Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

केदारनाथ सिंह : एक बेहतर दुनिया की तलाश

मधुरेश
372, छोटी बमनपुरी
बरेली-243003
मो. 093198-38309
म्र का फ$र्क ही शायद हमारे लेखन की शुरूआत के बीच का फ$र्क भी है। जब वे बाकायदा छपने लगे थे, एक लेखक के रूप में वे मेरी तैयारी के वर्ष थे। सन् 1956 में जब मैं इंटर में था, बरेली कॉलेज की नागरी प्रचारिणी की सभा की ओर से आयोजित कहानी प्रतियोगिता में मेरी कहानी ‘बुधिया’ पर मुझे प्रथम पुरस्कार मिल चुका था। उस दौर में ही एक-दो ट्यूशनें, इस कारण शुरू की थीं कि मनचाही किताबें और पत्रिकाएं खरीदी जा सकें और चोरी-छिपे पीने वाली सिगरेट का खर्च निकल सके। यह समझ भी वस्तुत: इसी दौर में विकसित हुई कि अपने समय और उसमें सक्रिय लेखकों को जानने-समझने का सबसे अच्छा माध्यम वे पत्रिकाएं हैं जिनमें वे छपते हैं। चूंकि तब मेरा अपना क्षेत्र कहानी था, यशपाल, राहुल सांकृत्यायन, वृंदावन लाल वर्मा, रांगेय राघव आदि से पत्राचार की शुरूआत हुई जो लंबे अरसे तक बना रहा। ‘कहानी’ के ऐतिहासिक महत्व वाले ‘55 और ‘56 के विशेषांक आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। ‘कहानी’ के अतिरिक्त ‘ज्ञानोदय’ अपने शहर में ही मिल जाती थी जबकि ‘कल्पना’ को चंदा भेजकर मंगवाना होता था। उस दौर की अन्य अनेक पत्रिकाएं भी सुविधानुसार आगे-पीछे खरीदीं। अद्र्धवार्षिक ‘हंस’, ‘निकष’, ‘नई कविता’ और द्वैमासिक ‘प्रतीक’ ने ही शायद वह पुल तैयार किया जिस पर चलकर केदारनाथ सिंह और उनके अनेक समवयस्क लेखक मुझ तक आए। इनमें से अनेक बाद में मेरे मित्र और आत्मीय भी बनें- रमेश कुंतल मेघ, शिवप्रसाद सिंह या फिर इन्हीं के हमउम्र शिवकुमार मिश्र, गोपाल राय और किसी हद तक विश्वनाथ त्रिपाठी भी। अपने एक वक्तव्य में केदारनाथ सिंह ने इस बात का उल्लेख किया है कि सन् 54-55 में बिहार में आयोजित एक संगोष्ठी में अज्ञेय की उपस्थिति में उन्होंने काव्य-पाठ किया था। जो कविता उन्होंने पढ़ी थी, बाद में अज्ञेय ने उसे ‘प्रतीक’ में छापा था। यशपाल पर मेरी पहली आलोचनात्क टिप्पणी भले ही दिसम्बर सन् 62 की ‘लहर’ में छपी हो, ‘कहानी’ और ‘ज्ञानोदय’ में कुछ अंग्रेजी कहानियों के अनुवाद सन् 56 और 58 के बीच छप चुके थे। इसी के आसपास बरेली से प्रकाशित ‘मुरलिका’ के शरतचन्द्र पर केन्द्रित अंक में शरत् पर मेरा एक परिचयात्मक आलेख भी छप चुका था। यह संयोग थोड़ा आगे चलकर बना कि ‘ज्ञानोदय’, ‘कल्पना’, ‘माध्यम’ आदि में केदारनाथ सिंह की कविताएं और मेरा आलेख या समीक्षा एक साथ छपे। सन् 59 में जब ‘तीसरा सप्तक’ आया, उसे मैंने बरेली के ही एक पुस्तक विक्रेता द्वारा भारतीय ज्ञानपीठ की कुछ किताबों के साथ मंगवाया था। उनका कविता संग्रह ‘जमीन पक रही है’ हरीशचंद्र शर्मा के प्रकाशन संस्थान से ही छपा था, जहां से मेरी ‘सिलसिला’ छपी थी। कविता पर लिखकर भी कविता पढ़ी जाती थी, इसका प्रमाण उस दौर के केदानाथ सिंह के साथ राजकमल चौधरी और धूमिल रहे। अपनी गंभीर और मारक अस्वस्थता के बीच राजकमल चौधरी का ‘मुक्ति प्रसंग’ आज भी मेरी किताबों में होना चाहिए।
