Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

पंक लेपन

रजनी शर्मा
116 सोनिया कुंज
देशबन्धु प्रेस के पीछे
रायपुर (छ.ग.)
मो. 9301836811
बारिश आज सुबह से शुरू हो गई थी। तेज बारिश न होकर यह पिछले दो दिन से लगी झड़ी थी। ऐसा लग रहा था मानो वह नीली छतरी वाला ऊपर बैठे आसमान में अपनी बड़ी सी छलनी में बारिश को बड़ी नफासत से छान-छानकर बड़े सुकून से नीचे धरती पर भेज रहा था। महुआ तडक़े ही उठ चुकी थी उसने सुबह ही मंडिया पेज, चिंगड़ी मछली पका लिया था । पुडिय़ा में नमक बांधकर एक प्लास्टिक के थैले में सबको समेटने लगी। आज उसे खेत जल्दी जाना था धान रोपाई करने कोचिया (सरदार) ने चालीस लोगों की टोली में उसे भी शामिल कर लिया था। गांव में खेतीहीन श्रमिक ही थी वो। धान रोपाई के काम से घर चलाने लायक, धान खरीदने  के पैसे तो मिलते थे जिससे वो और उसका परिवार रूखी सूखी खाकर अपना दिन गुजार रहे थे। महुआ महुए सी लुनाई लिये, भरा शरीर, पुष्ट कंधे साथ ही लापरवाह देहाती सौन्दर्य देते वक्त विधाता ने जरा सी भी कंजूसी नहींबरती थी। लोहरा जनजाति की होने के कारण उसका रंग गोरा ही था। गोरे रंग पर मोरपंखी स्याही के गोदने के टप्पे उसके गंवैया सौन्दर्य में चार चांद ही लगाते थे। अरंडी के तेल से भीगा तरबतर केश विन्यास उस पर गिलेट के क्लिप, बांहे बिना ब्लाउज की इस तरह चमकती थी मानो अभी-अभी मोंगरी मछरी को पानी से बाहर निकाला गया हो। साड़ी को घुटने के ऊपर कंधे पर गठान की शक्ल में उसने बांध रखा था ।
घर के कोने में पड़े झिटका (झाड़ू) बाहरी से उसने घर के आंगन को जल्दी-जल्दी साफ  कर दिया , नक्खी(गंज) में एक के उपर एक तालाब से पानी भर कर वह कब की ला चुकी थी। महुआ ने उचटती सी नजर अपने घर के पिछवाड़े की बाड़ी पर डाली। केले की गाछ (केले के फल से लदा गुच्छा) सही सलामत है कि नहीं। घर के पिछवाड़े में बरतन मांजने की जगह पर उसने दो-तीन केले के पौधे रोप दिये थे। प्रकृति की तासीर तो देखिये बरतन मांजने के बाद जो राख बची होती थी उसे भी सोख कर कितना सुंदर प्रतिदान केले के पौधे महुआ को देते थे। साधारण से सपनों में ऐश्वर्य का कोई स्थान तो महुआ के लिये था ही नहीं वह तो केले की मालकिन के समान खुद ही खुद खुश हो जाती थी। पीछे के कोठार में पुडऱे (गाय के बछड़ों) को पुचकारा और चारा डाल कर देखा तो बाहर थोड़ी रोशनी हो चली थी। आग को चूल्हे से खींच कर पानी का छींटा मार बुझाया। रसोईघर के पाटे पर रखे चिमनी को हिला डुला कर देखा शाम के लिये मिट्टी तेल के खत्म होने व नमक की अनुपलब्धता महुआ जैसे कई महिलाओं को बस्तर की हाटों (बाजार) की ओर खीच ले जाती थी । खूटी पर टंगे देहाती प्लास्टिक को उसने खींच कर सर से पांव तक इस प्रकार ओढ़ा जैसे वो डिजायनर मनीष मल्होत्रा की डिजाइन की गई लेटेस्ट रेनकोट हो। सस्ती प्लास्टिक को सर के ऊपर ओढक़र उसने गरदन पर हल्की सी रस्सी बांध दी ताकि वह रेनकोट की टोपी के समान हो जाये । बरसाती बस पीठ ढक ले इतना ही काफी था। प्लास्टिक के थैले में अपना भोजन रख किवाड़ बंद करके वह घर के सामने से गुजर रहे रेले में शामिल हो गई ।
