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Tuesday 21 Nov 2017

ख़्वाब जो गुमशुदा हो गए


अनिल अग्निहोत्री
‘कमल वास्यम्’, बी-115, समाधिया कॉलोनी
कृष्णविहार, तारागंज, लश्कर, ग्वालियर (म.प्र.) 474001,
 मो. 09826232559
विता लिखना इतना सरल तो नहीं, जितना मोमबत्ती से पत्थर पर लकीर का उकेरना (प्रकाश दीक्षित) और गल लिखना भी इतना आसान नहीं है क्योंकि इसमें एक बात कहनी है और एक बात छिपानी है- शाश्वत लेखन के लिए यह परम आवश्यक है- कि क्या लिखना है और क्या नहीं लिखना है?
 कवि, गीतकार डॉ. हिमांशु चतुर्वेदी का सद्य: प्रकाशित गल संग्रह ‘ख़्वाब जो गुमशुदा हो गये’ हमें वर्तमान की पीड़ा, भोगे हुए यथार्थ और मानवीय संवेदनाओं से रूबरू कराता है। संग्रह का शीर्षक न केवल आत्मीय परक है, प्रत्युत एक प्रश्नाकुलता भी जगाता है, कि आखिर जो ख़्वाब हमने संजोये थे वे गुमशुदा क्यों हो गये? तफसील से इनकी पड़ताल जरूरी थी। इन गलों को बार-बार पढऩे पर लगता है कि ये गलें समकालीन संवेदना और समझ की मुखर प्रतिध्वनि हैं। अनुभवों की विविधता और शिल्प का रचाव इन गलों को और भी अधिक मनोरम और संप्रेषणीय बनाता है- बानगी देखिये-
एक रीता हुआ कलश लेकर / जिंदगी सौ सगुन उठाती है
तुम तो आंगन से द्वार तक / दृष्टि देहरी से लौट जाती है
 डॉ. हिमांशु की गलों में भाषा सिर्फ उपकरण अथवा अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं है, वे एक लम्बे जीवनानुभव का पर्याय हैं। भाषा अपने समय से तालमेल करती हुई दिखाई देती है। कवि की दृष्टि, निष्ठा और उसकी क्षमता हमारे सामने पसरी हुई नर आती है:-
‘समेट लेने में माहिर जहां जहां से मिले
वे शहीदों के वारिसान हो नहीं सकते’
इन गलों में कवि ने अपनी बिम्ब योजना और प्रतीक विधान को पर्याप्त स्पेस दिया है :-
धुंध के गांव में धूप का घर
अजनबी जिसमें ठहरे मिले।
***
उम्र की नींद में घाव सोया हुआ
तुमने देखा तो फिर नव-युवा हो गया।
***
जिंदगी तेरे शहर में किस कदर आसान है
एक पत्थर की नदी में प्यास का स्नान है
आदमी और समाज, मानव और नियति और अनुभूति से संपृक्त कवि का रचना संसार हमें अपने समय से मुठभेड़ करता हुआ यथार्थ के धरातल पर खड़ा दिखाई देता है। कवि के रचना-कर्म में इस तरह की तासीर को आसानी से देखा जा सकता है। उपरोक्त संग्रह की रचनाएं इस बात को भी रेखांकित करती हैं कि कवि लम्बे समय तक अपने वर्तमान से जूझता रहा है।
इस संग्रह की रचनाएं सामाजिक चेतना के गहन मानवीय संस्पर्श की भावना पर केन्द्रित हैं। ये गलें वास्तव में एक नये भावलोक का निर्माण करती हुई हमें सोचने को मबूर करती हैं कि कवि के मन में जो लावा धधक रहा था उसे उलीचने का काम कवि द्वारा बखूबी किया गया है, और यही इन रचनाओं की मूल ताकत है। भरोसे और विश्वसनीयता के संकट काल में या मूल्यों के क्षरण के इस दौर में डॉ. हिमांशु की गलें जीवन के प्रति आश्वस्ति प्रदान करती हुई पूरी ताकत से हमारे सामने मुखरित हुई हैं। इन गलों में अपने समय, समाज और संस्कृति से बड़ी शिद्दत के साथ रिश्ता कायम करने की एक अभिनव पहल हमें बखूबी दिखाई देती है।
 आत्मबोध के साथ ईमानदारी लेखन की पहली शर्त है जिस पर कवि सवा सोलह आने टंच खरा उतरा दिखाई देता है। परिपक्वता की आंच पर रखी हुई शब्दों की हांडी में उफनते हुए भाव इस संग्रह का वैशिष्ट्य है। भाषा और शिल्प के स्तर पर यह गल संग्रह हिमांशु को भीड़ से सर्वथा अलहदा खड़ा हुआ दिखाई देने में पर्याप्त सक्षम प्रतीत होता है।