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Saturday 18 Nov 2017

भारतीय फिल्मों के हास्य अभिनेता (1935-1970)

प्रो. मणि खेडेकर भट
कीर्ति नगर, अकोला (महाराष्ट्र)
मो. 9850124678
‘ये कैसी जल्वागाह है दुनिया, हजारों जा चुके लेकिन वही रंगत है महफिल की।’’ जी हां दास्तां है भारतीय फिल्मों के हास्य कलाकारों की। जीवन की तरह फिल्मों में भी हास्य स्वाभाविक रूप से आया है। मानव जीवन अनेक रसों से परिपूर्ण होता है जिनमें हास्य व करुण रस विशेष रूप से व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। हास्य एक अद्भुत कला है, रस है जो अंदर से आता है। सही कलाकार मुसीबतों में भी हंसता रहता है, हंसाता है। अधिकांश महान हास्य कलाकार अंदर से दुखी होते हैं परन्तु ऊपर से हंसते हुए दिखाई देते हैं। ऐसी विरोधाभासी स्थिति ही सही हास्य कलाकार की कसौटी होती है। एक बार प्रख्यात अंग्रेजी हास्य कलाकार चार्ली चैपलिन से पूछा गया कि तुम्हें कौन सी ऋतु अच्छी लगती है? उनका जवाब था, मुझे बरसात की ऋतु अच्छी लगती है क्योंकि इसमें आंसू दिखाई नहीं देते, आंसू छिप जाते हैं।
भारतीय फिल्मों में हास्य, कहानी व सिचुएशन के आधार पर निर्धारित होता है। हास्य एक नैसर्गिक कला है जिसका मन से नजदीक से संबंध होता है। मन की प्रसन्नता हालात पर निर्भर करती है। हास्य एक कठिन विधा होती है। किसी को हंसाना मामूली बात नहीं है। डायलॉग की अदायगी शारीरिक हावभाव, चेहरे की मुद्राएं सब शामिल होती हंै। हास्य बोला और अबोला दोनों ही होता है। मूक फिल्मों में मूक हास्य होता था, जहां शब्दों की आवश्यकता नहीं होती थी। वहां आंखों से, चेहरे से, शारीरिक हावभाव, चेहरे की मुद्राएं सब शामिल होती है। कहते हैं महर्षि नारद जी विश्व के सबसे पहले हास्य कलाकार थे।
सन् 1912  से 1931 तक मूक फिल्में बनती थी। जिनमें हास्य को वाणी नहीं सिर्फ चेहरे के हावभाव, ऊटपटांग शारीरिक हरकतों से हंसाया जाता था। उस समय के अंग्रेजी फिल्मों के कलाकारों में चार्ली चैपलिन, बॉब होप इत्यादि नाम मशहूर थे। भारतीय फिल्मों में हास्य की भूमिका का गौरवशाली इतिहास रहा है। इसकी शुरूआत सन् 1935 के आसपास हुई थी। उस जमाने के हास्य कलाकारों में सबको अपनी एक विशेष स्टाइल होती थी। हर फिल्म में चार विशेष पात्र होते थे, हीरो, हीरोइन, विलेन व एक हास्य कलाकार। इनके बिना फिल्में नहीं बनती थी।
हास्य में क्रमवार विकास हुआ। शुरू में खेल, तमाशे, नौटंकिया, नाटक व मूक फिल्मों से सवाक फिल्मों तक। उस जमाने के मशहूर फिल्म हास्य कलाकार थे याकूब। सन् 1940 में औरत फिल्म से याकूब का प्रवेश हुआ। याकूब हास्य के साथ-साथ खलनायक व चरित्र नायक का भी रोल करते थे। उनकी हास्य फिल्में बहुत ज्यादा चली जिनमें दिल्लगी, दीदार, बाजार, अब दिल्ली दूर नहीं, करोड़पति आदि हैं। उनके ऊपर फिल्माया गया गीत- ‘चुन-चुन करती आई चिडिय़ा’ बहुत हिट हुआ था। याकूब के बोलने का ढंग, काली तिरछी टोपी, झूठ बोलने की आदत आज भी लोग याद करते हैं।
