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Sunday 19 Nov 2017

प्रेमचंद की कहानियों में दलित-जीवन

डॉ. पंकज साहा
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
खडग़पुर कॉलेज, खडग़पुर-721308 (प.बंगाल)
मो. 09434894190
दलित जीवन को हिन्दी साहित्य के केन्द्र में लाने वाले पहले लेखक प्रेमचंद ही हैं। डॉ. नामवर सिंह ने प्रेमचंद की पहली रचना को दलित-जीवन से संबंधित माना है और अंतिम रचना को भी। प्रेमचंद का कथा एवं विचार साहित्य हिन्दी-क्षेत्र के दलित-जीवन की त्रासदी को प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करता है। दलित-जीवन की त्रासद सच्चाइयों को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करने के कारण प्रेमचंद को अनेक दलित लेखकों का कोप-भाजन भी बनना पड़ा है और उन्हें ‘घृणा का प्रचारक’ भी कहा गया है। लेकिन सच तो यह है कि प्रेमचंद-साहित्य में केवल दलित जीवन का चित्रण नहीं है बल्कि दलित-जीवन की स्थितियों को बदलने की चिंता भी है। ‘‘प्रेमचंद राष्ट्र की आजादी को दलितों की आजादी से जोडक़र देखते हैं। दलितों की दुर्दशा को लेकर उनकी कहानियों में जो छटपटाहट दिखाई पड़ती है वह रचनाकार की मानवतावादी दृष्टि का परिचायक है।’’1
‘ठाकुर का कुआं’ प्रेमचंद की दलित समस्या को केन्द्र में रखकर लिखी गई कहानी है। ‘‘इस कहानी में ‘हरिजनों’ के गांव के किसी भी कुएं से पानी न लेने की मजबूरी और उससे उपजी पीड़ा और आक्रोश का चित्रण किया गया है। हिन्दू समाज की यह खासियत है कि इसमें जाति के आधार पर व्यक्ति-व्यक्ति में भेद किया जाता है। व्यक्ति की पहचान जाति से होती है उसके काम से नहीं। जाति व्यवस्था हिन्दू समाज की सच्चाई है जिससे अलग हटकर कोई बात नहीं की जाती।’’2
जबकि प्रेमचंद की नजरों में सबसे बड़ा धर्म था- मानव-धर्म। उनका मानना था कि मनुष्य की पहचान तथा उसकी स्थिति का निर्धारण उसमें निहित मानवीय गुणों तथा उसके कर्मों से होना चाहिए, उसकी जाति से नहीं। तथाकथित ऊंची जातियों पर कटाक्ष करते हुए ‘ठाकुर का कुआं’ कहानी में वे गंगी के मुख से कहलवाते हैं, ‘हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊंचे हैं? इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं? यहां तो जितने हैं एक से एक छंटे हैं। चोरी ये करें, जाल फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें। अभी इस ठाकुर ने उस दिन बेचारे गड़रिये की एक भेड़ चुरा ली थी और बाद में मारकर खा गया। इन्हीं पंडित जी के घर बारहों माह जुआ होता है। यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते हैं। काम करा लेते हैं। मजूरी देते नानी मरती है। किस बात में हैं हमसे ऊंचे?’’3