केदारनाथ सिंह ने अपनी आजीविका की शुरूआत भले ही गोरखपुर से की हो, उनके आरंभिक दौर की कविताओं के साथ जिस जगह का नाम अरसे तक जुड़ा रहा वह गोरखपुर के निकटवर्ती जिले देवरिया का ही एक कस्बा पडरौना था। यहां एक कॉलेज में वे हिन्दी के अध्यापक बनकर गए फिर प्राय: एक दशक तक वहीं ंप्राचार्य भी रहे। चाहे अपने गांव जवार की धरती और किसानी संस्कारों का प्रभाव हो या फिर इन छोटी जगहों से उनका जुड़ाव, यह कस्बाई चेतना उनके जीवन का एक अभिन्न अंग बनी रही है। बरसों तक यहीं रहने के बाद सन् 1976 में वे जे.एन.यू. में नियुक्त होकर दिल्ली आए। सच-झूठ की जानकारी को लेकर कोई दावा भले न किया जा सके, उनके जे.एन.यू. में आने की कहानी भी मित्रों से अनेक बार सुनी है। दो वर्ष पहले केन्द्र की जिम्मेदारी संभालकर नामवर जी ने उसे बनाने-संवारने की अपनी कोशिशें तेज कर दी थीं। स्वाभाविक ही वे चाहते थे कि उनकी पसंद के साहित्यिक सूझ-बूझ वाले लोग विभाग में आएं और उनके काम में सहयोग करें। इसी बीच विभाग में एक नियुक्ति डॉ. सावित्री शोभा ‘चन्द्र’ की हुई- नामवर जी को न चाहते हुए भी। उसकी चयन समिति में हजारी प्रसाद द्विवेदी थे। लेकिन यू.जी.सी. के चेयरमैन प्रो. सतीशचंद्र के प्रभाव की अनदेखी नहीं की जा सकती थी। बताते हैं द्विवेदी जी ने ही नामवर जी से कहा था- यह नियुक्त तो होगी ही। चाहे तो अपनी इच्छा और पसंद के एक व्यक्ति की मांग वे और कर लें। सुना यही है कि जे.एन.यू. में केदारनाथ सिंह का आना द्विवेदी जी के इसी सुझाव का त्वरित और तात्कालिक परिणाम था।
नामवर जी से पहली बार मिलना नवम्बर सन् 1970 में हुआ था- दिल्ली में आयोजित अफ्रो-एशियन लेखक सम्मेलन में। तब वे जोधपुर जा चुके थे और एक-दो दिन को वहीं से दिल्ली आए थे। सन् 73 में जब मैंने अपने शोध ‘माक्र्सवादी जीवन-दृष्टि और हिन्दी उपन्यास’ के लिए, गाइड के रूप में आगरा विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति बालकृष्ण राव को नामवर सिंह का नाम सुझाया तो उन्होंने तत्काल सहमति जताते हुए सारी बात उनकी स्वीकृति पर टिका दी। नामवर जी ने न सिर्फ स्वीकृति दी, शोध के मूल शीर्षक में संशोधन भी किया। मेरा शीर्षक ‘साम्यवादी हिन्दी उपन्यास’ था। इसके बाद मेरा दिल्ली आना-जाना बढ़ गया। केदार जी के कुछ बाद ही मैनेजर पाण्डेय भी जे.एन.यू. में आ गए। इसके बाद के कुछ वर्ष जे.एन.यू. एक तरह से मेरा दूसरा घर था। प्राय: हर साल वहां जाता और कई-कई दिन रहना होता था। पाण्डेय जी तब बरेसराय में रहते थे। पाठ्यक्रम निर्माण के प्रसंग, इग्नू की बैठकें, लोकभारती इलाहाबाद से ‘क्रांतिकारी यशपाल : एक समर्पित व्यक्तित्व’ के संपादन का कार्य हो या फिर शोध संबंधी •ारूरतें- जाने का बहाना कुछ भी हो सकता था।
