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Saturday 25 Nov 2017

अशोक सेकसरिया : फिक्र ए दुनियां में सर खपाता था , अब वो कहां और ये बवाल कहां

रमेश गोस्वामी
22 Verewood
122, Grayston drive
Sandown 246
South Africa
अशोक की बेचैन रूह परवाज कर गयी है।  मैं शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि वह इस वक्त भी आसमान में किसी थके हुए परिंदे को अपनी अदृश्य गोद में बिठाकर उसके फडफ़ड़ाते परों पर धीरज बांध रहा होगा। अशोक की जिंदगी और उसकी मौत के बीच के सांसों का सफर हमें इसी मकाम पर लाता है कि वह आखरी सांस तक बेकरार आदमी होते हुए भी अपने लिए अशोक था और दूसरों के लिए शोकाकुल। अशोकान्त के बाद उसके अहवाब ने उसकी इस फितरत का इजहार किया बयान किया तहरीर की। वह जब तक आसपास था जहान में मुझे उसकी अच्छाइयों की तारीफ  दूसरे लोगों से ही मालूम पड़ती थी। मैं कभी उससे दूर था और कभी पास।  किसी के बहुत नजदीक होने से लापरवाही की दीवार उठती है। उसकी कई सिफ़तों पर दोस्तबाग कभी खुले, कभी दबे हंसते भी थे कि अशोक उस अंधे को भी सडक़ पार करा देता है जो अंधा सडक़ पार करना ही नहीं चाहता। अनेक ऐसे भी कुशाग्र आँखों वाले नाबीना लोग भी थे जो अपनी नजरों से ज्यादा अशोक की दृष्टि पर ज्यादा भरोसा करते थे और उम्मीद रखते थे कि अशोक ही सडक़ पार कराये। मैं भी अपनी हैसियत ऐसे ही अंधों में गिनता था, जो अंधे भी थे और सोये हुए भी थे और झूठमूठ आंखें बंद किये पड़े थे कि कोई उन्हें जगाए, सडक़ पार कराए। अशोक के साथ मेरे संबंध की क्या सूरत सीरत थी कभी तय नहीं हो पाया। जरूरत भी महसूस नहीं हुई। दोस्ती अक्सर लम्बाई और गहराई के भौतिक पैमानों में तौली परखी जाती है लेकिन यह चलन है। घिसे पिटे इजहार हमारी जहनी कमजोरी को ढंकने में मददगार साबित होते हैं।  वैसे भी वैधानिक चेतावनी है.. पकी पकाई परिभाषाओं का सेवन सोच की सेहत के लिए हानिकारक है।
दिल्ली शहर इतना बदल नहीं गया जितना बिगड़ गया है कि कौन न जाय दिल्ली की गलियाँ छोडक़र। गनीमत है कि तबाह नहीं हुआ। इसलिए यह इसरार करना हिमाकत होगी कि दिल्ली के उस दौर को याद कीजिये कि जब हम जवान थे। हम लोगबाग हमजबान थे हमनवा थे हमख्याल न होते हुए भी हमदर्द थे और हम हम थे। कनॉट प्लेस। खूबसूरत गोलाई  घूमती इमारतों के खम्बों की आलीशान तरतीब। तफरीह का मरकज़। प्लाजा सिनेमा के करीब बीस कदम के शालामार कैफे। शाम हुई नहीं कि मशहूर और मकबूल पेंटरों की आमद। मकबूल फिदा हुसैन, रामकुमार, तैयब मेहता, स्वामीनाथन, अम्बादास, हिम्मत शाह। और भी कई। प्रबोध कुमार से भी पहली मुलाकात यहीं पर हुई। रामकुमार का प्रबोधकुमार के साथ बहुत स्नेह था और अशोक के साथ भी।  प्रबोध कुमार के साथ संबंध गुड्डू के सम्बोधन तक पहुंचे। अभी भी दोस्त भी है ... दोस्ती भी। प्लाजा सिनेमा के पास चार पांच दुकानों के फासले पर राय बहादुर भोलाराम की दारू की दुकान थी।  