सन् 1945 के आसपास एक बुजुर्ग लेकिन टीपटाप रहने वाले, अचकन शेरवानी पहने चश्मा लगाए हुए एक हास्य कलाकार आए जिनका नाम मिर्जा मुशर्रफ। इन्होंने कई फिल्मों में काम किया। काफी मकबूल था। खासकर उनके बोलने का लहजा और बोलचाल में अंग्रेजी में ‘आय मीन टू से दैट’ से वे जाने जाते थे।
इसी दौर में 45-50 के बीच एक सिंधी हास्य अभिनेता गोप का आगमन हुआ। गोप बोले तो ठिगना कद, बाब होप टाईप मक्खी जैसी मूंछें, गोल पोपला मुंह व चेहरा, कभी टी शर्ट व नीचे पेंट फोल्ड की हुई, पतली आवाज। उनका धीरे-धीरे से बोलने का अंदाज आज भी याद है, गोप सन् 50 के दशक में फिल्मों में छाये रहे। फिल्म पतंगा का मशहूर गाना, ‘मेरे पिया गये रंगून किया है वहां से किया है टेलीफून’, बहुत चर्चित रहा। फिल्म पॉकेटमार में भी उनके ऊपर फिल्माया गया गीत, लड़ी आंख से आंख, खूब चला। वे बात-बात में ‘पार्टनर’ शब्द बहुत बोलते थे। गोप अमर कलाकार थे।
उस जमाने के मशहूर कलाकारों में आगा का नाम भी प्रथम श्रेणी में था। सन् 50 के करीब उनका पहले मारधाड़ स्टंट फिल्मों में प्रवेश हुआ। आगा करीब करीब हर फिल्म में रहते थे। कभी हीरो के दोस्त, या राजा के सलाहकार। प्रेमनाथ के साथ उनकी फिल्में बादल, साकी वगैरा खूब चली। उनका डायलॉग बोलने का विशेष अंदाज, पहले गलत बोलना फिर दुरुस्त करके बोलना, भूलने की आदत आदि। एक गीत ‘भगवान तुझे मैं खत लिखता’, उनके ऊपर फिल्माया गया था।
सन् 50 से 60 के बीच हास्य अभिनेता राधाकिशन ने कई फिल्मों में अभिनय किया। बैजू बावरा में उनकी विशेष भूमिका थी- एक संगीत उस्ताद की। डायलॉग बोलने का उनका अपना एक विशेष अंदाज था। मीठी दबी नकली आवाज। शुद्ध सहज अभिव्यक्ति। उनकी फिल्म बैजू बावरा का डायलॉग, ‘वो रही मियां तानसेन की हवेली’, आज भी लागों को याद है। देशी कुत्ते को कलर करके अंग्रेजी कुत्ता बनाकर बेचना। ‘मैं तो कहता था यहां कुआं नहीं बनेगा पर मेरी सुनता कौन है’, इत्यादि डायलॉग प्रसिद्ध थे।
इसी क्रम के दौर में हास्य अभिनेता मुकरी भी कई फिल्मों में आए। छोटे साढ़े चार फीट हाइट के मक्खी छाप मूंछें, हीरो-हिरोइन के आगे-पीछे घूमना उनकी सहज अभिनय की आदत थी। कभी शेख मुख्तार के साथ उनकी विशेष जोड़ी थी। मदर इंडिया में खास भूमिका थी। उन्होंने नौशाद, मेहबूबा व दिलीप कुमार के साथ कई फिल्में की।
ओमप्रकाश ने सन् 48 से 70 तक कई फिल्मों में हास्य अभिनेता, चरित्र अभिनेता का ऐतिहासिक रोल किया। वे एक सहज प्रतिभाशाली हास्य कलाकार थे। उन्होंने अनगिनत फिल्में की। कभी मुनीम, तो कभी शराबी, कभी पंडित। अनेक किरदार किए। उनकी डायलॉग बोलने की शैली भी अलग थी। वे ‘बरखुरदार’ शब्द बहुत बोलते थे। उन्होंने करीब सभी मशहूर कलाकारों के साथ काम किया।
