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Monday 20 Nov 2017

मेरी अधिकांश रचनाएं अपने निजी अनुभवों का ही समाजीकरण हैं -सुधा अरोड़ा

निर्मला डोसी
ए-5, ओरियन सेक्टर-1
चारकोप कांदिवली (पश्चिम)
मुंबई-400067,
मो. 9322496620
‘‘एक औरत की नोटबुक’’ पढऩे के बाद सुधा अरोड़ा से निर्मला डोसी की बातचीत  
सुधा अरोड़ा ने आधी सदी यानी पचास वर्ष की लंबी लेखकीय यात्रा तय की है। लेखन के साथ सामाजिक चेतना व समझ ने उनके लेखन को हमेशा सामयिक मुद्दों और समस्याओं से जोड़े रखा। पिछले दिनों उनकी एक अलग तरह की किताब आयी है, ‘एक औरत की नोटबुक’। लेखन की अनेक विधाओं को एक साथ संजो कर पुस्तक के नाम को सार्थक स्वरूप दिया है।  चूंकि लेखिका ने लगभग बीस सालों तक पीडि़त स्त्रियों के साथ काम किया है, उनकी आपबीती सुनी है, उसके परिणाम देखें हैं, जाहिर है लेखन का मूल आधार सच्चाई है और सच्चाई की गूंज जबरदस्त होती है। पुस्तक के आलेख हो या कथाएं या फिर कविताएं सारी सामग्री गहरे शोध व अनुभव का निचोड़ प्रतीत होती हैं।  ‘एक औरत की नोटबुक’ पुस्तक में विधाएं चाहे अनेक हो किंतु स्वर एक ही प्रतीत होता है और वह है - औरतों में अपने प्रति भी संवेदना जगाना, उन्हें जागरूक करना, उनके अंदर खोए आत्म विश्वास को पाने का हौसला भरना।  किताब को पढऩे के लिए पाठक को प्रयास नहीं करना पड़ता, पुस्तक स्वयं को पढ़वा ले जाने की कूवत रखती है। इस विषय में लेखिका से जो विस्तृत चर्चा हुई  पाठकों के लिए प्रस्तुत है ।
प्र. आप एक लंबे समय तक कहानियां ही लिखती रहीं। फिर कहानियों से आलेखों और फिर कविताओं की ओर मुड़ जाने की कोई ख़ास वजह?
हर विधा की अपनी ज़मीन है, अपनी ताकत है। कहानी लिखने के लिये हमें आज के घटनाक्रम से एक दूरी बनानी पड़ती है। कहानी लिखना एक लंबी प्रक्रिया है । वह अंदर ही अंदर पकती रहती है। कभी दो चार महीने तो कभी कई साल तक। आज कोई घटना हुई या कोई हादसा हुआ जिसने हमें विचलित किया तो उसे हम तत्काल किसी कहानी में नहीं ढाल सकते पर उस हादसे का हम विश्लेषण ज़रूर कर सकते हैं। उसके पीछे के कारणों को खंगाल सकते हैं। भविष्य में ऐसे हादसे न हों, उस पर अपने सुझाव सामने रख सकते हैं । यह काम आलेखों के माध्यम से किया जा सकता है। जहां तक कविता का सवाल है वह एक इंटेसिटी से जन्म लेती है । किसी चोट को, तकलीफ़  को या आक्रोश को हम कम शब्दों में संप्रेषित करना चाहते हैं तो कविता उसके लिये सबसे कारगर विधा है। विधा का चुनाव हमारे भीतर की बेचैनी अपने आप कर लेती है। उसके लिये हमें सायास एक कोशिश नहीं करनी पड़ती ।
प्र.    हाल ही में फेमिना में प्रकाशित इस किताब की समीक्षा में लिखा है - ‘‘स्त्री विमर्श पर आधारित किताब ‘एक औरत की नोटबुक’ उबाऊ मानी जानेवाली इस विधा में नई जान फूंकने का माद्दा रखती है।’’ माना जाता है कि यह क्रिया सैद्धांतिक और वैचारिक है और सिद्धांत ऊब पैदा करते हैं। आपने इसे विचार से जमीन पर उतारने की जहमत क्यों और कैसे उठाई ?  
