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Sunday 19 Nov 2017

गुड्डू बाबू की सेल : बाजार की उलटबाँसी

पल्लव
393 डीडीए, कनिष्क अपार्टमेंट्स
ब्लाक सी एंड डी
शालीमार बाग़
दिल्ली -110088
युवा मानसिकता पर हिंदी में अनेक कहानियाँ हैं। युवा मित्रों की भटकन और निराशा पर हिन्दी कहानी का ध्यान बार बार गया है। अस्सी के आसपास से देखें तो स्वयं प्रकाश की प्रभाव और अखिलेश की चि_ी के बाद भी अनेक कहानियाँ मिलेंगी। रघुनन्दन त्रिवेदी की कहानी गुड्डू बाबू की सेल इस चर्चा में विशिष्ट है। भारत में 1990 के आसपास से प्रारम्भ हुई उदारीकरण अथवा भूमंडलीकरण अथवा बाजारीकरण की प्रक्रिया के शुरुआती दिनों में ही यह कहानी कांकरोली से छपने वाली लघु पत्रिका सम्बोधन के मार्फत पहली बार पाठकों तक पहुँची थी। आश्चर्य यह कि तब बाजार के रंग इतने साफ देखने की आँख आमतौर पर नहीं थी तब भी त्रिवेदी लिख रहे थे- छोकरी अकेली सडक़ पर खड़ी हो तो बेकार है और टीवी के पास आकर खड़ी हो जाए तो लाखों की हो जाती है। कहानी एक कस्बे की है। जहाँ कालेज है और कालेज से पढक़र निकले बेरोजगार युवा भी। मामला यह है कि पंकज और कथावाचक सहपाठी हैं और कालेज से निकले तीन साल हो गए अब तक नौकरी नहीं मिली। पंकज के पिता दो महीने बाद रिटायर होने वाले हैं लेकिन कथावाचक को उम्मीद है कि ओबीसी होने के कारण और पिता के रिटायर होने में अभी छह साल का समय होने से कोई नौकरी मिल ही जाएगी। पंकज की तकलीफ ज्यादा है क्योंकि दो महीने बाद महँगाई और बढ़ेगी। दो महीने बाद भी बिजली का बिल आएगा। दो महीने बाद भी पोस्टल आर्डर के लिए पैसों की जरूरत रहेगी। दो महीने बाद भी सिगरेट और चाय की तलब रहेगी। दो महीने बाद क्या होगा? यही वह पंकज है जो अक्सर कहता है तीन साल की बेरोजगारी अच्छे-खासे आदमी को तोड़ देती है।
तो उम्मीद की किरण अब गुड्डू बाबू हैं। जिनके पिता का कपड़े धोने की मशीनों को बेचने का एक शो रूम था। गुड्डू बाबू कालेज में इन दोनों के सहपाठी थे। मोटे और गदबदे। वे सभी विषयों में फिसड्डी थे, जबकि पंकज की गिनती पढऩे वालों में होती थी। वाचक की टिप्पणी है- दरअसल हमारी स्थितियां भिन्न थीं। गुड्डू बाबू समय गुजारने के लिए पढ़ रहे थे और हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था, क्योंकि न तो पंकज के बाबू के पास इतना पैसा था कि वे उसे गुड्डू बाबू के पिता की तरह बाद में किसी धंधे में लगा सकते और न ही अपने बाबू से मैं ऐसी कोई उम्मीद रख सकता था। इसलिए जब हम पढ़ रहे थे तब पढऩे के लिए विवश थे और आज जब बेकार हैं तो गुड्डू बाबू से काम मांगने के लिए विवश। नौकरी का सपना धीरे धीरे तिरोहित होता जा रहा है और बकौल वाचक अब हालत यह है कि हम गुड्डू बाबू की कपड़े धोने की मशीनें बेचने के लिए उनकी सेल में काउंटर पर खड़े रहने को तैयार हैं।