इसी लगभग एक दशक की अवधि में केदारनाथ सिंह के संपर्क की अनेक स्मृतियां जुताई किए गए खेत में छींटे गए बीजों की तरह बिखरी पड़ी हैं। उनका क्रम थोड़ा आगे-पीछे भी हो सकता है लेकिन नहीं लगता कि इससे कोई खास फर्क पड़ता है। उनसे अधिकतर मिलना भले ही नामवर जी के जे.एन.यू. वाले 109 नंबर के क्वार्टर में ही  हुआ हो, लेकिन उसके बाहर भी बहुत कुछ है। ऐसी ही एक स्मृति यूनिवर्सिटी की गाड़ी में मैनेजर पाण्डेय के साथ कहीं जाने की है। संभव है साहित्य अकादमी के सहयोग से जे.एन.यू. द्वारा आयोजित यह प्रेमचंद शताब्दी वर्ष का आयोजन हो- सन् 1980 में। हम लोग पीछे की सीट पर बैठे थे और नामवर जी के यहां जा रहे थे। उन्हें लेते हुए कार्यक्रम में जाना था। गाड़ी में ही किसी प्रसंग में पाण्डेय जी ने कहा- ‘वहीं बाबू साहब भी होंगे... उन्हें भी साथ चलता है’ ‘बाबू साहब’ के उनके संबोधन पर मैंने शायद कुछ कौतुक भरे आश्चर्य से उनकी ओर देखा था। फिर उन्होंने ही बताया- ‘केदारजी को हम सब यहां इसी तरह बुलाते हैं...’ गाड़ी रुकने पर जब हम लोग अंदर गए थे, वे दोनों तैयार थे और फिर हम लोग साथ ही उस आयोजन में गए थे।
पडरौना से जे.एन.यू. में आने पर केदारनाथ सिंह को उडऩे को बेशक एक बड़ा और निर्बाध आकाश मिला। लेकिन उनकी मूल प्रकृति ग्रामीण और कस्बाई संस्कारों में बनी-बुनी है। यह परिवेश जे.एन.यू. में भी उनके साथ था। इसे पर्याप्त जतनपूर्वक उन्होंने बनाया और संवारा था। छोटी जगह पांवों को पकडऩे और जमाने वाली मिट्टी की जो अपनी एक खास महक होती है, वह उन्हें खींचती और सम्मोहित करती है। जे.एन.यू. में भी उनके इन गंवई संस्कारों वाला एक अंतरंग एवं आत्मीय संसार उनके साथ था। पूर्वांचल को जीते मित्रों और आत्मीयों का अपना अंतरंग वृत्त वहां उन्हें चकिया, बनारस या पडरौना में ही  होने का सुख और संतुष्टि देता था। मौका मिलने पर घर-गांव की ओर भागने को जैसे वे मुंह उठाए तैयार रहते। परमानंद श्रीवास्तव को इस दौर में लिखित उनके अनेक पत्रों में उनकी इस ललक का संकेत जब-तब मिलता है। देशज के प्रति उनके इस सम्मोहन का नाता दिल्ली में भी क्षीण नहींहोता। अपने ऐसे ही एक अनुभव को परमानंद श्रीवास्तव को लिखते हुए जैसे अंदर कहीं वे अपने को ही छूते और टटोलते हों... ‘तुमने कभी गांव-देहात में ऐसे लोगों को देखा है जो बिना किसी गिला-शिकवा के एक पूरी उम्र एक पेड़ या टीले की तरफ देखते हुए गुजार देते हैं। मैं पिछले दिनों गांव गया था तो एक बूढ़े नट को एक पेड़ पर बैठे देखा जो घंटों से उन खेतों की ओर एकटक देख रहा था, जिनसे उनका कोई रिश्ता नहीं था। मेरे लिए यह दृश्य सात्र्र या काफ्का के किसी नायक के अकेलेपन से ज्यादा खौा$फनाक था...’ उनके काव्य में किसानों के ढेरों बिम्ब हैं जो कहीं न कहीं उनके अंदर के इस किसान के ही प्रतिरूप हैं। ये बिम्ब और उनमें आए किसान ही वस्तुत: उन्हें दिल्ली में भी उस तरह कभी अकेले नहीं होने देते। एकदम शुरू में ही देशज के प्रति इस लगाव की जो गहरी लीक त्रिलोचन ने उनके मन में डाली, वह फिर कभी धुंधली नहीं पड़ी।
गांव-देहात वाले इन संस्कारों के कारण ही दिल्ली में भी वे अपने ढंग से रह सकते हैं। एक दिन शाम को हम लोग- मैं और पाण्डेय जी- जब नामवर जी के यहां पहुंचे, केदारजी भी वहीं थे। गर्मी के दिन थे। वे खड़े कॉलर वाले हल्के गेरुए रंग के कुर्ते पर ढीले पायचों का पैजामा पहने कहीं जाने को तैयार होकर ्आए लगते थे। थोड़ी देर में जब वे बाहर आए, केदारजी ने ही कहा, ‘चलें... आप लोग भी चलें... आज उदय प्रकाश के यहां चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘दि ग्रेट डिक्टेटर’ देखने का कार्यक्रम है...’ थोड़ी दूर तक उन लोगों के ही साथ चलकर, उन्हें बिदा करने के बाद फिर हम लोग देर तक संध्या से धूसर होते उस लम्बे-चौड़े परिसर में ही घूमते रहे थे।
वह अस्सी के दशक के उत्तरार्ध का ही कोई साल रहा होना चाहिए। तब वे सोवियत संघ की अपनी यात्रा से लौटे ही थे। शाम के समय नामवर जी के यहां पहुंचने पर वे वहां पहले से ही मौजूद थे। अनुभव के विस्तार और समृद्धि की चमक उनके चेहरे से साफ पढ़ी जा सकती थी। वे उन्हीं अनुभवों के बारे में उत्साहपूर्वक बोल-बता रहे थे। उसी रौ में, बात करते-करते वे अंदर के कमरे में गए और एक किताब लाकर मेरे हाथ में दे दी... ‘यह मॉस्को में अभी कुछ दिन पहले ही आई है... भारत में यह शायद इसकी पहली प्रति है’ उनके उत्साह ने मेरी उत्सुकता को और उकसा दिया था। वैसे भी किताबों के बारे में शुरू का यह थ्रिल कम होने की बजाय अपने ढंग से और बढ़ा ही है। वह भारत-सोवियत संयुक्त तत्वावधान में साहित्य अकादमी और रादुगा प्रकाशन मॉस्को की एक बड़ी योजना ‘बीसवीं शताब्दी का साहित्य’ के अंतर्गत प्रकाशित ‘साहित्य और सौंदर्यशास्त्र’ शीर्षक पहला खण्ड था। योजना के तहत सोवियत साहित्य के दस खण्ड हिन्दी में और हिन्दी साहित्य के दस खण्ड रूसी में छपते थे। मिखाइल गोर्बाच्योव और चंगीज आइत्मातोव की संक्षिप्त भूमिकाएं भी उसमें थीं- भारत-सोवियत संबंधों के प्रसंग में उस समूची योजना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए।