जैसे विज्ञान की कक्षाओं में हम थ्योरी और प्रैक्टिकल करते हैं, वैसे ही साहित्य में भी सिद्धांत और व्यवहार का विभाजन किया जा सकता है। यह किताब एक तरह से सिद्धांतों का व्यावहारिक पक्ष है। सिद्धांत जानने के लिये आपको देश विदेश के विशेषज्ञों के मतों का अपने समाज और अपने देश के लोगों की मानसिकता के हिसाब से अध्ययन करना पड़ता है जबकि उसका व्यावहारिक पक्ष आपको जीवन से और अपने अनुभवों से ही समझ में आता है। यह किताब अपने अनुभवों और महिला सलाहकार केंद्रों में आने वाली पीडि़त महिलाओं की केस स्टडी के बाद ही लिखी गई है।
यह तो लेखक का पक्ष हुआ । गृहीता यानी गृहण करने वालों के भी स्पष्टत: दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। हमारे यहां महिलाओं के दो वर्ग हैं। एक प्राध्यापकीय प्रबुद्ध वर्ग है और दूसरा सामान्य गृहिणियों का - जो पढ़ी लिखी हैं, अच्छा साहित्य पढऩा चाहती हैं । दूसरा वर्ग ज़्यादा बड़ा वर्ग है। भारतीय समाज और परिवार में घर की गृहिणी से सबकी बहुत गहरी अपेक्षाएं होती हैं और उन्हें हर महिला अपनी अपनी तरह से डील करती हैं। अपनी समस्याओं को सुलझाती हैं। कई स्त्रियों की किताबों से कोई खास अपेक्षा नहीं होती। एक बड़ा वर्ग किताबों को सिर्फ़ वक्तकटी का सामान समझता है। देश-विदेश की फेमिनिस्ट महिलाओं ने कौन से सिद्धांत गढ़े हैं, उन्हें प्रचारित किया है, उनका पाठकवर्ग अलग है। ये सभी छात्राएं जो एक रूटीन जि़न्दगी जीती हैं और सिर्फ़ डिग्री हासिल करने के लिये स्त्री विमर्श विषय को पढ़ती हैं , वे इस विशय की गहराई में तब तक नहीं उतर सकतीं जबतक खुद इन समस्याओं से सीधे सीधे रू ब रू नहीं होतीं ।
प्र. जिस हिंसा के निशान दिखाई नहीं देते... के बारे में कुछ सवाल...! यह आपका सबसे चर्चित और प्रशंसित आलेख है। आपने कहीं लिखा है कि इस आलेख को लिखने में बारह साल लग गये। कोई खास वजह ?
यह सच है, निर्मला ! 1995 में मैंने स्त्री मुद्दे पर अपना पहला आलेख लिखा था - आक्रामकता के खिलाफ़ । उसके अंत में एक पैराग्राफ़ मानसिक यातना पर था - जिसे इमोशनल एब्यूज़ कह सकते हैं। इसका एक अनछुआ पक्ष मेरे ज़ेहन में धंसा हुआ था जिसे मैं विस्तार देना चाहती थी। जब जब मैंने इस आलेख को महिलाओं की किसी कार्यशाला में पढ़ा, उस आखिरी पैराग्राफ़ पर बात की गई। आखिर सन् 2006 से मैंने उस पैराग्राफ़ पर काम करना शुरु किया। 2008 तक एक ड्राफ़्ट तैयार हो चुका था। बाद में आपके ही कहने पर मुंबई की संभ्रांतवर्ग की संस्था ‘‘अर्चना’’ में जब इस लेख को पढ़ा तो पूरे माहौल में कैसी बेचैनी दिखाई दी, उसकी गवाह आप भी हैं। पहले महिलाएं सकते में आ गईं, फिर आश्वस्त भी हुईं। सभी जगह ऐसी ही प्रतिक्रिया हुई जिसने मुझे विश्वास दिलाया कि यह मध्यवर्ग से लेकर धनाढ्य वर्ग की महिलाओं तक एक बहुत बड़े वर्ग की समस्या है और इसे रेखांकित किया जाना चाहिए। 2010 से 2015 तक इसमें बहुत कुछ जुड़ा। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसपर अपने अनुभवों से लगातार सामग्री में संशोधन और एडीशन किए जा सकते हैं।
प्र. हिंदी साहित्य में ऐसे आलेख को कब और किस पत्रिका में जगह मिली ?