कहानी असल में गुड्डू बाबू से इन दो बेरोजगारों की मुलाकात का ही ब्योरा है। पंकज इस मुलाकात के लिए बहुत उतावला है क्योंकि उसे पक्की उम्मीद थी कि इतने मामूली से काम के लिए गुड्डू बाबू मना नहीं करेंगे। इस उम्मीद का आधार है -काउंटर पर खड़ी रहने वाली इन फूहड़ लड़कियों से तो हम ज्यादा काबिल हैं। जरा इन लड़कियों को भी जाना जाए। ये संख्या में तीन हैं जिनके बारे में अफवाहें हैं कि ये सर्कस से आई हैं, यह भी कि ये काल गल्र्स थीं। इनका काम अनोखा है- टीवी में दिखाए जाने वाले विज्ञापन की तरह सेल में भी लड़कियां ग्राहकों को प्रत्यक्ष मशीन का उपयोग करके दिखाती हैं। वे अपना गाउन उतारकर (गाउन के नीचे उनमें से एक सफेद कुरता और निकर पहने हुए होती है, जबकि बाकी दोनों जींस के कटी बांहों वाले जैकेटनुमा कुरते और वैसे ही चुस्त बरमूडा) मशीन में डालती हैं। ठीक दो मिनिट बाद वे मशीन बंद करके दूसरा एक बटन दबाती हैं और अगले पाँच-सात मिनटों में लगभग सूखा हुई साफ-सुथरा गाउन लोगों के सामने होता है। पंकज का तर्क था कि हम लड़कियों की तुलना में ज्यादा फुर्ती से काम कर सकते हैं और यह भी कि हम ज्यादा पढ़े-लिखे हैं इसलिए ग्राहकों को मशीनों या दूसरी चीजों के बारे में अधिक बेहतर ढंग से बता सकते हैं।
गुड्डू बाबू ने साफ इंकार कर दिया। कहानी के बीचों बीच यह वाक्य है। जैसे उन्हें इस बाबत कोई बात ही नहीं करनी है। उन्हें साफ मालूम है- यह तो फिलहाल मुमकिन नहीं। और मशीन काउंटर तो तुमसे संभलेगा ही नहीं। पंकज मान नहीं रहा और गुड्डू बाबू को मनाने का प्रयास कर रहा है। गुड्डू बाबू ने पहले तो समझाया कि हम पढ़े-लिखे लोग हैं और इस कारण इतने मामूली काम के बजाय हमें कोई बड़ी नौकरी तलाश करनी चाहिए,  कि कहीं से लोन का जुगाड़ करके अपना खुद का धंधा शुरू करना चाहिए और अंतत: कि उनके पास हमारे लायक कोई काम नहीं। लेकिन पंकज के न मानने और गिड़गिड़ाने पर वे मजाक पर उतर आए और उन्होंने कहा यार पंकज, मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। कालेज के जमाने में तो तुम बड़े इंटेलीजेंट थे। पंकज की बेचारगी प्रकट होने पर उनका आगे व्यंग्य है -मैं सोचता था कि तुम काबिल आदमी हो, इसलिए बाजार के रंग-ढंग समझते होंगे। भाई, तुम क्या सोचते हो, इन लड़कियों की इतनी औकात है कि ये मशीनों को बेच सकें? यह तो धंधे का नया तरीका है प्यारेलाल, जिसमें लगता यह है कि लड़कियाँ मशीन बेच रही हैं जबकि हकीकतन मशीन लड़कियों को बेच रही है। छोकरी अकेली सडक़ पर खड़ी हो तो बेकार है और टीवी के पास आकर खड़ी हो जाए तो लाखों की हो जाती है। लडक़ी का मोल बढ़ा या लडक़ी के कारण टीवी का? सब गड्डमड्ड है प्यारे भाई, गड्डमड्ड।
बाजार की इस लीला को गुड्डू भाई चंद वाक्यों में सुलझाकर पंकज की बोलती बंद करवा रहे हैं और अंतत: दोनों मित्र निरुपाय लौट रहे हैं। कहानी में एक पेंच है। पेंच यह है कि कहानी जिस फ्लैशबैक में शुरू होती है वहां वाचक कह रहा है गुड्डूू बाबू की बात सुनकर मुझे झटका-सा लगा। वही बात पंकज ने कही होती तो मुझे ताज्जुब न होता। पंकज की तो आदत है ऐसी उलटी और पेचीदा बातें कहने की। तीन साल से सुन रहा हूँ उसकी उलटबांसियाँ। राह चलते रुक जाएगा और पूछेगा, यह सडक़ कब तक हम पर चलती रहेगी? वाचक के बाबूजी के खराब स्वास्थ्य और नौकरी के द्वंद्व पर पंकज ही कह सकता है- यह भी तो हो सकता है, नौकरी ही तेरे बाबू को खींच रही हो, जैसे वह तांगा। उसने दूर जाते हुए एक ताँगे की तरफ  इशारा किया और कहने लगा, वहां आदमी घोड़े को पाल रहा है या घोड़ा आदमी को? और गुड्डू बाबू ने कहा था- यह तो धंधे का नया तरीका है प्यारेलाल, जिसमें लगता यह है कि लड़कियाँ मशीन बेच रही हैं जबकि हकीकतन मशीन लड़कियों को बेच रही है।
