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Tuesday 21 Nov 2017

भूख - 1

 

नूर मुहम्मद ‘नूर’
सी.सी.एम. क्लेम्स लॉ,
दक्षिण पूर्व रेलवे
3, कोयलाघाट स्ट्रीट, कोलकाता-700001
मो. 09433203786
भूख
घुटन और अंधेरे की तरह
जबकि छितराई हुई हो
अस्सी प्रतिशत लोगों की रोटी की भूख
भूख जबकि बिल्कुल साफ दिखाई देती हो
महाशून्य में नाचते,
इस इकलौते जीवधारी महापिंड में चारों ओर
घिरी हुई तरह-तरह की जंगली-जुनूनी भूखों से
चिंचियाती, शिकार ढूंढती
छछून्दरों की कर्कश आवाजो से लैस
कैसे दिखाई-सुनाई नहीं देगी वह
सभ्यता की कोख से वह आ$िखर
कैसे बिला जाएगी यकायक... और
कैसे नहीं लिखी जा सकेगी इस पर
एक महान-महत्वपूर्ण कविता
रोटी की भूख अगर जिंदा है
तो मर जाएगी आखिर कैसे
भूख पर कविता रच सकने की भूख
भूख की यही ताकत कि वह बन सकती है
कविता बार-बार, रोटी पर रोटी के लिए
कविता लिखे जाने की तरह, पर भूख के
कविता बन जाने की तरह, भूख बन
नहीं सकती रोटी, कभी नहीं
वह या तो भूख ही रहेगी या फिर
कविता हमेशा, रोटी कभी नहीं
कभी नहीं... कभी नहीं।

लेकिन भूख पर लिखना
लिखना नहीं है सि$र्फ भूख पर
सि$र्फ ऐंठी अंतडिय़ों के भयावह भूगोलों पर
इतिहास पृष्ठों के उन स्वर्णाक्षरों पर ही सि$र्फ
असंख्य अक्षम्य अपराधों की भांति ही जिनमें
छुपाकर रखी गई है रोटियों की तस्करी की
बेशुमार रक्ताक्त दास्तानें।
भूख पर लिखना