इस आलेख को छपवाने में काफ़ी परेशानी हुई। यह लंबा विस्तृत आलेख था। सबसे पहले हंस पत्रिका के लिए राजेंद्र यादव जी को दिखाया तो उन्होंने लंबा कहकर मना कर दिया। फिर मैंने ‘तद्भव’ के लिए अखिलेश को भेजा। सोचा, वहां तो लंबे आलेख के लिए काफ़ी गुंजाइश थी। वहां भी कुछ महीने पड़ा रहा। एक दिन वहां फ़ोन किया तो अखिलेष ने कहा - मेरे सामने विजय राय बैठे हैं जो उत्तरप्रदेश पत्रिका निकालते थे, अब एक नयी पत्रिका ‘लमही’ निकालने जा रहे हैं, उसके प्रवेषांक के लिए दे दूं क्या। सोचा, कहीं तो छपे। ‘लमही’ प्रवेशांक के आखिरी पन्नों पर आलेख छप गया। हिंदी में जिस आलेख को छपवाने के लिए मशक्कत करनी पड़ी , उसी का अंग्रेज़ी में अनुवाद कर जब हिंदू मैगज़़ीन में भेजा तो उन्होंने दस दिनों के अंदर संडे हिंदू मैंगज़़ीन के पूरे फ्रंट पेज पर प्रमुखता से इसे लिया। हिंदू मैगज़़ीन में छपते ही यह आलेख ज़बरदस्त चर्चा में आ गया। दो दिन में देश विदेश से सौ से ज़्यादा मेल आईं। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यू.के. के कुछ मनोवैज्ञानिकों, डॉक्टरों और काउंसिलिंग की कुछ वेबसाइट्स ने इसे अपनी साइट पर लिया। इसका मराठी अनुवाद ‘साप्ताहिक सकाळ’ में अगले ही हफ़्ते आ गया। विक्टिम महिलाओं के वयस्क बच्चों और कई पाठक पाठिकाओं से संवाद हुआ। आलेख में कई और पैराग्राफ़ जुड़े। 2012 तक यह निरंतर संशोधित-परिवद्र्धित होता रहा। अब 2015 में राजकमल से छपी किताब में इसका परिमार्जित, अब तक का फ़ाइनल, स्वरूप है!  
प्र. क्या साहित्य सृजन और सामाजिक कार्य परस्पर विरोधी हैं ? कौन सा काम अधिक संतोष देता है ? काउंसिलिंग सेंटर से निरंतर जुड़ाव के कारण हर बार नये केसेज़ और नयी समस्याओं से साबका पड़ा। कभी सोचा ही नहीं था कि महिलाएं इस इस तरह की क्रूरताओं और जटिलताओं से गुजऱती हैं। अपना भोगा और अब तक देखा-सुना भी नाकाफ़ी था। इन अनुभवों से ज़्यादा इनकी पृष्ठभूमि और इसके सामाजिक कारण लेखन के कारक तत्व बने। मैंने अपने में भी एक जागरुकता महसूस की, अपनी निजी समस्याओं को देखने का भी एक नज़रिया मिला और मेरे लिए साहित्य के मायने ही बदल गए। यह कहना सही होगा कि सामाजिक कार्य और साहित्य सृजन - दोनों काम परस्पर विरोधी नहीं, सहयोगी ही बने । पर यह ज़रूर हुआ कि जिस वक़्त आप किसी केस से जूझ रहे होते हैं, उस वक्त मानसिक रूप से पूरी तरह उसमें इन्वॉल्व होते हैं,  उस समय कविता कहानी रचने का उपक्रम नहीं किया जा सकता क्योंकि उस मन:स्थिति में साहित्य में भाषायी चमत्कार रचने की ऊर्जा नहीं बचती। मन्नू दी (मन्नू भंडारी) ने मुझे कई कई बार यह कहा - तुम इन सब सामाजिक मुद्दों पर आलेखों में इतना ज़्यादा उलझ गई हो कि तुम्हारे कहानीकार होने की पहचान खोती जा रही है। वे मेरे प्रति बहुत लाड़ से कहती हैं - ‘‘तू यह सब छोड़ और बस कहानियां लिख नहीं तो सिर्फ़ एक एक्टीविस्ट बनकर रह जाएगी।’’ पर उनके इन उलाहनों का मुझ पर कोई असर नहीं होता। महिलाओं की समस्याओं से उलझना और उनके लिए उन्हें डॉक्टरी, कानूनी या पुलिस की मदद उपलब्ध करवाना और आखिऱ उनके चेहरे पर आत्मविश्वास की मुस्कान देखना मेरे लिए ऑक्सीजन का काम करता रहा है जो मुझे एक कहानी लिखने से बड़ा लगता है। कुछेक छोटी छोटी कहानियां ही लिखीं उन दिनों । इन कहानियों का कच्चा माल उन केसेज़ से उठाया हुआ बिल्कुल नहीं था। जब तक आप किसी दूसरे की तकलीफ़ को पूरी तरह आत्मसात न कर पाएं, प्रामाणिक लेखन नहीं किया जा सकता। मेरी अधिकांश रचनाएं अपने निजी अनुभवों का ही समाजीकरण हैं, उन्हें एक बड़े दायरे में देखना है।
प्र.    ‘मैं दोपहर की फुर्सत में नींद दिलाने के लिए कहानियां नहीं लिखती। मैं चाहती हूं कि कहानी पढ़ कर आती हुई नींद भाग जाये?’ यह काम कहानी के बाद दिए गए लेख बखूबी करते हैं। यह किताब स्त्री मुद्दों को बंद कमरों से बाहर लाने की कोशिश में कामयाब रही है! - फेमिना में यह लिखा गया है। आप क्या कहती हैं ?
