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Friday 17 Nov 2017

रेडियो की भाषा

डॉ. सुनील केशव देवधर
आकाशवाणी, पुणे
sunilkdeodhar@gmail.com
इस्लामी दार्शनिक जलालुद्दीन रूमी ने अपनी (एक) मसनवी में एक कहानी बयान की है- एक आदमी ने चार अलग-अलग भाषा बोलने वालों को एक दिरम दिया और एक चीज खरीदने को कहा।
ईरानी ने अपनी जवान (भाषा) फारसी में कहा- इससे (रुपए से) अंगूर खरीदेंगे।
अरबी आदमी ने अपनी जबान यानी अरबी में कहा- इससे इनब खरीदेंगे।
तुर्की ने कहा- हम अम खरीदेंगे।
एक चौथे आदमी ने कहा- इस्ताफील खरीदेंगे।
और चारों आपस में लडऩे लगे। उस वक्त अगर चारों भाषाएं जानने वाला वहां कोई होता तो बताता कि आप सब एक ही चीज खरीदना चाहते हैं और वो है- ‘अंगूर’, जिसे संस्कृत में द्राक्ष और अंग्रेजी में त्रह्म्ड्डश्चद्गह्य कहते हैं।
दरअसल भाषा का मसला विवाद का है ही नहीं, भाषा तो संवाद के लिए है और ये संवाद तभी बेहतर हो सकता है, जब शब्द के न केवल अर्थ बल्कि मर्म को भी समझ लिया जाए। हां, भाषा ऐसी जरूर होनी चाहिए जिसके अर्थ निकालने में कोई तकलीफ न हो। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि भाषा अपनी सार्थकता और सांस्कृतिक पहचान ही खो दे।
भाषा कैसी हो, इस बारे में विषय, प्रांत, व्यक्ति आदि को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं और वे मत ठीक भी हो सकते हैं। लेकिन एक सामान्य अर्थ में भाषा को लेकर भारतेन्दु हरिश्चंद्र का एक छंद उल्लेखनीय है-
जो हि एक बार सुने, मोहे सो जनम भरी
ऐसो न असर देख्यो, जादू के तमासा में
अरि हुं नवावे सीस, छोटे-बड़े रीझे सब
मगन रहत नित पूर होई आसा में
देखी न कबहूं मिसरी में मधु हूं मैं ना
रसाल ईख दाख में न तनिक बतासा में
अमृत में पाई न अधर में सुरंगना के
जैसी मधुराई भूप सज्जन की भाषा में।
सज्जन की भाषा यानी भाषा की गरिमा ही माध्यमों की, संवाद की और संप्रेषण की भाषा होनी चाहिए।
वैसे भी हम यदि इस बात पर बारीकी से विचार करें कि जब हम यह कहते हैं कि आज मैंने शैली और कीट्स को पढ़ा, गालिब और मीर को पढ़ा, तुलसी और कबीर को पढ़ा, रामदास या तुकाराम को पढ़ा या फिर भवभूति और कालिदास को पढ़ा; तो हम-आपको यह बताने की आवश्यकता कभी नहीं होती कि शेक्सपियर को अंग्रेजी में पढ़ा और कालिदास को संस्कृति में। दरअसल ये सारे नाम किसी भाषा, प्रांत, देश या जाति के रह ही नहीं जाते, ये नाम हैं साहित्य के कविता के, शायरी के; जिनके माध्यम से अपनी बात को हम अधिक सार्थक, रोचक, तार्किक और प्रभावी बना पाते हैं। और यह कहना आज भी अनुचित न होगा कि साहित्य और समाज, कला और संस्कृति के जितने संदर्भ आकाशवाणी के कार्यक्रमों में आज भी हैं, उतने अन्य माध्यमों या एफ.एम. चैनल पर उपलब्ध नहीं हंै।
कहना होता है कि रेडियो ने ‘अभिव्यक्ति’ से उसके लिखित और दृश्य सभी साधनों से परे, उसे उच्चरित शब्द (स्श्चशद्मद्गठ्ठ 2शह्म्स्रह्य) का जो अस्त्र दिया, वो कई बार इस्तेमाल होने के बाद भी उसकी धार कभी कम नहीं होती, बल्कि दृश्य और लिखित कार्य को और अधिक व्यापक करने में जो माध्यम सहयोगी बना, वह है रेडियो। फिल्मों की काव्यमय उपलब्धियों को बार-बार दुहराकर (गीतों का निरंतर प्रसारित होते रहना) भाषा और शब्द की रंजकता को दिल-दिमाग में बसाकर रेडियो ने भाषा और फिल्मों पर उपकार ही किया है।
