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Tuesday 21 Nov 2017

एक अनकही कहानी


शर्मिला बोहरा जालान
6, रीचि रोड
 कोलकाता-700019
मो. 09433855014
प्रिय स्नेहा,
वर्षों से मन में एक बात रह आई थी। वर्षों-वर्षों से। किसे कहूं और कैसे? न कहूं तो शरीर के साथ यह बात चली जाएगी और मेरी आत्मा उन्मुक्त नहीं हो पाएगी। भारीपन लिए मैं कैसे मरूं? रोग ने मुझे चारों तरफ से घेर लिया है। फेफड़े का कैंसर। मेरा शरीर साथ छोडऩे वाला है सो मन हुआ पत्र द्वारा यह बात तुम्हें कहूं।
तुम मेरी कई संतानों में से एक संतान हो मेरा अंश। तुम पर अगाध विश्वास। कई बार तुम्हें मैंने कहना चाहा पर तुम ‘अनकहा’ ही रहने देना चाहती रही। पर, स्नेहा मैं अनकहा दर्द लेकर संसार से जाना नहीं चाहती। तुम्हारे सभी भाई बहन में मुझे लगा तुम्हें मुझे यह सब कहना है, पर तुम उन वर्षों छोटी थी, मासूम बच्ची। निश्छल। पवित्र। तुम निश्छल हो इसलिए ही तुम्हें बताना, तुमसे साझा करना चाहती थी। तुम्हारे वयस्क होने का इंतजार करती रही। यह इंतजार भारी नहीं लगा। इस दौरान वह बातें जो मुझमें थी उसने अपना रूप ग्रहण किया। अपना रूप-रंग, आकार-स्वाद, स्पर्श। विकास हुआ उस अनकहे दर्द का। और जितने-जितने साल गुजरते गए उतनी ही विकलता से उसे तुमसे साझा करने के लिए मन में तूफान उठता रहा। वह दिन आया जब तुम पूरी वयस्कता के साथ मेरे सामने अपने पूर्ण सौंदर्य में महकती बैठी हुई थी। तुमसे मैंने स्वयं को पाया।
कैसा खिलता-खुलता रूप। अंग-अंग से प्रफुल्लता झलकती। मोहक रूप। मैं हैरान रह गई तुम्हें देख कर। लोग जब कहते तुम मां पर गई हो, मैं इंतजार करती उस क्षण का जब मैं तुममें स्वयं को देख पाऊं। ओह, स्नेहा बीस वर्ष की उम्र में आज पहली बार जब मैंने तुम्हारे पूर्ण सौन्दर्य को देखा तो अभिभूत हो गई और मर मिटी।
मैं क्या ऐसी ही लगती रही थी। रोम-रोम में प्रसन्नता। अंग-अंग महक रहा हो जैसे। जबकि मैं कई बच्चों की मां थी उन दिनों। और तुम भी तो थी दो वर्ष की। पर मातृत्व ने मेरे सौन्दर्य को बढ़ा दिया था। और स्नेहा मैं एक पक्षी एक बोलने चहकने वाली पक्षी और ‘वे’ एक आकाश।
वे आकाश की तरह पसर गए थे मेरे मन में। उनका क्या नाम था यह बताना जरूरी नहीं। वह कहां से आए और कहां चले गए यह बताना अनावश्यक है।
पर ‘वे’ थे मेरे मन और आत्मा पर छाए। एक तरफ तुम्हारे पिता। पूर्ण रूप से समर्पित। स्नेह करने वाले दूसरे तरफ ‘वे’।
मुझे नहीं पता था मुझे क्या हो रहा था पर मेरा रोम-रोम तुम्हारे पिता से हट उनकी तरफ बह चला था।
कई बच्चों का दायित्व, घर के ढेरों काम। तुम्हारे दादी, दादा का पहरा। सब कुछ था। तमाम बाड़े। तमाम घेरे। पर मन उसे कौन रोक सका है भला।
मन तो उन्मुक्त था। वह तुम्हारी बड़ी दीदी को पढ़ाने आते। ईश्वर ने भी मुझे जीवन जीने की छूट दी। स्पेस। निजी स्पेस। कोई नहीं होता उस दौरान। ऐसी रुढि़वादी व्यवस्था। पर उन क्षणों को मैंने जिया है।
मैंने इस परिवार की तन से मन से सेवा की है। अपने आकांक्षाओं और इच्छाओं को जाने बगैर। पर मुझमें चाहना थी और मैं आकाश में उड़ रही थी पक्षी बन। नदी की कल-कल, झरने के स्वर मुझमें बजने लगे थे। कोई इकतारा बज रहा हो। मैं उमड़ रही थी नदी की तरह। मेरा रोम-रोम जग गया था। खुल रहा था, खिल रहा था। मैं पत्तों की सरसराहट सुनती। मैं आकाश में फैले घुमड़ते बादलों में डूबती। मैं ढलते सूरज को पकडऩे दौड़ पड़ती। मेरी आत्मा मुझे ले जाती उस परम की ओर। जहां से सूरज निकलता था। जहां ईश्वर रहता था। जहां से अंधेरा छंटता था। जहां रहते थे ‘वे’ मेरे संबल। जहां ईश्वर की करुणा बरसती थी। जहां रहती थी मैं।
स्नेहा पहली बार मैंने स्वयं से प्रश्न किया मैं कौन हूं? मैं शरीर नहीं हूं। मेरा शरीर मुझसे छूट रहा है। आज मेरा शरीर... मेरे संबल छूट रहे हैं। मेरे आंसू रुक नहीं रहे। मुझे तुच्छताओं से क्षुद्रताओं से जिसने बचाया वह ईश्वर। स्नेहा, सुनो
मुझे सुनो।
मुझे मुक्त करो।
मुझे मोक्ष दो।
स्नेहा, उन दिनों आकाश उस उड़ान से था जो मेरी अपनी थी।
नैसर्गिक
निरावरण
जैसे आकाश मुझे खुद में व्यापतता लग रहा। उन पलों को मैंने जिया।
शिशु बन। बाहर की दुनिया को भूलकर स्नेहा यह जो आकाश है न
असीम है
जिसमें हम खो जाएं
अपने को भूल जाएं
अपने को भूल जाएं। उस पल में।
उन्मुक्त हो मैं देख रही थी स्वयं को।
तैरते पक्षी सी मैं।
बही जा रही थी।
घुल रही थी हमारी सांसें।
होंठ पर होंठ।
मन पसर रहा था। तन भी।
वे बांहें फैलाए और मैं लता सी लिपटी।
मेरे अंदर एक संसार पसर रहा था। गहरा होता जा रहा था। खुद को भूले। दुनियावी दायित्व को बिसरा मैं उनकी हो बह रही थी।
पर तुम्हारी दादी। अदृश्य आंखें थीं उनके पास।
आंखों के अंदर आंखें।
कुछ महीनों बाद उन्होंने मुझसे कहा। तुम्हारी बड़ी दीदी अपने आप पढ़ेगी। वे नहीं आएंगे। मैं आकाश से नीचे गिरी। जैसी पक्षी चाल भूल गया  हो। पंख उसका साथ नहीं दे रहे। वह लड़ रहा था आंखों से, पर पंख भारी हो गए हों। गोल-गोल चक्कर लगाता वह नीचे और नीचे और नीचे गिरता ही जा रहा।
मुझसे मेरा आकाश छिन गया। मैं तैरना भूल गई। दादी ने करुणा भरी आंखों से देखा।
मैं महीनों बीमार रही।
आज भी हूं। एक उम्र में तुम्हारे मन में तुम्हारी आंखों में मैंने प्रश्न देखा?
तुममें क्रोध भी देखा।
ना जाने कैसे दादी सी अदृश्य आंखें तुम्हारे पास भी थीं। पर तुमने कभी कुछ नहीं पूछा।
स्नेहा, तुम मुझमें हो और मैं तुममें।
तुम और मैं।
मैं और तुम।
अलग नहीं। सो सुनो।
मेरा निजी एकांत। स्पेस, मैंने उन पलों को जिया है। अनुभूति के स्तर पर।
स्नेहा, मेरी बच्ची क्या तुम बता सकती हो मैं कौन हूं।
क्या तुम बता सकती हो तुम कौन हो?
दुनियावी रिश्तों नातों के नाम से अलग।
स्नेहा, यह जो बाहरी संसार है न, यहां बहुत शोर है, कोलाहल, इससे मन विरक्त होता है। नरक लगती है यह दुनिया। पर भीतर आत्मा में आनंद ही आनंद। अनिर्वचनीय आनंद।
स्नेहा, ऐसे स्नेहिल पिता फिर क्यों?
क्यों बही? नहीं जानती, पिता व्यवस्था में थे। पति बनकर रह गए। उनके क्रोध और उनके उस निर्जीव संसार ने जो दायित्व से लदा नीरस सा था, मुझे बहने दिया। मैं बही और उसने मुझे विकलता दी। तृप्ति भी।
पर स्नेहा, यह पत्र तुम्हारे लिए। तुम्हारे मेरे बीच में कुछ ‘अनकहा’ न रहे। मेरी आत्मा भारी रहती अगर नहीं कहती।
मुझे मुक्ति दो, मुझे मोक्ष दो, हे ईश्वर।
मेरी स्नेहा... मुझे समझना। मेरा शरीर मेरा साथ नहीं दे रहा है।
तुम्हारी मां
प्रेम लता।