सुलाने के लिए तो कोई भी नहीं लिखता । जो सामाजिक विसंगतियां या शोषण के अलग-अलग स्वरूप हमें बेचैन                    करते हैं, उनसे हम लिखकर मुक्त होना चाहते हैं। अगर वह पठनीय बन पाता है और दिलचस्पी को बरकरार रखते हुए अपने को पूरा पढ़वा ले जाता है और पाठक को भी डिस्टर्ब करता है तो यह एक रचनाकार की सफलता है। कुछ मुश्किल विषयों को हंसी में चुटकी लेते हुए अगर हम आम पाठक पाठिकाओं तक पहुंचाने में सफल हो जाते हैं तो यह एक बड़ी सफलता है।
ऽ    ‘हेल्प’ से अनेक कहानियों का कच्चा माल मिला होगा। यकीनन आपके भीतर बहुत सी कहानियां या उपन्यास लिखे जाने की प्रतीक्षा में हैं ?
हां, यह तो सच है कि हेल्प के केसेज़ ने मुझे बहुत उद्वेलित किया। रेगुलर केसेज़ की कम से कम सात आठ या ज़्यादा सिटिंग्स होती थीं। एमरजेंसी केसेज़ की भी दो तीन होती थीं । हमलोग रजिस्टर में केस दजऱ् किया करते थे और यह दर्ज करना मेरे ही जिम्मे था। मैं उन सभी पर लिखना भी चाहती थी पर उनके बारे में लिखना एक तकलीफ़देह प्रक्रिया है।  अभी सब स्मृतियों में है। दो-तीन ही कहानियां आ पाई हैं बाहर । एक तो मेरी सबसे चर्चित कहानी ‘अन्नपूर्णा मंडल की आखिरी चि_ी’ दूसरी ‘ताराबाई चॉल: कमरा नं 135’ तीसरी - एक औरत: तीन बटा चार। लिखे जाने की प्रतीक्षा में अनंत कथाएं हैं। डायरी में लिखे नोट्स हैं। देखें कितना बाहर लाने की हिम्मत जुटा पाती हूं।
प्र. एक साथ दस काम शुरू कर लेने से ज्यादा अच्छा यह नहीं कि एक को संपूर्ण कर दूसरे में हाथ डाला जाए ?
व्यावहारिकता तो यही कहती है । आमतौर पर लेखक एक उपन्यास को शुरु करते हैं और उसे मुकाम तक पहुंचाने के बाद ही दूसरा काम हाथ में लेते हैं । मैं बहुत बेचैन आत्मा हूं । मुझसे इस तरह का अनुशासित लेखन नहीं हो पाता। कई बार तो लेखन में भी व्यवधान आ जाता है। किसी पीडि़त महिला को आपकी ज़रूरत है । आपको इंसानियत के नाते उसे समय देना ही होगा । बेशक आप कुछ नहीं करते, सिर्फ़ सुनते हैं उसकी बातें, पर सुनना भी समय तो मांगता है। दूसरी वजह क्या है , मैं किसी रचनात्मक काम में लगी हूं तभी मेरे पड़ोस में एक साढ़े चार साल की बच्ची का रेप हो जाता है । उसकी रोज़ की उठापटक की, उस क्षेत्र में चल रहे बवाल की रिपोर्ट मुझे मिल रही है। अब धरने मोर्चे पर तो बैठने की उम्र नहीं रही। जितना जो कर सकती हूं , करती हूं। लेखन उस वक्त बैकड्रॉप में चला जाता है। ऐसी मन:स्थिति में आप लिख नहीं सकते। मैं सारे काम छोडक़र बच्चियों के यौन शोषण पर आलेख लिखने बैठ जाती हूं। 16 दिसंबर को जब निर्भया कांड हुआ, मैं 29 दिसंबर तक कोई काम नहीं कर पाई। आखिर उस पूरी तकलीफ़ को कविता में उतार लेने के बाद ही मुझे चैन मिला। तो मुझ जैसा कमज़ोर दिल इंसान रूटीन बनाकर लेखन नहीं कर सकता । मेरे लिखने में इसलिये व्यवधान आते रहे हैं।       
प्र. आज लेखकीय सरोकार काफी बदले हैं। आप सामयिक घटनाओं से उद्वेलित होकर जो लिखती हैं वह भीतरी दबाव है या बाहर की मांग ?
