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Saturday 18 Nov 2017

स्ंगीत की अंर्तधारा


प्रियंका

शोधार्थी (हिन्दी विभाग)
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय,
शिलांग(मेघालय)

भारत में संगीत कला का उद्भव स्वयम्भू परमेश्वर से माना गया। भारतीय परम्परा के अनुसार नटराज शिव नृत्य कला के सम्राट व देवी सरस्वती संगीत कला की सम्राज्ञी हैं। सृष्टि के मूल बिंदु में संगीत समाहित है सृष्टि के विनाश के बाद भी यह संगीतमय ध्वनि विद्यमान रहती है। इसी ध्वनि से एक नवीन सृष्टि की संरचना होती है। सृष्टि की प्रत्येक गति में संगीत विद्यमान है। बीज से पौधा और पौधे से वृक्ष तक की क्रिया में वही नाद है, जिसे भारतीय संगीत में ‘नादब्रह्म’ कहकर पुकारा गया है। ईश्वर द्वारा निर्मित सबसे प्रशंसनीय काया मनुष्य की काया को माना गया। यदि इस काया पर चिन्तन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि मनुष्य के शरीर की गति लय, आवाज की बदलती हुई तारता धुन व हृदय की धडक़नें ताल का बोध कराती हैं। अर्थात् ईश्वर ने भी अपनी कलाकारी में संगीत का सहारा लिया। संगीत ही एक ऐसा माध्यम माना गया जो मनुष्य को ईश्वर की शरण में पहुँचाता है। संगीत भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सृष्टि की उत्पत्ति का मूल बिंदु नाद ही माना गया। यदि सिंधु घाटी सभ्यता की बात की जाए तो उस समय भी संगीत विकसित था, इसके प्रमाण मिलते हैं। खुदाई के दौरान सात छिद्रों वाली बांसुरी, तत् वाद्य, कलात्मक नृत्य मुद्राएँ आदि प्राप्त सामग्री इस बात को सूचित करती हैं कि सदियों से संगीत के विकास का क्रम चलता आ रहा है। वैदिक युग का संगीत सामगान आधारित था। हमारे चारों वेद संगीतमय हैं, लेकिन सामवेद संगीत की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है। साम का अर्थ - ‘गान’ है। वेदों के मंत्रों का उच्चारण दो-चार स्वरों पर आश्रित रहकर किया जाता था। जो आज भी पूजा-पाठ के समय पंडितों द्वारा उच्चरित मंत्रों में सुनने को मिलता है। इसके कुछ समय पश्चात संगीत का एक शैलीगत रूप सामने आता है जिसे छंदोगान कहकर पुकारा गया। यह मूल सामगान के अतिरिक्त है। सामगान दो बड़े भागों में विभाजित किया गया- अरण्य गान और ग्रामगेय गान। अरण्य गान संतों के लिए सुरक्षित रखा गया। समय के साथ ग्रामगेय से कंठ संगीत के कई अन्य स्वरूपों का निर्माण किया गया जैसे- प्रबंधगान, गांधर्वगान, ग्राम संगीत आदि। और मार्ग संगीत की सात जातियां निर्धारित की गईं- आर्चिक, गाथिक, सामिक, स्वरांतर, औड़व, षाड़व, सम्पूर्ण।