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Wednesday 22 Nov 2017

भ्रष्टाचार निवारण सप्ताह


अश्विनी कुमार दुबे
525-आर, महालक्ष्मी नगर, इंदौर-10 (म.प्र.)
मो. 9425167003
जैसे यातायात सुरक्षा सप्ताह, एड्स जागरुकता सप्ताह, पर्यावरण संरक्षण सप्ताह, कुछ इसी तर्ज पर हमारे जिले में सरकार द्वारा भ्रष्टाचार निवारण सप्ताह मनाने की घोषणा की गई। बहुत अच्छी बात है, होना चाहिए इस दिशा में कु छ भी। तो ‘कु छ भी’ करने के  लिए सोचा गया किया और कै से किया जाना चाहिए? सबसे पहले तो कार्यक्र म का शुभारंभ उद्घाटन से होगा। अर्थात किसी बड़े हॉल में, सुसज्जित मंच पर कार्यक्रम के अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि टाइप लोग एकत्रित होकर विधिवत फीता काटते हुए ‘भ्रष्टाचार निवारण सप्ताह’ का शुभारंभ करेंगे। उसके बाद सप्ताह भर जिले में भाषण, दौड़, चित्रकला प्रदर्शनी, गायन प्रतियोगिता, जुलूस आदि आयोजित किए जाएंगे।
आदेश के परिपालन में सबसे पहले स्थानीय मंत्री, सांसद महोदय, जिले के प्रभारी मंत्री और सत्तारुढ़ पार्टी के सैकड़ों कार्यकर्ता सक्रि य हुए। बैठक बुलाई गई, जिसमें पूरे सप्ताह भर चलने वाले कार्यक्र मों की रूपरेखा तय की गई। कार्यक्रम के  अध्यक्ष क्षेत्र के सांसद महोदय और मुख्य अतिथि माननीय मंत्री जी मनोनीत किए गए। स्थानीय गांधी हॉल में कल सुबह दस बजे कार्यक्र म का उद्घाटन किया जाना तय हुआ।
कार्यक्र म में भाग लेने वाले सभी प्रमुखजन अपने दल-बल सहित रात में ही स्थानीय सर्कि ट हाउस में पहुंच गए। सर्किट हाउस का प्रभारी परेशान। इतने सारे लोगों के लिए उसे तरह-तरह के भोजन की व्यवस्था करनी है। सांसद और मंत्री महोदय के  लिए जो वीआईपी व्यवस्था उसे करनी है सो तो ठीक है परंतु उनके साथ पधारे हुए अन्य सैकड़ों लोग, जिन्हें वह बिल्कुल नहीं जानता, उनके लिए विशेष भोजन की व्यवस्था करने के  लिए मंत्रीजी केनिजी सचिव ने पहले ही निर्देश दे दिए थे। सर्किट हाउस में आए दिन तरह-तरह के  लोगों के  लिए पीने-खाने की व्यवस्था आम बात है, परंतु उसके  खर्च का प्रावधान कहां है? और वह कै से होता है? यह परम रहस्य है। आज भ्रष्टाचार निवारण सप्ताह की शुरु आत में सबसे पहले इस रहस्य पर से ही पर्दा उठना चाहिए। नहीं उठा।
एक बार एक बहुत बड़े अफसर ने सर्कि ट हाउस में ठहरते हुए प्रभारी को पीने और खाने के बाद दूसरे प्रकार की सेवाएं प्रदान करने का आदेश दिया, जिसे पूरा न कर पाने की स्थिति में उसे दूसरे दिन ही तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया था। सर्किट हाउस का प्रभारी, बहुत निरीह प्राणी होता है। वह मैच में फुटबॉल की गेंद है, जिसे दोनों दलों द्वारा लतियाया जाता है। सर्किट हाउस में जो वीआईपी ठहरे, वह तो उसे लतियाएगा ही। ऐसा करना उसके  अधिकार क्षेत्र में आता है। ऊपर से उसके ऑफिसर यह कहते हुए, ‘अरे! इतना खर्च कै से हुआ? तुमने उन्हें मना क्यों नहीं कर दिया...’ उसे लतियाते हुए नहीं अघाते। हालांकि सब प्रकार की लातें खाते हुए प्रभारी गण भी इतनी मोटी चमड़ी के हो जाते हैं कि उन्हें किसी से, कु छ भी सुन लेने में कोई फर्क नहीं पड़ता। वे भी मजे से ढोल की पोल में अपने लिए जगह बना लेते हैं।