बहुत अच्छा सवाल है निर्मला। भीतर का ही दबाव ज़्यादा रहता है वरना आप हर स्थिति में नीरो की तरह बांसुरी बजाते रह सकते हैं। कोई असामान्य घटना घटती है, उसी वक्त लिखा तो नहीं जा सकता। बस, एक दबाव सा बनकर भीतर बैठ जाता है और जब तक निकासी नहीं पाता, भीतर खदबदाता रहता है। हां, कई बार बाहर के दबाव से भी चीज़ें पूरी हो जाती हैं। इसका श्रेय संपादकों को जाता है। बुत जब बोलते हैं को लिखना आसान नहीं था। अगर विजय राय जी ने लगातार छह महीने कहानी भेजने का दबाव न बनाया होता तो शायद वह लिखी नहीं जाती। पर शुरुआत तो भीतरी दबाव से ही होती है।
प्र.    लेखन के अतिरिक्त दूसरा कौन-सा काम है जिसे करके संतोष मिलता है।
किसी मुसीबतज़दा की समस्याओं को सुनना और उसे उस भंवर से बाहर निकालने की कोशिश करना - यह लंबे अरसे तक मुझे इस हद तक संतोष देता रहा कि लेखन को बैकसीट मिल जाना भी नहीं अखरा। बहुत वक्त दिया और बहुत सुकून भी पाया। उस सुकून ने अपने को जि़ंदा रखने की ताकत भी दी। पिछले कई सालों से यह काम छोड़ दिया क्योंकि अंतत: यह आपकी बहुत सारी ऊर्जा भी मांगता है। ऐसे समय में कलम ने गहरी दोस्ती निभाई। लेखन के बाद स्ंागीत राहत देता है।
प्र. किसी वजह से कुछ सार्थक नहीं लिखा जा रहा होता है तो क्या अंदर बेचैनी तारी रहती है या उसे सहज भाव से लेती हैं ?
मैं इस स्थिति से कई बार गुजऱी हूं जिसे राइटर्स मेंटल ब्लॉक कहते हैं। एक लेखक का मानसिक अवरोध उसे बहुत तकलीफ़ देता है। दिमाग़ में बहुत कुछ उमड़ घुमड़ रहा है पर शब्द साथ नहीं देते, शब्द मिलकर संप्रेषण की एक मुकम्मल भाषा नहीं बना पाते। हम समझ ही नहीं पाते कि हमें क्या हो रहा है। यह नितांत व्यक्तिगत मामला है। सबके साथ एक सा हो, ज़रूरी नहीं। कुछ लोग ऑफि़स के काम की तरह दस से पांच की रूटीन बनाकर लिखते हैं । मेरे साथ ऐसा नहीं होता। मेरी कलम अराजक है। एक बार एक संस्था की प्रतिनिधि ने कहा - हम देशप्रेम की कहानियों का एक संकलन निकाल रहे हैं। बहुतों ने फऱमाइश पर देशप्रेम की कहानियां लिखीं। लोग दंगों पर, सांप्रदायिक सद्भाव कहानियां गढ़ लेते हैं। मैं अगर दंगों की आग में खुद न झुलसी होती तो ‘काला शुक्रवार’ और ‘जानकीनामा’ जैसी कहानियां नहीं लिख पाती। ‘काला शुक्रवार’ पहले एक रिपोर्ताज या संस्मरण की तरह ही लिखा था। बाद में उसे कहानी बनाया गया।
प्र. अपने से अलग और बाहर की दुनिया में भी बहुत कुछ लिखने के लिए कच्चा माल बिखरा है , क्या कहानियों को ढूंढने के लिए बाहर की ओर भी देखती हैं ?
मुझे लिखने के लिए कभी कहानियां ढूंढने जाने की ज़रूरत नहीं हुई। इतने सारे विषय क़तार में लगे अपने लिखे जाने का इंतज़ार करते रहते हैं । कितना कुछ अपने आसपास घटता हुआ हम देखते हैं। लगता है, इन्हें लिखकर ही अपना कैथारसिस किया जा सकता है। फिर वही बात कि लेखन अपने लिए एक थेरेपी है, चिकित्सा है।
 हम रचनाकारों के अपने अपने द्वीप हैं। ऐसी दुनिया है जिसे हम पहचानते हैं। उसमें अगर रचना कर हमें सुख मिलता है तो उसे आप कितना भी सीमित या छोटी दुनिया का विशेषण दें पर किसी भी लेखक के लिए लेखन के विषय का चुनाव उसका निजी मसला है। उसे कोई डिक्टेट कैसे कर सकता है ?
