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Saturday 18 Nov 2017

भूख- 3

 

गूंजती रहेगी भूख शब्दों में
ढोल के, खांचे पर चढ़ तनकर
बज उठने वाले चमड़े की तरह
चढ़ी रहेगी वह शब्दों पर
और जिन्दा रहेगी,
लेकिन नापसंद है कविताओं को
कि सिर्फ़ भूख ही तैरती रहे
उनके शब्दों की शिराओं में
कि बस भूख ही बलखाती
ची$खती-चिंचियाती रहे
उसे $कतई-$कतई पसंद नहीं यह
वह तो चाहती है कि भूख, भूख न रहे
कि वह बिला जाय हमेशा-हमेशा के लिए
सभ्यताओं के इतिहासों के
सूचना-भूखे स्वर्णिम पन्नों और वर्तमान
के भूगोलों की भूख जनती उर्वर कोखों से।
बस यही चाहत रखती है और देखती है
स्वप्न दुनियाभर की तमाम जुबानों
भाषाओं, बोलियों की कविताएं,
हां, कविताएं देखती है स्वप्न और खुश होती है
खुश होती हंै कि वे मर रही हैं धीरे-धीरे
कि उनके साथ मर रही है भूख भी
दुनिया में हर कहीं चारों ओर
लेकिन पी-पी कर अमृत अभावों का
वह होती रहती है जिन्दा
शब्द तपने-तडक़ने लगते हैं
और अर्थ भभकने
भूख का जीवन शब्दों का जीवन है
शब्दों का दुख है, भूख का फैलाव
नहीं, शब्द जुगाली भर नहीं करते भूख की,
वे भूख को अपनी अंकवार में भरकर
उसे पूरी ताकत से उछाल देते हैं
फैला देते हैं धधकते हुए समय के
$फलक पर चारों ओर
हां, इसी $फलक से फिर उतरती है भूख
एक कोह$कद सवालिया निशान की तरह
और बैठ जाती है सभ्यता के मलबे पर
संस्कृतियां समृद्ध हो जाती है
घुटने-घुटने चलती
तलवे सहलाती और चाटती हुई
अपने ही मीर को पागल कुत्ते सी काटती हुई
दौलत और शोहरत की भूख की तरह
लानत होती है रोटी की भूख
सभ्यता के गले में,
जंगलों और गुफाओं की तरह हहराती है
बजती है उच्चारती है-
छि: मानुष - छि: मानुष।
संस्कृतियों की कोख की
वह भ्रूण होती है अविकसित
जिसके होते हैं कई-कई हाथ पैर
और मुंह और आंखें और नाक
बेहद-बेहद खौफनाक।
डर जाती है यह सुंदर दुनिया
अपनी सम्पूर्ण लम्बाई-चौड़ाई में भी
और उसे कर नहीं पाती वह, जिन्दा दफन।
दुनिया उसके मरने की प्रतीक्षा में
उसे पूजती है पुजवाती है
अगर कहीं एक जगह कुछ-कुछ
मर भी गई तो कई-कई नई जगहों
पर, वह फिर होने लगती है पैदा।
भूख को मिटाने की कोशिश
पकी हुई मछली होती है
जो हाथ से मुंह तक का $फासला
तय करने से पहले ही
फिसलकर डूब जाती है पानी में
और जिन्दा रहती है कहानी।
भूख मगर होती नहीं कहानी
वह हकीकत होती है, हकीकत
आदमी और उसकी जिन्दगी की तरह
हां, भूख बहुत कुछ होती है
किन्तु सटीक अपने अर्थों में भूख
बस भूख नहीं होती
बस भूख नहीं होती।