मुखिया जोर-जोर से चिल्ला रहा था खिडिक़ नुको रेंगा री (थोड़ा जल्दी चलो)। किरका ने भद्दी सी गाली बुदबुदाते हुए कहा कि काम दिलवा रहा है इसका मतलब क्या उसने हमें खरीद लिया है क्या? चालीस महिलाएं एक कतार में पानी मारी गला झांई गीत गुनगुनाते हुए हल्की बारिश में खेतों की ओर जा रही थी। खेत क्या था दूर-दूर तक चौकोन खेतों को मेड़ों की सहायता से बांधा गया कोई चौसर बिछा हो इस जीते जागते चौसर पर कोचिया (मुखिया) बिसात जमायेगा। सारे प्यादे तक साथ झुकेंगे और धान की रोपाई करेंगे। बारिश के कारण खेतों के मेड़ों पर हल्की घास लहलहा रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे मटमैली साड़ी पर विधाता ने ग्रीन बार्डर उकेर दिया हो। उन मेड़ों पर इक्का-दुक्का बबूल के पेड़। कोचिये के चीखते ही सारी महिलाएं मोहरी, महुआ, मंगलदई, किरका, पोकलू सबने अपने-अपने भोजन जो कि प्लास्टिक की चुंगड़ी में रखे थे उन सबको मेड़ पर सूखी जगह पर रखा। अब बारिश में भोजन ना भीगे इसलिये प्लास्टिक के धमेले , तगाड़ी (टोकनी) को भोजन के उपर उलट कर रख दिया। सबने अपना-अपना मोर्चा संभाल लिया। बारिश की झड़ी थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। महुआ ने एक पतली रस्सी कमर के चारों ओर बांधी जिससे ओढ़ी गई प्लास्टिक उसके झुकने पर ना गिरे। पूरा खेत कीचड़ से भरा हुआ उस पर जगह-जगह धान के थरहे (पौधे) जिनकी रोपाई का आज पहला दिन था ।
बस्तर में तरह-तरह की किस्में धान की हुआ करती है। जैसे - बासा भोज, दूबराज ,मोटा, सफरी आदि । रोपाई का काम महुआ इतने सधे हाथों से करती कि दक्ष इंजीनियर का नाप भी मात खा जाय । घुटने तक कीचड़ में धंस कर जब बस्तरिया अपनी खेतों में रोपाई का कार्य करते है तो वह मंजर देखने लायक ही होता था। नब्बे डिग्री कोण पर कमर झुक जाती और एक-एक पौधा बिल्कुल सही जगह पर खोंच दिया जाता । थरहे (पौधे) अपने ढेर में रहते तो थे दबे कुचले, पर अपने कुनबे से (ग_ेे) से विलग होना उन्हें जरा भी नहीं भाता था। इस जुदाई के कारण नन्हे जान के पौधे उदास रहते थे। पर कीचड़ से भरी धरती वात्सल्य भाव से उन्हें अपनी छाती पर पनाह देती तो वो खिलखिला उठते। जब एक खेत में रोपाई पूरी होती तो ऐसा लगता मानो मटमैली साड़ी पर कुशल दर्जी ने हरे मुकेष का काम कर दिया हो। पकलू की आवाज आई ..आयागो, कीचड़ से सने पैर को उसने बाहर निकाला तो जोंक उसकी चमड़ी पर चिपका बैठा था। महुआ ने उसे कस के खींचकर पकलू के पैरों से अलग किया ।
