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Wednesday 22 Nov 2017

गुड्डू बाबू की सेल


रघुनंदन त्रिवेदी
गुड्डू बाबू की बात सुनकर मुझे झटका-सा लगा। वही बात पंकज ने कही होती तो मुझे ताज्जुब न होता। पंकज की तो आदत है ऐसी उल्टी और पेचीदा बातें कहने की। तीन साल से सुन रहा हूं उसकी उलटबासियां। राह चलते रुक जाएगा और पूछेगा, ‘‘यह सडक़ कब तक हम पर चलती रहेगी?’’ मैं कुछ समझ पाऊं, इससे पहले ही वह हंसता हुआ आगे बढ़ जाएगा। इसी तरह किसी दिन जब मैं कहता हूं कि आज का दिन तो कटा, तब वह गौर से मेरी तरफ देखता है और पूछने लगता है, ‘‘सच बताओ, कौन कटा? दिन या कि हम?’’
पंकज की ऐसी उलटी और पेचीदा बातों के और भी कई उदाहरण हैं जो मुझे याद हैं, जैसे एक दिन जब हम दोनों तीन बत्ती चौराहे के पास खड़े थे और मैंने अपने बाबू के बारे में कहा था कि उनकी तबियत ठीक नहीं रहती, जैसे-तैसे वे नौकरी को खींचे जा रहे हैं। मेरी बात सुनने के बाद पंकज ने कहा था कि इससे उलटी बात भी हो सकती है। मैं उसकी बात का मतलब नहीं समझ पाया था, इसलिए चुप रहा। थोड़ी देर बाद उसने खुद ही मतलब समझाते हुए कहा था कि, ‘‘यह भी तो हो सकता है, नौकरी ही तेरे बाबू को खींच रही हो, जैसे वह तांगा।’’ उसने दूर जाते हुए एक तांगे की तरफ इशारा किया और कहने लगा, ‘‘वहां आदमी घोड़े को पाल रहा है या घोड़ा आदमी को।’’
आमतौर पर मैं पंकज की इस किस्म की बातों पर ज्य़ादा ध्यान नहीं देता, लेकिन उस दिन बाबू वाली बात सुनकर मेरा माथा भन्ना गया था और मैंने तय किया था कि उसका साथ छोड़ दूंगा। परन्तु अगले ही दिन, पूरा दिन अपनी समूची ऊब के साथ मेरे सामने पसरा हुआ था और मुझे पंकज के साथ की जरूरत महसूस होने लगी थी।
तीन साल पहले मैं और पंकज कॉलेज में थे; अब सडक़ पर। जब कॉलेज से निकले थे, तब हमारा सपना था- एक बड़ी-सी नौकरी। बड़ी-सी नौकरी का मतलब था- बहुत पैसा और पैसे के साथ अफसरी का रुतबा। परन्तु धीरे-धीरे हम ‘समझदार’ होते गए और अब हालत यह है कि हम गुड्डू बाबू की कपड़े धोने की मशीनें बेचने के लिए उनकी ‘सेल’ में काउंटर पर खड़े रहने को तैयार हैं। इसी कारण आज हम दोनों गुड्डू बाबू के पास गए थे।
गुड्डू बाबू कॉलेज में हमारे साथ पढ़ते थे। वे मोटे और गदबदे थे। उन दिनों चुस्त कपड़ों का फैशन था और गुड्डू बाबू नित नए कपड़े पहनते थे। $कीमती और नई काट की पोशाकों के बावजूद उनका शरीर बेडौल, चिकना और चिपचिपा-सा होने के कारण पंकज उन्हें वेसलीन से भरी हुई थैली कहता, जब वे अनुपस्थित होते। वे सभी विषयों में फिसड्डी थे, जबकि पंकज की गिनती पढऩेवाले लडक़ों में होती थी। दरअसल हमारी स्थितियां भिन्न थीं। गुड्डू बाबू समय गुजा रने के लिए पढ़ रहे थे और हमारे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था, क्योंकि न तो पंकज के बाबू के पास इतना पैसा था कि वे उसे गुड्डू बाबू के पिता की तरह बाद में किसी धंधे में लगा सकते थे और न ही अपने बाबू से मैं ऐसी कोई उम्मीद रख सकता था, इसलिए जब हम पढ़ रहे थे तब पढऩे के लिए विवश थे और आज जब बेकार हैं तो गुड्डू बाबू से काम मांगने के लिए विवश।
