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Wednesday 22 Nov 2017

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 अरविन्द अवस्थी
श्रीधर पांडेय सदन
बेलखरिया का पुरा
मीरजापुर (उ.प्र.) 231001
ऐसे तो पूरे घर की सफाई प्राय: रोजाना ही होती रहती थी किन्तु उस दिन कुछ विशेष सफाई हो रही थी। सभी नौकर-चाकर बड़े सबेरे से ही सफाई में लगे थे। ऊपर से बलराम पाण्डेय स्वयं घर का कोना-कोना देख रहे थे। कभी किसी को बुलाकर कोई सामान हटाने को कहते तो कभी किसी से कहते- ‘‘देखो! कैसी सफाई की है? यहां धूल जमी है, यहां से दाग-धब्बा नर आ रहा है, इस कोने में मकड़ी के जाले लगे हैं। तुम लोग बस खानेभर के लिए हो। जल्दी-जल्दी करो। बाहर का फर्श भी धो देना। और हां दस-बारह कुर्सियां भी बाहर रख देना।’’ यह कहकर वे बाहर निकल गए। सभी के हाथ तेजी से चल रहे थे। कहीं धूल का नामोनिशान न रहने पाए यही सबकी कोशिश थी। सफाई हुई, धुलाई हुई, पोंछा लगा और कालीन बिछा दिए गए।
सब कुछ चमक रहा था। पर्दे भी धुले हुए लगा दिए गए थे। खिड़कियों के शीशे भी बिलकुल लक-दक थे। अभी जैसे ही सब काम करके खाली हुए थे कि बलराम पाण्डेय वापस आ गए। एक को इशारे से बुलाया और पूछा- ‘‘सारा काम हो गया?’’
‘‘हां, साहब’’ उत्तर दिया।
‘‘ड्राइंगरूम में सोफों के कवर बदल दिए गए?’’
‘‘हां’’
‘‘पर्दे भी?’’
‘‘हां साहब’’
‘‘ठीक है। देखो, कुछ मेहमान आने वाले हैं। उनको कोई दिक्कत न हो।’’
‘‘नहीं साहब, हम लोग हैं न।’’
पाण्डेय जी अंदर गए और मालकिन को बुलाने लगे- ‘‘हां भाई सुनो! इधर आना!’’ मालकिन तक उनकी आवाज नहीं पहुंची तो फिर बोले- ‘‘अरे, प्रभा की मम्मी! सुनो... जरा इधर आओ।’’ प्रभा ने जाकर अपनी मम्मी को बताया कि पापा बुला रहे हैं तो वे कमरे से निकलकर पाण्डेय जी के पास आईं और ‘‘क्या है’’ कहकर खड़ी हो गई।
पाण्डेय जी बोले, ‘‘सब तैयारी हो गई है कि अभी कुछ बाकी है।’’ उनकी पत्नी ने गंभीरता से सिर हिलाया कि सब ठीक है।
उस दिन पाण्डेय जी की लडक़ी को लडक़े वाले देखने आने वाले थे। उनके दो बच्चे हैं। एक लडक़ा, एक लडक़ी। लडक़ी का नाम प्रभा है। वही बड़ी है और बी.