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Monday 20 Nov 2017

भूख - 2

 

तो कल की उस सुबह पर लिखना है दरअसल
जो सूर्यागमन के साथ ही अचानक एक दिन
उतरेगी पृथ्वी पर, कि जिसकी ममतामयी
रौशनियों में होगा ही होगा
हर बच्चे के हाथ में बासी रोटी का
एक टुकड़ा कम से कम, कम से कम
एक गुड़ की डली, एक फुटहा बताशा
माओं के आंचलों में और... और
तमाम पूरे दिन के जलते-झुलसते क्षणों में
पिताओं के लिए, एक आधी-अधूरी ही सही
होगी मगर ज रूर एक घायल-उदास तसल्ली
हां, भूख पर लिखना रोटी के सपने पर लिखना
माना जाएगा ज रूर, ज रूर माना जाएगा कि भूख पर
इसलिए भी लिखी जा रही है कविताएं
क्योंकि भूख है सचमुच चारों ओर
अंधेर और अंधेरों की तरह छितराई हुई
चारों ओर.. और उस दोज $ख में
जहां उसका होना, होना है उनके सुंदर
सतरेंगे शब्दकोशों का सबसे भयावह
कुरुप शब्द, यह मान लिए जाने पर भी
कि भूख सचमुच है भयावह चारों ओर
बोई जाएंगी धरा पर फिर भी
बड़ी-बड़ी आदमखोर आणविक भट्टियां
कि काटी जाएंगी विध्वंसकारी आयुधों की ही
लहलहाती $फस्ल, हां, ऊंची-ऊंची अट्टालिकाएं
ही रोपी जाएंगी और उनमें सजाए जाएंगे
सूखा-बाढ़ और भूख उन्मूलन के
घडिय़ाली आंसू बहाते; महकते हुए दफ़्तर
पर्यावरण और खगोल के
शांति और प्रेम-बोल के।
जहां से जारी किए जाएंगे बुलेटिन
भूखे लोगों की दिलजोई, मनोरंजन के लिए
हां, ये मान लिए जाने पर भी
कि सचमुच वजूद है भूख की भयावहता का
इस कुरुप होती दुनिया में
अनाजों से भरे हुए गोदाम नहीं खोले जाएंगे
नहीं खोले जाएंगे रोटियों के कारखाने
क्योंकि ऐसे करने से तब
मिट जाएगा वजूद
सभ्यता की कोख से
एक बहुत बड़े सच का
संस्कृतियों के इतिहास के जंगल में
यह सच कहीं बिला न जाए
कहीं खत्म न हो जाए भूख
सृष्टि की कुछ विख्यात चीजो की
फेहरिस्त से, भूख को बचाने की
वो तमामतर कोशिशें करेंगे
वे बंद कर देंगे भूल से खुले रह गए
अनाजों के बड़े-बड़े गोदामों के मुंह
वे जला देंगे, लेस देंगे
लहलहाती हुई फसलों की
मीलों मील लम्बी कतारें
वे पैदा कर देंगे दुनिया के नक्शे में
जगह-जगह, इथोपिया, सोमालिया
कालाहांडी और पलामू
भूख सि$र्फ भूख के लिए नये-नये टापू और
और मूसलाधार बरसती मृत्यु से
कीड़ों-मकोड़ों की तरह मरती
आबादियों के कई-कई नये द्वीप और
इस तरह सच के लिए वे सब कुछ करेंगे संभव
सच को बचा लेंगे
बचा लेंगे वे भूख को हर हाल में
नहीं, भूख सिर्फ सुलगता हुआ
कोई एक बयान भर नहीं है
भूख एक सच है
एक बहुत बड़ा सच
एक भयावह दहला देने वाला सच
जो ब्रम्हाण्ड में नाचते
इस इकलौते जीवधारी महापिंड से
चिपका हुआ नाच रहा है
शताब्दियों-शताब्दियों से,
हां, जब तक है धरा पर भूख
भूख पर लिखी जाती रहेंगी कविताएं
कविताओं में सुख संतोष के गूंजते रहने की तरह