इस प्रकार भ्रष्टाचार निवारण सप्ताह की शुरु आत वाली पूर्व संध्या पर स्थानीय सर्किट हाउस में सैकड़ों लोगों के लिए भव्य डिनर का आयोजन किया गया। इस महाडिनर में हुए खर्च की व्यवस्था कहां से की गई? यह जानने की किसी को कोई जरूरत नहीं  है। यहां तो ऐसा चलता रहता है। आगे भी इसी प्रकार चलते रहना चाहिए। हम परंपराओं को नहीं तोड़ते,चाहे वो कैसी भी हों।
गांधी हॉल में जो मंच बनाया गया, उसकी पूरी जिम्मेदारी नगर निगम अधिकारी को सौंपी गई। शानदार मंच, ताजे फूलों से सजा हुआ। लकदक गाढ़े लाल रंग के पर्दे। और सामने हजारों कुर्सियां। मंच के बीचोंबीच एक छोर से दूसरे छोर तक लाल फीता मौजूद, जिसे काटकर भ्रष्टाचार निवारण सप्ताह की शुरु आत की जानी है। समय पर सभी अतिथिगण पधार गए। हॉल खचाखच भर गया। चांदी की कैंची से वह लाल फीता काटा गया। चांदी और लालफीताशाही का पुराना संबंध। आज चांदी की कैंची लालफीताशाही पर चली। ठीक-ठीक प्रतीक है, लालफीताशाही चांदी की कैंची से कटती है। सोने की कैंची से और जल्दी कटती है। लोहे की कैचियां लिए जनता वर्षों से उसे काटने की कोशिश करती आईं, आज तक कु छ नहीं हुआ। मानो अध्यक्ष महोदय ने संदेश दिया कि इसी प्रकार शांतिपूर्वक चांदी की कैंची हाथ में ले कर आप लालफीते का सामना करेंगे तो वह हर्षपूर्वक कट जाएगा। जैसे आज कट गया।
स्वागत की औपचारिकता के पश्चात मंत्री महोदय ने अपना भाषण दिया-‘लोग कहते हैं, जगह-जगह भ्रष्टाचार फैला हुआ। यह देश की नसों को कमजोर कर रहा है। इससे हमारी प्रगति अवरु द्ध हो रही है। हमारी सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही। वैसे हमें तो आज तक कहीं भ्रष्टाचार के  दर्शन नहीं हुए। कहीं गुप्त रूप से छिपकर रहता होगा वह। जब विपक्षियों ने उसे आंखभर देखा है, तब हो सकता है वह गुप्त रोगों की तरह किसी गुप्त जगह में होगा। वो कोई गुप्त रोग ही होगा, जो देश की नसों को कमजोर कर रहा है। फिलहाल मुझे कोई ऐसा-वैसा रोग नहीं है, इसलिए मैं भ्रष्टाचार रूपी गुप्त रोग को कतई नहीं जानता। लेकिन देश की प्रगति को कोई भी ज्ञात-अज्ञात रोग अवरु द्ध करे तो हम बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह बात सरासर गलत है कि सरकार भ्रष्टाचार के प्रति उदासीन है। यदि हम इस ओर उदासीन होते तो यहां इस प्रकार इक_े हुए होते? नहीं! अर्थात हम बिल्कुल उदासीन नहीं हैं। हमने अपनी सक्रियता स्पष्ट करने के लिए ही यह ‘भ्रष्टाचार निवारण सप्ताह’ का आयोजन किया है। मुझे पूरा विश्वास है कि इस आयोजन की सफलता के पश्चात विरोधियों के  मुंह बंद हो जाएंगे।’ तालियों की गड़गड़ाहट। देर तक।
एक-दो इसी प्रकार के  भाषणों के पश्चात अध्यक्षीय उद्बोधन- ‘भ्रष्टाचार निवारण के  लिए आप लोगों में ऐसा अपूर्व उत्साह दे खकर मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। आप सबका संकल्प और ऐसी एकजुटता देखकर भ्रष्टाचार तो भ्रष्टाचार, उसका बाप भी अब सामने नहीं टिक सकता। उसे मिटना ही होगा और वह मिटकर रहेगा। उसे मिटाए बिना हम दम नहीं लेंगे। हमसे जो बन पड़ेगा, हम करेंगे। हम लोकसभा में इसके  लिए आवाज उठाएंगे। इस अभियान में धन की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। हम केन्द्र से पैसा दिलवाएंगे, इस योजना के लिए। वैसे तो हमारे मंत्रीजी हैं ही, इनकी सतत निगरानी में यह अभियान चलेगा। लेकिन आप सबके  सहयोग के  बिना कोई भी अभियान पूरा नहीं हो सकता। इस अभियान की सफलता के लिए मैं अपनी हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं...।’ पुन: तालियां। उसी तरह, कु छ ज्यादा देर तक।