(1) मान सकते हैं कि इसी समय से संगीत में ‘जाति’ निर्धारण की शुरुआत हुई होगी। वैदिक साहित्य में सात सुरों को सप्तक कहकर संबोधित किया जाता था, और संगीतमय ध्वनि को वेदों में भी ‘नाद’ कहा गया है। रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रंथों में भी संगीत को उच्च शिखर पर प्रतिष्ठित किया गया। लव-कुश ने स्वर, ताल, पद तथा मूच्र्छना आदि से युक्त शास्त्रीय गान का अभ्यास कर श्रोताओं को मंत्र-मुग्ध किया। ‘‘गांधर्व तथा साम दोनों प्रकार की प्रणालियों का प्रचलन रामायण काल में था। जाति तथा राग दोनों का समान प्रचलन था। काव्यों का गान रस निष्पत्ति के आधार पर होता था और ‘कौशिक’ नामक एक विशेष प्रकार के राग का प्रचलन था। मार्ग तथा देशी दोनों ही शैलियों में गांधर्व गान होता था और वल्लभी तथा विपंची नामक वीणाओं का विशेष प्रचलन था। संगीत, नृत्य और नाट्य संबंधी विवेचन रामायण में भारतीय संगीत के इतिहास का एक अभिनव अध्याय है। आचार्यों के अंर्तगत रामायण में नारद तथा तुम्बरू की अधिक प्रसिद्धि थी। वस्तुत: रामायण की गांधर्व और नृत्य नाट्य परंपरा ही भरत परंपरा के रूप में विकसित हुई होगी।’’(2) इसी तरह महाभारत युगीन संगीत पर वैदिक परंपरा के संगीत का प्रभाव पड़ा। अर्जुन ने स्वयं राजकुमारी उत्तरा को नृत्य एवं संगीत की शिक्षा दी। उस समय के परिवेश में संगीत समाज में आदर्श रूप में देखा जाता था। संभ्रांत परिवार की महिलाएं भी संगीत एवं नृत्य सीखा करती थीं। इसी तरह वैदिक युग से आगे बढ़ते हुए बौद्ध काल में भी संगीत अपने उच्च शिखर पर रहा। बौद्ध काल में संगीत को राज्याश्रय प्राप्त था। राजसभाओं में गायक, वादक तथा नर्तक नियुक्त रहते थे। सांगीतिक उत्सवों में साधारण लोग भी सम्मिलित होकर आनंदित होते थे। महिलाएं भी संगीत कला में निपुण थीं। राज्याश्रयों की संगीतकारों पर बढ़ी कृपा थी। ‘‘तत्कालीन संपन्न परिवारों में संगीत का सम्यक अध्ययन किया जाता था। बोधिसत्व संगीत तथा नाट्य कला के अच्छे ज्ञाता थे तथा उनके परिवार की सभी महिलाएं संगीत में कुशल थीं।’’(3) बौद्ध काल में सप्ततंत्री वीणा लोकप्रिय एवं प्रमुख वाद्य था। इस समय के संगीत में वैदिक तथा लौकिक दोनों पक्षों का प्रचलन था।
    संगीत जनता का सहचर रहा उसे भारतीय वेदों, शास्त्रों तथा उच्च कोटि के ज्ञाताओं व साधकों ने समृद्धि प्रदान की। आरंभ से ही भारतीय संगीत स्वयं में बहुत कुछ समाहित करते हुए चला। जिस किसी भी शासक ने देश पर राज्य किया उस शासक के राज्यकाल में संगीत में बहुत परिवर्तन हुआ। इटली के संगीत का एक प्राचीन और दूसरा आधुनिक समय है। लेकिन भारतीय संगीत में ऐसा नहीं है। सल्तनत काल और ब्रिटिश समय में भारतीय संगीत पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा क्योंकि राज्याश्रय में रहकर वह कैसे अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति कर सकता था। बादशाहों की रुचि और ब्रिटिश सरकार की रुचि का उसे ध्यान रखना पड़ा होगा। भारतीय संगीत में बहुत कुछ जोड़ा और घटाया गया। अमीर खुसरो ईरानी संगीत के जानकार थे। जिससे भारतीय संगीत पर ईरानी संगीत का प्रभाव पड़ा। कव्वाली और ख्याल को भारतीय संगीत में लाने का उत्तरदायित्व बहुत से विद्वान खुसरो को ही देते हैं। 1975 में लाहौर से प्रकाशित रशीद मलिक की पुस्तक हजऱत अमीर खुसरो की इल्मे मौसिकी के अनुसार - ‘‘कव्वाली का चलन ग्यारहवीं शताब्दी में हो गया था और ख्याल भी हजऱत अमीर खुसरो से पहले भी गाया जाता था।’’