इतनी तकलीफ , इतना कष्ट क्या सिर्फ पैसों के लिये नहीं? यह तो बस्तर के जन मानस का जमीन से जुड़ाव था जो उन्हें इस कार्य की ओर खींचता था। सोनारिन ने महुआ को आवाज लगाई बेरा होली रे (समय हो गया रे ), इतने में कोचिया की कर्कष आवाज गंूजी खिडिक़ अऊर लेकी(थोड़ी देर और लडक़ी) दिन के दो बजे चुके थे बारिश अभी हो रही थी। पेड़ के किनारे साफ , थोड़ी कम गीली जगह का चयन कर महुआ और उसकी जमात बैठ गई। प्लास्टिक से आ टपकी बूंदों को महुआ ने पोंछा । सबने अपना-अपना भोजन निकाला तुई काय साग रांधली आसीस (तुमने क्या सब्जी पकाई है) इस कथन के उत्तर में पकलू ने आमट आय (खट्टी सब्जी है) कह के दोने में पकलू की ओर सब्जी बढ़ा दी। आमट याने कि तिवरा के दाल में जरा सा चावल के आटे को घोल कर आम की फांको के साथ पकाई गई सब्जी । पांच दस लोगों का पूरा एक समूह होता था और इस समूह के लिये एक केन में पानी भरकर एक सदस्य ले आता था। अब जिस बर्तन में उन्होंने खाना खाया उसी में पानी डाल कर पीने से प्यास भी बुझ जाती थी और बरतन भी साफ । बस्तर के इन कर्मठ सदस्यों से मां अन्नपूर्णा शायद ही कभी नाराज हुई होगी क्योंकि गरीबी या अन्य किसी कारण से अभिजात्य वर्ग के विपरीत बरतन में कभी भी अन्न का दाना शेष नहीं रहता था। कोचिये की आवाज फिर आने लगी चला -चला। रेला खेतों में कूच कर गया। शाम के पांच बजे जब महुआ ने कमर सीधी करने की कोशिश की तो कमर अकड़ चुकी थी। आठ-आठ घंटों तक एक ही मुद्रा पर झुक कर काम करने से कमर की क्या हालत हुई होगी। पकलू , सोनारिन सबने महुआ के साथ जल्दी-जल्दी, अपने-अपने घर की राह पकड़ ली। दरवाजा खोला तो देखा कि महुआ का पति उखड़ू बैठ कर बीड़ी पी रहा था। बेकार नि_ल्ले पति पर उसने अब गुस्सा करना छोड़ दिया था। शाम को घर पहुंचने के बाद मालिक के घर जाना था। धान या पैसा धान रोपाई के बदले जो भी मिल जाये। धान अगर मिले तो ज्यादा अच्छा है। क्योंकि यदि घर में कुछ न भी होतो भात व नमक खाया जा सकता है। मालिक का घर था या कोई पुरानी हवेली। आधे एकड़ के भू-भाग पर फैली मालिक की कोठी पुराने बस्तर शिल्प की याद दिलाती थी। ऊंची जगह पर निर्मित भवन फर्शी पत्थर जो थोड़े लाल होते है, उन्हें थोड़ा छेद कर आपस में तार बांध कर छत की शक्ल दी गयी थी। पूरे घर की बाऊंड्रीवाल (दीवार) सर्वाधिक सुंदर। अनपढ़ श्रमिकों के आर्किटेक्ट का बेजोड़ नमूना। मोटे और छोटे पत्थरों को एक के उपर एक रखकर कीचड़ से जुड़ाई की गई थी। इन दीवारों को देखने पर ऐसा लगता था मानो बच्चों के हाथों में कूची ,तूलिका थमा दी गई हो और उन्हें दीवारों को रंग देने की आजादी दे दी गई हो। मेन गेट का आकर्षण और भी अधिक। मुख्य द्वार की ऊंचाई बाकी दीवारों से थोड़ी ऊंची की गई थी और बिल्कुल एक फीट का छज्जा जिस पर खपरैल बिछा दी गई हो उन दीवारों का अवलम्बन लेकर लहलहाते तोरई, करेले , कुम्हड़ा , रखिया की नारे। मालिक के घर