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Monday 20 Nov 2017

देवदास का स्त्रीवादी पाठ

कमल कुमार

डी-38, प्रेस एनक्लेव
नई दिल्ली।
मो. 9810093217

भंसाली की फिल्म देवदास बाक्स आफिस पर तो सफल रही साथ ही तकनीकी और विचार के स्तर पर भी चर्चा के केेंद्र में रही। मैंने यह फिल्म देखी इसके पहले की बनी दोनों फिल्में नहीं देखी थी। शरतचन्द्र का उपन्यास देवदास पढऩे की इच्छा हुई। अक्सर ऐसा होता भी है। फिल्म देखने के बाद दर्शक मूल कहानी के पाठक बन सकते हैं। अथवा मूलकथा के पाठक फिल्म के बड़े उत्सुक दर्शक हो जाते हैं। यह उपन्यास भी मैंने पहली ही बार पढ़ा। उपन्यास पढ़ते हुए बार-बार भीतर सवाल उठ रहा था कि इसका नाम देवदास क्यों है, पारो या पार्वती क्यों नहीं? उपन्यास के अंत में लेखक का एक वक्तव्य है-‘इतने दिन गुजरने के बाद पार्वती का क्या हुआ और वह किस हालत में है और क्या करती है, यह कोई नहीं जानता। इसे जानने का मन भी नहीं करता। सिर्फ देवदास के लिए अत्यंत दुख होता है।’
इससे स्पष्ट हुआ कि इस उपन्यास का शीर्षक देवदास क्यों है? लेखक के इस कथन ने मेरे मन को झकझोरा और स्त्रियोचित मेरे मन में कई सवाल उठे। कई बातें स्पष्ट से स्पष्टतर हुई। एक सवाल यह कि क्या इस उपन्यास का कोई स्त्री पाठ हो सकता है? अगर हां तो क्या? लेकिन लेखक और समाज की सहानुभूति देवदास के साथ है। वही इस उपन्यास का घोषित नायक भी है। वह प्रेम के लिए मरकर नायक बन जाता है। लेकिन सवाल यह है कि जीवन यथार्थ से पलायन करके, अकर्मण्य, असहाय, निराश, हताश होकर, शराब पीने और शराब के नशे में इधर-उधर गिरने पडऩे में और पी पीकर मर जाने में भला क्या बड़ाई है। कैसा नायकत्व है? इसके विपरीत पार्वती और चंद्रमुखी दोनों ही स्त्री पात्र असंगत विसंगत स्थितियों में जीवन जीती हैं। दोनों स्त्रीपात्र अपने-अपने स्तर पर संघर्ष करती हंै। अपनी दी गई भूमिका को निभाती हैं, अपने कर्तव्य को पूरा करती हैं अनेक अवरोधों को और प्रतिकूलताओं में जीती हुई भी जीवन से हार नहीं मानतीं, न ही अपने प्रेम का त्याग करती हैं। पारिवारिक सामाजिक प्रतिकूलताओं के बाद भी अपने प्रेम को अंत तक निभाती हंै। पाठक और समाज की प्रेरणा पार्वती और चंद्रमुखी हो सकती हैं न कि देवदास। फिर सामाजिक न्याय के पाठकों की सहानुभूति देवदास के प्रति क्यों? इसका नायक देवदास क्यों? इस उपन्यास का वस्तुसत्य चाहे देवदास हो परंतु काव्य सत्य पारो है। क्योंकि इस उपन्यास की शक्ति पारो है। देवदास की स्थापित छवि के विपरीत पारो की शक्ति उपन्यास की कहानी में अंतर्निहित हैं फिर इतने वर्षों बाद बनी भंसाली की फिल्म में कथावस्तु में कई परिवर्तन करके उसे स्त्री विमर्श के साथ जोडऩे का प्रयास भी हुआ है। वहां इसका नामकरण पार्वती या पारो क्यों नहीं किया गया? हर कलाकृति पाठक और कलाकार को स्वच्छन्द कल्पना का अवसर देती है। भंसाली ने भी इस तथ्य का लाभ उठाया। इसके लिए उनकी आलोचना भी हुई। परंतु इससे तो उपन्यास का और न ही फिल्म का महत्व कम होता है। क्योंकि कोई भी रचना रचनाकार का अंतिम सत्य (फिनिश्ड प्रोजेक्ट) नहीं होती। न ही रचना अंतिम सत्य की वाहक ही होती है। किसी भी रचना में पाठक और समाज का दखल हमेशा ही रहता है। वे लेखक के विचार से सहमत होते हैं। कृति में कहानी और विचार की उनकी इंटरप्रीटेशन लेखक से अलग हो सकती है। क्योंकि पाठक और हर समय का समाज अपने संस्कारों, मान्यताओं और मूल्यों से ही कृति का निर्धारण करेगा। देवदास उपन्यास