तीन साल की बेरोजगारी अच्छे-खासे आदमी को तोड़ देती है, पंकज अक्सर कहता है। यही बात मैं भी सोचता हूं, लेकिन मैं पंकज की तरह निराश नहीं हूं। मेरे मन में आस बची हुई है कि किसी दिन अचानक ही मुझे कोई नौकरी मिल जाएगी और तब मैं निश्चिंत होकर जी सकूंगा। मेरी इस उम्मीद के पीछे दो कारण हैं। एक तो यह कि मैं ओ.बी.सी. से हूं और दूसरी वजह यह कि मेरे बाबू के रिटायर होने में अभी छह साल बाकी हैं। पंकज की निराशा के पीछे भी उसके बाबू की नौकरी ही है, जो अब सिर्फ दो महीने और चलेगी।
दो महीनों बाद पंकज के बाबू रिटायर हो जाएंगे। दो महीने बाद बराबर आधे पैसों में घर चलाना पड़ेगा। दो महीने बाद महंगाई और बढ़ेगी। दो महीने बाद भी बिजली का बिल आएगा। दो महीने बाद भी पोस्टल ऑर्डर के लिए पैसों की जरूरत रहेगी। दो महीने बाद भी सिगरेट और चाय की तलब होगी। दो महीने बाद क्या होगा? आजकल यही सब सोचता रहता है पंकज। वह चिड़चिड़ा और ईष्र्यालु हो गया है। मेरे बाबू की छह साल और चलने वाली नौकरी से ईष्र्या करता है। कार में बैठकर जाते हुए किसी आदमी को देखकर सुलग जाता है। जिन मास्टरों से हम पढ़ें, उन्हें कोसता है। पढ़ाई को फिजूल बताता है। आरक्षण की व्यवस्था को गाली देता है। वह चाहता है जल्दी से जल्दी कुछ हो और उसकी जल्दी ही वह कारण है जो हम दोनों को गुड्डू बाबू के पास ले गई।
घंटाघर से रेलवे स्टेशन की तरफ जाने वाली शहर की सबसे व्यस्त सडक़ पर गुड्डू बाबू का शानदार शो-रूम है। शो-रूम से थोड़ी दूरी पर गुड्डू बाबू ने घरेलू चीजों की सेल लगा रखी है। मैं और पंकज पहले वहीं गए थे, लेकिन ‘सेल’ में गुड्डू बाबू कहीं नर नहीं आए। वहां काउंटर पर खड़ी एक लडक़ी से पूछने पर पता चला कि गुड्डू  बाबू इस वक्त शो-रूम में मिल सकते हैं।
शो रूम की तरफ जाते वक्त पंकज बहुत उतावला दिखाई दे रहा था। उसे पक्की उम्मीद थी कि इतने मामूली से काम के लिए गुड्डू बाबू मना नहीं करेंगे।
‘हम कोई उधार थोड़े ही मांगने जा रहे हैं’... ‘गुड्डू बाबू को इंकार करने से पहले सोचना पड़ेगा’... ‘काउंटर पर खड़ी रहने वाली इन फूहड़ लड़कियों से तो हम काबिल हैं’... ‘वेतन के  बारे में कोई जिद नहीं करनी है; गुड्डू बाबू अपने पुराने लोगों से कम भी देंगे तो चलेगा।’ रास्ते में पंकज जैसे खुद को भरोसा दिलाते हुए कहता जा रहा था और मैं मन ही मन गुड्डू बाबू की दिनोंदिन होती तरक्की के बारे में सोचता जा रहा था।
