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Thursday 23 Nov 2017

सहयात्री


मूल लेखिका- भारती चन्द
अनुवाद- संतोष झांझी
डी-7, स्ट्रीट-12, आशीष नगर (पश्चिम)
भिलाईनगर (छ.ग.) 490006
मो. 9770336177
मानसी ने दो महीने पहिले एजेन्ट से बाम्बेमेल की दो टिकट कटवाई थी, फिर भी लोअर बर्थ नहीं मिल पाई। एसी टू टायर में दोनों ही बर्थ ऊपर की थी। वो बहुत वर्षों बाद नागपुर से कलकत्ता जा रही थी। श्यामली बिटिया को ज्वाइंट एन्ट्रैस एक्जाम दिलवाने के बहाने छुट्टी के कुछ दिन मायके गुजारने जा रही थी। मायके के नाम पर बस दो भाइयों का परिवार ही था। मां-बाप का तो बहुत समय पहले ही देहांत हो गया था।
सोमेन के साथ मानसी का तलाक भाभियों को स्वीकार नहीं हुआ था। बातों-बातों में दोनों भाभियां अपने-अपने पतियों को यदा-कदा इस बात का ताना मारने से बाज नहीं आती ‘‘तुम्हारी दीदी की भी कम गलती नहीं है खुद भी तो वो ऑफिस से निकलकर घूमते-घामते रात 8.00 बजे घर में घुसती है, हलर-हलर पूरे नागपुर में मंडराती रहती है, अगर जीजा जी टूर के बहाने कहीं दो-चार दिन घूमकर आए तो ऐसा क्या गुनाह कर दिया उन्होंने? पुरुषों की ऐसी थोड़ा बहुत घूमने फिरने की लत तो होती ही है इसका मतलब क्या सभी डायवोर्स लेकर बैठ जाए।’’
भाभियां वैसे खुद दिनरात घर, आंगन, सीढिय़ों को कारण बना-बनाकर, चाहे आपस में लाख झगड़ा करती रहती हो पर ननद की गलतियां पकडऩे में दोनों एक जान-प्राण हो जाती है और मानसी के भाई तो दीदी के डायवोर्स को लेते हुए इतने मर्माहत हैं कि बीवियों के सामने सर झुकाये रहने के सिवाय उनको और कोई राह ही नजर नहीं आती। फलस्वरूप मानसी का मायके आना-जाना धीरे-धीरे प्राय: बंद ही हो गया। इस बार लडक़ी की परीक्षा के कारण मजबूरन आना पड़ा। इसी के बहाने अपने शैशव किशोरावस्था के शहर को और एक बार देखने की इच्छा को मन से नहीं हटा पाई। इसलिए आ गई।
स्टेशन पहुंचने में कुछ देर हो गई थी। ट्रेन में बैठने से पहले उसने सोचा था एक बार पैसेंजर लिस्ट देखकर गाड़ी में बैठेगी। सहयात्रियों में से किसकी-कितनी उम्र है और उन्हें कहां तक जाना है शायद एकाध नीचे की बर्थ मिल जाए, नहीं तो उसे अपने टूटे पांव के साथ ऊपरी बर्थ पर चढऩे में बड़ी कठिनाई होगी। कुछ वर्ष पूर्व एक बस एक्सीडेंट से उसका दाहिना पांव तीन जगह से टूट गया था। चलना-फिरना तो पड़ेगा ही। अपना और अपनी बेटी के भरण-पोषण का उत्तरदायित्व उसने स्वेच्छा से लिया था। वैसे भी नौकरीपेशा औरत कानूनी तौर पर पति से भरण-पोषण पाने की अधिकारी नहीं होती यह बात वह जानती थी। बेटी के लिए सोमेन ने कुछ रुपए देने चाहे थे मानसी ने नहीं लिये। जब सारा जीवन उसे अकेले बेटी का पालन-पोषण करना ही है तब क्यों सोमेन के आगे हाथ फैलाये? डायवोर्स के समय जज साहब ने बहुत समझाने का प्रयास किया था।
सोमेन ने उससे मुक्ति चाही थी आंखों में आंसू छुपाकर उसने सोमेन को मुक्ति दे दी थी। उस समय श्यामली मात्र दो वर्ष की थी। ट्रेन में बैठकर कुछ देर निश्चिंत रही और नागपुर  से कोई नहीं चढ़ा तो नीचे की दोनों सीटों पर आराम से हाथ-पांव फैलाकर बेटी के साथ बैठ गई। कुछ देर बाद ही श्यामली फैलकर सो गई। जब तक कोई दावेदार नहीं आता तब तक थोड़ा सो सकते हैं। ज्ञानेश्वरी ट्रेन के एक्सीडेंट के बाद बाम्बे कोलकाता लाइन की ट्रेनों का समय बदल जाने से यात्रियों की बदहाली का अंत नहीं। कलकत्ता कब पहुंचेंगे कुछ बता नहीं सकते।
रात प्राय: नौ बजे महाराष्ट्र की सीमा लांघकर ट्रेन छत्तीसगढ़ के इलाके में प्रवेश कर गई। घने जंगल, छोटे-छोटे पहाड़, बाहर झांकने पर दूर डोंगरगढ़ मंदिर की रोशनी दिखलाई दी। ऊंचे पहाड़ की चोटी पर बम्लेश्वरी देवी का मंदिर, छत्तीसगढ़ की जागृत देवी का स्थान। सोमेन उन दिनों भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी करते थे। शादी के बाद वो दोनों दुर्ग स्टेशन से लोकल ट्रेन में बैठकर पूजा करने आए थे।