कॉम. फाइनल ईयर का इम्तहान दे चुकी है। पिछले एक साल से पाण्डेय जी उसके लिए योग्य वर की तलाश कर रहे हैं। कई जगह गए। कहीं उनका मन नहीं जमा तो कहीं लडक़ी की ‘हाइट’ का मामला आड़े आ जाता। इस बार जहां बात हुई है लडक़े के पिता रेल विभाग में अधिकारी हैं। लडक़ा भी ‘नेट’ पास कर लिया है। कहीं न कहीं डिग्री कॉलेज में उसे लेक्चररशिप मिल ही जाएगी। पुराने रईस हैं। बात लगभग तय हो चुकी है बस लडक़े के पिता ने एक ही शर्त रखी है कि भाई लडक़ी पसंद होनी चाहिए। पाण्डेय जी को इस बात का अंदेशा है कि कहीं हमारी प्रभा को लडक़े वाले नापसंद न कर दें। लडक़े के पिता की कही हुई बात आज फिर उनके कानों में गूंजने लगी थी-
‘‘पाण्डेय जी! भगवान का दिया हमारे पास सब कुछ  है और मैं यह भी मानता हूं कि किसी का दिया हुआ धन टिकता नहीं है। आपसे धन लेकर मैं धनी नहीं बन जाऊंगा। बस हमारी-आपकी दोनों जन की इज्जत बनी रहे यही चाहता हूं। मैं उन लोगों में से नहीं हूं कि लडक़ी वाले को कंगाल बना दूं। मैं जानता हूं कि हर आदमी अपनी लडक़ी को अपनी हैसियत से अधिक देने की कोशिश करता है। बस! एक ही चीज है जिससे मैं समझौता नहीं कर पाऊंगा और वह है लडक़ी। लडक़ी हमारे लडक़े के योग्य होनी चाहिए। देखिए! आजकल जमाना बहुत खराब है। लडक़ा-लडक़ी एक दूसरे को पसंद कर लें तभी शादी करनी चाहिए। जीवनभर जिनको साथ-साथ रहना है उनकी आपस में रजामंदी बहुत जरूरी है। बाकी आप निश्चिंत रहिएगा।’’
पाण्डेय जी के मन में यह ‘रजामंदी’ शब्द बार-बार चहलकदमी कर रहा था। कभी सहज रूप धारण कर तो कभी डरावना रूप बनाकर। पाण्डेय जी का रंग थोड़ा दबा है किन्तु बिटिया का रंग कुछ ज्यादा ही दबा है, ऊपर से हाइट भी मुश्किल से पांच फीट। पाण्डेय जी की पत्नी और उनके बेटे का रंग गोरा है किन्तु बेटी के रंग ने उन्हें बदरंग बना दिया है। आज वे यही सोच रहे थे कि भगवान जब बेटी दे तो उसे सर्वगुण सम्पन्न बनाए और खूब धन भी दे।
उधर सीमा प्रभा को सजाने-संवारने में लगी थी। सुबह ही प्रभा बाल शैम्पू से धोकर नहा चुकी थी। सीमा ने नहाते वक़्त बार-बार प्रभा को सहेजा था कि दीदी! बालों में कंडीशनर भी रूर कर लेना। प्रभा का मन जहां थोड़ा-सा भी गिरता देखती सीमा उसे समझाने लगती। उसे कौन-सा सूट  पहनना है या कौन-सी साड़ी पहननी है अभी सीमा निश्चित नहीं कर पा रही थी तभी प्रभा की मां आ गई। सीमा ने पूछा- ‘‘आंटी, दीदी को साड़ी पहननी पड़ेगी कि सूट? आप बता दें तो मैं उसे निकालकर जरा प्रेस चला दूं।’’ प्रभा की मां ने कहा- ‘‘अच्छा, रुको, अभी इनसे पूछकर बताती हूं।’’ कहती हुई बाहर की ओर चली गईं। प्रभा और सीमा अकेली बचीं तो प्रभा ने सीमा से पूछा-
‘‘सीमा, लड़कियों के साथ क्यों ऐसा होता है कि उन्हें अपने मां-बाप का घर छोडक़र पराए घर जाना पड़ता है?’’