एक समय था जब भाषा की शुद्धता आकाशवाणी की पहचान थी। (कुछ एक अपवादों को छोडक़र आज भी है) वार्ता/चर्चा में अनेक उदाहरण प्रस्तुत होते थे। एक प्रसंग याद आता है- आज के धार शहर को राजा भोज के जमाने में धारा नगरी कहते थे। राजा भोज स्वयं विद्वान थे। ‘सरस्वती कंठाभरण’, ‘श्रृंगार प्रकाश’ ये उनके ग्रंथ प्रसिद्ध हैं। वे अपनी प्रजा का हालचाल जानने कभी-कभार अकेले घोड़े पर निकला करते थे। एक बार उन्होंने एक वृद्ध को लकड़ी का भारी गट्ठर लिए, उसके बोझ से परेशान होते देखा, तो कहा- ‘‘भो वृद्ध:, भारम न बाधति।’’ तुम्हें वृद्धावस्था में भारी बोझ परेशान तो नहीं कर रहा? वृद्ध ने राजा के अशुद्ध वाक्य पर कटाक्ष करते हुए कहा- ‘‘राजन् न तथा भारम बाधते यथा ‘बाधति’ बाधते।’’ अर्थात् लकड़ी के भारी बोझ से जितनी तकलीफ नहीं हो रही है, उससे अधिक परेशान ये ‘बाधति’ शब्द कर रहा है।
एक समय था जब आकाशवाणी अकेला माध्यम था और एक-एक शब्द विचारपूर्वक बोला-कहा जाता था और विश्वसनीयता इतनी कि विद्वानों में भी उसे मानक और शुद्ध समझा जाता था। उच्चारण, तलफ्फ़ुज या प्रॉनाऽनसिएशन (क्कह्म्शठ्ठह्वठ्ठष्द्बड्डह्लद्बशठ्ठ) पर बहस छिड़ जाती, शब्दकोश खुल जाते, लु$गत देखी जाती और डिक्शनरी से ‘कनफर्म’ किया जाता।
आज मसला थोड़ा अलग है, न चिंता बोलने वाले को है और सुनने का तो प्रश्न ही नहीं है। कहा जाता है कि रेडियो ही नहीं है बहुत-से घरों में! लेकिन यह आधे से भी आधा सच है। आकाशवाणी की जो भूमिका देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और कला जीवन में है, उसे झुठलाया नहीं जा सकता। भाषा किसी देश की पहचान होती है और भाषा का सर्वाधिक प्रयोग माध्यमों में होता है। आज चूंकि रेडियो ऐसा माध्यम है जहां केवल और केवल ‘शब्द’ होता है; इसलिए वह ‘आकाश’ तक उठकर ‘वाणी’ रूप में व्यापक हो जाता है। इसी व्यापकता के कारण इस माध्यम की जिम्मेदारी भी कुछ अधिक है।
आकाशवाणी की भाषा को लेकर एक प्रश्न पहले से ही चर्चा में रहा है- वह है भाषा के स्वरूप को लेकर, हिन्दी और हिन्दुस्तानी को लेकर। यही कारण था कि दिल्ली केन्द्र से वर्ष 1939 में 20 और 25 फरवरी के बीच हर दिन ‘हिन्दुस्तानी क्या है’ इस विषय पर वार्ता प्रसारित की गई। इसके वार्ताकार थे- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ.

जा किर हुसैन, प्रो. ताराचंद, आचार्य नरेन्द्र देव और आसिफ अली। हिन्दी-हिन्दुस्तानी का यह विवाद या चर्चा आज भी है और शायद आगे भी रहे। लेकिन यह अवश्य ध्यान में रखने योग्य बात है कि विषय के अनुरूप भाषा का प्रयोग हो रहा है या नहीं। क्योंकि ‘कठिन’ और ‘सरल’ ये शब्द समाज और प्रांत पर भी निर्भर हैं कि वहां कैसी भाषा बोली जाती है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर समय और प्रसंग का विचार करना भी आवश्यक है। स्वाधीनता दिवस समारोह में यदि बहुतायत में उर्दू का प्रयोग होगा; जैसे- ‘आज हम आजाद हैं’, ‘हजारों कुर्बानियों के बाद मिली आजादी’, ‘हमारा प्यारा मुल्क’ और कुछ शेर भी- ‘ये हवा आजाद है, ये फजा आजाद है’ तो यहां विचार का बिंदु यह है कि भारत के स्वतंत्रता दिवस समारोह का आंखों देखा हाल बताते समय भाषा का स्वरूप दिन-विशेष पर क्या हो? शेर अवश्य पढ़े जाएं, लेकिन साथ ही साथ हिन्दी की कुछ कविताएं प्रसंगानुरूप बोली- पढ़ी जाएं तो लोगों को अच्छी ही लगेंगी। जैसे; निराला की कविता-
भ्रमर का गुंजार, वह भी स्वाधीन,
पक्षियों का कलरव वह भी स्वाधीन,
उदय-अस्त दिनकर का, सब है स्वाधीन।
या सोहनलाल द्विवेदी की पंक्तियां-
जय स्वतंत्र भारत, जय जननी, जय नव भारत हे...।
जय नवीन आकाश धरा नव, चंचल-अंचल हर्ष भरा भव।
नव जीवनमय नवचेतनमय जय नव जागृत हे...।