ठीक शालामार के सामने सडक़ पार। सवा दो रुपए की बरफ में लगी बीयर आती थी। अगर किसी यार तलबगार की जेब में दो रूपये का सरमाया है तो दुकान के बाहर बरामदे में उस दोस्त का इंतजार करता था जिससे चवन्नी उधार ली जाए। कर्ज की पीते थे मय.. और सोचते थे ... कि रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन। और यकीन मानो ऐसा दानवीर कर्ण प्रकट हो भी जाता था बल्कि पूरी बीयर ही अपने पल्ले से पिला देता था। सात बजे शाम तक कनॉट प्लेस सुनसान। बोर्ड बत्ती सब गुल। दिल तो तेरा उदास है नासिर शहर क्यों सांय सांय करता है। मैं और गुरूजी (अशोक) खम्बे के पीछे सीधे बोतल से बीयर गटक रहे थे तो पता नहीं किस दिशा से पुलिसवाला आ धमका। शराब पी जा रही है? बीयर है। शराब ही होती है। जी। नहीं जानते शराब पीना कानूनन जुर्म है। पता है। क्या करते हो? स्टूडेंट हैं हवलदार साहब। मैंने हाथ मिलाने की तर्ज से उसके हाथ में अठन्नी थमा दी। ठीक है जल्दी जल्दी कर लो, मैं देखता हूँ कोई और पुलिसवाला तो इधर नहीं आ रहा।
कनॉट प्लेस में एक और तीर्थ-स्थान  था, टी हाउस। मैं एक बार फिर शर्त लगाकर कह सकता हूँ कि अगर टी हाउस नहीं होता तो हिंदी साहित्य का इतिहास बेशक अधूरा नहीं रहता, कुछ पन्ने जरूर कोरे रह जाते। यह जगह साहित्य की हाइड पार्क थी, दुनिया भर के लेखकों और कवियों का मजमा लगता था। भांति-भांति के कवि, गीतकार और मुक्तछंदी। कहानी, नई कहानी, कविता, अकविता, तारसप्तक जैसे शब्द टी हाउस की हवा में भिनभिनाते थे। अजीबोगरीब गहमागहमी होती थी। अगर कोई संपादक आ गया तो लेखकों की चमचागिरी का नजारा होता था। किसकी रचना कैसे कहां छपी और कहां-कहां से लौटकर आई और क्यों। तब के जमाने की अग्रिम और अगुआ उपन्यासकार, कहानीकार, विचारक सबका वहां बैठना और बोलना होता था। कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव की जमात खास आकर्षण होती थी। नवोदित और उभरते लिखाड़ी उनसे खौफ  खाते  थे। हमारे अशोक की इन तीनों से खूब दोस्ती थी। खासकर मोहन राकेश से। यहीं अशोक ने मुझे श्रीकांत वर्मा से मिलाया। श्रीकांत वर्मा ने मुझे हरिशंकर परसाई से मिलाया। राजेंद्र यादव से एक शाम परिचय करते हुए अशोक ने कहा .. यह रमेश गोस्वामी हैं। कुछ दिनों पहले ही मैंने राजेंद्र यादव की जहां लक्ष्मी कैद है कहानी पढ़ी  थी। राजेन्द्र यादव ने धूप के चश्मे में से मुझ पर नजरें डालीं और मुझे नजर अंदाज कर दिया। कमलेश्वर से जान पहिचान नमस्कार तक पहुंची। मोहन राकेश बिना मुँह से सिगार निकाले मेरे अभिवादन का कम से कम जवाब तो देते थे। अब अशोक की शरारत तो देखो अभी भी उसने गुणेन्द्र सिंह कम्पानी से नहीं मिलाया।