सीमा बोली- ‘‘दीदी, ये कोई नई बात तो है नहीं, हमारी-आपकी दादी, मां सबके साथ तो ऐसा ही हुआ है। ये परंपरा तो न जाने कब से चली आ रही है। अमीर हो या गरीब कोई मां-बाप अपनी लडक़ी को अपने घर नहीं रख पाता। शायद विधि का विधान ही कुछ ऐसा है कि लड़कियों में ही इतनी सामथ्र्य होती है कि पराए घर जाकर भी सबके साथ सामंजस्य बना लेती हैं। अलग-अलग लोग, अलग-अलग रुचियां, अलग-अलग आदतें। किन्तु सबसे साथ संतुलन बनाकर चलना आता है लड़कियों को। अपनी मां को देखो, हमारी मां को देखो।’’
‘‘क्या लड़कियों के साथ ज्यादती नहीं है यह? क्या उनकी विवशता का लाभ उठाना नहीं है यह? क्या उनकी कमजोरी के साथ खिलवाड़ नहीं है यह?’’ प्रभा ने कहा।
सीमा ने उसके बालों पर हाथ फेरते हुए यह देखने की कोशिश की कि उसके बाल सूखे या नहीं, साथ ही प्रभा की बात का जवाब देते हुए बोली- ‘‘नहीं दीदी, आजकल तो माना बदल गया है। औरतें भी कितना आगे निकल गई हैं। नौकरी कर रही हैं, बिनेस कर रही हैं तो कम•ाोर होने की स्थिति नहीं है। देखिए, पढ़ी-लिखी नौकरी करने वाली लड़कियां भी विवाह करके पति के घर ही जा रही हैं। यह परंपरा है समाज को संतुलित और व्यवस्थित रखने की। आप इन बातों को लेकर चिंतित न हों। आपके ससुराल वाले बहुत अच्छे लोग होंगे। आप इतनी अच्छी जो हैं।’’
‘‘हां, तुम तो कहोगी ही। तुम तो चाहती हो कि मैं जल्दी जाऊं।’’
‘‘नहींदीदी, आप ऐसा क्यों सोच रही हैं? क्या मुझसे कोई गलती हुई है?’’
‘‘ना बाबा, गलती और तुमसे! ये तो हो ही नहीं सकता!’’
तब तक सीमा की मां किचन से चिल्लाकर बोली-
‘‘सीमा! ओ सीमा!... एक बार में सुनती ही नहीं ये लडक़ी। अरे! यहां आना, किचन में। अभी इतना काम पड़ा है और तुम इधर-उधर के काम में लग जा रही हो।’’
आई मम्मी, कहकर सीमा प्रभा से फिर आने को कहकर चली आई और आते ही बोली- मम्मी, मैं प्रभा दीदी के साथ थी। देख रही थी कि उनके बाल सूख गए हों तो कंघी वगैरह कर दूं।
‘‘अच्छा चलो, अब थोड़ी देर रसोई में काम करा लो। मां ने कहा।
 सीमा और उसकी मां बलराम पाण्डेय के यहां घरेलू काम करती हैं। सीमा के पिता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। सीमा एकमात्र उनकी संतान है। उसकी मां बलराम पाण्डेय के यहां काम करने लगी। अपनी बेटी को वह पढ़ाना-लिखाना चाहती थी। इसलिए उसने यह काम पकड़ लिया। बलराम पाण्डेय नेक इंसान हैं। सीमा के पढऩे-लिखने का  भी उन्होंने इंतजाम कर दिया। मां-बेटी को कोई तकली$फ न हो, इसका ध्यान पाण्डेय जी की श्रीमती भी रखती थीं। सीमा और प्रभा हमउम्र होने के नाते सहेलियों की तरह रहती थीं। प्रभा बी.कॉम कर रही थी और सीमा बी.ए.। प्रभा के पिता को अब प्रभा की शादी की चिंता करते देख सीमा की मां भी सीमा के विवाह के लिए परेशान रहने लगी थी। गांव की मीन बेचकर सीमा की मां ने रुपए बैंक में जमा करा दिए थे। यही सोचकर कि बेटी की शादी में काम आएंगे। रोजमर्रा के खर्च के लिए उसने पाण्डेय जी के यहां काम करना शुरू कर दिया था। गांव से आकर शहर में एक कमरा किराए पर लेकर गुर-बसर कर रही थी कि पाण्डेय जी उसके भगवान बनकर मिले।