बाद में इसी योजना के सातवें खण्ड के रूप में स्वयं केदारनाथ सिंह के संपादन में वरयाम सिंह के चयन और अनुवाद वाला, सोवियत कविताओं का एक ‘संकलन’ तनी हुई प्रत्यंचा शीर्षक से 1994 में प्रकाशित हुआ। अपनी संक्षिप्त भूमिका में केदारनाथ जी ने इस बात पर जोर दिया कि रूसी उपन्यास की महान परम्परा की अपेक्षा उसकी कविता से हमारा परिचय पर्याप्त विलंब से हुआ। यह तभी हुआ जब ‘सुपरिचित पश्चिमी आधुनिकता के अभ्यस्त मानस के लिए एक नए तथा अधिक उन्मुक्त सौंदर्य लोक की आवश्यकता थी- कला की ऐसी दुनिया की जहां प्रयोग की बेचैनी भी हो और परंपरा का अपना अंत:संघर्ष भी।’ उन्होंने इस बात पर खासतौर से जोर दिया कि रूस यूरोप से विच्छिन्न न होने पर भी उसकी कविता में बहुत कुछ ऐसा है जो पूरी तरह उस शब्द की अर्थव्याप्ति में नहीं समा पाता, जिसे हम पश्चिम कहते हैं। यही बात वस्तुत: पूर्वी पाठक के लिए रूसी कविता को विशेषकर रुचिकर और सार्थक बनाती है।
यह संपूर्ण योजना दस खण्डों में पूरी होनी थी। बाद के वर्षों में थोड़े-थोड़े अंतराल के बीच इसके सात या आठ खण्ड निकले। फिर सोवियत संघ के विघटन के बाद जैसे और अनेक चीजों पर उसका प्रभाव पड़ा, रादुगा प्रकाशन भी बंद हो गया। इस योजना के बारे में कोई प्रामाणिक एवं आधिकारिक जानकारी न होने पर भी इसके अंतिम खण्ड बहुत प्रयत्न करने पर भी मुझे मिले नहीं। शायद वे कभी निकले ही नहीं।
समय का क्रम थोड़ा आगे-पीछे हो सकता है लेकिन प्रसंग इसी के आसपास का है। अगस्त सन् 1982 में पटना विश्वविद्यालय में एक सप्ताह चलने वाला एक राष्ट्रीय सेमीनार ‘साहित्य और लोक चेतना’ विषय पर केन्द्रित हुआ। उसी का एक विषय ‘आंचलिकता और लोकचेतना’ जैसा कुछ था। गोपाल राय ने मुझे लिखा- मैं आऊं, इसी बहाने मिलना हो जाएगा। बहुत से और लोगों से भी भेंट होने की संभावना थी। पहुंचने पर पता चला कि जिस सत्र में मुझे आलेख पढऩा था, उसी के आगे-पीछे केदारनाथ सिंह और मैनेजर पाण्डेय को भी बोलना था। गोपाल राय ने सूचना दी कि वे लोग आ गए हैं और पटना में ही अन्यत्र कहीं ठहरे हैं। मेरे वाले सत्र में केदारनाथ सिंह मौजूद थे। अपनी बात मैंने नागार्जुन और रेणु को आमने-सामने रखकर कही थी। आलेख रेणु के उतने विरोध में नहीं था, जितना रेणु समर्थक कुछ श्रोताओं ने तब उसे समझा। जो भी हो, उस पर पर्याप्त हल्ला हुआ और जैसा होता है- श्रोता दो वर्गों में बंट गए। एक बड़े वर्ग ने मेरा समर्थन किया। वाचन समाप्त हो जाने पर संयोजक ने पुन: घोषणा की कि सारे आलेखों और उन पर हुई बहस के प्रसंग में यदि किसी को कुछ और कहना है तो वह कह सकता है। जब मेरी बारी आई और मुझे डाइस पर बुलाया गया। मैंने सिर्फ इतना ही कहा कि अपने आलेख के बाद और बाहर मुझे कुछ और नहीं कहना है। मेरे इस वक्तव्य पर भी खूब तालियां बजीं। बाद में खाली पड़ी एक कुर्सी पर केदारजी के पास ही बैठ गया। मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर गहरी ऊष्मा के साथ दबाते हुए उन्होंने कहा-‘आपका स्टैण्ड एकदम सही था। मुझे आपके आलेख में भी ऐसा कुछ नहीं लगा जो किसी रूप में विवादास्पद हो...’