टी हाउस में आने वाली कुछ और हस्तियों को यहां दर्ज नहीं किया तो समझा जायेगा कि मैं कभी टी हाउस गया ही नहीं। यह हिंदी उर्दू का गंगा जमुनी संगम था। बलराज मैनरा मंटो की तरह मशहूर और बदनाम हो चुका था और उसने एक नियुक्त समय नियुक्त दिन नियुक्त महीने और नियुक्त साल ईश्वर के अस्तित्व को मानना बंद कर दिया था। मजाज़ का एक नौटंकी रूप था हंसराज रहबर। धुली अधधुली काली अचकन, लखनवी पैजामा और कीकड़ पहलवान अब गिरा कि अभी गिरा। वह इस जात का कम्युनिस्ट था कि लेनिन पर रजअतपसंद यानि प्रतिक्रियावादी होने का इल्जाम धरता  था। उसकी लिखी किताबों के नाम इस प्रकार हैं-लेनिन बेनकाब, नेहरू बेनकाब, गालिब बेनकाब, हरवंश कश्यप नाम का एक दसकहानीकार रहबर का दोस्त था। अशोक ने उसे कहा- तुम एक किताब क्यों नहीं लिखते- रहबर बेनकाब। एक और जनाब थे ब्रजेश्वर मदान। वह अपनी हाल की लिखी कहानी एक ही बैठक में, एक ही काफी के प्याले पर मुंहजबानी सुना देता था। बशर्त कि काफी का बिल आप अदा करें। एक दिन उसने मुझे और अशोक को अपना निहायत बेसूदा शाहकार सुनाया। अशोक ने कहा - इट्स ए ग्रेट स्टोरी, पेरिस रिव्यू  में भेज दो। टी हाउस में हर रोज हर शाम लम्बी और गर्म-गर्म बहसें होती थीं। मेजों पर मुक्के मारे जाते थे। दीवारों पर गिलास तोड़े जाते थे। कृश्नचन्दर वाहियात अफसाना निगार हैं, बेदी को छू नहीं सकता। सात्र्र से मैं इस मुआमले में मुत्तसकीक नहीं करता हूँ। और जवाहरलाल को मैं राय देना चाहता हूं कि....। बड़ा सर फुटव्वल होता था। कई लेखकों का वेटरों से उधार चलता था। एक  वेटर था- मसीह। वह भी शाइर हो गया। उसका लिखा एक मिसरा है- बहुत रहता है उदास मसीह आजकल।
बढिय़ा बीयर के दाम के साथ अच्छी किताबों की कीमत भी दो ढाई रुपए होती थी और उन सालों में जो भी उम्दा  किताबें मैंने पढ़ीं वह अशोक के मशविरे पर या उसके दबाव से, और कभी अफसोस नहीं हुआ। अशोक को हर लायब्रेरी का दरबान जानता है, हम लोग उसे खींचते थे। चाहे ब्रिटिश कांउसल हो या यू एस आई एस या भारत सरकार का सूचना केंद्र। अशोक इन जगहों पर घंटों बैठा पढ़ता था।  बाहरी मुल्कों के अखबार, रिसाले और किताबें। समीक्षाएं पढक़र हम लोगों में बांटता था और मैं उस किताब के दिल्ली पहुंचने की राह देखता था। न्यू स्टेट्समैन हम दोनों की काबिले इंतजार एक पत्रिका थी। शीतयुद्ध पर तेल डालने वाला बुद्धिजीवियों का चहेता  एनकाउंटर भी साहित्य पृष्ठों के कारण पढ़ा जाता था। अमरीकी साहित्य का पढऩा यू एस आई एस की लाइब्रेरी में ही होता था। न्यूयॉर्क टाइम्स में नाटकों की समीक्षाएं पढक़र टेनिसी विलियम्स, आर्थर मिलर, ओ नील के सब नाटक पढ़ डाले, मेरी समझ में अशोक की राय का जो अहसान है वह है जे डी सेलेंजर की  केचर इन द राइ और हार्पर ली की टू किल ए मॉकिंगबर्ड। रुसी वांग्मय के सामने अमेरिकन वांग्मय फीका है पर यह दोनों उपन्यास नायाब शाहकार थे। और अब तक मेरे दिल में और मेरी शेल्फ में मौजूद हैं। नायपाल की एन एरिया ऑफ डार्कनेस भी उन्हीं दिनों में रौशनी में आई और मुफ्त बदनाम हुई। नायपाल ने किताब में कहा .. हिंदुस्तानी रेल की पटरियों के तट पर  शौच करते हैं और सारा हिंदुस्तान एक तरह का शौचालय है। खूब लफ्फाजी गदर हुआ। चाल्र्स चैप्लिन की सरगुजस्त भी उन्हीं सालों आई जो पांच रुपए की महीना किस्त पर वेगर्स के सामने फर्श पर बैठे किताब वालों से खरीदी गई। रुसी साहित्य की बुलंदी को छूने की कोशिश में भी हम लग