गंगी के उपुर्यक्त कथन से प्रेमचंद की मनुवादी-ब्राम्हणवादी व्यवस्था के प्रति कट्टर विरोधी सोच तो प्रकट होती ही है इसके साथ वे यह भी दिखाना चाह रहे हैं कि दलितों में अब चेतना आ रही है, उनमें हिम्मत आ रही है। गंगी का ठाकुर के कुएं तक जाने का साहस करना उसकी प्रतिरोध भावना को दर्शाता है। वे क्यों नीच हैं और गले में तागा डाल लेने वाले क्यों ऊंचे हैं? ‘‘गंगी का इस तरह सोचना एक बड़े परिवर्तन या बड़ी क्रांति की ओर इशारा करता है। क्रांति के इस बीज को बाबा साहब अम्बेडकर ने पल्लवित-पुष्पित किया। गंगी यह मानने से साफ इनकार कर देती है कि यह तागा किसी को ऊंच या नीच बना सकता है। वह पूरे ब्राम्हण दर्शन को चुनौती देती प्रतीत होती है।’’4
अपनी ‘सद्गति’ कहानी में प्रेमचंद ने ब्राह्मणों के पाखंड एवं उनके द्वारा दलितों के शोषण का यथार्थ एवं दर्दनाक चित्रण किया है। इस कहानी में दुखी नामक एक निम्नजाति के इंसान की करुण कथा है। दुखी एक ब्राह्मण के घर भूखे-प्यासे बेगार खटता है और अंतत: दम तोड़ देता है। उसके बाद ब्राम्हण उसकी लाश को रस्सी से घसीटकर गांव के बाहर फेंक देता है। ‘‘दलित जीवन-संदर्भों पर लिखी गई प्रेमचंद की कहानियों में ‘सद्गति’ अपनी अंतर्वस्तु के चलते कदाचित सबसे अधिक बेधक और रोमांचक है। समाज-व्यवस्था में दलितों ंके लिए रचे गए जिस नरक की चर्चा हमने की है, उस नरक को रचने वालों- वे पुरोहित हों, ठाकुर हों या साहू हों, का इससे अधिक क्रूर और भयावह चेहरा शायद अन्यत्र, इतना एकाग्र होकर, इतने पाशव रूप में वे नहीं उजागर कर सके हैं, जितना इस कहानी में।’’5
समाज में दलितों की स्थिति पर प्रेमचंद की ‘मंदिर’ कहानी पूरी स्पष्टता से प्रकाश डालती है। इस कहानी में सुखिया नामक निम्नजाति की महिला अपने बच्चे की प्राण-रक्षा के लिए मंदिर में ठाकुर जी के दर्शन-पूजन करना चाहती है। परंतु मंदिर का पुजारी उसे अछूत बताकर मंदिर में घुसने नहीं देता।  इस पर सुखिया अत्यंत दीनता एवं मासूमियत से पूछती है, ‘‘सरकार, वह तो संसार के मालिक हैं। उनके दरशन से तो पापी भी तर जाता है, मेरे छूने से उन्हें छूत कैसे लग जाएगी?’’6
यह सिर्फ एक दलित का प्रश्न नहीं है, बल्कि मानवाधिकार का भी प्रश्न है। भगवान के द्वार पर वे लोग ही जाते हैं, जो दुखी होते हैं, फिर एक दुखियारिन सुखिया को यह अधिकार क्यों नहीं है? भगवान के द्वार पर जब सब बराबर हैं, तो सुखिया के साथ भेदभाव क्यों?
इस प्रश्न का जवाब न तो समाज के तथाकथित उच्च वर्ग के लोगों के पास है न बड़े-बड़े भाषण देने वाले नेताओं के पास। ‘‘सुखिया जैसे दलित पात्र को सामाजिक परिवर्तन का अग्रदूत बनाकर प्रेमचंद ने व्यापक संदेश दिया है। वे हमेशा से ब्राह्मण-व्यवस्था के विरोधी रहे हैं। यह उनके कथा-साहित्य एवं अन्य गद्य-साहित्य से बिलकुल स्पष्ट है। दलितों के शोषण का सबसे बड़ा अपराधी वे ब्राम्हणों और ठाकुरों को मानते हैं।’’7
