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Monday 20 Nov 2017

समकालीन कविता का युवा उत्स

जनार्दन मिश्र
संकटमोचन नगर,
नई पुलिस लाइन
आरा, पिन-802301 (बिहार)
मो. 09334295077

चर्चित युवा कवि अरुण शीतांश का दूसरा काव्य संग्रह-  ‘हर मिनट एक घटना है’ बोधि प्रकाशन, जयपुर से छपकर आया है। इनका प्रथम काव्य संग्रह- ‘एक ऐसी दुनिया की तलाश में’ जो वर्ष 2011 में वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित था, काफी चर्चित रहा। ‘हर मिनट एक घटना है’... अपने आप में कवि और कविता का चरम उत्कर्ष है... जहां कविता पूर्णरूपेण अपना आकार ग्रहण करती है... हर मिनट एक घटना है/ हर क्षण एक घटना है / जो कुछ खास घट रहा है / सामाजिक मूल्यों के लिए... (‘शक्ल’ पृष्ठ सं. 29)। प्रसिद्ध युवा आलोचक डॉ. भरत प्रसाद के द्वारा इस काव्य संग्रह की भूमिका में ठीक ही लिखा गया है कि अरुण का कवि बेतरह पक्षधर है परिधि के जीवन का, बुझी हुई मशालों का, मरती हुई आवा•ाों का, लडख़ड़ाते कदमों का और पथराई हुई लाखों आंखों का...।
अरुण अपनी कविता में जीते हैं। कवि का वार्तालाप अपनी कविता से होता है... इनकी कविता का मूल स्वर- इसका सौन्दर्यबोध- बिम्ब-प्रतिबिम्ब स्वत:स्फूर्त हैं। कवि अरुण शीतांश अपनी एक कविता में जब कहते हैं- स्त्रियां हाईटेक होते हुए भी बचाए रखी हैं लाज.../ स्त्रियों ने काजल लगाकर देश को बुरी नजरों से बचाया है / और सिंदूर लगाकर किया है धमाल/ लक्षमीबाई से लेकर झलकारी बाई तक ने की है ललकार... (स्त्रियां ही बता सकती हैं... -स्त्रियों के बारे में- पृ.सं. 61)
अरुण शीतांश प्रतिरोध के कवि हैं- जब वे कहते हैं- मेरा रास्ता इधर नहीं / उस जगह हो/ जहां सबको अन्न पानी हो। आज रास्ता भूल गए हैं हम। जहां से शुरू होता है / और खत्म होता है... शायद रास्ता ऐसे ही बनेगा / तोड़-फोडक़र / जोडक़र। रास्ता ऐसे ही बनेगा (पृष्ठ सं. 14)
उक्त संदर्भित कविता में कवि की छटपटाहट, जद्दोजेहद देखी जा सकती है। कवि एक मुक्कमल रास्ते की तलाश में संघर्षरत है। वह सारी वर्जनाओं से टकाराना चाहता है। इस क्रम में हमें राष्ट्रकवि दिनकर की पंक्ति याद आती है- जब वे कहते हैं- ‘‘रे रोक युधिष्ठर को न यहां / जाने दो इनको स्वर्ग धीर...।’’
जिस जगह पे लड़कियां नहीं जातीं / जहां लड़कियों का दिमाग जाता है / जहां लड़कियों के पांव लडख़ड़ाते हैं / वहां उनके केहुनियां तेज चलती हैं...
अरुण बाजारवाद में फंसी लड़कियों के प्रति अपना जोरदार विरोध दर्ज करते हुए कहते हैं कि लड़कियां पागल नहीं होती / प्रेम की दीवानी होती हैं / प्रतीक्षा करती महारानी होती हैं / लड़कियों को जूते के कपड़े प्रिय होते हैं। वे चलने से पहले चेहरे को नहीं जूती को देखती हैं / चूती हुई जुल्फों को नहीं / कमर में कसी कट्टे को टोती है / लड़कियां किसी को टोकती नहीं... (कमर में कसी कट्टे को टोती लड़कियां- पृ.सं. 21)
अरुण शीतांश उम्मीद के कवि हैं। उम्मीद और स्मृतियोां के सहारे जीते हैं। जब वे कहते हैं- ‘अब अंधेरे साफ होगा / और छू जाएगा समय / धंस जाएगी धरती एक फीट नीचे / परिणाम क्या होगा / पता नहीं / रात तो यूं चलती जाएगी / और अंधेरा साफ होता जाएगा। कोई पैसे नहीं लगेंगे/सिर्फ प्रेम होगा... (रात यूं चली गई- पृ.सं. 92) यह कविता बद्रीनारायण की प्रसिद्ध कविता ‘प्रेम पत्र’ की याद दिलाती है।
अरुण शीतांश के संग्रह से गुजरते हुए हमें ऐसा महसूस होता है कि इनका काव्य फलक विस्तार की ओर तेजी से उन्मुख है। ये सिर्फ अपने समय और समाज से संवाद करना ही नहीं चाहते- इस क्रम में इनकी कविता- खेतों में पांव रोपता राजकुमार, इस वक्त बारिश में, चटाई, दइया फेन चुनावे चल्ली फूलन बहु ना, दृष्टव्य है। कवि गांव-गिरांव, पगडंडियों, खेत-खलिहान, लोक परंपराओं को बचाना चाहता है और उन सभी परंपराओं को जो मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखती हैं, सजग रखती हैं।  कुत्ते की आवाज पीछा नहीं छोड़ती जीवन का / यह कैसा जीवन है जिसके दरवाजे पर बराबर रात्रि / दस्तक देती हैं... (आबरू पृ.सं. 37)
उक्त पंक्तियां कवि के अन्तर्मन में यूं ही नहीं उतरी हैं। ये कवि और इसकी कविता का विस्तार करती हैं। स्पष्ट है कि कवि अपनी कविता के प्रति सामाजिक दर्शन व तत्वचिंताओं से ओतप्रोत हैं। वह समय को साधता है और समय इसे। इस क्रम में प्रसिद्ध कवि शलभ श्रीराम सिंह की कविता - ‘चीखो! कि तुम्हारी चीख /  शब्दों और अर्थों को मरने / और गिरने से रोक सकती है / भाषा की चीख की बगल में / खड़ी करो अपनी चीख... कवि अरुण के तल्ख तेवर का बार-बार स्मरण दिलाती है।
मुहम्मद इजहारूल हक जब अपनी कविता में कहते हैं- ‘हर दरख्त की अपनी शक्ल होती है/ अपनी आदतें / और अपने दर्द / वे इस जमीन से जुदा नहीं होते / जिनमें उनकी जड़ें होती हैं... इस क्रम में कवि अरुण की कविता ‘शक्ल’ कहीं न कहीं समय से टकराती हैं और मानवीय पक्षधरता के लिए संवाद करती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कवि अरुण संभावनाओं के कवि हैं। इनकी कविताएं भले ही किसी को अपनी कद-काठी में छोटी लगें, मगर किसी ओर से छोटी नहीं हैं। काफी असरदार एवं धारदार हैं। कवि प्रकृति और आमजनों की प्रवृत्ति को बहुत मजबूती से पकड़ता है। बाजारवाद, वैश्वीकरण, स्त्रीविमर्श आदि का परत-दर-परत अपने तरीके से अनुसंधान करता है और अपनी कविताओं पर और धार चढ़ाता है।
कवि अरुण का दूसरा काव्य संग्रह प्रशंसनीय एवं संग्रहणीय है। यह संग्रह अपेक्षाएं जगाने में सफल हैं।