन्दुस्तान की विजय के बहाने देशवासियों की विजय के हामी है। यह जरूरी नहीं कि भारत हमारी माता है या पिता। यह ख्याल या विचार व्यक्ति सापेक्ष है। जयहिन्द बोलने वालों की देश-भक्ति पर सवालिया निशान लगाना एकदम बेबुनियाद है।
इस बार ‘पत्र’ के अंतर्गत महेन्द्र राजा जैन का प्रतिभाव पठनीय है। श्री जैन ने फरवरी 2016 के अंक में ललित जी के वर्धा हिन्दी शब्दकोष पर प्रकाशित सकारात्मक विचारों के बरक्स अपना सूक्ष्म अनुचिंतन व्यक्त किया है तथा उसमें समाविष्ट अप्रचलित अंग्रेजी शब्दों की भरमार की भत्र्सना की है। अन्य अनेक विसंगतियों की ओर भी पाठकों का ध्यान आकृष्ट किया है। विडम्बना तो यह है कि उक्त कोश के सम्पादक मंडल में तथाकथित 73 विद्वान सम्मिलित है। ललित जी के कोष से अनावश्यक व अन्यवहृत आंग्ल शब्दों को हटाने का अपना अभिमत प्रकट किया है जो समुचित व चिन्त्य है।