‘दूध का दाम’ दलित-जीवन की त्रासदी की कहानी है। इस कहानी में भुंगी नाम की भंगी जमींदार के बेटे को अपना दूध पिलाकर पालती है लेकिन उसी के बेटे मंगल को जमींदार के जूठे पत्तलों पर जीवन गुजारना पड़ता है, यह है ऊंची जाति द्वारा नीची जाति को दिया जाने वाला दूध का दाम। दरअसल यह ‘‘जाति-व्यवस्था के दंभ को तोडऩे वाली कहानी है। बड़प्पन के गरुर को इसमें चकनाचूर कर दिया गया है। ऊंची जाति वालों के चिकने चेहरे के पीछे छिपी कुरूपता को उजागर कर दिया गया है। जाति प्रथा, वर्ण व्यवस्था और उससे जुड़े ढकोसले का पर्दाफाश किया गया है। भारतीय संस्कृति में मां के दूध का मोल अनमोल है। इसका कर्ज कभी नहीं चुकाया जा सकता। इस कहानी में इसका नकार ऊंची जाति के सांस्कृतिक पतन का द्योतक है। ऊंची जाति वालों की कथनी-करनी में फर्क को भी इसमें स्पष्टता से दिखाया गया हैा। अंतत: दलितों के प्रति पूरे हिन्दू समाज का नजरिया इस कहानी के सामने आया है।’’8
‘कफन’ प्रेमचंद की अंतिम और सबसे चर्चित कहानी है, परंतु यह जितनी चर्चित है उतनी विवादास्पद भी है। विवाद का मुख्य कारण इसके प्रमुख पात्र घीसू और माधव का चमार जाति का होना एवं उनमें अकर्मण्यता एवं नकारात्मक सोच का होना है। यही तो प्रेमचंद की कलात्मकता है कि वे अकर्मण्य, झूठे, काइयां, डींगबाज पात्रों के माध्यम से शोषण और भेदभाव पर आधारित समाज-व्यवस्था पर व्यंग्यात्मक प्रहार करते हैं और इन पात्रों की निष्क्रियता द्वारा समाज को बदलने का संर्दश देते हैं।
इनके अलावा प्रेमचंद की ‘मंत्र’, ‘आगा-पीछा’, ‘प्रेम का उदय’, ‘सती’, ‘कजाकी’ आदि कहानी दलित संवेदना की कहानी है, जिनमें कहीं दलित स्वाभिमान को दर्शाया गया है तो कहीं दलित की मानवीय संवेदना को।
प्रेमचंद ने लगभग 300 कहानियां लिखी हैं। उनकी अनेक कहानियों में सवर्णों विशेषकर ब्राम्हणों पर कटु व्यंग्य किया गया है इसीलिए अनेक सवर्ण लेखक उन्हें ब्राम्हण विरोधी मानते हैं। उनकी अनेक कहानियों में दलित जीवन का यथार्थ चित्रित हुआ है, जिनमें दलित पात्र दबे-कुचले पराजित होते हुए दिखाए गए हैं। इस कारण कुछ दलित आलोचक प्रेमचंद को दलित विरोधी मानते हैं. परंतु सच तो यह है कि प्रेमचंद का सरोकार न तो वर्ग-संघर्ष से था न जाति-संघर्ष से। उनका संघर्ष तो जीवन संघर्ष था। इसीलिए उनकी रचनाओं में युग-जीवन की सच्चाइयां यथार्थ रूप में चित्रित हुई हैं। आश्चर्य तो यह है कि दलित जीवन से संबंधित जिन त्रासद सच्चाइयों का चित्रण प्रेमचंद ने आज से अस्सी-नब्बे वर्ष पूर्व किया गया था, उनमें आज भी कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है।
संदर्भ सूची-
1. डॉ. सत्यकाम, प्रेमचंद की कहानियां : पुनरावलोकन, अनुपम प्रकाशन, पटना पृ. 12-13
2. वही, पृष्ठ 98-99
3. प्रेमचंद, ठाकुर का कुआं, मानसरोवर, भाग-1, प्रकाशन संस्था नई दिल्ली, पृ., 105
4. शिवकुमार मिश्र, कहानीकार प्रेमचंद : रचना दृष्टि और रचना-शिल्प, लोकभारती प्रकाशन, पृ. 64
6. प्रेमचंद, मंदिर, मानसरोवर, भाग-5, प्रकाशन संस्था, नई दिल्ली- पृ.7
6. प्रेमचंद, मंदिर, मानसरोवर, भाग-5 प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, पृ. 7
7. डॉ. सत्यकाम,प्रेमचंद की कहानियां : पुनरावलोकन, अनुपम प्रकाशन, पटना, पृ. 122,
8. वही, पृष्ठ 116