कार्यक्र म के अंत में नगर निगम के महापौर द्वारा धन्यवाद ज्ञापन- ‘श्रीमान सांसदजी, माननीय मंत्री महोदय एवं अन्य गणमान्य जनों, सबने समय से पधारकर इस आयोजन को सफल बनाया, इसके लिए हृदय से आभार। बाहर जलपान की उत्तम व्यवस्था है, कृपया लेकर जाइएगा।’
रात में नगर निगम अधिकारी ने महापौरजी को पकड़ा और उलाहना दिया- ‘सर,आपने इस कार्यक्रम में बहुत खर्च करा दिया। आपने जो कहा सो हमने किया। अब ये बिल...।’
महापौर मुसकाए फिर बोले-‘ अरे चिंता क्यों करते हो वर्मा। देखते नहीं कितना सफल कार्यक्रम रहा अपना। मंत्रीजी बहुत खुश थे। सांसद महोदय बहुत दिनों से मुझसे असंतुष्ट चल रहे थे, वे भी प्रसन्न हो गए। हमने उन्हें कार्यक्रम का अध्यक्ष बनाया और फीता भी उन्हीं से कटवाया। वे गदगद हो गए। रही खर्चे निकालने की बात तो यह कला अब मुझे सिखानी पड़ेगी तुम्हें?’
वर्माजी गिड़गिड़ाए- ‘वो भ्रष्टाचार निवारण सप्ताह...।’
‘तो उससे या होता है? काम करने की शैली कभी बदलती है! नगर निगम में शांति बनाए रखनी है कि नहीं? तुम चिंता न करो वर्मा। मंत्रीजी से कहकर किसी भी योजना में और फंड एलाट करा लेंगे। ऐसे आयोजनों में खर्च तो होता ही है। कुछ ज्यादा हो गया, कोई बात नहीं। हम देख लेंगे।’ महापौर ने वर्मा को आश्वस्त किया।
 दूसरे दिन नगर में कार्यक्रम के अगले चरण के अंतर्गत दौड़ का आयोजन था। सुबह से शहर की सडक़ों पर, क्षेत्र के नेता, अभिनेता, अफ सर और युवा भ्रष्टाचार निवारण के लिए दौड़ेंगे। इस कार्यक्रम के लिए विशेष प्रकार की टी-शट्र्स, जिसमें ‘भ्रष्टाचार मुर्दाबाद’ टाइप कुछ लिखा हो और टोपियां जिसमें ‘भ्रष्टाचार तेरा सत्यानाश’ जैसा स्लोगन लिखा हो, की जरूरत महसूस हुई। मंत्रीजी ने ‘ फत्तेलाल एंड संस’ जो इस क्षेत्र के सबसे बड़े कपड़ा व्यापारी हैं, उन्हें इसके लिए आदेश दे दिया। कंपनी वालों ने भी लगे हाथ पूरे प्रदेश में चपरासियों की वर्दी सप्लाई करने के  ऑर्डर प्राप्त कर लिए। इस प्रकार समय से टी शट्र्स और टोपियां, दौड़ शुरू होने वाले स्थल पर पहुंचा दी गईं। लोग टी शट्र्स पहनकर और टोपियां लगाकर भ्रष्टाचार निवारण के लिए खूब दौड़े। शाम को दूरदर्शन पर इस दौड़ की बहुत अच्छी कवरेज हुई। युवक-युवतियां, नेता-अफसर और गणमान्य नागरिक सभी इस दौड़ में शामिल हुए। इस प्रकार भ्रष्टाचार निवारण की दिशा में एक नई पहल हुई।
चित्रकला प्रदर्शनी का जिम्मा जिला शिक्षा अधिकारी को सौंपा गया। सभी छोटे-बड़े स्कूलों में फटाफट आदेश पहुंच गए कि ‘भ्रष्टाचार निवारण विषय’ पर बढिय़ा से बढिय़ा पेंटिंग बनाकर जिला कार्यालय में जमा करना है, इन सभी चित्रों की टाउन हॉल में प्रदर्शनी लगाई जाएगी। प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय पुरस्कार प्राप्त चित्रों के चित्रकार विद्यार्थी पुरस्कृत किए जाएंगे। छात्रों ने अपनी कल्पना शक्ति के  घोड़े फटाफट दौड़ाए। भ्रष्टाचार बहुत व्यापक विषय है। छात्र इसके विषय में बहुत कम जानते थे परंतु चित्र बनाने के लिए उनके  अभिभावकों, पड़ोसी अंकलों और उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों ने उनकी भरपूर मदद की। जिला शिक्षा अधिकारी ने अपना दायित्व पूरी सजगता के  साथ पूरा किया। वे इसी वर्ष सेवानिवृत्त हो रहे थे। उनकी सेवाओं के महत्व को देखते हुए उन्हें एक्सटेंशन प्रदान कर दिया गया, जिससे दूसरे सीनियर लोगों के  अवसर नष्ट हो गए। चित्र प्रदर्शनी बहुत सफल रही क्योंकि कलेक्टर साहब के निर्देश पर बहुत से चित्र उसमें से पहले ही हटा दिए गए थे। कलेक्टर साहब को डर था कि कहीं मंत्रीजी बुरा न मान जाएं।