मुझे अच्छी तरह याद है कि गुड्डू बाबू के पिता का यही शो-रूम सालभर पहले सूना पड़ा रहता था। कपड़े धोने की ये मशीनें जो इन दिनों इस छोटे-से शहर में खूब चल निकली हैं, शो-रूम में पड़ी रहती थीं। इसकी एक वजह तो शायद यह थी कि इतने भव्य-शो रूम में जाते हुए आम आदमी को डर-सा लगता था। दूसरी बात शायद यह थी कि लोग एक-साथ इतना पैसा खर्च करके मशीन ले जाने से कतराते थे। लेकिन गुड्डू बाबू ने ‘सेल’ लगाकर धंधे में आने वाली इन्हीं रुकावटों को दूर कर दिया है। पहली बात तो यह कि ‘सेल’ में वह भव्यता नहीं जो शो-रूम की तरह डराती या हीन भावना उत्पन्न करती हो। दूसरी बात यह कि गुड्डू बाबू की सेल में महंगी ची भी आसान किस्तों पर मिल जाती है। इससे लोगों को एक-साथ ज्य़ादा रकम खर्च नहीं करनी पड़ती और वे एक अनुबंध-पत्र पर हस्ताक्षर करने के बदले टी.वी., फ्रि, क्रॉकरी, टेप-रिकार्डर और मिक्सी जैसी चीजे खरीद लेते हैं। परन्तु इन सब चीजो की तुलना में हमारे शहर में जो ची सबसे ज्यादा चर्चित है, वह है गुड्डू बाबू के यहां मिलने वाली वाशिंग मशीन। कुछ साल पहले इस कस्बेनुमा शहर के जो लोग टी.वी. पर इस मशीन का विज्ञापन देखकर भी इसे फालतू ची समझ रहे थे, वे ही लोग अब सौ रुपए मासिक किस्त पर इस मशीन को खरीदने लगे हैं। गुड्डू बाबू की ये मशीनें कोई अजूबा नहीं। अजूबा हैं वे लड़कियां जो ‘सेल’ में काउंटर पर खड़ी रहती हैं। और सच  बात तो यह है कि इस शहर में मशीनों से ज्य़ादा चर्चा उनका है। संख्या में वे कुल तीन लड़कियां हैं। एक का रंग गोरा है और होंठ मोटे; दूसरी का रंग भी साफ है लेकिन पहली के पास खड़ी होने पर वह कम गोरी लगती है, इसकी पहचान इसके घुंघराले बालों से होती है; तीसरी का रंग निस्संदेह सांवला है और उसकी पहचान या तो उसकी बड़ी-बड़ी आंखों से होती है या फिर उसकी पिण्डली के ख्म से।
इन तीनों लड़कियों के बारे में कहा जाता है कि ये पहले सर्कस में काम करती थीं। पहली, जिसके होंठ मोटे हैं, ट्रैक सूट पहनकर सर्कस में जिमनास्टिक किया करती थी। दूसरी, जिसके बाल घुंघराले हैं, दो खेलों के बीचवाले अंतराल को भरने के लिए दर्शकों के सामने आया करती थी। इस छोटे-से वक्फे में एक बौना जोकर भी दर्शकों के सामने आया करता था और वह इस घुंघराले बालों वाली लडक़ी के आगे अपनी मुहब्बत का इहार किया करता था। लडक़ी उसके प्रपोल को ठुकराती रहती थी और कभी-कभी उसे अंटशंट हरकतें करने का आदेश देकर दर्शकों का मनोरंजन करती थी। सर्कस की समाप्ति के समय वही  बौना जोकर, दर्शकों की मौजूदगी में, जबकि लडक़ी लापरवाह होने का अभिनय करती, चुपके-से आकर लडक़ी के गाल पर बोसा लेकर भाग जाया करता था। तीसरी लडक़ी, जिसका रंग सांवला है और पिण्डली पर ख्म हैं, शेर पर बैठकर दर्शकों के सामने आया करती थी। सुना है, गुड्डू बाबू इन तीनों को चेन्नै से यहां लाए हैं। लेकिन इनमें से पहली लडक़ी को छोडक़र बाकी दोनों जिस सा$फ-सुथरे लहजे में हिन्दी बोली लेती हैं, उससे लगता है कि वे दक्षिण की बजाय उत्तर भारत के