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Tuesday 21 Nov 2017

पानी के पास

तेजराम शर्मा
श्रीराम कृष्ण भवन
अनाड़ेल, शिमला-171003

पानी के पास

गांव में
सदियों से था
अलिखित आदेश
सुबह उठ कर
जाओ पानी के पास
अपनी बावड़ी के पास

उगते ही सूरज देता था
जल के छींटे
आंखों को सात रंग में
रंग जाता था
अमृत बूंद से गला
तर -ब-तर

बावड़ी को सुनाते थे
मन की बात
कुछ देर बैठते
उसके पास

समय पानी के लिए नहीं रुकता
आ ही गया आखिर वह
सुबह-सुबह शहर में मेरे पास
पत्नी सिसकियां सुनते ही जाग गई
पर बहते ही न थे
उसके सुख आंसू
मेरी प्यास के भय से
थर-थरा रहा था

उसे पता न था
कि पानी के पास जाना
एक दिन
कालकूट के पास जाना होगा
आदमी का सूख जाएगा गला इतना
कि नदी ही सूख जाए।
मोर पंख सा

उजड़ी धरती के सभागार में
बादलों की उमड़े भीड़
मोर पंख-सा नाचो कुछ

जीवन लीला में
हो कुछ रास-उल्लास
मोर पंख-सा पहनो कुछ
माना कि
धरती सा फैला है तुम्हारा कोपगृह
नवरात्र में तो
मोरपंख सा संवरो कुछ

घिरे बादल
न उतरे तुम्हारी आंखों में
आकाश-से कैन्वस पर
मोर पंख-सा रंगो कुछ

कविता के पन्नों बीच
सहेज कर रख लूं
मोर  पंख-सा रचो कुछ