आज यदि हम आकाशवाणी के अतिरिक्त टी.वी. चैनल की भाषा सुनें, तो कई जगहों पर ऐसा लगता है कि कुछ शब्दों का प्रयोग जान-बूझकर तो नहीं, लेकिन अनावश्यक रूप से हो रहा है। जैसे आत्मघाती के लिए ‘फिदाइनी’, हिमपात के लिए ‘बर्फबारी’, प्रांत या प्रदेश के लिए ‘सूबा’, अपहरण के लिए ‘अगवा’ आदि।
आकाशवाणी द्वारा ‘सामुदायिक गान’ कार्यक्रम सर्वथा अभिनंदनीय पहल है। देश की सभी प्रांतीय भाषाओं के शब्दों का, साहित्य का थोड़ा ज्ञान और भान तो हमें हो ही जाता है। लेकिन यहां भी हिन्दी भाषा के गीत के लिए दो अवसरों पर, एक- पॉल रॉब्सन की गीत रचना ‘वी शैल ओवरकम’ का अनवाद ‘हम होंगे कामयाब’ और दूसरी बार ‘वक्त की आवाज है मिल के चलो, जिंदगी का राज है मिलके चलो’ हिन्दी भाषा के साथ अन्यायपूर्ण लगता है। इसे बस यही ‘समझ’ कर छोड़ देना ठीक है।
चूंकि रेडियो एक बहुश्रुत माध्यम है, वह ध्वनिचित्र बनाता है। दृश्य बनाता नहीं बल्कि दृश्य बनाने की स्वतंत्रता देता है, वह केवल एक बार सुना जा सकता है, रेडियो का संदेश हवा में विलीन  हो सकता है, इसलिए इस माध्यम की भाषा पर अधिक विचार और चिंता की जरूरत है। यहां ‘और’ शब्द केवल उच्चारण से अपना अर्थ बदल सकता है। और च्ह्म्ज् या तथा और च्द्वशह्म्द्गज् या अधिक। ऐसे ही अनेक शब्द और वाक्य- ‘मैंने आपको एक किताब दी थी’ वाक्य में प्रत्येक शब्द पर स्वराघात से उसके अर्थ की अभिव्यक्ति अलग होती जाएगी।
रेडियो के प्रसारणकर्ता के लिए यह भी आवश्यक है कि प्रांत विशेष की  भाषा के अलावा हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत तथा उर्दू का कार्य साधक ज्ञान यदि उसके पास है, इन भाषाओं के शब्द उसके पास हैं तो कार्यक्रम में, संभाषण में, अपनी प्रस्तुति में वह अधिक सफल होगा। उच्चारण की शुद्धता प्रसारण और भाषा की अनिवार्य शर्त है। क्योंकि दोषपूर्ण, असहज और गलत उच्चारण से अर्थ-भिन्नता ही नहीं, अपितु अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है। जैसे-
स्वजन (आत्मजन)                      श्वजन (कुत्ता)
सकलम (कुल)        
शकलम (अपूर्ण, खंडित)
जलील (महान)        
जलील (अधम, नीच)
सा$की (शराब पिलाने वाला/वाली)    शाकी (शिकायत करने वाला)
श$क (दरार)    
शक (संदेह)
ऐसे अनेक उदाहरण लगभग सभी भाषाओं में मिलते हैं।
भाषा की सहजता और रोचकता, साथ ही संप्रेषणीय क्षमता की परिणति लोकप्रियता में होती है, उसका लाभ मिलता है। इसलिए रेडियो और अन्य माध्यमों को भाषा के प्रति अपने सामाजिक दायित्व को भी समझना होगा। शब्द-माध्यम के लिए विषय की उपयुक्तता, स्वर और ध्वनि का ध्यान, छोटे और सरल वाक्य (भाषा नहीं), विषयानुरूप भाषा, आंकड़ों का कम से कम उपयोग, सटीक एवं अस्पष्ट सामग्री, लक्षित श्रोता के लिए विषय की संबद्धता, अच्छी यांत्रिक गुणवत्ता के साथ रोचक प्रस्तुति; यही है मंत्र अच्छे प्रसारण और बेहतर कार्यक्रम का।
आज 24 भाषाओं और लगभग 146 बोलियों में आकाशवाणी अपना प्रसारण करती है। लोकजीवन में लोकभाषा और लोक संस्कृति के संरक्षण-संवर्धन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। सबको साथ लेकर सबके साथ चलकर शब्दों का संसार सजाए, हम आपको ‘बोलता’ करती है, वक्ता बनाती है और वक्ता होना कितना कठिन है, यह बात इस श्लोक से स्पष्ट है-
शतेशु जायेत शूर:, सहस्त्रेशु च पंडित:
वक्ता दशसहस्त्रेशु दाता भवति वानवा:।
अर्थात् सौ में एक वीर, हजार में एक विद्वान उपजता है; लेकिन वक्ता दस हजार में कोई एक हो पाता है। दाता का होना तो संभव ही नहीं है।