इसी क्रम में 50 से 60 के बीच कई हास्य अभिनेता आए जिनमें धुमाल, सुंदर, मजनू, मोहन चोटी आदि ने भी अपनी विशेष इमेज बनाई। सुंदर व मजनू बहुत पुराने थे। उन्होंने आई एस जौहर के साथ शुरू में बहुत काम किया। रामअवतार भी थे। मोहन चोटी पर फिल्माया गया गीत, ‘सिकंदर ने पोरस से की जो लड़ाई तो मैं क्या करूं’ बहुत चला।
इधर जगदीप ने भी गुरुदत्त के साथ हास्य की शुरूआत में कुछ फिल्में की। जगदीप की शोले में भी यादगार भूमिका थी। ‘सूरमा भोपाली’। इसी समय हास्य अभिनेता असित सेन, ने भी कई फिल्में की, शरीर मोटा पर आवाज पतली, वे अंदर आने के बाद बोलते थे ‘मे आय कम इन सर’। इधर छोटे कद के धुमाल ने हास्य कलाकार सुंदर के साथ किशोर की कई फिल्में की। जैसे नई दिल्ली, हावड़ा ब्रिज आदि में उनकी यादगार भूमिका रही है।
भारतीय फिल्मों में हास्य कलाकार को हीरो के रूप में स्थापित करने में किशोर कुमार, मेहमूद और जॉनी वाकर की अहम भूमिका रही है। उनके तो नाम से ही फिल्में चलती थी। किशोर कुमार गायक व नायक दोनों थे। वे एक जन्मजात महान कलाकार थे जिन्होंने गायन में ‘योडलिंग’ शुरू की। किशोर शुरू से ही चलती का नाम गाड़ी से फक्कड़ और अलमस्त रहे हैं। पड़ोसन, चलती का नाम गाड़ी, हाफ टिकिट में किशोर ने अद्भुत कला का प्रदर्शन किया है। किशोर, मेहमूद और जानी वाकर के बिना भारतीय फिल्मों का इतिहास अधूरा है।  जानी वॉकर का सन् 52-53 से लेकर सन् 65-70 तक हास्य पर एकछत्र राज्य रहा है। उनकी हंसाने की कला, एक विशिष्ट शैली की आवाज निकालना, कभी डोलते, झूमते शराबी जैसा अंदाज का अपना एक अलग रंग था। जानी वॉकर को गुरुदत्त ने पहला ब्रेक दिया। उनकी यादगार फिल्में टैक्सी ड्रायव्हर, प्यासा, मधुमती, नया दौर, सीआईडी, रेलवे प्लेटफार्म, मेरे मेहबूब, छूमंतर, आदि हैं। हर फिल्म में उन्होंने एक अलग किरदार किया। उन्होंने कभी शायर, कभी कंजूस मारवाड़ी, कभी फोटोग्राफर का रोल किया। उनके ऊपर फिल्माए गए गीत जंगल में मोर नाचा, तेल मॉलिश आदि अविस्मरणीय हंै। उनकी एक स्टाइल ‘ए भाय’ आज भी लोगों को याद है। वे ऐसे कलाकार थे जो हीरो के बराबर पारिश्रमिक लेते थे।
भारतीय फिल्मों में हास्य जगत में हास्य अभिनेता मेहमूद का भी एक विशेष स्थान रहा है। सन् 56  में सीआईडी में एक छोटी सी भूमिका से प्रवेश हुआ। मेहमूद जन्मजात हास्य कलाकार थे। उन्होंने 50 और 60 के दशक में अनगिनत फिल्में की और सभी में एक यादगार ऐतिहासिक भूमिकाएं की। उनकी मद्रासी और हैदराबादी स्टाइल में, ‘हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं’ अमर किरदार था। प्यार किए जा, जौहर मेहमूद इन गोवा, काजल, कश्मीर की कली, पड़ोसन जैसी फिल्मों को कौन भूल सकता है।
