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Tuesday 21 Nov 2017

पापा और मैं

मंदाकिनी श्रीवास्तव

एनडीएस/229, भारतीय स्टेट बैंक के पास
किरंदुल-494556
जिला- दंतेवाड़ा (छ.ग.)
मो. 9424278372
पापा और मैं

मैं जब भी चली हूं
जीवन की चिलचिलाती धूप में
औब जब भी
मेरे माथे पर
पसीना चुहचुहाता है
छांव बने हैं- पापा।
मेरे थोड़े से दुख में से
कितना कुछ सोख लेते हैं वे
लेकिन, सुख का बड़ा हिस्सा भी
मुझे थमा देते हैं
चॉकलेट की तरह
अब भी
नन्हीं गुडिय़ा के नन्हें हाथ समझकर।

सोचा कई बार
तस्वीर बनाऊं पापा की
हर बार
बनता गया
पर्वत,
समुद्र,
वटवृक्ष,
आसमान
और न जाने क्या-क्या!

मोटा चश्मा चढ़ाए अ$खबार पढ़ते पापा
सुबह घर के बाहर जाते हुए पापा
किसी से चर्चा करते हुए पापा
मेरे तपते माथे पर ठंडा हाथ रखते पापा।

अनुभवों और बीते जीवन का
संघर्ष सुनाते पापा
जब भी बनानी चाही
कविता पापा पर
कविता विशाल होती गई
क्योंकि
कविता की शुरूआत
मेरे जन्म से है
मेरा बचपन
मेरा बोलना, उठना, बैठना, चलना
कुछ शरारतें
गोद में बैठकर
दुनिया को जानना...
और...
दुनिया दिखा रहे हैं पापा।

कविता फैल रही है
और
हो रही है पूरी धरती।
लेकिन
मन हुआ जब भी
ठुमकती हुई
लडिय़ाकर दिखाऊं-
कविता और चित्र पापा को
एक धौल-सी महसूस हुई पीठ पर
और लगा-
पापा स्लेट पकडक़र
ठहाका मारकर हंस रहे हैं
मैं धीरे से
कलम पकड़ा रही हूं
$गलतियां सुधरवाने के लिए-
बचपन की तरह।
पापा की आंखों से
स्नेह टपककर
शीर्षक पर फैल रहा है
और
स्लेट बन रहा है
पूरा ब्रह्माण्ड।

सपनों में लथपथ

वो उछलती है, कूदती है, बताती है कि
हम कैसे खेलते हैं मिट्टी में
भूल जाती है कि
पड़ सकती है डांट
वो बताती है
हम बनाते हैं लड्डू मिट्टी के
स्कूल में खेलते वक्त।
हंस-हंस बोलती है-
फूट गया था कैसे लड्डू उसकी सहेली का
और पोंछ रहे थे कैसे
एक-दूसरे की ड्रेस में
मिट्टी वाले हाथ।
वो हाथ दिखाती है
मिट्टी में सने हुए
और बताती है-
नाम लिख रहे थे
हम लोग मिट्टी से
पानी डालकर मिट्टी में
लिखने से बहुत मजा आया।
भूल जाती है वो कि
मना किया गया है
मिट्टी में गंदा होने के लिए।
देखती हूं उसका खिलता बचपन
और धो देती हूं चुपचाप
मिट्टी में सने हुए हाथ और कपड़े।
मुस्कुराती हूं सोच-सोच
वाह रे माटी!
कीमती खिलौने पड़े हैं
बेजान तुम्हारे सामने।
उसका बचपन
माटी की $खुशबू तले पल रहा है
जिसमें खेल है
सीख है
सादगी है
अपनेपन का रंग है सदियों पुराना।
माटी सच है
सपनों और यथार्थ के बीच।
घर के सामने वो मैदान में
बनाती है मिट्टी का पहाड़
और सनकर आती है घर
सपनों में लथपथ।
मैं उसकी भोली आंखों में
जीवित रहने देती हूं
सच्ची $खुशी और सपनों की चमक।

हाथ-पैर धुलाते वक्त
कपड़े धोते वक्त
मेरे हाथों में भी आ जाती है थोड़ी मिट्टी
मेरा भी मन करता है लड्डू बनाने का ।
मैं छू पा रही हूं उसे
वो खेल पा रही है उसे
जिसके लिए
तरस जाते हैं लोग।
एक सोंधी-सी गहरी श्वास
उतर आती है हृदय में।
मेरा मस्तक
मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व
झुक जाता है
उसी के सामने
जो पड़ा है
धरती पर ऐसे ही
जो फैला है
यहां से वहां तक
जिसका मोल नहीं कुछ
जो अनमोल है।