के सम्बन्ध में आज यह प्रश्न और भी विचारणीय हो जाता है। इस उपन्यास का स्त्रीपाठ क्या हो इस पर विचार करना जरुरी समझा। देखा जाए तो उपन्यास के स्त्री पात्र ही अधिक सशक्त, आधुनिक और प्रभावित करने वाले हैं। पार्वती और चन्द्रमुखी, दोनों ही स्त्रियां तेजस्वी, स्वाभिमानी, सशक्त, अस्तित्वान और जुझारु है। इसके विपरीत उपन्यास के सभी पुरुष पात्र देवदास, चुन्नीलाल, पार्वती के पिता नीलकंठ चक्रवर्ती, देवदास  के पिता नारायण मुखर्जी, भुवन चौधरी (पार्वती के पति) ये सभी पात्र एकांगी, अहंकारी, आत्मलीन परंतु अशक्त और अस्तित्वहीन हैं। देवदास इस पुरुष सत्तात्मक समाज का एपीटोम है। स्वार्थी, अहंकारी, अस्थिर, चंचल चित्त और अनिश्चित। देवदास के विपरीत परंतु उसके समक्ष है, इस उपन्यास की प्रमुख स्त्री पात्र पारो अर्थात पार्वती। पार्वती इस क्रांतिकारी प्रेमगाथा में स्थापित नैतिक मूल्यों, आचरण संहिताओं, लोक रीतियों, सामाजिक बंधनों, बाधाओं और अवरोधों को तोड़ती है। पार्वती का व्यक्तित्व दो धु्रवों के बीच उपस्थित है एक धु्रव पर उसका प्रेम है और दूसरे धु्रव पर उसका स्वाभिमान। प्रेम के लिए वह अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करती।
उपन्यास में पार्वती देवदास के कलकत्ता जाने और आने, शादी से पहले और बाद भी देवदास के प्रेम को हर अवरोध में अपने भीतर और बाहर जीवित रखती है। भंसाली की फिल्म में उसे दिए के प्रतीकार्थ द्वारा दिखाया गया है। पार्वती हमेशा यह दीपक जलाए रखती है। शादी के बाद भी उसे अपने साथ ले जाती है। यह दीपक देवदास की मृत्यु के साथ ही बुझता है।
पार्वती में विनय के साथ विरोध का साहस भी है। उपन्यास में बचपन की एक घटना में देवदास पारो से पानी लाने के लिए कहता है। वह कहती है ‘अब तो मैं जाती नहीं। तुम्हीं जाकर पी आओ। देवदास के बहुत जिद्द करने पर वह कहती है ‘मैं हर्गिज नहीं जाऊंगी।’
एक और प्रसंग में पारो की सहेली मनोरमा पूछती है तुम्हारे वर का नाम क्या है? पार्वती पूरे आत्मविश्वास से कहती है इतने दिनों में तुमने यह भी न जाना, श्री देवदास है। मनोरमा सोचती है यह रिश्ता भी पक्का नहीं है, क्या कहती है तू, कुछ भी समझ नहीं पाती। पार्वती कहती है तो देवदास से पूछकर समझा दूंगी।
यही पूछने के लिए पार्वती काफी रात गये देवदास के घर पहुंच जाती है देवदास उसे देखकर घबरा जाता है। उपन्यास में यह प्रसंग पढऩे के योग्य है। देवदास पारो को देखकर घबरा जाता है
‘अरे पारो? इतनी रात को अकेली आई हो?’
‘हां?’
‘रास्ते में डर नहीं लगा?’
‘मुझे कोई खास डर नहीं लगा।’
किसी ने देखा क्या?
दरबान ने देखा है।
और किसने?
आंगन में नौकर सोए थे हो सकता है किसी ने देखा भी हो।
बिस्तर से कूदकर देवदास ने अंदर से दरवाजा बंद कर दिया।
किसी ने पहचान तुम्हें?
पार्वती ने जरा भी उत्कंठा नहीं दिखाई। बड़े सहज ढंग से बोली।
सभी तो मुझे जानते हैं, किसी ने पहचान लिया हो शायद।
तो तुमने ऐसा क्यों किया पारो। इतनी रात को। छि!छि! कल शक्ल कैसे दिखाओगी?
वह हिम्मत मुझमें है।
भीरु देवदास कहता है- मां बाप को तो कतई नामंजूर है, सुना है। क्या मैं मां बाप से बाहर हो जाऊं?
हर्ज क्या है? हो जाओ।
रुढिग़्रस्त और भावभ्रम देवदास व्यक्तित्व की अडिगता और तेजिस्वता में पार्वती के सामने कहीं नही ठहरता। इसी क्रम में एक और प्रसंग को लिया जा सकता है। पार्वती की शादी निश्चित हो जाती है। उपन्यास में पार्वती पोखर पर पानी भरने आती है और देवदास उससे मिलता है। कहता है-
मैं आ गया पारो?