ही किसी शहर में आई हैं। ये लड़कियां सर्कस में थीं या नहीं, यह बात भी दावे से नहीं कही जा सकती क्योंकि वे सब सुनी-सुनाई बातें हैं। कहा तो यह भी जाता है कि ये तीनों सर्कस में नहीं, बल्कि मुंबई या दिल्ली जैसे किसी बड़े शहर में कॉल गल्र्स थीं, जिन्हें फुसलाकर गुड्डू बाबू यहां ले आए हैं। जो भी हो, मशीनों की बिक्री का गुड्डू बाबू का तरीका इस छोटे-से शहर के लिए अनोखा है। अनोखा यों कि इससे पहले हमारे यहां इतने बड़े पैमाने पर महीनों चलती रहनेवाली ‘सेल’ कभी नहीं लगी थी। दूसरी बात यह कि मशीन के प्रचार के लिए गुड्डू बाबू ने विचित्र तरीका अपनाया है। टी.वी. में दिखाए जाने वाले विज्ञापन की तरह ‘सेल’ में भी लड़़कियां ग्राहकों को प्रत्यक्ष मशीन का उपयोग करके दिखाती हैं। वे अपना गाउन उतारकर (गाउन के नीचे उनमें से एक कुरता और निकर पहने हुए होती हैं, जबकि बाकी दोनों जीन्स के कटी बांहों वाले जैकेटनुमा कुरते और वैसे ही चुस्त बरमुड़ा) मशीन में डालती हैं। ठीक दो मिनट बाद वे मशीन बंद करके दूसरा एक बटन दबाती है और अगले पांच-सात मिनटों में लगभग सूखा हुआ साफ-सुथरा गाउन लोगों के सामने होता है। धुलाई के इस प्रदर्शन के लिए कई बार वे ‘सेल’ में रखे  हुए गंदे कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं तो कई बार ग्राहकों के कुरते या पतलून उतरवा लेती हैं। खैर, जैसा कि मैं कह चुका हूं, पंकज का ख्याल था कि गुड्डू बाबू को हमें काउंटर पर खड़ा करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। उसका तर्क यह था कि हम लड़कियों की तुलना में ज्य़ादा फुर्ती से काम कर सकते हैं और यह भी कि हम ज्य़ादा पढ़े-लिखे हैं इसलिए ग्राहकों को मशीनों या दूसरी चीजों के बारे में अधिक बेहतर ढंग से बता सकते हैं। लेकिन गुड्डू बाबू ने साफ इंकार कर दिया।
‘भाई, यह तो फिलहाल मुमकिन नहीं। मेरे यहां इस वक्त एक भी आदमी की जरूरत नहीं। जब भी जरूरत होगी, मैं तुम्हें बुला लूंगा। और मशीनों वाला काउंटर तो तुमसे संभलेगा भी नहीं।’ गुड्डू बाबू ने कहा था।
‘‘क्यों, क्यों नहीं संभलेगा? गुड्डू बाबू, आपकी इन फूहड़ लड़कियों से कहीं ज्य़ादा अच्छी तरह हम ग्राहकों को मशीन की खूबियां बता सकते हैं। इसके अलावा मैं थोड़ा-बहुत रिपेयर का काम भी जानता हूं।’’ पंकज ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए गुड्डू बाबू को मनाने का प्रयास किया।
पंकज की बात सुनकर थोड़ी देर के लिए गुड्डू बाबू गंभीर हो गए, लगा कि वे उसके प्रस्ताव पर सोच रहे हैं, लेकिन उनके चेहरे से यह भी जाहिर था कि वे इस स्थिति से निपटने के लिए किसी लिहा में पडऩे को कतई तैयार नहीं होंगे। सचमुच ऐसा ही किया उन्होंने। पहले तो उन्होंने समझाया कि हम पढ़े-लिखे लोग हैं, इस कारण इतने मामूली काम के बजाय हमें कोई बड़ी नौकरी तलाश करनी चाहिए, कि कहीं से लोन