अचानक उसे लगा अभी कुछ समय बाद ट्रेन दुर्ग पहुंचने वाली है। इस बीच रात का खाना खा लेना चाहिए। श्यामली उच्च माध्यमिक और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करके एकदम थक गई थी। अकेली-अकेली पता नहीं खाना भी ठीक से खाती है कि नहीं, काम के बोझ के कारण मानसी ठीक से श्यामली के खाने-पीने का ध्यान नहीं रख पा रही है। लडक़ी बहुत दुबली हो गई है। इस बार परीक्षा हो जाए उसके बाद बस सारा दिन खाना और जी भर सोना।
सोई हुई बेटी को जगाने की इच्छा न होते हुए भी उसे जगाना ही पड़ा- ‘‘इस सीट के दूसरे पैसेंजर आने से पहले चल रात का खाना निपटा लेते हैं।’’ मां की आवाज से श्यामली अकबका कर उठ बैठी- ‘‘मैं मुंह धोकर आती हूं, तुम तब तक खाना निकालो।’’ उनका डिनर खत्म होते न होते ट्रेन दुर्ग स्टेशन पर आ लगी। शायद यहां उनके सहयात्री आ गए थे, क्योंकि कुली बर्थ के नीचे सूटकेस रख रहा था। दोनों ही पुरुष यात्री, एक वयस्क और दूसरा श्यामली का हमउम्र लडक़ा। मोटे काले फ्रेम का चश्मा पहने जो आदमी सामने सीट पर आकर बैठा, उसे इतने वर्षों बाद इस तरह देखेगी, मानसी को यह उम्मीद नहीं थी। सीट पर बैठते हुए सज्जनतावश उन्होंने मुस्कराकर सामने सीट पर नजर डाली तो मानसी पर नजर पड़ते ही वो गंभीर मुद्रा में सामने अपनी सीट पर चुपचाप बैठ गए।  इतने वर्षों बाद इस तरह अचानक मानसी से मुलाकात हो जाएगी यह बात सोमेन ने भी नहीं सोची थी। ड्राइवोर्स के बाद मानसी अपना ट्रांसफर नागपुर करवाकर वहां से चली गई थी। नागपुर में मानसी के एक दूर के रिश्तेदार रहते थे। श्यामली की देखभाल में असुविधा नहीं होगी ऐसा सोचकर मानसी ने वहीं रहना तय किया। एल.आई.सी. की नौकरी में ट्रांसफर करवाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। सोमेन के साथ इस तरह आमने-सामने बैठने वाली मानसी को उलझन हो रही थी। पांव का दर्द भूलकर किसी तरह ऊपर की बर्थ पर चढऩे का प्रयास करने लगी पर साथ के लडक़े को यह नागवार लगा। खुद आगे बढक़र बोला- ‘‘आंटी आप क्यों ऊपर चढऩे का कष्ट उठा रही हैं। मैं ऊपर चला जाता हूं।’’ अनिच्छा से मानसी नीचे की सीट पर सो गई। लडक़ा तो एकदम श्यामली का हमउम्र है। इसका मतलब हमारे डायवोर्स से पहले ही इस लडक़े की मां से सोमेन का शारीरिक संपर्क हुआ था। सोचते-सोचते उसका मन घृणा से मर गया।
लेडी डॉक्टर ने जब मानसी के प्रेगनेंट होने की खबर दी थी, सोमेन ने खुशी से पागल होकर उसे गोद से उठा लिया था। उसके बाद सिविक सेंटर में घूमते हुए काफी हाउस में रात का खाना खाकर दोनों घर लौटे थे। छोटे शहर में जितना इन्ज्वॉय वो कर सकते थे उन्होंने किया था। उन खुशी के पलों में मानसी ने स्वयं को विश्व की सबसे सुखी महिला समझकर गर्व का अनुभव किया था। तब क्या उस समय इस लडक़े की मां को सोमेन ने इसी प्रकार से प्यार किया होगा? मेरी ही तरह उसकी मां ने भी स्वयं को पृथ्वी का सबसे सुखी महिला समझ गर्व का अनुभव किया होगा?
उस दिन उस पल की बात सोचते-सोचते इतने वर्षों बाद भी उसका सोमेन के प्रति वो पुराना आक्रोश जग उठा। इच्छा हुई उस दिन की तरह और एक बार सोमेन का कालर पकडक़र खींचकर थप्पड़ जड़ दे, जैसे उस दिन सोमेन ने अपने अवैध संबंध स्वीकार कर मानसी से मुक्ति चाही थी। उसने जोर से आंखें बंदकर खुद को शांत करने का प्रयास किया।
तब तक ऊपरी बर्थ पर हमउम्र लडक़े-लडक़ी में सहज ही दोस्ती हो गई। श्यामली ने उत्तेजित स्वर में मां से कहा- मां, मां जानती हो सोनक मतलब ये लडक़ा भी मेरी तरह जायेन्ट एक्ट्रैन्स एग्जाम देने कलकत्ता जा रहा है। और मां जानती हो इसके पापा का नाम भी सोमेन दे है। इनका भी कलकत्ते में दाकुरिया में दादा का घर था। वहां से इनके पापा भी यादवपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में पढऩे जाते थे। एकदम मेरे पापा की तरह।
श्यामली की बातें मानसी को सुनाई नहीं दे रही थी। मां की तरफ से कोई जवाब न पाकर उसकी बकबक बंद हो गई ‘‘लगता है मां सो गई, कल सुबह बताऊंगी।’’
नीचे की बर्थ पर मानसी और सोमेन नींद का बहाना कर सारी रात पड़े रहे।