प्र.    लेखन के मूलत: तीन आयाम होते हैं। सृजन से पहले, सृजन के समय और सृजन के बाद। इस विषय पर आप अपने मन की ऊहापोह को शब्द दे सकती हैं ?
हर रचना के पहले अलग मन:स्थिति होती है। कुछ कहानियां अपने को लिखवा ले जाती हैं और कुछ को लिखने के लिये मशक्कत करनी पड़ती है। लिखने के दौरान कभी कभी लगता है कि सिरे जुड़ ही नहीं पा रहे और घटनायें अधर में बेसहारा झूल रही हैं। बेहतर है कि ऐसी रचना को एक दु:स्वप्न मानकर स्थगित कर दिया जाये बजाय इसके कि रचना को एक मुकाम तक पहुंचाने में हम ख़ुद को यातना शिविर में बनाये रखें। लेखन की प्रक्रिया की अपनी जद्दोजहद है, अपनी पीड़ाएं हैं, अपने अवरोध हैं। सृजन से पहले और उसके दौरान की सारी मशक्कत, अवरोध रचना के बाद एक ठहराव और शांति लाती है। लेखन और किसी को - पाठक या अध्येता को बाद में सुख देता है, सबसे पहले वह रचनाकार को एक अर्निवचनीय सुख देता है क्यों कि उसे लगता है कि उसके शब्दों के उसके भीतर से बाहर आने के बाद कहीं कुछ बदलेगा। बेशक एकाध या दस के लिए पर जो लेखन अपने लिए चिकित्सा का काम करता है, वह आप जैसे बहुत से पाठकों के लिए भी उतना ही कारगर होता है। सृजन के बाद का सुख ऐसे पाठकों के ऐसे मेसेज देते हैं - हाल ही में लखनऊ की एक युवा रचनाकार भावना मिश्र , जो अंग्रेज़ी और हिंदी में कविताएं लिखती है, का एक संदेश आया - ‘‘ आपको पढऩा मुझे मेरे और करीब लाता है। शुक्रिया कि आप दूर-दूर ही सही पर मेरे जीवन में हैं....’’  खडगपुर की संध्या पांडे ने लिखा -’’ जैसे भूखा आदमी खाने पर टूट पड़ता है, वही हाल आपकी किताबों के प्रति मेरी भूख है । जल्दी ख़त्म न हो जाएं, इस बात का खय़ाल करके कंजूस की तरह थोड़ा थोड़ा पढ़ती हूं ।’’ ऐसी भावभीनी प्रतिक्रियाएं मिलती हैं कि सृजन के वक्त की सारी तकलीफ़ बिला जाती है।
प्र.    आप में सच कहने की जो बेबाकी दिखती है, यकीनन उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता होगा। विशेषत: तब जबकि सच पर मौन रहने की शालीनता हर कहीं देखी जा सकती है जो समतल जीवनचर्या में विघ्न नहीं डालती। यह आपके पंजाबी खून का सहज स्वभाव है या कुछ और ?
अपना विश्लेषण खुद कैसे किया जाए। पर पंजाबी खून को दोष देना ठीक नहीं। यह तो अपने स्वभाव की विषेशता या ख़ामी है। पंजाबी क़ौम के लिए माना जाता है कि वे अक्खड़ होते हैं पर लड़कियों पर अपने-अपने घर के संस्कारों का असर होता है। वहां भी वे बहुत दबी सहमी होती हैं। मेरे माता-पिता का निडर स्वभाव और ग़लत के खि़लाफ़ हमेशा खड़े हो पाने की ताकत मुझ तक भी ट्रांसफऱ ज़रूर हुई होगी।
बचपन में बहुत छुईमुई थी । बाद में भी पर जब पानी सर से गुजऱने लगता है तो यह समझ आ जाता है कि नरम और धीमी आवाज़ किसी को सुनाई नहीं देगी। वैसे मुझे नहीं लगता कि मैंने चीखकर कोई बात कही हो । मुझे जो कुछ ग़लत लगता है, बतौर एक नागरिक मैं उस पर आवाज़ उठाती हूं। अपने जाने कभी शालीनता की सीमा नहीं लांघी। किसी ग़लत चीज़ पर चुप न रह पाना मेरी आदत में है और इसे लेकर मुझे कभी डर नहीं लगा कि मैं अपने कितने दुश्मन पैदा कर रही हूं। अपना ज़मीर आहत न हो, साफ़  रहे, मेरे लिए यह ज़्यादा ज़रूरी है।  