चुके थे। अशोक और महेंद्र भल्ला का टालस्टाय बहुत प्रिय उपन्यासकार था और मेरा भी। उसका सब लिखा पढ़ा, बाद में दोस्तोवस्की मेरा खुदा हो गया। उस जमाने की शेष स्मृति में एक और हकीकत बयान करने लायक है। जितनी बढिय़ा बीयर, जितनी उम्दा किताबें, उतनी ही अच्छी फिल्में। टिकिट भी दो रुपए। आई वांट टू लिव, व्हिस्परिंग विंडोज, रोमन हॉलीडेज, कासाब्लांका, टू किल ए मॉकिंगबर्ड जैसी फिल्में हम दोनों की चहेती फिल्में थीं। अब सिर्फ  मेरी। विमल राय, देवकी बोस, केदार शर्मा , अमिय चक्रवर्ती की फिल्मों को हम आँखों पर धरते थे। अनिल विस्वास, पंकज मलिक, तिमिर बरन,  खेमचंद प्रकाश, सचिन देव बर्मन, सलिल चौधरी जैसे कई और संगीतकारों की बनाई धुनें हमारे दिलों के तारों को छेडक़र हमें जिन्दा होने का अहसास दिलाती थीं। शैलेन्द्र के लिखे गीत सुनकर हम हिंदी के कवियों पर हँसते थे। हंसने से मुराद कि उन्हें कम पाते थे। अशोक अलबत्ता हंसने को ज्यादा नहीं खींचता था।
यहां थोड़ा फेड इन फेड आउट। मौत और हयात की एक पुरानी तस्वीर। नेहरू जी के जनाजे को सौज का कंधा देने तमाम दुनियां उमड़ी। अशोक और मैं तीनमूर्ति से राजघाट तक मई के जालिम महीने में नेहरू जी के आखरी सफर में उनके साथ चले। अशोक की बुरी हालत थी। वह अपनी आदत के मुताबिक बारडबार हाथ मलता था। और बार-बार आसमान देखता था। पृथ्वी पर रहने वाले हर मनुष्य की तरह उसके लिए भी शायद आकाश नियति था, प्रतीक था। बाद में अशोक बौनों की इबादत में झुक गया। लेकिन उसका जमीर लाजवळ रहा।
अशोक आमिर बाप का फकीर बेटा था, लेकिन अमीरी  उसके खून के हर कतरे में  खौलती थी। अशोक उधार  ले सकता था,  पर अहसान नहीं। यह बात अगर मैं ठीक से नहीं कह  पाया, तो धुंधलका मेरे जहन में है। दैनिक हिंदुस्तान में अशोक संपादक था। उप, सह या मुख्य मैंने कभी जानना नहीं चाहा। अखबार का बड़ा संपादक रतनलाल जोशी था। अशोक की नजरों से गिरा हुआ। उसे हरेक  बेवकूफ -कामयाब शख्स से अजहद चिढ़ थी पर यह और बात हो गई। हिन्दुतान का दफ्तर दिल्ली के दिल में होने के कारण हर कोई उससे भेंट  करने आ टपकता था। ज्यादातर लेखक कवि ही होते थे। अशोक यजमानों की तरह उनकी पेटपूजा  करता था। तनख्वाह खत्म हो गई तो उधार शुरू। उसके दफ्तर में एक पंडितजी   चपरासी था, जो बनियों की तरह बिना जाति-भेद के सबको सूद पर उधार देता था और पहली तारीख को पठान की तरह उगाही करने सम्पादकीय विभाग, प्रेस और विज्ञापन विभाग और दूसरे विभागों के चक्कर लगाता था। अशोक प्यार से उसे कमीना कहता था। दिल्ली में जो भी जाना अनजाना,  कमजाना आता, चप्पलें चटकाता अशोक के पास पहुंचता। फिर वह लोदी रोड में अशोक के एक किरायेदार से किराये पर लिए कमरे में सोता और उसके  होटल में खाना खाता। कोई जेब ढीली नहीं करता था। जबकि उनकी जेबें खाली नहीं होती थीं। वही  सुदामा दोपहर बाद दिल्ली भ्रमण के दौरान दरियागंज से खरीदी चार सौ रुपए की किताबें और बीबी के लिए चांदनी चौक से खरीदी चांदी  की पायल की नुमाइश करता था।  