(4) कई विद्वान सितार के आविष्कारक भी खुसरो को ही मानते हैं। आचार्य बृहस्पति का कहना है कि ‘‘गायक फिरोज खाँ उर्फ़ अदारंग के पिता का नाम खुसरो खाँ था। सितार का आविष्कार इन्होंने किया था।’’(5) हो सकता है कि खुसरो ने ख्याल, कव्वाली व सितार में कुछ परिवर्तन कर नया रूप दिया हो। जो अपने मूल रूप में भारतीय संगीत में पहले से विद्यमान हो।  
संगीत को समृद्ध करने में ग्वालियर नरेश मानसिंह तोमर का नाम प्रशंसनीय है। इन्होंने अपने राज्यकाल में संगीत को दृढ़ता प्रदान की। उन्होंने संगीतकारों से ऐसे गीतों से रचना कराई जो लोकभाषा पर आधारित हों जिनसे श्रोताओं का प्रत्येक वर्ग आनंदित हो सके। ‘‘इन्होंने ध्रुपद की गायकी को अपने राज्य में प्रारंभ किया तथा इस गायकी की पूर्णता के विषय में बैजू जैसे तत्कालीन मान-सभा के गायक के सहयोग की संभावना प्रकट की। इस कथन की पुष्टि में यह कहा जा सकता है कि राजा मानसिंह के दरबार में बैजू को छोडक़र अन्य कोई गायक ऐसा नहीं था जो ध्रुपद शैली को जन्म देने की सार्थकता रखता।’’(7) ध्रुपद का घनिष्ठ संबंध मध्य प्रदेश की संस्कृति से रहा है। मध्ययुग में भारतीय संगीत की स्थिति किसी राज्याश्रय में उन्नत हुई तो किसी राज्याश्रय में उसे क्षति पहुंची। इल्तुतमिश का उत्तराधिकारी रुकुनद्दीन फिरोजशाह, सुल्ताना रजिया, सुल्तान कैकुबाद, सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी ये सभी शासक संगीतप्रेमी थे। इन्होंने संगीत के प्रति अपनी उदार दृष्टि रखी। संभव है कि संगीत में परिवर्तन अवश्य हुआ होगा, व दूसरी संस्कृति का प्रभाव पडऩा भी संभव ही था। लेकिन संगीत को पनाह मिली। इन शासकों ने संगीतकारों को अपने राज्य में आश्रय दिया। अलाउद्दीन खिलजी के ही दरबार में गोपाल नायक व अमीर खुसरो को आश्रय मिला। किन्तु दिल्ली के सुल्तान गियासुद्दीन तुगलक का रुढि़वादी दृष्टिकोण संगीत के लिए घातक सिद्ध हुआ। इब्नबतूता ने लिखा है कि ‘‘तालाब के जल की भाँति संगीत के विकास के लिए विस्तृत सीमा न थी।’’(8) रुढि़वादी फिरोज तुगलक के समय में भी संगीत की उन्नति में बाधा उत्पन्न हुई। लोदी वंश के शासकों ने भी संगीत के विकास के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया। मुगल काल के बहुत से शासकों ने संगीत के प्रति अपनी दृष्टि प्रेमपूर्वक रखी। बाबर उच्चकोटि का गायक था। वह स्वयं गीत की रचना कर उसका गायन करता था। उसने बहुत से संगीतकारों को आश्रय भी दिया। हुमायूं का भी बाल्यावस्था से ही संगीत के प्रति रुझान था। ‘‘अमीरों के वर्गीकरण में संगीतकारों को अहल-ए-मुराद के अन्तर्गत विशिष्ट स्थान दिया था। और उसने मालवा अभियान के समय मांडू विजय के बाद  कत्ल-ए-आम का आदेश संगीतकार मंझू के कहने से वापस दिया।’’(9)