संगोष्ठी में शिवकुमार मिश्र नहीं थे। वे तब अपने मित्र आलोचक चंद्रभूषण तिवारी से मिलने आरा चले गए थे। जब वे लौटे संगोष्ठी समाप्त होने को थी। उन्हें हॉल में आते देख, हम लोगों ने उन्हें बुलाकर अपने पास ही बिठा लिया। संगोष्ठी के समाप्त होने पर जब लोग उठने लगे, केदार जी ने इस प्रसंग की विस्तृत सूचना शिवकुमार जी को दी थी।
फिर अगले दिन वाराणसी तक हम लोग साथ ही लौटे थे। मैनेजर पाण्डेय को एक-दो दिन वहां रुकना था। रामविलास शर्मा तब वहीं थे और कुछ दिन पूर्व ही उनकी पत्नी का निधन हुआ था। पाण्डेय जी का कार्यक्रम उनसे मिलते हुए दिल्ली लौटने का था। केदारजी को कुछ दिन के लिए बनारस और अपने गांव जाकर फिर दिल्ली लौटना था। तय हुआ कि मैं भी इन लोगों के साथ ही जाऊंगा और रामविलास जी के यहां जाकर एक-दो दिन बनारस में रुककर फिर बदायूं लौट जाऊंगा। वाचस्पति के छोटे भाई-बहन प्रभाकर और संज्ञा तब वहीं पढ़ रहे थे और आत्रेय निवास में रहते थे।
स्टेशन तक हमें रामवचन राय छोडऩे आए थे। हमारे टिकट खरीदकर वे हमें गाड़ी में बिठा गए थे। पटना से बनकर वाराणसी आने वाली वह दिन की कोई सामान्य गाड़ी थी, जिसमें भीड़ खूब थी- साधारण किसान-मजदूर और उसी जनता की भीड़ जिसके नाम पर देश के नेता राजनीति करते हैं। एक छोटी अटैची और कंधे पर लटकने वाला बैग हम लोगों के पास था। जैसे-तैसे रामवचन राय ने एक सीट घेरकर हम लोगों को बैठाने की व्यवस्था कर दी। इस तरह पटना से वाराणसी तक की इस छह-सात घंटे की यात्रा में हम पूरमपुर जनता के बीच थे।
केदार जी भरसक अपने ढंग से उस भीड़ का आनंद ले रहे थे। अपनी-अपनी अटैची सीट के नीचे रखकर सीट पर बैठ गए थे, भीड़ के घटने-बढऩे से विशेष अंतर नहीं पड़ता था। देर तक हमारी बातचीत का मुद्दा भी वही भीड़ बनी रही जो ‘जनता’ के रूप में हमारे आसपास कहीं थी। यह वस्तुत: उनकी कविता का सडक़ पार करता हुआ वही आदमी था :
उस आदमी को देखो जो सडक़ पार कर रहा है
वह कहां से आ रहा है
मुझे नहीं मालूम
कहां जाएगा
यह बताना कठिन है।
लेकिन सडक़ पार करता यह आदमी केदारनाथ सिंह को अच्छा लगता है और उसमें उन्हें अनेक संभावनाएं दिखाई देती हैं :-
मुझे आदमी का सडक़ पार करना
हमेशा अच्छा लगता है
क्योंकि इस तरह
एक उम्मीद सी होती है
कि दुनिया जो इस तरह है
शायद इससे कुछ बेहतर हो
सडक़ के उस पार।
डिब्बे में आते चाय और खोमचे वालों के बीच-बीच में हम कुल्हड़ की चाय लेते, नमकीन चना या फिर एकाध जगह किसी स्टेशन पर देर तक गाड़ी रुकने पर नीचे उतरकर खरीदे गए अमरूद उस भीड़ में भी यात्रा को एक उत्सव में बदल रहे थे। टिकट चेकर जैसे-तैसे भीड़ में जगह बनाता हुआ अपनी पहुंच के हिसाब से टिकट देखकर चला गया था। उसके जाने के बाद पाण्डेय जी ने जब अपने टिकट की तलाश में जेब में हाथ डाला तो कुर्ते में न टिकट था न ही शेष बचे पैसे। उस भीड़ का फायदा उठाकर, कुर्ते की जेब में हाथ डालकर कोई अपनी करामात दिखा गया था। हाथ की सफाई दिखाने वाला यह हाथ उन हाथों से अलग और भिन्न था जिनके बारे में नृतत्व शास्त्रियों एवं समाज विज्ञानिकों ने लिखा है कि मानव सभ्यता के विकास में हाथ और पहिया की एक विशिष्ट भूमिका रही हैा। दुनिया उसी दिन बदल गई थी जब मनुष्य ने चार हाथ-पैरों से चलने की बजाय हाथों को चलने से मुक्त करके दूसरे उपयोगी श्रम में लगाया था। इसी हाथ का बखान करते हुए कभी ‘जमीन पक रही है’ में केदारनाथ सिंह ने लिखा था :
उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।
वाराणसी से पहले मु$गल सराय में गाड़ी काफी देर रुकने पर स्टेशन के बाहर जाकर पाण्डेय जी ने टिकट खरीदा था। फिर डिब्बे की ओर वापस आते हुए खुद मूंगफली चबाते और केदार जी के लिए का$ग•ा के ठोंगे में मूंगफली लाए थे।
बनारस पहुंचकर गाड़ी से उतरकर उनके साथ ही पहले हम लोग काशीनाथ सिंह के यहां गए थे। तब काशी के पिताजी के भी वहां होने की याद है। बाहर से ही केदारजी ने काशी को जोर से नाम लेकर पुकारा था। उनके बाहर आने पर कुछ चुहल और परिहास भाव से हंसते हुए कहा था... लो संभालो... देखो तुम्हारे लिए आलोचक को लेकर आया हंू... और फिर काशी द्वारा मेरा हाथ पकडक़र गले लगाते हुए हम सब देर तक हंसते रहे थे।
पहचान की एक खामोश-सी झिलमिलााहट केदारनाथ सिंह की एकदम अपनी ची•ा है। इसी से वे अपनेपन का एक ऐसा पुल बनाते हैं जिस पर कहीं और कभी भी एक आत्मीय एवं अंतरंग दुनिया में पहुंचा जा सकता है। इसमें भीड़ के ज्यादा होने न होने का भी कोई फ$र्क पड़ता हो, लगता नहीं। अब तो कई सालों से विश्व पुस्तक मेले में दिल्ली जाना नही ंहोता। लेकिन कभी नियमित जाता था, प्राय: हर मेले में। प्रसंग शताब्दी के शुरू के वर्षों का ही रहा होगा। एक शाम राजेश के साथ ऐसे ही मेले में घूम रहा था कि एक स्टॉल पर काफी जमावड़ा सा दिखाई दिया। आगे बढक़र मैं भी पीछे जाकर खड़ा हो गया। ऐसे अवसरों पर एक तरह से छिपा-छिपौवल का मेरा खेल प्रिय कौतुक है। आप भीड़ में है लेकिन किसी के द्वारा भी सामान्यत: आपके पहचाने जाने की आशंका नहीं है क्योंकि आपका वहां होना किसी की जानकारी में ही नहीं है। आप गु•ारते हुए अपनी पहचान के व्यक्तित्व को चीन्हते हैं और चाहने पर उसे रोककर बात कर सकते हैं, उसे हैरत और अचंभे में डालते हुए। उस स्टॉल पर भी कई चेहरे पहचान में आ रहे थे। मंच पर केदार जी थे और उनके हाथ में कोई किताब थी। प्रसंग किसी युवा लेखक की पुस्तक के लोकार्पण का था। उसका विधिवत विमोचन शायद केदारजी ने ही किया था। जो उन्हें कहना था वह बोल चुके थे। जब मैं जाकर खड़ा हुआ पास खड़े लोगों से वे उस पर हस्ताक्षर करवा रहे थे। इसी बीच उस भीड़ के ऊपर फिसलती हुई उनकी न•ार मुझ पर पड़ी। भीड़ में से निकलते हुए वे चुपचाप मेरे पास आए और बिना कुछ पूछे किताब मेरी ओर बढ़ा दी। ‘मधुरेश जी, हस्ताक्षर करें...’ हस्ताक्षर करके किताब उन्हें पकड़ाने के बाद ही मैंने उनसे अभिवादन किया। फिर वे मेरा हाथ पकडक़र मुझे मंच की ओर ले आए और सामने पड़ी कुर्सी पर बिठाकर अपने अधूरे छूटे हुए काम में लग गए।