गायन प्रतियोगिता का कार्यक्र म भी स्थानीय कलाकारों ने बहुत मेहनत और लगनपूर्वक आयोजित किया। ‘सांस्कृ तिक मंडल’ नामक एक प्रायवेट संस्था को इसके लिए भारी अनुदान स्वीकृ त किया गया। भ्रष्टाचार भगाना है... (कोरस), भगवान भ्रष्टाचार से जन-जन को मुक्ति  दीजिए... (प्रार्थना) इस प्रकार के  बहुत अच्छे-अच्छे गीत कार्यक्रम में कुशल गायकों द्वारा गाए गए। गीत-संगीत का यह सुमधुर कार्यक्रम देर रात तक चला जिसमें स्थानीय नेताओं और अफसरों ने खूब तालियां बजाई और कार्यक्रम का आनंद उठाया।
भ्रष्टाचार निवारण सप्ताह के अंतिम दौर में एक भव्य जुलूस निकाला जाना था, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी लोककर्म विभाग को सौंपी गई। इसमें बड़े-बड़े बैनर बनने थे। शहर भर में जगह-जगह होर्डिंग लगाए जाने थे। सभी समाचार-पत्रों में फुल पेज के  विज्ञापन प्रदाय किए जाने थे। निकटवर्ती ग्रामों से जुलूस में सम्मिलित होने के लिए जनता को लादकर लाना था। दोपहर में सबके लिए लंच पैके टों की व्यवस्था करनी थी। शाम को दशहरा मैदान में, जहां जुलूस एक सभा में परिवर्तित होगा, वहां भव्य मंच की व्यवस्था करनी थी। इन सब बड़े कामों में एक बड़े विभाग को लगाया गया।
भ्रष्टाचार विरोधी इस भव्य जुलूस में लाखों लोग सम्मिलित हुए। इनमें नेता, अफसर, पार्टी कार्यकर्ता तो थे ही, इसके अलावा हजारों की संख्या में वृद्ध, युवा और महिलाएं भी जोरशोर से नारे लगाते हुए शामिल हुई। उनमें से जब किसी से पूछा गया कि इन नारों का क्या मतलब है और आप किस प्रकार के जुलूस में आए हैं? तब किसी ने भी संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। अलबत्ता कार्यकर्ताओं ने प्रश्न पूछने वाले की ठुकाई करते हुए उसे पीछे धकिया दिया। दरअसल जुलूस के  लिए लाए गए ग्रामीण बड़ी शिद्दत से भोजन के पैकेट ढूंढ रहे थे, जो उन्हें थोड़े समय बाद प्रदान कर दिए गए। उनमें से किसी को यह न मालूम था कि वे किसलिए इस जुलूस में लाए गए हैं। उनके हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर लिखा था-‘भ्रष्टाचार मुर्दाबाद’ और मुंह में नारे ‘भ्रष्टाचार, दूर भगाओ, दूर भगाओ।’ पूरे शहर में तरह-तरह के होर्डिंग लगे हुए थे, जिन पर भ्रष्टाचार विरोधी नारे शोभायमान थे। इन होर्डिंग्स को बनवाने में, जुलूस को इस तरह आयोजित करवाने में किस तरह भ्रष्टाचार का सहारा लिया गया, यह शोध का विषय है। इस प्रकार जिले में ‘भ्रष्टाचार निवारण सप्ताह’ का रंगारंग कार्यक्रम समाप्त हुआ। ऐसे सदाबहार कार्यक्रम ही हमें बताते हैं कि सरकार बहुत क्रियाशील है। भ्रष्टाचार थककर जब सुस्ताने लगता है, तब ऐसे कार्यक्रम उसे उठाते हैं, उसमें नई ऊर्जा का संचार करते हैं और उसे सरपट दौडऩे के लिए विवश कर देते हैं। वह दौड़ रहा है और मुझे लगता है अभी बहुत दिनों तक यों ही दौड़ता रहेगा।