गुड्डू बाबू की होशियारी यह है कि वे नए दौर में चीजों को नए ढंग से बेचने का हुनर जानते हैं। वे केवल लड़कियों को ही अपनी सेल पर बिक्री की मशीनों के साथ नहीं रख रहे अपितु शो रूम के बजाय सेल खोल रहे हैं। कहानी में बताया गया है- पहली बात तो यह कि सेल में वह भव्यता नहीं जो शो रूम की तरह डराती या हीन भावना उत्पन्न करती हो। दूसरी बात यह है कि गुड्डू बाबू की सेल में महंगी से महंगी चीज भी आसान किश्तों में मिल जाती है। आज की राजनीति में वही चेहरे चमक रहे हैं जो खुलेआम छोकरी को टीवी के पास खड़ा कर टीवी बेचने का कह रहे हैं। मुनाफे की यह प्रवृत्ति अंतत:क्या-क्या बिकवा देगी कहना मुश्किल नहीं।  
कहानी वाचक की टिप्पणी के साथ खत्म हुई है-वाकई मुझे उनके तर्क सुनकर ताज्जुब हुआ और अभी भी मैं यही सोच रहा हूँ कि गुड्डू बाबू इतने चतुर तो न थे ! उनकी यह चतुराई पैसे की वजह से है या चतुर होने के कारण उनके पास पैसा आ रहा है? ध्यान दीजिये पंकज जो सबसे काबिल है वह कहानी के शुरू में ऐसी उलटबांसी कहने की सामथ्र्य रखने वाला है और गुड्डू बाबू इस उलटबांसी को कहते ही नहीं करके दिखा रहे हैं। जो वाचक है वह अंत तक इस उलटबांसी को हल नहीं कर पा रहा। जाहिर है यह कथा युक्ति है लेकिन इस कथा युक्ति में इशारा साफ है। काबिल के पास काम नहीं और न वह संसाधन जुटाने में समर्थ है। जिसके पास संसाधन की ताकत है वह चीजें तय कर रहा है और जो सबसे संवेदनशीलता से हमें यह बता रहा है वह इस उलटबांसी में उलझा ही है। यही है बाजार की लीला।
कहानी में छिपे क्रूर व्यंग्य को पहचानना आवश्यक है जब गुड्डू बाबू दो बार पंकज को इंटेलीजेंट और काबिल कहते हैं। देखिए तो वे क्या कह रहे हैं? वे कह रहे है कि इस नए दौर में इंटेलीजेंट और काबिल की कोई जरूरत नहीं है अब तो बस होशियार आदमी चाहिए। स्वयं प्रकाश की कहानी है उज्ज्वल भविष्य जिसमें एक बड़े उद्योगपति एक बेरोजगार को काबिल और होशियार का फर्क समझा रहे हैं। काबिल आदमी अच्छा काम कर सकता है, पर होशियार आदमी के मुकाबले में आता है तो बौखला जाता है और हार जाता है। होशियार आदमी चाहे उतना काबिल न हो, काबिल लोगों से अपना काम निकलवाना जानता है। गुड्डू बाबू होशियार आदमी हैं जो काबिल लोगों को औकात बता रहे हैं। क्या भूमंडलीकरण ऐसा नहीं करता है?
17 जनवरी 1955 को जन्मे और 10 जुलाई 2004 को स्मृतिशेष हो गए रघुनन्दन त्रिवेदी बड़े कथाकार हैं क्योंकि वे इस होशियारी को शुरू में ही भांप गए थे और आगाह कर रहे थे। इस कहानी के लिए वे कोई असाधारण प्लॉट नहीं लाते और न कोई असाधारण घटनाएँ। सामान्य बातचीत की सहज भाषा में यह कहानी अपने को रचती है। और अब सोचिए तो याद आता है कि हमारे देखते देखते जीवन की सबसे जरूरी चीजों का उत्पादन करने वाले लोग आत्महत्या को मजबूर हैं और सबसे गैर जरूरी चीजों का उत्पादन कर रहे लोगों को धनवानों की सूचियों में शीर्ष स्थान मिल रहे हैं। यह है काबिलियत और होशियारी का फर्क। आवश्यकता की परिभाषा बदल देना ही होशियारी है और भूमंडलीकरण यही होशियारी करता है।  
आखिर में किस्सा यह है कि एजाज अहमद साहब एक जगह भाषण देने गए और भूमंडलीकरण का मनुष्य विरोधी चेहरा खूब अच्छे से दिखाया। एक उत्साही नौजवान भाषण के अंत में उनकी पीछे पड़ गया कि बताइये क्या करें? अब आप ही बताएं कि एजाज साहब क्या बताते?