लेखन को करियर की तरह लेने वाले, अपना नफ़ा-नुकसान तौल तौल कर बोलने वाले अक्सर चुप रह जाते हैं। इसे शालीनता नहीं, कायरता कहेंगे। मुझे सच बोलने से परहेज़ कभी नहीं हुआ और शायद यही मेरी पहचान भी है।
प्र.    कथादेश में ‘औरत की दुनिया’ और ‘हमारी विरासत:पिछली पीढ़ी की औरतें’ जैसे आपके बहुचर्चित स्तंभ को फिर से शुरू करने की जरूरत आपको नहीं लगती ? कितनी-कितनी औरतों का अनकहा इसके कारण बाहर आएगा।
संपादन में अपनी रचनात्मक ऊर्जा का काफ़ी क्षरण होता है। पांच साल इस स्तंभ को निभाया। बहुत से पाठक मिले। स्तंभ खूब सराहा गया पर अपनी उम्र और लिखने की अपनी भीतरी ख़लिश का तकाज़ा था कि अपने को समेट कर सिर्फ़ लेखन में रमा जाए। सोशल मीडिया, फ़ेसबुक और ब्लॉग ने महिलाओं को अपने अनकहे को कह पाने की काफ़ी स्पेस दी है। यह एक अच्छी शुरुआत है।
प्र.    एक ही विषय पर अनेक विधाओं का संकलन कर पुस्तककार में लाना अच्छी पहल है, इससे रचनाकार के सृजन के विभिन्न आयाम पढऩे को मिलेंगे क्योंकि एक दो विधा की अपेक्षित सामग्री को लिखे जाने की प्रतीक्षा नहीं करनी होगी। इसका एक उदाहरण यह किताब ‘एक औरत की नोटबुक’ है। यह अनायास हुआ या सोच समझकर किया गया ?
यह कोई सायास कोशिश नहीं थी।  मेरा ध्यान मुद्दे पर केंंिद्रत था। एक खुश्क विषय को रोचक बनाकर प्रस्तुत करना चाहती थी जो अपनी गंभीरता बरकरार रखते हुए अपने को पढ़वा ले जाए । मेरे खय़ाल से स्त्री मुद्दों पर ऐसी पुस्तकें तैयार की जा सकती हैं जहां एक गंभीर मुद्दे पर केंद्रित कर कई विधाओं में उस पर बात की जा सके। ‘एक औरत की नोटबुक‘ किताब का सेंटर प्वॉइंट एक लंबा आलेख था - जिसके निशान नहीं दिखते ..... लिखने के बाद लगा कि इस मुद्दे पर तो मेरी बहुत सी कहानियां भी हैं। यह भी लगा कि ऐसे सामाजिक मुद्दों पर लिखी गई किताबें बहुत बोरियत पैदा करती हैं - आंकड़े, तथ्य, सूचनाएं और विश्लेषण .... जिसे समाज विज्ञान के शोधार्थी भले ही पूरा पढ़ लें पर आम पाठक नहीं पढ़ेगा क्योंकि उसके लिए पढऩे की बाध्यता नहीं है जबकि आम पुरुषों और स्त्रियों को भी इसे पढक़र आत्मनिरीक्षण करने की ज़रूरत है। इसे शुगर कोटेड कुनैन की तरह आम पाठक के हलक से नीचे उतारने की कोशिश करनी पड़ेगी। बस, यही सब सोचकर पुस्तक ने आकार लिया। पत्रकारिता का एक भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार दिया जाता है जहां प्रकाशक ने इस पुस्तक को भेजा। पुस्तक पर स्त्री विमर्श न लिखकर कथा विमर्श लिखा था। एक निर्णायक ने मुझे बताया कि पुस्तक सबको बहुत पसंद आई लेकिन इसमें आधे आलेख हैं, कहानियां हैं, नोट्स भी हैं, कविताओं के टुकड़े भी हैं तो इसको किस विधा के अंतर्गत रखा जाए। ख़ैर, नयी तरह की शुरुआत करने के लिए इस तरह के जोखिम उठाने पड़ते हैं।      
प्र.    आपकी सबसे चर्चित कहानी ‘रहोगी तुम वही’ के लिए पुरुषों की प्रतिक्रिया का जिक्र आपने किया कि ‘एकतरफा कहानी है’। अर्थात् प्रबुद्ध से प्रबुद्ध पुरुष भी रचना पढ़ते वक्त एक सहृदय पाठक मात्र क्यों नहीं रहता, सिर्फ  पुरुष क्यों बन जाता है ?