का जुगाड़ करके अपना खुद का धंधा शुरू करना चाहिए, कि उनके पास हमारे लायक कोई काम नहीं। लेकिन जब पंकज बराबर गिड़गिड़ाता रहा तो अचानक गुड्डू बाबू मजाक पर उतर आए। पंकज की तरफ झुकते हुए (क्योंकि बीच में एक बड़ी टेबल थी और गुड्डू बाबू टेबल के उस तरफ, जिधर दीवार थी, एक घूमनेवाली कुर्सी पर बैठे थे) उन्होंने कहा, ‘‘यार पंकज, मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। कॉलेज के माने में तो तुम बड़े ‘इन्टेलीजेन्ट’ थे।’’
उनकी बात सुनकर एकबारगी पंकज सकपका गया। वह खिसियाकर मेरी तरफ देखने लगा। मैं चुप था और उन दोनों की बातचीत सुनते हुए गुड्डू बाबू की मंगवाई हुई चाय पी रहा था।
‘‘क्यों गुड्डू बाबू, ऐसा मैंने क्या कह दिया?’’ पंकज के चेहरे पर बेचारगी थी और वह वाकई बेवकूफ लग रहा था। वह बार-बार मेरी तरफ देखता रहा था ताकि इस बातचीत में मैं उसका पक्ष लूं। परन्तु मुझे शुरू से ही गुड्डू  बाबू के इंकार का अनुमान था, और अब तो मैं जल्दी से जल्दी चाय खत्म करके वहां से उठना और बाहर खुली हवा में जाकर गुड्डू बाबू को गाली देना चाहता था। मगर जब तक बातचीत पूरी नहीं हो जाती, मुझे वहां चुपचाप बैठना था; क्योंकि, अगर मैं पंकज को वहां से चलने के लिए कहता तो बाद में वह सारा दोष मेरे ही मत्थे मढ़ देता।
‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं पंकज भाई। मैं सोचता था कि तुम काबिल आदमी  हो, इसलिए बाजार के रंग-ढंग समझते होगे। चलो, कोई बात नहीं। मैं ही बताता हूं,’’ गुड्डू बाबू ने कहना शुरू किया- ‘‘भाई, तुम क्या सोचते हो, इन लड़कियों की इतनी औकात है कि ये मशीनों को बेच सकें? यह तो धंधे का नया तरीका है प्यारे लाल, जिसमें लगता यह है कि लड़कियां मशीन बेच रही हैं जबकि ह$की$कतन मशीन लड़कियों को बेच रही है। तुमने देखा होगा, आजकल चाय की पत्ती के साथ चम्मच फ्री, शर्बत के साथ गिलास फ्री, फ्रिज के साथ वाकमैन फ्री, और अब तो हालात यह है राजा बाबू कि टी.वी. में चित्रहार के साथ भी इनाम जुड़ा हुआ है। ऐसे में यह पता लगाना मुश्किल है कि गिलास के कारण शर्बत बिक रहा है या शर्बत के कारण गिलास। छोकरी अकेली सडक़ पर खड़ी हो तो बेकार है, और टी.वी. के पास आकर खड़ी हो जाए तो लाखों की हो जाती है। टी.वी. से लडक़ी का मोल  बढ़ा या लडक़ी के कारण टी.वी. का? सब गड्डमड्ड है प्यारे भाई, गड्डमड्ड।’’
गुड्डू बाबू के इस वक्तव्य के बाद पंकज एक शब्द भी नहीं बोल पाया। हम शो-रूम से निकले और सडक़ पर आ गए। अपनी आदत के विरुद्ध पंकज ने गुड्डू बाबू को गालियां नहीं दीं। वापसी के वक्त वह चुप था और मैं गुड्डू बाबू के वक्तव्य से चकित। वाकई मुझे उनके तर्क सुनकर ताज्जुब हुआ और अभी भी मैं यही सोच रहा हूं कि गुड्डू बाबू इतने चतुर तो न थे। उनकी यह चतुराई पैसे की वजह से है या चतुर होने के कारण उनके पास पैसा आ रहा है?