पूर्वान्ह को ठीक ग्यारह बजे लडक़े वाले आ गए। एक तरफ हर्ष था तो एक तरफ अनजानी आशंका से पाण्डेय जी के हृदय में हलचल मची हुई थी। किन्तु आने वाले मेहमानों के स्वागत-सत्कार में कोई कमी न हो इसका ध्यान रखने के चक्कर में और बातें पीछे रह गई थीं। मुस्कुराते हुए पति-पत्नी ने उनका स्वागत किया। आने वालों में लडक़ा, लडक़े की मां और लडक़े के पिता बस तीन ही जन थे। पाण्डेय जी ने कहा भी कि मैं तो समझ रहा था कि आठ-दस लोग आएंगे। लडक़े के पिता बोले-
‘‘पाण्डेय जी! मेरा मानना है कि पहली बार लडक़ी देखने में भीड़ लेकर नहीं चलना चाहिए और आपको भी बहुत भीड़ नहीं जुटानी चाहिए। जब सब तय हो जाए तो खूब धूमधाम से गोदभराई की रस्म पूरी की जानी चाहिए।’’
‘‘बिलकुल ठीक कहा आपने।’’ पाण्डेय जी ने सिर हिलाकर कहा और फिर अपनी पत्नी की ओर मुखातिब होकर नाश्ता वगैरह मंगाने के लिए इशारा किया। तभी सीमा ट्रे में खाने-पीने की तमाम चीजें सजाकर ले आई। लडक़े ने सोचा शायद यही लडक़ी है। सीमा सुंदर है, किसी का भी ध्यान आकर्षित करने की क्षमता है उसके चेहरे में। इसलिए यदि लडक़ा उसे ही लडक़ी समझ बैठा तो उसका कसूर नहीं है। लडक़ा एकटक सीमा की ओर देख ही रहा था कि सीमा ट्रे में रखा सामान उठाकर सबको देने की कोशिश करने लगी। विनम्रता और प्यार के साथ सबसे एक और, एक और लेने का आग्रह करती। लडक़े और लडक़ी के माता-पिता आपस में बातें करते जा रहे थे कि लडक़े की मां ने कहा कि भाभीजी अब हमें लडक़ी दिखा दीजिए। उसे यहीं बुलवा लीजिए। पाण्डेय जी ने अपनी पत्नी से कहा, ‘‘जाओ, प्रभा को लिवाकर आओ।’’ लडक़ा अपने मां-बाप की ओर ताकने लगा।
प्रभा की मां वहां से उठकर प्रभा को लेने चल पड़ीं। उन्होंने लडक़े की आंखों की चमक से कुछ पढऩे की कोशिश की थी। उनका हृदय धक्-धक् कर रहा था। एक-एक कदम आगे बढ़ाते हुए उन्हें बड़ी ताकत लगानी पड़ रही थी। अनजाना भय उनकी आंखों के सामने अंधेरा बनकर छाता जा रहा था। जिस लडक़ी को हृदय से लगाकर रखा उसके भविष्य को लेकर उनके माथे पर चिंता की रेखाएं उभर आईं। मन पर काबू करने की कोशिश करते हुए वे प्रभा के कमरे तक पहुंची। उन्हें देखते ही सीमा दौडक़र आगे आ गई और बोली- ‘‘आंटी! दीदी को लिवाकर चलें!’’ प्रभा की मां केवल सिर हिला सकीं।
आगे-आगे प्रभा ट्रे में चाय के कप रखकर चल रही थी और साथ में सीमा ऐसे चल रही थी जैसे उसे संभाले हुए हो। प्रभा को सीमा ने कुर्सी पर बैठा दिया और सबको स्वयं चाय देने लगी। लडक़ा अब एक बार प्रभा को देखता और एक बार सीमा को। उसकी आंखें मानो दोनों के सौंदर्य को परख रही थीं। दोनों की तुलना कर रही थीं। लडक़े की मां ने प्रभा से उसकी पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछा। लडक़े ने केवल इतना पूछा कि आपका नाम क्या है? सिर उठाकर बताया- ‘‘प्रभा’’... और लडक़ा चाय पीने लगा। पाण्डेय जी ने लडक़े के पिता से पूछकर प्रभा को सीमा के साथ अंदर भेज दिया।