स्ंागीत के विकास में अकबर का योगदान विशेष उल्लेखनीय है। वे स्वयं वाद्य संगीत में निपुण थे। तानसेन का उनकी सभा के नौ रत्नों में स्थान था। इन्होंने तानसेन को मिर्जा की उपाधि से विभूषित किया था। इनके दरबार में संगीतज्ञों को विशेष प्रश्रय मिला। जिनमें हिन्दु, तुरानी, ईरानी, कश्मीरी व स्त्री-पुरुष दोनों ही संगीतज्ञ थे। यहाँ यह प्रशंसनीय है कि अकबर की समन्वयकारी दृष्टि धर्म व लिंग में भेदभाव नहीं करती थी। यह किसी भी कला के विकास में महत्वपूर्ण बात है। कुछ विद्वानों ने ऐसा कहा है कि भरत के समय में जो सुरों का रूप षड्जग्रामीय नि सा रे ग म प ध, वही अकबरी युग में सा रे ग म प ध नि, हो गया। स्पष्ट है कि दो संस्कृतियों की समीपता कुछ तो परिवर्तन का कारण अवश्य होती।
सम्राट जहांगीर और शाहजहाँ भी महान संगीतप्रेमी थे। सर मदुनाथ सरकार के अनुसार सम्राट शाहजहाँ का मधुर राग इतना प्रभावकारी था कि बहुत से संगीतप्रेमी सूफी-संत स्तब्ध रह जाते थे। शाहजहाँ प्रत्येक रात्रि दीवान-ए-खास में संगीत का आयोजन करता था। ‘‘शाहजहाँ कालीन सबसे लोकप्रिय वाद्य यंत्र गिटार तथा जीटर था। सुखसेन गिटार तथा सूरसेन जीटर के कलाकार थे।’’(10) पाश्चात्य संस्कृति का भी प्रभाव गिटार के रूप में भारतीय संस्कृति पर पडऩे लगा था। शाहजहाँ ने ‘सहसरस’ में गायक बख्शू की धु्रवपदों का संकलन किया। यह संगीत के क्षेत्र में महान उपलब्धि थी कि दिल्ली नरेश शाहजहाँ एक हजार धु्रपदों को संकलित कराएँ।
सम्राट औरंगजेब की नीति संगीत के प्रति कठोर रही जिससे संगीत को हानि पहुँची। लेकिन शाहजहाँ और अकबर के शासन काल में संगीत समृद्ध रहा। यह ऐसा समय था जब भारतीय शास्त्रीय संगीत में बदलाव तो हुए लेकिन उसका रुप नष्ट या कम नहीं हुआ जो कि आगे जाकर हुआ। साहित्य की दृष्टि से देखा जाए तो रीतिकालीन युग में संगीत और काव्य दोनों में चमत्कारिता की ओर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा। दरबारों में गायकों और वादकों के दंगल होते थे। अनुप्रास की अतिशयता पर अधिक बल दिया जाने लगा। नायिकाभेद संगीत और काव्य दोनों के लिए आवश्यक रहा जिससे धु्रपद पीछे हुआ और ख्याल आगे बढ़ा। आगे ख्याल के स्थान पर टप्पा, ठुमरी, भावगीत आदि प्रचलन में आए। लखनऊ के नवाब वाजिदअली शाह के दरबार से ठुमरी का प्रचलन प्रारंभ हुआ। सामान्यतया ठुमरी की गायकी में नियमों की मान्यता बहुत ही कम है। आजकल लखनऊ और बनारस के ही घरानों में ठुमरी की धाक है। अंग्रेजी राज आने तक संगीत में और भी उतार-चढ़ाव हुए। भारतीय संगीत ने अपने भीतर बहुत कुछ समाहित किया। कहा जाता है कि उन्नीसवीं शती ईसवी के आरंभ में सितार की संगति के लिए तबले का आविष्कार दिल्लीवासी सुधार खाँ ने किया जिनका ठेका ‘सत्तारखानी’ प्रसिद्ध है।’’(11) मृदंग और वीणा को भारतीय संगीत में महत्वपूर्ण वाद्य समझा गया लेकिन सितार और तबले ने मृदंग और वीणा का स्थान ले लिया। दक्षिण भारत में मृदंग और वीणा का प्रयोग आज भी है।
