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Tuesday 21 Nov 2017

संवेदनहीन सलमान खान


सर्वमित्रा सुरजन
सलमान खान जैसे लोग यूं तो पूरी दुनिया में मौजूद हैं, लेकिन शर्म आती है यह सोचकर कि हमारे देश में वे नायक कहलाते हैं। सलमान खान को फिल्म इंडस्ट्री में बहुत से लोग प्यार से भाईजान कहते हैं। कुछ समय पहले उनकी बहन अर्पिता के विवाह व उसके बाद संतान के जन्म पर जो खबरें व तस्वीरें सामने आईं, उसमें अपनी बहन को बहुत प्यार करने वाले भाई के रूप में सलमान की छवि उभरी। फिल्मों में भी वे आज्ञाकारी पुत्र, मां के लाड़ले, महिलाओं का सम्मान करने वाले शख्स के किरदार में खूब पसंद किए जाते रहे हैं। अफसोस कि राजश्री प्रोडक्शन्स की फिल्मों का नायक प्रेम, हकीकत में आम महिला के लिए उतना संवेदनशील नजर नहीं आता। असल जिंदगी में सलमान खान महिलाओं के लिए कितना सम्मान रखते हैं, इसका अनुमान उनके एक साक्षात्कार में कही इस बात से लगाया जा सकता है, जिसमें फिल्म सुल्तान की शूटिंग के दौरान रिंग में कड़ी मेहनत और उसकी थकान की तुलना उन्होंने बलात्कार पीडि़ता से की। इस बयान के बाद स्वाभाविक तौर पर बवाल मचना था। मुमकिन है सलमान खान को इस एंटी पब्लिसिटी का फायदा सुल्तान के प्रदर्शन के दौरान मिले। लेकिन उनकी इस निम्नकोटि की मानसिकता ने इस देश में महिलाओं के सम्मान पर फिर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। सलमान खान के इस बयान के बाद राष्ट्रीय महिला आयोग ने उनसे उचित ही स्पष्टीकरण मांगा है। कुछेक महिला संगठनों ने उनके खिलाफ प्रदर्शन भी किया। लेकिन ऐसे हर अवसर पर क्षुद्र स्वार्थों के कारण बड़े सवालों को हल करने का मौका गंवा दिया जाता है। एक ओर संवेदनहीन बयान के कारण सलमान खान की आलोचना हो रही थी, दूसरी ओर उनके बचाव में फिल्म जगत की कई जानी-मानी हस्तियां उतर पड़ींऔर उनके कहे के निहितार्थ समझाने लगीं। मानो सलमान खान से एकता दिखाने का मौका चूकना नहींचाहिए। इस विरोध और समर्थन की बयानबाजी में असली मुद्दा गुम होता नजर आया। जब दिल्ली में सामूहिक बलात्कार कांड हुआ था, तब देश भर में रोष की लहर उठी थी, लेकिन तब भी राजनीतिक दलों ने इस मुददे को अपनी-अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए लपक लिया और बात महिला सुरक्षा से हटकर आपसी आरोप-प्रत्यारोप में उलझ कर रह गई।
निर्भया के बाद भी नृशंस बलात्कार की घटनाएं घटती रहीं और वृहत्तर समाज ने इन पर अफसोस करना तो दूर संज्ञान लेना भी जरूरी नहीं समझा, मानो समाज में यह सब चलता ही रहता है। संभवत: सलमान खान भी ऐसी ही मानसिकता से ग्रसित हैं। इसलिए उन्हें अपनी शारीरिक थकान समझाने के लिए बलात्कार पीडि़ता के शारीरिक कष्ट का उदाहरण देना पड़ा। कलाकार को संवेदनशील होना चाहिए। लेकिन सलमान खान में इतनी संवेदनशीलता भी नहीं है कि वे समझ सकेें कि बलात्कार से जितना शारीरिक कष्ट होता है, उससे कहीं ज्यादा मानसिक संताप भोगना पड़ता है। बलात्कार के बाद जिंदा रही पीडि़ता के शरीर के जख्म एक समय के बाद भर जाते हैं, लेकिन मन की पीड़ा आजीवन रहती है। बेशक सलमान खान इस मानसिक दर्द को कभी नहीं भोगेंगे, उनसे यह उम्मीद भी नहीं की जाती कि वे इस दर्द को समझेंगे, लेकिन इतना ही तो वे कर सकते हैं कि अपनी जुबान से पीडि़तों के दर्द को न कुरेंदे। एक बलात्कार पीडि़ता ने सलमान खान के बयान पर कहा है कि वे उन्हें सुपरहीरो मानती थीं, लेकिन वे इंसान भी नहीं हैं। उन्हें जो थकान हुई, वह उनके शौक और काम के कारण हुई, लेकिन बलात्कार पीडि़ता का दर्द न दवा दूर कर सकती है, न दुआ। वह इस जिंदा समाज में खुद को रोज मुर्दा समझती है। वे पूछती हैं कि सलमान क्या इस थकान से तुमने खुद को मुर्दा महसूस किया है। इसी तरह निर्भया की मां ने कहा है कि अगर वे मेरी बेटी से मिले होते तो उन्हें पता चलता कि बलात्कार पीडि़ता की क्या हालत होती है? सलमान खान इन सवालों का जवाब शायद ही दें। या इस बार भी साबित कर दें कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा। इस देश में पूंजी और सत्ता के धनी लोगों के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। सलमान के लेखक पिता सलीम खान ने ट्वीट कर उनकी ओर से माफी मांगी है और इस माफी में अपने लेखकीय कौशल का परिचय दिया है, कि गलती करना मानवीय है। मानवता के नाम पर ही सलमान खान ने बीइंग ह्यïूमन नामक समाजसेवी संस्था बनाई है। फिर उनके बयान में मानवता क्यों नहींदिखी? फिल्मनिर्माता सुभाष घई उन्हें बच्चा बतला रहे हैं। पचास बरस के सलमान खान का बचपना उनके मित्रों-परिजनों को मुबारक हो, लेकिन देश को ऐसे लोगों को नायक बनाकर सिर पर बिठाने के पहले सोचना चाहिए।