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। पाण्डेय जी ने चुप्पी तोड़ी- ‘‘तिवारी जी! लडक़ी तो आप लोगों ने देख ली, अब चाहूंगा कि अपना फैसला भी सुना दें तो बड़ी कृपा होगी। मैं अंदर से आ रहा हूं। तब तक आप लोग आपस में विचार कर लें। कहकर पाण्डेय जी अंदर गए और थोड़ी ही देर में सपत्नीक वापस आ गए। उन लोगों को आता देखकर लडक़े वालों ने चुप्पी साध ली। इस बार लडक़े के पिता ने चुप्पी तोड़ी, बोले- ‘‘पाण्डेय जी क्षमा चाहता हूं। हमारे लडक़े ने प्रभा को न पसंद करके सीमा को पसंद किया  है।’’ सुनते ही प्रभा की मां को जैसे काठ मार गया। बेचारी हाथों से चेहरा ढंककर सिसकने लगी। तिवारी जी ने पाण्डेय जी से निवेदन किया- ‘‘भाई साहब! मैंने आपसे पहले ही बताया था कि लडक़ी और लडक़े की रजामंदी पर ही शादी की सफलता होती है। आप भाभीजी को धैर्य बंधाइए।’’ पाण्डेय जी ने कहा-
‘‘तिवारी जी! सीमा मेरे घर में काम करती है। उसकी मां के अलावा उसका कोई नहीं है। मैं ही उनके रहन-सहन की व्यवस्था कर देता हूं।’’ इस बार लडक़ा बोला- ‘‘अंकल जी! आप तो पढ़े-लिखे समझदार और नेक इंसान हैं। जब आप इनके शुभचिंतक और गार्जियन की तरह ही हैं तो सीमा का विवाह करके एक जिम्मेदारी और निभा दीजिए।’’  ‘‘बेटा! ये तुम क्या कह रहे हो!  शायद तुम खुद नहीं समझ पा रहे हो। एक पिता की बेटी को नापसंद करके उससे कह रहे हो कि उसी लडक़े के साथ दूसरी लडक़ी की शादी कर दे जो उसकी बेटी नहीं है।’’ पाण्डेय जी ने कहा।
लडक़े की मां ने हाथ जोड़ते हुए कहा-
‘‘भाई साहब, आपका दिल बहुत बड़ा है। ऐसा करके आप छोटे नहीं होंगे।’’ तब तक सीमा की मां सामने आ गई और बोली- ‘‘साहब लोगों, मैं गरीब ब्राह्मणी वह भी विधवा, मेरी लडक़ी आपके घर की बहू बनने योग्य नहीं है। फिर आप तो प्रभा को देखने आए थे। भला ऐसा करने पर प्रभा बिटिया के दिल पर क्या बीतेगी?’’
अचानक प्रभा सबके सामने आ गई और हाथ जोडक़र अपने पापा-मम्मी से कहने लगी- ‘‘पापा! आप लोग यही समझ लीजिए कि सीमा आपकी बड़ी बेटी है और बड़ी बेटी का ब्याह तो पहले होना ही चाहिए। अब हां कह दीजिए और विवाह की तैयारी कीजिए। मेरी ओर से आप लोग निश्ंिचत हो जाइए। सीमा का विवाह करके उसे विदा करते हुए मुझे खुशी होगी।’’
काफी देर तक वाद-संवाद हुआ। उठा-पटक हुई। आखिर यही निश्चित हुआ कि सीमा का ही विवाह होगा। सीमा कुछ कहना चाह रही थी तो प्रभा ने अपनी कसम धरा दी कि वह कुछ नहीं बोलेगी।
अब सबके चेहरे पर प्रसन्नता थी। शादी की तिथि तय करने के लिए पंडित जी बुलाए गए। सब कुछ निश्चित हो गया। तिवारी जी विवाह का सारा खर्च खुद उठाने को तैयार थे किन्तु पाण्डेय जी ने कहा कि नहीं, सीमा का विवाह मेरे खर्चे से होगा। उसकी विदाई मेरे घर से होगी। सीमा प्रभा के गले लगकर सुबकने लगी जैसे अभी विदा हो रही हो।
सुनने वालों में कुछ ने इसे अनुचित ठहराया तो कुछ ने बिलकुल उचित। समाज में इसी तरह कभी कोई ऐसी घटना घटित हो जाती है जो दूसरे के लिए चर्चा का विषय बन जाती है और एक कहानी को जन्म देती है।