अब तक उनसे हुई अंतिम भेंट मेरे अपने ही शहर की है। शायद अगस्त 2004 की बात है। एक दिन अचानक वीरेन डंगवाल का फोन आया। उन्होंने बताया कि बरेली कॉलेज में नामवर जी और केदार जी आ रहे हैं। कुछ और कवि भी हैं। आलोक धन्वा पहले से ही यहां हैं। नामवर जी का व्याख्यान होगा और उसके बाद कवियों का काव्य-पाठ। होटल का नाम  भी उन्होंने बताया जहां इन लोगों के ठहरने की व्यवस्था थी। यह सब बताकर उन्होंने कहा- ‘भाई साहब, मैं बहुत घबरा रहा हूं और बेतरह नर्वस हूं... एकदम अकेला... संभव हो तो आप होटल पहुंच जाएं... नहीं तो कॉलेज में तो आपको रहना ही है।’
मैंने हृदयेश को भी सूचना दे दी थी। तीसरे पहर वे भी शाहजहांपुर से मेरे घर ही आ गए थे। आयोजन शाम को 6 बजे से होना था। उसके पहले ही हम लोग कॉलेज पहुंच गए थे। दो गाडिय़ों पर सात-आठ लोग थे। नामवर जी और केदार जी आगे वाली गाड़ी में थे। उनके बाहर आते ही अभिवादन करते हुए मैंने कहा- ‘अपने शहर में आपका स्वागत है...’ हृदयेश ने नामवर सिंह की ओर बढक़र अपना परिचय दिया। फिर वहीं खड़े हम लोग कुछ देर बातें करते रहे। फिर केदार जी से बतियाते हुए हम लोग आगे बढ़े और डंगवाल सहित अनेक लोगों से घिर गए।
कार्यक्रम कुल मिलाकर कोई चार घंटे चला। नामवर जी के व्याख्यान में हिन्दुत्व के कुछ उत्साही पैरोकारों द्वारा कुछ व्यवधान डालने की कोशिश भी की गई। गोधरा को हुए बीते तब दो वर्ष हो चुके थे लेकिन उसका संक्रमण तब भी हवा में व्याप्त था। नामवर जी के व्याख्यान के बाद चाय थी। उस समय हम लोग नामवर जी और केदारनाथ सिंह के साथ ही खड़े थे। मैंने दोनों से सुबह की चाय घर पर मेरे साथ ही लेने का अनुरोध किया। नामवर जी की नारा•ागी को जानते-समझते वह काफी कुछ एक औपचारिक सा प्रस्ताव ही था। सुबह जल्दी ही होटल से दिल्ली निकलने जैसा कुछ कारण बताकर उन्होंने उसे टाल दिया था। उसके बाद केदार जी को कहने के लिए जैसे कुछ बचा ही नहीं था। नामवर जी की ‘ना’ में जैसे केदार जी स्वत: शामिल थे।
उसके बाद हुए काव्यपाठ में केदारजी की कविताओं की कोई याद आज नहीं है जबकि परिवार में बेटा-बेटी के अंतर पर अनामिका की एक छोटी सी कविता की याद आज भी मन में कहीं अटकी है। आलोक धन्वा की ‘लाहौर’ शीर्षक कविता भी देर तक मन में गंूजती रही थी जिसे टुकड़ों में तोड़-तोडक़र उन्होंने अपने खास अंदाज में पढ़ा था। उस कविता को सुनकर यशपाल के ‘झूठा सच’ का लाहौर देर तक आंखों में तैरता रहा था- एक जिंदा और जीते-जागते शहर के रूप में।
इसके बाद आयोजित रात्रि भोज और पान-गोष्ठी में चूंकि मुझे नहीं जाना था, औपचारिक रूप से केदार जी से कैसी भी विदाई के बिना हम लोग हॉल के बाहर निकल आए थे ताकि भीड़ की असुविधा से बचा जा सके। आयोजन की गमक अलबत्ता देर तक बनी रही थी। अपनी तरह से यह एक सफल आयोजन ही था क्योंकि इसके चार म हीने बाद ही उस वर्ष का घोषित साहित्य अकादमी पुरस्कार वीरेन डंगवाल को मिला था। इस पर नामवर सिंह की टिप्पणी थी कि साहित्य अकादमी पुरस्कार अब दिल्ली-इलाहाबाद-पटना जैसे बड़े शहरों से निकलकर छोटे शहरों और कस्बों की ओर बढ़ रहा है।