मुझे अशोक पर बहुत गुस्सा आता। वह कहता, कोई बात नहीं, कोई बात नहीं। घर से पैसे आने वाले हैं। मैं दोस्ती में बराबर का होना  मानता हूँ। रोज मिलने जुलने वाले दोस्तों में मिलकर खर्च करने के हक में हूं। यह नहीं कि आपने चाय का एक घूंट भरा नहीं कि अशोक काउंटर पर पैसे देने पहुंच गया। उस का हम हैं .. हम देते हैं, कोई नहीं रोकता था। अशोक की पांच हजार साला मेहमाननवाजी की तहजीब पर मुझसे फिदा नहीं हुआ जाता था। वह खुद पैसे-पैसे के लिए हर पल मरता था और मुफ्तखोरों के मुंह में सांभर समेत इडली डोसा भरता था। उदारता सिर्फ  देने में नहीं होती, लेने भी होती है। अशोक के वही कवि लेखक मित्र अब  नामी गिरामी हो गए हैं। अशोक की उदारता का किसी के मुंह से तारीफ  का एक लफ्ज़ नहीं सुना। अशोक कभी-कभी मसखरी करता कि तुम बीबी की तरह डांटते हो कि ऐरे गैरे लोगों पर पैसा बर्बाद करते हो। मैंने कहा-तुम्हारी बीबी होती तो तुम्हारी खूब मरम्मत भी होती।  जिस तरह के तुम हो।
जनाब अशोक ने प्रथम प्रेम में असफलता के बाद शादी नहीं की, पर दूसरों की शादी की नोक पलक ठीक करते रहे। सेकसरिया से हिज्जे निकालकर हम कहते- सेक्सी शादी कर लो। अशोक असत यौवन की तरह झेंपता और हँसता। थोड़ा गुस्सा भी होता। विवाहित मित्रों के वैवाहिक विवाद सुलझाने में अशोक अव्वल नंबर पर। अशोक अनेक सड़ी-गली धारणाओं का धारक था। उसमे यह एक कि पति ही गलत है, अत्याचारी है, खुदगर्ज है। पत्नी सहनशीलता की जीती जागती तस्वीर है, मजलूम है। नारी के मौलिक और अमौलिक अधिकारों के लिए, लडऩे के लिए वह अदालतों की चौखटों पर भी सर मारने गया। वह मजलूम का हमेशा तरफदार रहा पर औरत और मर्द में सिर्फ  औरत का पक्षधर होना इंसाफपसन्दी नहीं है। मर्द भी जुल्म बर्दाश्त करता है और गली में आकर चिल्लाता नहीं। बीबी की तरफ से भी घरेलू हिंसा होती है, पर खाविंद के लिए कोई कानून नहीं। क्या कहें बीवी की कंैची की तरह चलने वाली जबान उसे तो कभी चुभी नहीं। जिंदगी भर बाप बनकर दूसरों को पालता रहा। जो सुख देवी देवताओं ने भी न छोड़ा, और सांप बिच्छुओं ने भी जमकर लिया, उस सुख से भी हमारा यार वंचित रहा। कुदरत के इस निजाम की भी उसने मुखालफत की। प्रथम प्रेम की बची खुची चिंगारी पर भी उसने पानी फेर दिया। हर मौकों पर दूसरों को इंसाफ  दिलाने के लिए लाठियां खाने आगे बढ़ा या मासूम बच्चों की तरह हक की बात मनवाने के लिए सडक़ों पर लेट गया, अपने मैले कपड़ों के साथ जख़म भी ओढ़ लिए।
अशोक की बैचेन रूह परवाज कर गयी है पर उसकी याद अभी भी उसके घोंसले में आकर दम लेती है। उसी की याद में बैठी रहती है। खानदानी मकान के दो कमरों की एक खिडक़ी के बाहर नीचे बच्चों का स्कूल है। आधी छुट्टी में बच्चे खेलते हैं, शोर करते हैं, आहट में कदीमी पेड़ है। वहां से परिंदों की बच्चों के साथ शोर मिलाने की प्रतिस्पर्धा हो रही है। अशोक की याद बच्चों को देखती है और परिंदों को सुनती है और देख सुन कर वह भी परवाज़ के लिए अपने पंख फैलाती है,  और खला में बिखर जाती है।