निर्मला, इस सवाल में आपने खुद ही उसका जवाब भी दे दिया है। प्रबुद्ध वर्ग के पुरुष भी पुरुष पहले हैं, प्रबुद्ध बाद में। कहानी लिखने के बाद एक लघु पत्रिका के सम्पादक को भेजी , जिन्होंने कहानी पढक़र कुछ कुढ़ते हुए कहा-‘‘ क्या औरतें बोलती ही नहीं है, बड़ी एकतरफा कहानी है यह।’’ फिर कुछ तंज से कहा -‘‘ एक कहानी ऐसी भी लिखिए जहां औरत बोलती है और आदमी चुप रहता है।’’ कहानी मैंने ‘हंस’ के लिए भेजी । संपादक राजेंद्र यादव ने अगले ही अंक में इसकी घोषणा कर दी और जून 1994 के अंक में यह कहानी अंक की पहली कहानी के रूप में बड़ी प्राथमिकता से प्रकाशित की गई । कहानी छपते ही चर्चा में आ गई। अभिव्यक्ति वेबसाइट पर आते ही कई विदेशी भाषाओं में नुक्कड़ नाटक के रूप में इसका अनुवाद कर इसे खेला गया जिसने इस स्थापना को रेखांकित कर दिया कि यह सिर्फ  भारतीय पति की कहानी नहीं, यह वैश्विक समस्या है। लन्दन के एक एक्सपेरिमेंटल ग्रुप ने भी इसे अंग्रेजी में खेला। कई मंचों से मैंने इस कहानी का पाठ किया और कई शहरों - मुंबई, भोपाल, देहरादून, वर्धा वगैरह में इसे नुक्कड़ नाटक की तरह प्रस्तुत किया गया। पुरुषों की यह बेबाक प्रतिक्रिया थी कि यह कहानी हमें आईना दिखाती है, लेकिन कुछेक पुरुषों की उग्र आपत्तियां भी सुनाई दीं कि यह इकतरफा कहानी है ।
अभिनेता सईद जाफरी ने लन्दन के नेहरू सेंटर में इस कहानी का अभिनय पाठ किया। डॉ दागमार मारकोवा ने इसका नाटक बनाकर चेक भाषा में अनुवाद किया । तूरीन , इटली की अलस्सांद्रे ने इंटरनेट से निकालकर इसे इतालवी भाषा में खेला । मुंबई की चौपाल में अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने कई बार इसे अपने खास अंदाज में सुनाया। पाकिस्तान के टी वी चैनल हम टी वी ने इस कहानी का चार धारावाहिक किस्तों में प्रसारण किया । निर्देशन-पटकथा तो पुरुष ने ही लिखी । ऐसा नहीं है कि पुरुष सह्नदय नहीं होते। दरअसल वे भी अपनी सामाजिक संरचना के विक्टिम होते हैं। अपने अहम के चलते कुछ इसका स्वीकार नहीं करते। कुछ समझदार पुरुषों की सह्नदयता और उदारता के सहयोग से ही स्त्रीवादी आंदोलन अपनी जड़ें जमा पाया है।     
प्र. आपकी अपनी लिखी और छपी किताबों में से सबसे प्रिय किताब कौन-सी है? इस किताब का दूरगामी प्रभाव? कौन से हल देती है यह किताब?
अब तक की सबसे प्रिय किताब यही है - एक औरत की नोटबुक । देखकर अच्छा लगता है कि जो भी इस किताब को पढ़ता है और उसकी अगर कुछ समस्याएं हैं तो अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए फ़ोन ज़रूर करता है। अब तक लगातार पाठकों के संदेश इस किताब पर आते हैं। ऐसी प्रतिक्रिया मेरे किसी कहानी संकलन या किसी और किताब पर नहीं हुई जबकि इस विषय को खासा उबाऊ समझा जाता है और वह होता भी है। किताब निश्चित रूप से सिर्फ़ दिल बहलाव की रचना नहीं है, एक समस्या की नब्ज़ पर उंगली रखती है। हर स्त्री अपने अस्तित्व को बचाए रखने के साथ साथ अपने दाम्पत्य जीवन को भी खुशहाल देखना चाहती है और उसे बचाए रखना चाहती है। बहुत छोटी छोटी सी घटनाएं हैं, छोटे छोटे नुस्खे हैं पर वे दाम्पत्य में एक बड़ा बदलाव ला सकते हैं अगर दोनों पक्ष अपने आप को कुछ बदलने को तैयार हों और अपने भीतर झांक सकें। पुस्तक की भूमिका में भी बाक़ायदा नामों के साथ मैंने उल्लेख किया है कि कैसे कुछ पुरुषों ने इसे पढऩे के बाद अपने को बदला तो चीज़ें बेहतरी के लिए बदलती हैं बशर्ते आप उसे बदलना चाहें।