में धान रखने की कोठरी दो मंजिले इमारत जितनी गहरी कि उस कोठार में जाने के लिये उपर तक सीढिय़ां, इसके बाद एक खिडक़ी जितना छोटा सा दरवाजा। सारा अनाज इसी रास्ते से गप्पा (बड़ी टोकरी) के द्वारा उस कोठार के भीतर गिराया जाता था। धान को निकालने का रास्ता भी यही खिडक़ी हुआ करती थी। बाहर बरामदे में बड़ी-बड़ी बांस की चटाइयों को गोल घेरे की शक्ल में मोड़ा गया था (स्थानीय भाषा में यह कडग़ी) न जाने कितने बोरे धान को उदरस्थ कर लेती थी इसके चारों ओर गोबर का लेप लगा कर इस कडग़ी के मुंह को बंद कर दिया जाता था। अर्थात साल भर के अनाज संग्रहण का सबसे सरल पर कारगर उपाय। महुआ मालिक के घर जाकर अपनी बारी के इंतजार में खड़ी हो गई। आयतू धान को पैली (किलो का देहाती स्वरूप) से नापता जा रहा था बीस पैली धान की गिनती होने पर एक कोड़ी (बीस को कोड़ी कहा जाता था) का जयकारा लगाता। धान नापने की नई तकनीक के अलावा भी बस्तर के सुदूर अंचलों में इस तकनीक का प्रयोग होता आता रहा है। एक निश्चित स्थान पर एक कोड़ी (बीस पैली) होने पर एक मु_ी धान को प्रतीक के रूप में रख दिया जाता था। अंत में इन धानों के ढेरों की गिनती से यहा पता चल जाता था कि आज कितने धान का वितरण श्रमिक वर्ग में किया गया है। चालीस सेर धान महुआ की हफ्ते भर की पगार थी। महुआ ने धान को बड़ी सी टोकनी में रखा और सर पर रखकर जल्दी घर की ओर रवाना हुई ।
    एक हफ्ते बाद जब धान की रोपाई पूरी हो जानी थी, उस आखिरी दिन गांव में त्योहार से कम नही होता था। मालिक की ओर से भजिया, बूंदी मुफ्त में मिलती और पारंपरिक त्यौहार चिक्खल लोंडी (पंक लेपन) होता। इसमें श्रमिक वर्ग उस धरती का कीचड़ (पंक) हाथ में लेकर तिलक के रूप में एक दूसरे को लगाकर अगले वर्ष पुन: इसी त्यौहार में मिलने का वायदा करते। मालिक को कीचड़ का तिलक लगाकर एक तरह से आशीर्वाद भी लेते। गीले कीचड़ के सोंधेपन से महुआ गमकने लगती। महुआ ने घर जाकर देखा तो पति एक ओर सोया मिला। उसने उसे झिझोड़ ही दिया तुके काय होयल्ला (तुझे क्या हुआ)। कुछ नहीं। महुआ समझ गई थी कि भद्दी गालियों का प्रसाद नहीं मिला मतलब कि उसके मन में कुछ जरूर चल रहा होगा । कोचिये द्वारा दिये गये मुफ्त की बीडिय़ों के कश से महुए का माथा ठनका दिया । बहुत ज्यादा कुरेदने पर बताया कि कल हम दोनो को गांव छोडक़र कमाने खाने बाहर शहर जाना है । महुआ चीख पड़ी क्यों? अरे चुप कोचिया अच्छे पैसे दिलवायेगा तुझे क्या मस्ती छाई है जो इतना बिगड़ रही है। काय बोल लीस (क्या कहा तूने ) वह कोचिया पूरा पैसा खुद खायेगा और जरूरत पड़ी तो तुम्हारी बायले (औरत) को भी बेच देगा। नहीं, बिल्कुल नहीं जाएंगे हम। हम जैसे भी हंै बस्तर के गांवों में रूखी-सूखी खाकर रह जायेंगे। पिछले दो साल पहले नांघरू, फूलो जो कि कोचिया के कहने पर नागपुर गये थे आज तक उनका अता पता नहीं है। इतना सुनना था कि महुए के पति के सर पर चढ़ी उधार की सल्फी (पेय) ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया। गन्ने की सूखी सोटी से महुआ को मारते जा रहा था। साथ ही बुदबुदाते जा रहा था। बड़ी आई लीडर बनने वाली। मेरे साथ तुम्हें चलना ही होगा। पूरी रात महुआ सिसकती रही। अपने पति को समझाने की तमाम कोशिशें विफल हो गर्इं।
    रात को दस बज चुके थे महुआ बेमन से उठी और बाहर कमरे में ढेकी पर धान डालने लगी। ढेकी एक ढाई फुट मोटी लकड़ी का बना यंत्र होता है जिससे ग्रामीण धान को चावल में बदलते थे। ढेकी के चलने से धान की खाल तो निकलती थी साथ ही धक-धक की आवाज भी आती थी पर इधर महुआ का मन अशांत, कलेजा धक-धक किये जा रहा था। परदेश में उसका क्या हाल होगा उसके पति ने तो मार-मार कर उसकी खाल अनेक बार उधेड़ी है, पर उसने उफ  तक नहीं की। वही पति उसे जबरदस्ती परदेश ले जाना चाह रहा था। कोचिया ने दो दिन का समय दिया था। परसों की ट्रेन है गांव के पार तालाब पर मेटाडोर खड़ी रहेगी वही से रेल्वेस्टेशन जाना है। ये दिन महुआ पर पहाड़ के समान भारी थे। गरीबी क्या मति भी छीन लेती है। यहां अपने गांव में ही उसे अपने सागौन, शीशम, माता पिता ही लगते थे । मां दंतेश्वरी के रहते उसे कुछ नहीं हो सकता उसे हमेशा लगता था। गोंचा तिहार, पंक लेपन त्यौहार सब छूट जायेगा । मेरे मूक पशु, मेरा घर मेरी कुटिया सब, मन ही मन सुबकने लगी।  पति का साथ देना इसे ही तो कहते हैं। तेरह वर्षीय महुआ ने आज तक श्रम-श्रम और इसके अलावा कुछ नहीं किया। उस पति ने मात्र सल्फी के लिये खुद अपनी आजादी उस कोचिये को बेच दी। मेरे केले के पौधे को पानी कौन देगा ।
आखिर वह घड़ी भी आ पहुंची, मेटाडोर में बैठने के पहले महुआ ने भरी आंखों से अपने गांव , पोखर , तालाब की ओर निहारा। दुष्ट कोचिया उसके पति को बीड़ी पिला -पिलाकर न जाने क्या पट्टी पढ़ा रहा था। महुआ ने आखरी बार विनती अपने पति से की, अब भी वक्त है मान जाओ। चुप उधार का पैसा क्या तेरा बाप देगा। अपने व्यसनों की पूर्ति के लिए , उधार की पूर्ति हेतु उसके पति ने उसे ही दांव पर लगा दिया । ट्रेन ने सीटी दी महुआ का मन धडक़ने लगा आंखें थी कि छलकी जा रही थी, पहले कोचिया, फिर सामान, उसका पति अब उसकी बारी थी ट्रेन में बैठने की। यह क्या ट्रेन चल पड़ी एक सेकण्ड के हजारवें हिस्से से भी कम समय में महुआ ने निर्णय ले ही लिया। पति और कोचिया चीखते गये ट्रेन आगे बढ़ती गई और महुआ पीछे बदहवास अपने गांव की ओर दौड़ती ही जा रही थी। खेतों के बीच चुपचाप खड़ी होकर खेत के कीचड़ से स्वयं अपने माथे पर तिलक लगा कर पंक लेपन का त्यौहार मना ही लिया। हाथों में, पैरों पर, गले, बांह, गाल पूरे शरीर पर सौंधे कीचड़ में खुद को सान कर उन रोपा लगाने वाले श्रमिकों की भीड़ में महुआ खो गई।