क्यों? पार्वती स्थिर पर रुखे स्वरों में पूछती है।
जैसे भी हो माता-पिता को मैं राजी करुंगा। केवल तुम।
पार्वती ने तेज निगाहों से देखा और कहा-
क्यों तुम्हारे माता-पिता हैं मेरे नहीं? उनकी राय की जरुरत नहीं है क्या?
पार्वती देवदास से यह भी कहती है ‘तुममें मेरी कोई आस्था नहीं। मैं जिनके पास जा रही हूं वे भी धनवान, बुद्धिमान, शांत और स्थिर व्यक्ति है, धार्मिक है। मेरे माता-पिता मेरा भला चाहते हैं। इसलिए मुझे तुम जैसे चंचलचित्त, दुर्दांत आदमी के हाथों हर्गिज नहीं सौंपेंगे।
इतना अंहकार?
क्या न हो। तुम कर सकते हो, मैं नहीं कर सकती? तुम्हारा रुप है गुण नहीं। हमारा रुप है और गुण भी।
पार्वती देवदास से यह भी कहती है जाओ मेरे नाम कलंक लगा दो कि उस रात अकेली मैं तुम्हारे पास आई थी।
पार्वती के इस व्यंग्य और दु:साहस को देवदास जैसा अहंकारी व्यक्ति कैसे बर्दाश्त कर सकता था। गुस्से और अपमान से भरकर बंसी की मूठ से पार्वती के माथे पर वार करता है। उसके माथे का एक हिस्सा फट जाता है। चेहरा खून से लाल हो जाता है। देवदास उसे अपनी निजी सम्पत्ति समझता है।
पार्वती स्वाभाविक और सहज रुप में अपनी नियति को स्वीकार करती है। स्थिति के घेरे ने पार्वती को उम्र से ज्यादा परिपक्व कर दिया था। शादी के बाद वह ससुराल पहुंचती है। सांझ से पहले एक खूबसूरत नौजवान आकर उसे प्रणाम करता है।
मां मैं तुम्हारा बड़ा लडक़ा हूं। पार्वती अपने दूसरे बच्चों के बारे में पूछती है। बड़ी लडक़ी यशोदा जो इस विवाह से नाराज थी। उसे लिवाने स्वयं उसके घर जाने के लिए तैयार हो जाती है। आखिर महेन्द्र उसे लेकर आता है। पार्वती उसे एक-एक कर अपने गहने उतार कर पहना देती है। उसे कहती है, यह तुम्हारा मायका है तुम्हारे पिता का घर। यशोदा अभिभूत होकर उसके पैरों पर सिर झुका देती है-‘तुम्हारे पैर पड़ती हूं मां।’ सदा के लिए यशोदा पार्वती से जुड़ जाती है।
एक ओर पार्वती का गरुर और दूसरी ओर उसकी यह विनम्रता उसके व्यक्तित्व को संपूर्ण बना देती है। पार्वती के पति भुवन उसके सामने परास्त दिखते हैं। अपने प्रेमभाव, कौशल, त्याग और ममता से वह भुवन की बिखरी गृहस्थी को बांध देती है।
पार्वती को जब मनोरमा के पत्र से देवदास की दारुण स्थिति का पता चलता है तो वह पालकी लेकर ताल सोना पहुंच जाती है। मनोरमा पूछती है -‘देवदास को देखने आई थी पारो?’
‘नहीं अपने साथ लिवा लाने को आई थी। यहां उसका अपना तो कोई है नहीं।’
शर्म नहीं आती पारो?
अपनी चीज़ आप ले जाऊंगी-इसमें शर्म किससे?