इसी दौर में उच्च शिक्षित हास्य अभिनेता आई.एस. जौहर का भी एक दौर था। कोई किसी से कम नहीं था। एक थी लडक़ी, हम सब चोर हैं, गूंज उठी शहनाई, शागिर्द आदि कई फिल्में उन्होंने की। इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। उनकी फिल्म शागिर्द में उनके ऊपर फिल्माया गया गीत ‘बड़े मियां दिवाने’ बहुत चला। सन् 50-60 के दशक में राजेन्द्रनाथ ने भी कई फिल्में की। जब प्यार किसी से होता है, मुझे जीने दो आदि दर्जनों फिल्में की। उनकी स्टाइल फुटबॉल प्लेयर का किट और मोजे पहनकर सांड के समान, अपने जूते से जमीन को खुर के समान रगडऩा, स्पोर्टस्मैन का ड्रेस, हाफ पेंट, गेटिस पहनना आदि उनका शगल था। उनकी पोपटलाल की भूमिका को कौन भुला सकता है।
चरित्र कलाकार डेविड ने भी हास्य की कई भूमिकाएं की। उनका गंजा व्यक्तित्व भी उनकी हास्य कला में सहायक रहा है। फिल्म बूटपॉलिश में एक गंजें कैदी के रूप में ‘गरज-गरज तू आ रे बदरवा’, विशेष यादगार किरदार था। उसमें उनके साथ में बूडी आडवानी भी थे। गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ।
हास्य अभिनय के क्षेत्र में एक महान अभिनेता भगवान का जिक्र भी जरूरी है। भगवान ने 50 के दशक में स्टंट फिल्मों में कॉमेडियन के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। बाद में उन्होंने कई फिल्मों में अपने विशिष्ट हास्य से दर्शकों को हंसाया व यादगार बन गए। उनका विशिष्ट स्टाइल का डांस तो देश के घर-घर, गली-गली में प्रचलित हुआ। भगवान के डांस के बिना आज भी कोई शादी पूरी नहीं होती थी।
सन् 70 के बाद हास्य कलाकार असरानी ने हास्य परंपरा को अच्छे ढंग से निभाया। फिल्म शोले में उनकी हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर है, काफी प्रसिद्ध रही। उन्हीं के समान देवेन वर्मा ने भी स्तरीय ढंग से हास्य अभिनय में अपना स्थान बनाया।
भारतीय फिल्मों में महिला हास्य कलाकारों में मनोरमा व टुनटुन ने भी काफी नाम कमाया। मनोरमा और टुनटुन सन् 50 के दशक से काम कर रही थीं। टुनटुन तो उमादेवी के नाम से गाना भी गाती थी। मेहमूद और सुंदर के साथ उन्होंने बहुत फिल्में की। टुनटुन की बम्बइया स्टाइल में ‘ए मैन’ बोलना बहुत मशहूर हुआ। मनोरमा की मटकती हुई गोल-गोल टब्बू आंखें उनकी खास आदत थी। टुनटुन भी अपने मोटापे का उपयोग अपने हास्य में करती थी।
सन् 55 के बाद में सन् 65 तक तो उस जमाने के हीरो स्वयं हास्य का रोल करने लग गए। दिलीप कुमार ने आजाद फिल्म से शुरूआत की। बाद में राम श्याम आदि फिल्में की। उनके ऊपर फिल्माया गया गीत ‘साला मैं तो साहब बन गया’, बहुत चला। बाद में किशोर, शम्मीकपूर, राजकपूर, अमिताभ बच्चन ने भी हीरो होकर हास्य की कई फिल्में की।
बाद में हास्य में फूहड़ता आने लगी व स्तरीय हास्य कम होने लगा। हास्य की कला करीब-करीब नेपथ्य में चली गई। चालू हास्य आने लगा। आज पुराने हास्य कलाकारों के बारे में लेख या संस्मरण बहुत कम देखे व पढ़े जाते हैं। जिन महान हास्य कलाकारों ने भारतीय फिल्मों को स्तरीय हास्य से समृद्ध किया आज उनकी मजार या समाधि पर दीया भी नहीं जलता है। ‘‘जिक्र जब होगा जमाने में हास्य कलाकारों का कहीं, याद हम आएंगे जमाने को मिसालों की तरह।’’