 अंग्रेजी राज आने पर राज दरबारों का दौर समाप्त हुआ अब कलाकारों को राज्याश्रय प्राप्त नहीं था। यह एक ऐसा समय कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि कलाकार राज्याश्रय से उठकर गली-चौराहों में आ गए और इन कलाकारों का वह सम्मान भी नहीं रह गया था जो राज दरबारों में इन्हें प्राप्त था। आजादी मिलने के बाद भी भारतीय संगीत निखर कर सामने नहीं आया। वह अपने पूर्ण रूप से समाज में विकसित नहीं हो सका। पाश्चात्य संस्कृति ने जहाँ खान-पान, वेश-भूषा को प्रभावित किया वैसे ही संगीत और अन्य कलाओं को भी प्रभावित किया।
भारतीय संगीत ने विश्व भर को अमूल्य देन दी। हमारे संगीत के एक-एक राग का अपना विशेष महत्व है ये हमारी सभ्यता और संस्कृति के परिचायक हैं। रागों का संबंध लोकरुचि से है। हिण्डोला राग सभ्यता निरुपित माना गया। श्री राग धन वैभव, ऐश्वर्य का प्रतीक माना गया। प्रारंभिक समय में यह राग धन की स्वामिनी लक्ष्मी जी की स्तुति में प्रस्तुत किया जाता रहा है। वहीं मेघराग को कृषक समूह वर्षा के स्वागत में गाता रहा, लेकिन आज के भारतीय समाज में इन रागों का कोई महत्वपूर्ण स्थान नहीं है। आज यह केवल उन लोगों तक ही सीमित है जो इन रागों के जानकार हैं। आज समाज के एक बहुत बड़े भाग की शास्त्रीय संगीत की ओर कोई रुचि नहीं है। जिस प्राकृतिक रूप को ध्वनि रूप में प्रस्तुत करना असंभव था वह कार्य भारतीय संगीत ने किया, लेकिन आज भारतीय मानस ही उस संगीत से स्वयं को दूर करता जा रहा है। भारतीय सिनेमा भी पाश्चात्य संगीत में ज्यादा रुचि दिखाता नजऱ आता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत को फिर से वही प्रतिष्ठा प्राप्त होनी चाहिए जिसका वह स्वामी है। यह हमारी सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक भी है।

संदर्भ
1 राग ताल के मूल तत्व और अभिनव स्वरलिपि पद्धति - निखिल घोष, अनुवादक - मदन लाल व्यास, प्रकाशक-संगीत महाभारती, मुंबई, पृ.-8
2 भारतीय संगीत: भारतीय सौंदर्य शास्त्र के संदर्भ में - सुरेन्द्र कपिला, आदर्श प्रकाशन - जालंधर, प्रथम संस्करण-1980, पृ.-46
3 भारतीय संगीत का इतिहास - डा. शरचन्द्र श्रीधर परांजपे, चौखम्बा प्रकाशन - वाराणसी, नवीन संस्करण-2010, पृ.-161
4 भारतीय साहित्य की भूमिका - रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन - नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-1996, पृ.-165
5 ,,      ,,   वही, पृ.-165
6 मध्यकालीन काव्य, चित्र एवं संगीत में रागतत्व - डा. रघुनंदनप्रसाद तिवारी, विद्यानिधि प्रकाशन - दिल्ली, प्रथम संस्करण-1998, पृ.-215
7 मध्ययुगीन भारतीय समाज एवं संस्कृति - डा. झारखण्डे चौबे व डा. कन्हैयालाल श्रीवास्तव, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान - लखनऊ, पंचम संस्करण-2013, पृ.-678
8 ,,     ,,  वही, पृ.-678
9 हिस्ट्री ऑफ  शाहजहाँ ऑफ देहली - बनारसी दास सक्सेना, इलाहाबाद, संस्करण-1958, पृ.-258
10 भारतीय साहित्य की भूमिका - रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन - दिल्ली, प्रथम संस्करण, पृ.-165