पार्वती का यह आत्मविश्वास और अपने प्रेम के प्रति निष्ठा विस्मयकारी है। उपन्यास के सभी पात्र पार्वती के साहसी और स्वाभिमानी होने की बात कहते हैं। लेखक ने स्वयं लिखा, पार्वती सदा की स्वाभिमानी थी। उसे जो तकलीफ उठानी पड़ रही थी। उसका तिलभर भी किसी को पता नहीं चले वह उसकी जी जान से कोशिश करती। शरत नारी मन के अद्भुत चितेरे थे। इसीलिए वे पार्वती के अप्रतिम चरित्र को उजागर कर सके। उसके साहस और स्वाभिमान के साथ ही उसके भीतर की उथल पुथल, चिंता, उद्वेलन और अदृश्यता का भी चित्रण किया। उपन्यास में पार्वती को लेखक ने गरीबों की सेवा और बेसहारा अंधे अपाहिजों के लिए काम करते हुए दिखाया है। पार्वती के समर्पण भाव और कौशल से घर में एकात्मकता स्थापित होती है। वह अपनी इच्छाओं की अपेक्षा दूसरों की भावनाओं को आगे रखती है। यह गुण उसे और भी विशिष्ठ बना देता है। पार्वती का चरित्र इस उपन्यास का प्राण तत्व है। वह अप्रतिम सुन्दरी, स्वाधीन चेता, स्वाभिमानी, साहसी, निष्पाप और निश्छल तो है ही साथ ही विचारपूर्ण और संघर्षशील भी है। उसकी सहनशीलता धैर्य, आत्मसम्मान और आत्मलोप अद्भुत है। अपनी भूमिका में वह पूर्ण है।
इस उपन्यास की दूसरी प्रमुख स्त्री पात्र चन्द्रमुखी है। जिसकी विषम परिस्थितियों ने उसे तवायफ  बनाया। सहनशीलता की प्रतिमूर्ति वह फजीहत, झिडक़ी, अपमान, अत्याचार और उत्पात सभी सहती है। शराब के नशे में धुत देवदास को जब चन्द्रमुखी उठाती है तो वह कहता है ‘राम राम छुओ मत मुझे.... तुम्हें मालूम नहीं मैं तुम लोगों से कितनी नफरत करता हूं।’ एक तरफ देवदास, पुरुष प्रधान समाज का स्वार्थी और दंभी मोहरा दूसरी तरफ  चन्द्रमुखी अपने यथार्थ से परिचित और अपने दिल से विवश। वह देवदास की नफरत के पीछे छिपी मंशा को समझ जाती है देवदास के व्यंग्य की चोट और देवदास के प्रति उसका प्रेम उसे बदल देता है।
पहले की चन्द्रमुखी वह नहीं रहती। अपना सब कुछ छोड़ छाड़ कर कलकत्ता से अपने गांव चली जाती है। चंद्रमुखी कहती है कि स्थिति के लिए वही लोग जिम्मेवार भी हैं। बदनाम करने वाले भी वही लोग हैं। औरत अपनी बात कह ही नहीं पाती। औरतों को यह प्यार का अभिनय मजबूरी में करना होता है। जिनसे वो नफरत करती है उन्हें भी नहीं कह पाती। जब कभी वो दुसह पीड़ा के क्षण में सही बात कह देती है तो यही लोग शोर करके आसमान सिर पर उठा लेते हैं और उन्हें बदचलन कहते हैं। चन्द्रमुखी को जब देवदास की दीन दशा का पता चलता है तो वह कलकत्ता आती है। उसे खोजकर अपने घर ले जाती है उसकी सेवा करती है। देवदास की हालत सुधर जाती है। वह भी चन्द्रमुखी के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करता है। चन्द्रमुखी अपनी व्यावहारिक बुद्धि से सोचती है कि उसके साथ रहने से देवदास को सुख और सेवा तो मिलेगी पर सम्मान हर्गिज नहीं मिलेगा। अंत में वह जाने का निर्णय लेती है उसके चरणों की धूल धारण कर और उसे प्रणाम करके चली जाती है। 19 वीं शताब्दी के अंत में लिखे गये तीन उपन्यास गोवर्धनराम त्रिपाठी का ‘सरस्वती चन्द्र’, मिर्जा मुहम्मद हारी रुसवा का ‘उमराव जान अदा’ और शरतचंद्र का ‘देवदास’ तीनों ही स्त्री विमर्श की दृष्टि से महत्वपूर्ण उपन्यास हंै, जिनका स्त्री पाठ किया और समझा जाना चाहिए। लेखकों द्वारा स्त्री चरित्रों पर लिखे गए ये तीनों ही उपन्यास विलक्षण है। उनकी स्त्री संवेदना की अंतरंग पहचान अप्रतिम है। तीनों ही उपन्यास मानवीय संबंधों की जटिलताओं के मनोविज्ञान को व्यक्त करते हैं। उमरावजान अदा में स्त्री मन की वेदना का चीत्कार है जबकि सरस्वतीचन्द्र और देवदास में स्त्री के विफल प्रेम की मार्मिक गाथा है। इन उपन्यासों की स्त्रियां समय को लांघकर वर्तमान में जीवंत आ खड़ी होती हैं। उनका स्त्रीवादी विमर्श स्त्री मुक्ति की चेतना को सौ वर्ष आगे ले जाता है। शरतचंद्र के देवदास का स्त्रीवादी पाठ पार्वती को देवदास से कहीं ऊंचे स्थान पर स्थापित करता है। उसे स्वीकार करने के लिए रुढि़वादी और प्रतिगामी पुरुषवादी विमर्श से अलग करके सोचने समझने और परखने की आवश्यकता है।