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Monday 20 Nov 2017

‘‘अपने-अपने सपने’’- गागर में सागर

प्रभाकर चौबे

शुक्ला प्रोविजन स्टोर के पास, गोल चौक
रोहिणीपुरम, रायपुर
(छ.ग.)- 492009
मो. 9425513356
‘अपने-अपने सपने’’ ठहर, थम जरा छोटी! तू हर दिन रोटी के ही सपने सुनाती है, क्या तुझे दूसरे सपने नहीं आते? एक बच्चे ने पूछा। ‘‘क्या दूसरे सपने भी होते हैं?’’ आश्चर्य मिश्रित भोलेपन से भरा छोटी का जवाब था, और सवाल भी। यह कथन प्रसिद्ध लघु व्यंग्य कथाकार घनश्याम अग्रवाल के संग्रह की लघुकथा ‘‘अपने-अपने सपने’’ का है। ‘‘क्या दूसरे सपने भी होते हैं’’ कथन में जबरदस्त व्यंग्य है। गरीब बस्ती में रहने वाली छोटी लडक़ी रोज ही अपना सपना अपने मित्र मंडली को सुनाती है। एक दिन वह सपना सुना रही थी। ‘‘कल मैंने सपने में एक रोटी देखी कि... सपना सुनाना शुरू होते ही एक बच्चा गुस्सा हो जाता है और कहता है- ‘‘तू हर दिन रोटी के ही सपने सुनाती है, क्या तुझे दूसरे सपने नहीं आते...’’ इस सवाल के जवाब में वह कहती है- ‘‘क्या दूसरे सपने भी होते हैं’’ और व्यंग्यकार की टिप्पणी ‘‘आश्चर्य मिश्रित भोलेपन से भरा छोटी का जवाब था, और सवाल भी।’’ दरअसल ‘‘अपने-अपने सपने’’ का व्यंग्य उन पर व्यंग्य है जो बच्चों को उपदेश देते फिरते हैं कि बच्चे बड़े-बड़े सपने देखें। बच्चों को सपने देखना चाहिए। अधिकतर हमारे नेता ही इस तरह का उपदेश देते रहते हैं कि बच्चे सपने देखें। जो चेतन अवस्था में देखा, वही तो सपने में देखेंगे। एक भूखे व्यक्ति के सपने में रोटी ही आएगी और सुखी व्यक्ति के सपने में अच्छे होटल में लिया गया डिनर दिखेगा। बेरोजगार युवक सपने में ‘‘रोजगार’’ देखेगा। बड़े साहब के सपने में फाइलें आती हों शायद और चपरासी को डांटता हो। ‘‘अपने-अपने सपने’’ घनश्याम अग्रवाल के लघु व्यंग्यों का संग्रह है। अधिकतर व्यंग्य एक-सवा पेज में पूरे हो गए हैं। इस अर्थ में वे लघु व्यंग्य लेखक माने जा सकते हैं। लेकिन उनके लघु व्यंग्य हंसाने के लिए नहीं। इन पर से गुजरते हुए समाज में व्याप्त तरह-तरह की विसंगतियों का सपना दिखता रहता है और हम उन विसंगतियों से मुठभेड़ कर पाते हैं जिनके बारे में हमने कल्पना भी नहीं की होती है। इस तरह घनश्याम अग्रवाल (व्यंग्यकार) की नजर पैनी है और समाज में जो कुछ छिपाए जाने की कोशिश की जाती रहती है, उन्हें व्यंग्यकार की आंखें, उनके अंदर तक धंसकर देख लेती हैं। और सामने लाती हैं। लेकिन व्यंग्यकार इनका या ऐसी विसंगतियों से बंधे व्यक्ति या व्यक्ति समूह का उपहास नहीं उड़ाता। वह एक तरह से सचेत सा करता है और ऐसी विसंगतियों से दो-चार होते हुए वह स्थिति को सामने रखने का काम बड़ी खूबी से करता है। संग्रह में अलग-अलग उपशीर्षक से नब्बे लघु व्यंग्य कथाएं हैं और सभी में गूढ़ार्थ हैं- एक भी व्यंग्य चलताऊ किस्म का नहीं है। लेखक के अवलोकन की दाद देनी पड़ेगी। कितनी सूक्ष्म दृष्टि है। जिस तरह से गिद्ध आसमान पर उड़ता हुआ जमीन पर पड़े सूक्ष्म आहार पर भी झपट्टा मारकर अपना काम कर जाता है। उसी तरह व्यंग्यकार भाई घनश्याम अग्रवाल ने बारीकी से समाज को परखा है और विसंगितयों पर झपट्टा मारकर उसे समाज के सामने ला दिया है। इनमें कहीं भी उपदेश नहीं है। कहीं भी व्यक्तिगत कटाक्ष नहीं है। लेकिन समाज की दशा के दर्शन तो कराते ही हैं। और सुधार के लिए प्रेरणा की अंतर्धारा तो इन व्यंग्यों में बह ही रही है।  इन नब्बे में कौन-कौन से व्यंग्य ज्यादा अच्छे हैं या किन्हीं पांच-दस श्रेष्ठ व्यंग्यों की सूची बनाओ कहने पर मैं फेल हो जाऊंगा- 5-10 की क्या सूची बनाऊं, यहां सभी श्रेष्ठ हैं, किताब को हाथ में लिया तो ‘‘पढ़ते जाओ-पढ़ते जाओ’’ की स्थिति हो जाती है। इसलिए मैं 5-10 पढऩे या किन्हीं को बहुत अच्छा कहने की स्थिति में नहीं हूं। यह मेरे लिए संभव भी नहीं है। विषय गूढ़ है लेकिन घनश्याम भाई की भाषा प्रवाहमान है- एक बार भाषा पर उतरे तो उसके प्रवाह में बहते गए- कहीं रोक-टोक नहीं। सरल भाषा में इतनी सार्थक बातें, यह साधना मांगती है। पूरा संग्रह पढक़र लगता है कि घनश्याम भाई ने शब्दों की साधना की है। शब्दों को साधा है और इतना साधा है कि एक भी अक्षर अनावश्यक नहीं फेंकते- वाह! कह सकते हैं- नावक के तीर देखने में सीधे लगे, घाव करे गंभीर। एक साथ नब्बे लघुकथाएं और सबकी सब व्यंग्य की धारा में कसी हुई। भाई घनश्याम अग्रवाल ने संग्रह में ‘‘मेरा सपना’’ कथन में लिखा है- ‘‘जिन्दगी ख्वाब है और ख्वाब में झूठ और सच में कोई फर्क नहीं होता। मगर वे होते तो हैं ही। ख्वाब मुट्ठी भर दानों का हो या कि दुनिया मुट्ठी में करने का हो, सबके अपने-सपने सच होते हैं और अपने-अपने झूठ।’’ इन लघु कथाओं में आदमी के ख्वाब की सुंदर परिकल्पना भी प्रस्तुत होती है। इन लघु कथाओं के अंदर सही सपनों की हल्की तस्वीर पेश की गई है। लघुकथा लिखना आसान नहीं है। फिर उनमें व्यंग्य की हल्की परत बिछाना तो और भी कठिन है। विनोद भट्ट ने फ्लैप पर सही लिखा है- ‘‘कम शब्दों में बड़ी बात कहना, जहां लघुकथा की विशेषता होती है, वहीं लेखक की कसौटी भी। घनश्याम अग्रवाल की लघुकथाएं कसौटी पर खरी उतरी हंै।’’