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Friday 24 Nov 2017

जीवन की उचाट नीरसता को भगाने का प्रक्षेपण

शहंशाह आलम
प्रकाशन विभाग
बिहार विधान परिषद
पटना- 800015
उल्लेखनीय है कि ‘इस खण्डित समय में’ रोहित कौशिक का पहला कविता-संग्रह है। लेकिन इनकी काव्य-यात्रा काफी पहले से आरंभ रही है। उल्लेखनीय यह भी है कि रोहित कौशिक सीधे-सीधे काव्य-पथ के पथिक नहीं है। इनका रचनात्मक हस्तक्षेप विभिन्न साहित्यिक विधाओं के साथ रहा है। वैसे रोहित कौशिक मूलत: पत्रकार हैं। इसलिए रोहित जिस विधा में जो भी रचते हुए दिखाई देते हैं, इनका पत्रकार मन समाज, राजनीति सब पर मुखर-प्रखर दिखाई देता है। एक पत्रकार वाला गुस्सा भी। परन्तु इसमें संदेह नहीं कि रोहित कौशिक की कविता को लेकर समझ एक समझदार कवि जैसी है। इनकी कविताओं में समाज का यथार्थ स्पष्ट दिखाई-सुनाई देता है। इनकी कविताओं में जीवन का उजाला है, जीवन का अंधेरा है और विविधता भी :
इस खंडित समय में
विखंडित होकर
चले गए हैं सब
अपने-अपने कंक्रीट के
तपते घरौंदे में
अजीब जंगल है कंक्रीट का
जहां तपन है
फिर भी संबंधों में गर्मी नहीं (‘कैसे बचा रहेगा गांव’/पृ.15)।
रोहित कौशिक का स्वभाव ऐसा है कि वे किसान और गांव के दुखों को अपने संग्रह में पहला स्थान देते हैं। यह सच भी है कि गांव में शोषण, अन्याय, अनैतिकता का बोलबाला अब भी वैसा ही है जैसा पहले से ग्रामीण जीवन में होता आया है। रोहित कौशिक लोकजीवन को बचाए रखने के पक्ष में पूरी मजबूती से खड़े हैं। वे यह जानते-मानते हैं कि लोकजीवन का, लोक संस्कृति का बचे रहना बेहद जरूरी है। सच तो यही है कि गांव बचेगा तभी तो जीवन का ‘लोक’ बचा रह पाएगा। रोहित की इस वाजिब चिंता पर शासन-प्रशासन को गौरो-$िफक्र करना चाहिए।
रोहित कौशिक अपने समय-समाज के प्रति प्रतिबद्ध कवि हैं। इसलिए वे अपने समय के अत्याचारी-दुराचारी के विरुद्ध अक्सर विरोध प्रकट करते दिखाई देते हैं। वे प्रेम की स्मृति को लिए यहां-वहां दनदनाते, घूमते, चरते दिखाई नहीं देते। बल्कि रोहित कौशिक अपने आसपास के दुखी लोगों की चिंता में पूरी करुणा के साथ अपनी चिंता को पुरजोर व्यक्त करते हैं, इस उम्मीद को लिए हुए कि उनकी इस आवाज को सबकी आवाज मिलेगी :
कल जब निपट जाएगा काम
निपट जाएगी चिंता भी
सोचा था मैंने
पर हर दिन
जुड़़ जाता है एक नया काम
और देहरी पर
आ खड़ी होती है
एक नई चिंता
बिलकुल चमकती धूप की तरह (‘चिंता’/पृ. 17)।
रोहित कौशिक सांप्रदायिक उन्माद जैसी भयावह समस्या को लेकर कई दूसरे कवियों की तरह गहरे दुखी दिखाई देते हैं। इस समस्या पर उनका अचूक शब्दबाण न हिन्दू पक्ष को छोड़ता है, न मुस्लिम पक्ष को बख्शता है। रोहित अपनी कविता- ‘इंसान बनने में’ स्पष्ट कहते हैं : ‘हिन्दू, हिन्दू बने रहें/मुसलमान बने रहे हैं मुसलमान/क्योंकि इंसान बनने में/धर्म नष्ट होता है श्रीमान!’ अपनी एक और कविता ‘दंगा’ में कहते हैं : ‘दंगे के समाजशास्त्र पर/चर्चा में मशगूल हैं बुद्धिजीवी/जबकि दंगे का न तो कोई समाजशास्त्र होता है/और न धर्मशास्त्र।’ रोहित संग्रह की अपनी पहली ही कविता- ‘आओ’ में एकदम सीधे-सीधे कह देते हैं : ‘आओ हम यूं ही/मरते-काटते रहें/और फूलने दे संतों की तोंद/बढऩे दें चोटी और तिलक की लम्बाई/फलने दें मौलवियों की दाढ़ी।’ रोहित इस सा$फगोई से अपने देश की साम्प्रदायिकता रूपी सड़ांध को समाप्त करना चाहते हैं।
‘इस खंडित समय में’ संग्रह में रोहित कौशिक की लगभग पचास कविताएं संग्रहित हैं। रोहित समकालीन कविता के युवा कवियों में थोड़ा इसलिए अलग स्वर लिए हुए दिखाई देते हैं कि रोहित के पास एक प्रखर युवा पत्रकार की ते आंख भी है। एक पत्रकार और एक कवि आंखों से रोहित जिस तरह अपने समय को देखते हैं। अपने समय के शत्रुओं को देखते हैं, वह काबिले-तारीफ है। रोहित के पास समकालीन कविता को देने के लिए जो सहज भाषा है, जो सहज मानवीय संवेदना है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए।