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Wednesday 22 Nov 2017

प्रो. शिवशंकर राय : आत्मीयता का वैभव

कांतिकुमार जैन

5, विद्यापुरम, मकरोनिया सागर470004 (म.प्र.)
मो. 9098571616
राय साहब की प्रतिक्रिया से एक क्षण के लिए मैं हतवाक् हो गया, निश्चेष्ट। लगभग निष्प्राण।
बी.ए. का मेरा परीक्षाफल आ चुका था 22 जून 1952 को। उन दिनों सागर विश्वविद्यालय के सत्रारंभ, परीक्षा प्रारंभ और परीक्षाफल की तिथियां पूर्व घोषित हुआ करती थीं। मुझे अपने परीक्षाफल की सूचना गर्मी की छुट्टियों के दौरान अपने गृह नगर अंबिकापुर में मिली। तार राय साहब का था। तार पिता जी को मिला था। वे तार से कुछ समझ नहीं पाये थे कि मामला क्या है। उन्होंने मुझसे पूछा था कि भैया, तुम्हारे नाम से तार आया है, मैंने तार का लिफाफा खोलकर पढ़ तो लिया है पर कुछ समझ में नहीं आया। तार उन दिनों लिफाफे में बंद आया करते थे। तार में लिखा था- ए•ा युजअल एट द टॉप विदाऊट ए पैरेलल।
मैं समझ गया, तार के नीचे किसी का नाम नहीं था पर यह भाषा, यह शैली सागर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के मेरे गुरु शिवशंकर राय की थी। मेरी उपलब्धियों पर उनकी गहरी नजर रहा करती थी। परीक्षा में हर पर्चे के खत्म होने के बाद कैंपस स्थित परीक्षा केन्द्र ऑडीटोरियम के बाहर यह जानने के लिए कि मेरा पेपर कैसा हुआ है, वे खड़े रहते थे। मेरे चेहरे के हावभाव से उन्हें पता चल जाता था कि उस पर्चे में मुझे लगभग कितने अंक मिलेंगे। एक तरह से हाथ देखकर भविष्य बताने वाले ज्योतिषी जैसा कमाल। उनकी भविष्यवाणी विश्वविद्यालय द्वारा परीक्षाफल के रूप में सत्य सिद्ध हुई होगी और यह तार। राय साहब ने मुझे मेरा परीक्षाफल सूचित किया था- ‘‘हमेशा की तरह प्रथम श्रेणी, प्रथम स्थान भी।’’ पिताजी सागर विश्वविद्यालय के मेरे हर अध्यापक को जानते थे, वे लगभग सभी अध्यापकों से मिल भी चुके थे। राय साहब से तो विगत चार वर्षों में कई बार।
सात जुलाई से विश्वविद्यालय प्रारंभ हो रहा था। मैं पांच जुलाई को ही वहां पहुंच गया। एक दिन अपने मित्र शिवकुमार श्रीवास्तव की धर्मशाला में रहा। शिवकुमार श्रीवास्तव का सदर स्थित घर मित्रों की धर्मशाला के रूप में विख्यात था। शिवकुमार श्रीवास्तव अविवाहित थे और अपने अविवाहित भाई कृष्णकुमार के साथ सदर में रह करते थे। कोई भी मित्र आता तो उनके घर यानी मित्रों की धर्मशाला में टिकता। सात को छात्रावास प्रभारी धगट साहब से कहकर मैंने उसी बैरक वही कमरा आबंटित करवा लिया जिसमें मैं पिछले साल था। शाम को मैं राय साहब के यहां पहुंचा। मुझे देखते ही सभी चिल्लाए- कान्ति भाई साहब आ गए। सभी यानी राय साहब के बड़े पुत्र रवीन्द्र, मझले यानी नीलू, छोटे अवनीन्द्र और बेटी मोनिका। दीदी भी आ गई। बोलीं, सर तुम्हारी ही बाट देख रहे थे। राय साहब आए, मैंने उनके चरण स्पर्श किए। सर, मुझे आपका तार मिल गया था। मैंने पिताजी से भी बात कर ली है। कल मैं एम.ए. में प्रवेश के लिए कितने बजे विभाग आ जाऊं? राय साहब ने बिना पलक झपकाए कहा था- कान्तिकुमार, पर मैं तुम्हें फिलासफी में प्रवेश नहीं दूंगा। राय साहब की बात सुनकर मैं धक से रह गया। हतवाक्, निश्चेष्ट। लगभग निष्प्राण।
मुझमें इतनी भी शक्ति नहीं थी कि मैं राय साहब से पुछूं- सर, क्यों? उन्होंने मेरा मलिन मुख देखा- बोले, तुम्हारी मनस्थिति मैं समझता हूं पर कान्ति, सोचो, दो साल बाद तुम्हारा क्या होगा? तुम्हें एम.ए. में भी सदैव की भांति प्रथम श्रेणी मिलेगी, तुम टॉप भी करोगे। पर दर्शनशास्त्र में फिलहाल पांच छह वर्षों तक, मेरी निगाह में तुम्हारे लायक कोई नौकरी नहीं है। वहां खंडवा में नीलकंठेश्वर कॉलेज में शिवशंकर मेहता हैं,जबलपुर के राबर्टसन कॉलेज में शिवप्रसाद खरे, सागर में कोई नई पोस्ट निकलने वाली नहीं है। और कहीं फिलासफी है नहीं। एम.ए. करने के बाद पता नहीं तुम्हें कब तक बेकार बैठना पड़े। काम्पीटीटिव एग्जाम कब हों, पता नहीं। मैं तुम्हारा संघर्ष जानता हूं, तुम्हारा स्वाभिमान भी। तुमने अपनी पढ़ाई के लिए पिताजी से एक भी पैसा नहीं लिया। एम.ए के बाद तुम्हें अविलंब अच्छी नौकरी चाहिए होगी।
तत: किम। राय साहब द्वारा दर्शन शास्त्र विभाग में मेरे प्रवेश पर आत्मीयता का अवरोधक लगा देने के बाद अब क्या? पहिले इतिहास में, फिर हिन्दी में। अंतत: हिन्दी में। वहां आचार्य नंददुलारे वाजपेयी अध्यक्ष थे- मेरे परम हितैषी, वही जिनके लिए मैं 1948 में बैकुंठपुर से सागर आया था। हिन्दी में मुझे जैसा कि राय साहब ने भविष्यवाणी कर रखी थी, प्रथम श्रेणी मिली, प्रथम स्थान भी। मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा विभाग में हिन्दी के व्याख्याताओं के लिए साक्षात्कार हुए- उसमें भी मैं प्रथम ही रहा। सागर विश्वविद्यालय में मेरी नियुक्ति 1956 में ही हो गई थी। पर शोध सहायक के रूप में 250 रुपए के निश्चित वेतन पर। उस पद का वेतन और शर्तें मुझे स्वीकार नहीं थी। मैं सागर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर के रूप में आया तो पर वनवास की अपनी अवधि काटने के बाद 1978 में। 1956 में जब सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी व्याख्याताओं के साक्षात्कार होने वाले थे, राय साहब का मुझे एक पत्र मिला था- 14.7.56 का लिखा हुआ। राय साहब ने लिखा था-
प्रिय कान्तिकुमार,
तुम्हारा बहुत आत्मीय पत्र, उसने मुझे अवसादग्रस्त कर दिया है। मुझे पता नहीं था कि तुम भी इतने मूडी और निराश हो सकते हो। मैंने आज ही तुम्हारे गुरु जी से बात की है। तुम्हारे लिए बहुत वे आशा से भरे हुए हैं। पर तुम्हारे विभाग की नियुक्तियों को लेकर उलझनें भी कम नहीं हैं, निश्चयपूर्वक कुछ भी कहना संभव नहीं है। जब तक मैं यहां हूं, तुम्हारे लिए कुछ भी उठा नहीं रखूंगा। आज ही अंचल यहां आए थे। मैं नहीं जानता कि उनके भाई की यहां क्या संभावनाएं हैं। मैं जानता हूं कि यहां अपने भाई की नियुक्ति को लेकर वे क्या कुछ नहीं करेंगे। तुम्हें प्रतियोगिता से बाहर करना ही उनका एकमात्र लक्ष्य है। कान्ति, तुम जानते हो कि ऐसे मामलों में लोग क्या-क्या नहीं करते। वाजपेयी भी किसी और का समर्थन करने के पहिले तुम्हारा समर्थन करेंगे। शिवकुमार भी तुम्हारे लिए उतने ही चिंतित है जितना मैं। तुम यहां एक दिन के लिए आ क्यों नहीं जाते? 16.7 को यहां सब कुछ तय हो जाएगा।
तुम्हारा-
शिवशंकर राय
16 जुलाई। 16 जुलाई 56 को मैं मध्यप्रदेश की राजकीय उच्च सेवा के अंतर्गत विज्ञान महाविद्यालय नागपुर में व्याख्याता के पद पर अपना कार्यभार ग्रहण कर चुका था। मैं सागर नहीं आया। मैं अपने गुरु जी को जानता था। वे मेधावी छात्रों के प्रति बहुत वत्सल थे किन्तु ऐन वक्त पर उनके घुटने पेट की तरफ मुड़ जाते थे। वाजपेयी जी का स्नेह मेरे प्रति कम नहीं था, किन्तु स्वजातियों के प्रति उनका प्रेम मुझसे कहीं ज्यादा था। यदि कोई तिवारी, कोई शुक्ला, कोई झा, कोई ज्योतिषी क्षेत्र में है तो कोई कितना भी मेधावी हो सब बेकार।
राय साहब जैसा छात्र वत्सल अध्यापक मैंने दूसरा नहीं देखा। यह आत्मीयता केवल मेरे लिए ही नहीं, सभी ईमानदार, स्वाभिमानी, संघर्षरत, मेधावी छात्रों के लिए थी- फिर चाहे वे शिवकुमार हों, चाहे कृष्णकुमार। केशव नंदन सिन्हा, हनुमान वर्मा या सविता शेखरधर शर्मा। एस.पी. खरे या एस.एस. मेहता कोई भी इस आत्मीयता के वृत्त से बाहर नहीं था। मेरे प्रति राय साहब अतिरिक्त स्नेहपूर्ण थे। 5 जुलाई 1952 को राय साहब ने मेरे प्रति जो निर्ममता प्रकट की थी, वह मैं आज तक भूल नहींपाता।
राय साहब से मेरी भेंट एक हादसे के कारण हुई। उसे मैं हादसा न कहूं तो क्या कहूं। 1948 में मैं सागर आया था। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी से हिन्दी पढऩे के लिए। पिताजी बैकुंठपुर से मेरे साथ आए थे, मैं तब तक अकेला घर से बाहर निकला नहीं था। छात्रावास में मुझे प्रवेश मिल गया था। पहिली ही कतार की पहिली बैरक में। वह लंबी वाली बैरक कहलाती। मेरा कमरा पहिला ही था। कमरे में सामान-वामान जमा कर शाम को मैं यों ही बैठा था एकाकी, उदास और घर की याद में डुबा हुआ कि कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। मुझे जानने वाला यहां कौन है? मैंने कमरे का दरवाजा खोला तो एक सूटबूटधारी युवा को देखा। उसका माथा कुछ ज्यादा ही चौड़ा था- चेहरे पर एक कठोर अधिकारी भाव भी मुझे दिखा- मैंने कहा, आइये पर वे कमरे में आये नहीं। बोले- आप नये आए हैं? मैं सचमुच नया था- उनको नहीं जानता था। उन्होंने इसे मेरी हिमाकत समझा। जल्दी ही जान जाएंगे। मैं आपका बैरक सुप्रिटेंडेट हूं। नाम भी बताया- दिनेश पंड्या। फिजिक्स में लेक्चरार हूं। उनके सारे व्यवहार में फिजिक्स का रूखापन और शुष्कता। वे अपनी श्रेष्ठता बताने के लिए व्यग्र थे। बोले- कहां से आए हैं? कोरिया से। स्कूल में ‘‘बिखरी पड़ी जहां पर शोभा अपार भारी। हम कोरिया पुजारी है कोरिया हमारी’’ का राज्यगीत हमने स्कूल में इतनी बार गाया था कि मैं कोरिया के साथ एकाकार सा हो गया था। वे भिड़ गए, बोले-आप मजाक करते हैं। कोई मुझसे मजाक करे, मैं पसंद नहीं करता। आपके न तो फीचर्स कोरिया के लोगों जैसे हैं, न बोलचाल। मैं समझ गया वे मुझे जापान के पास वाले कोरिया का समझ रहे थे। मैंने उनको सुधारने की कोशिश की पर वे घोड़े पर सवार थे- आप मुझे बना रहे हैं- मैं कोरिया, बैकुंठपुर का लडक़ा उनको क्या बनाता। मैं तो अपने अकेलेपन से भयभीत था। मैंने हिम्मत की। सर, आपको कुछ गलतफहमी हुई है। मैं जापान वाली कोरिया से नहीं, छत्तीसगढ़ वाली कोरिया रियासत से आया हूं। अपनी गलती पकड़ी जाने से वे आक्रामक थे- मैंने आप जैसे लौंडे बहुत देखे हैं। मैं आपका सारा कोरियापन भुला दूंगा। मैं सन्न था। मैं सागर पढऩे आया था, अपना कोरियापन भूलने नहीं। उस रात मुझे नींद नहीं आई। मैं कोरिया को जितना भूलने की कोशिश  करता, कोरिया मुझे उतना ही याद आता रहा। सबेरे जब छात्रावास प्रभारी का कार्यालय खुला तो मैं सीधे उनके पास गया। लगभग रुआंसे स्वर में कहा- मेरी बैरक बदल दीजिए। मैं उस बैरक में नहीं रहूंगा। धगट साहब भले आदमी थे, उन्होंने कल रात का सारा वाकया सुना- बोले, आप चिन्ता न करें। मैं, राय साहब से बोल दूंगा। वे आपको अपनी बैरक में ले लेंगे।’’
मैं दोपहर जब राय साहब से मिला तो मुझे यह नहीं बताना पड़ा कि मैं कोरिया से आया हूं। वे खुद ही बोले- आप कोरिया के हैं न। वही कोरिया न जिसके राजकुमार लोग इलाहाबाद में पढ़ते हैं। जिनके पास नीली गाड़ी है, कोरिया 2, ई.एस.ए.। मैं कोरिया की गाथा सुनता रहा। कोरिया का होने के कारण राय साहब मुझे अपना मान रहे हैं। मुझे भी वे अपने लगे। मैंने उन्हें मन ही मन अपना मान लिया। हम कोरिया पुजारी हैं कोरिया हमारी। वो पासबां हमारा, वो संतरी हमारा।
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राय साहब जब भी कक्षा में आते, उनकी जेब में दो फाउंटेन पेन होते। एक शेफर्स का जिससे वे हाजरी लेते या स्वयं लिखते। दूसरा छात्रों के लिए। कोई छात्र पेन लाना भूल गया है या उसके पेन की स्याही खत्म हो गई है या उसका पेन चल नहीं रहा है, पेन को झटके पर झटके दिए जा रहे हैं पर बेअसर। राय साहब दूसरा पेन अपनी जेब से निकालते हैं और उसे दे रहे हैं। यह दूसरा पेन काफी मोटा मुटक्कड़ा होता था, कैमल इंक की छोटी शीशी की पूरी की पूरी स्याही उसमें समा जाती। कक्षा समाप्त होने पर वह छात्र राय साहब को वापिस देना नहीं भूलता। रखकर वह करता भी क्या? वैसा पेन पूरे विश्वविद्यालय में किसी के पास नहीं था। पेन रखने वाला गुरुद्रोह का पातकी माना जाता।
राय साहब कक्षा में घूम-घूम कर पढ़ाते थे। उन दिनों सागर विश्वविद्यालय के शिक्षण विभाग के अच्छे अध्यापक होने का एक ही प्रमाण था- वह कक्षा में कैसे पढ़ाता है- यदि वह घूम-घूम कर पढ़ाता है तो उसे 100 में 100 नंबर। खड़े होकर पढ़ाने वाले अध्यापक भी अच्छे माने जाते। बैठकर पढ़ाने वाले अध्यापकों के बारे में हमारी राय अच्छी नहीं थी। अंग्रेजी के स्वामी नाथन साहब घूम-घूमकर पढ़ाते। राय साहब भी मोबाइल थे- अपने समय से बहुत आगे। 45 मिनट के पीरियड में वे कक्षा के 10-15 चक्कर तो लगा ही लेते। कक्षा यदि गैरेज में हुई तो चंक्रमण में आसानी होती, चारों ओर से घिरे, एक दरवाजे वाले कमरे में हुई तो चक्कर कम हो जाते। इन कमरों में डेस्क सटे-सटे होते और फर्नीचर से टकराए बिना घूमना थोड़ा कठिन होता। उन दिनों टाई बांधकर कक्षा में आने वाले अध्यापक कम ही थे। अधिकांश पेंट, शर्ट में आते। हिन्दी के पंडित जी लोग धोती, कुर्ता, धोती अचकन में। शेरवानियां भी थीं पर कम। अंग्रेजी के दत्ता साहब न कोट पहिनते, न शेरवानी, शांतिपुरी धोती, रेशम का कुर्ता। ऊपर पशमीने का शाल। बाद में दर्शन विभाग में जब शिवजीवन भट्टाचार्य और रासबिहारी दास आए तो दोनों बंगाली ढंग की धोती, ढीला कुर्ता और शाल पहनते थे। शेव हफ्ते में दो एक बार करते हों तो करते हों! दोनों न जूते पहिनते, न चप्पलें। खड़ाऊं भी कभी-कभी ही। शिवजीवन मोशाय को तो हम लोग बौद्ध भिक्षु ही कहते। दर्शनशास्त्र विभाग में एक दुग्वेकर साहब भी थे- महाराष्ट्रियन। मराठी ढंग की धोती, ऊपर काला कोट। राय साहब का कोट खुले गले का होता, गाढ़े कत्थई रंग का। पेंट वस्र्टेड का। बड़े सुदर्शन, बीच से मांग काढ़ते। काले फ्रेम का चश्मा। आवाज खूब खुली हुई, एकदम साफ। कक्षा में चक्रमण करते हुए हर विद्यार्थी पर उनकी न•ार होती। आज सैमुअल अलेक्जेंडर निकोडिमस डिडक्टिव ला•िाक की क्लास में नहीं आए। राय साहब ने यह अनुपस्थिति नोट कर ली है। सैमुअल कल भी नहीं आया, परसों भी। नरसों वह आया। कक्षा में चंक्रमण का पहिला चक्कर पूरा कर जब वे कक्षा में प्रवेश द्वार पर आए तो उन्हें जैसे एक आवश्यक कर्तव्य याद हो आया। वे अध्यापक की कुर्सी के पास थमेंगे, कुर्सी के पीछे खड़े हो जाएंगे, कुर्सी को दोनों हाथों से कस कर पकड़ेंगे। कहेंगे सैमुअल अलेक्जेंडर निकोडिमस, तुम तीन दिनों से कक्षा में नहीं आए। पढ़ाने में मेरा मन नहीं लगा, चिंता होती रही कि कहीं तुम बीमार तो नहीं पड़ गए। कहीं तुम किसी दुर्घटना में तो नहीं फंस गये। सैमुअल अलेक्जेंडर निकोडिमस हक्का-बक्का बैठे हैं। जीवन में उन्हें इतनी महत्ता आज तक किसी ने नहीं दी। वह कनवर्टेड क्रिश्चियन हैं। आदिवासी। घुंघराले बाल, चौड़ी नाक, काला रंग, ठिंगना कद। आज उसका कद बढ़ गया है। पास के किसी गांव से साइकिल पर पढऩे आता। हम सब उसके नाम का मजाक उड़ाते, उसे चिढ़ाते। बेचारा बुझा-बुझा रहता। सैमुअल अलेक्जेंडर हिप्पोपोटेमस। राय साहब उस दलित द्राक्षा को संरक्षण प्रदान कर रहे हैं, उसकी अनुपस्थिति को महत्ता प्रदान कर रहे हैं। उसके कद को अपनी आत्मीयता की ऊंची एड़ी वाला जूता पहिना रहे हैं। कहीं तुम्हारे पिता तो अस्वस्थ नहीं हो गए हैं। सैमुअल सहसा कक्षा के सर्वाधिक महत्वपूर्ण छात्र हो गए हैं। राय साहब को उसका पूरा नाम याद है। निकोडिमस। अब किसी की क्या मजाल जो उसे हिप्पोपोटेमस कह सके। यदि राय साहब को पता चल गया तो। राय साहब हर विद्यार्थी को उसके फस्र्ट नेम से पुकारते हैं चाहे वह फस्र्ट इयर का ही विद्यार्थी क्यों न हो।
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हमारी इंटरमीडियेट की तर्कशास्त्र की कक्षाएं पुस्तकालय की लंबी बैरक के बाद वाली बैरक में लगतीं। बी.ए. और एम.ए. दर्शनशास्त्र की कक्षाएं हिन्दी विभाग के अध्यापकों के कक्ष के बाद वाली बैरक में। यह ओल्ड साइड की बात है। 1952 की । राय साहब पढ़ा रहे हैं। अंग्रेजी में। मेटाफिजिक्स। घूम-घूम कर। सहसा उन्हें एक विद्यार्थी संकेत लिपि में दरवाजे के बाहर की उपस्थिति से अंगुलि के इशारों से बात करता लगा। वह दाहिने हाथ की चारों अंगुलियां वक्ष की ओर मोड़ता फिर संकेतिका से बाहर विद्यमान उपस्थिति से वर्जना रूप उसे हिलाता। एक बार-दो बार। कक्षा में राय साहब को किसी प्रकार का व्यवधान पसंद नहीं। कक्षा में बैठे विद्यार्थी से उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे चक्रमण करते हुए द्वार तक आए, एक झटके में। कक्षा के बाहर से हमें उनकी आवाज सुनाई पड़ रही है- यू आर एन एस, युओर फादर वाज ए डंकी एंड यूओर प्रोजिनी विल बी म्यूल्स। फिर थोड़ा रुककर एंड म्यूल्स डोंट प्रोकियेट, एक सांस में कक्षा में विघ्न डालने वाले को निवेश होने का अभिशाप। बाहर खड़े हॉकी के खिलाड़ी किशोर को भागने की राह नहीं मिल रही है। वे प्रोकियेट और म्यूल्स का अर्थ तो नहीं समझ पा रहे हैं पर इतना तो समझ ही गए कि राय साहब को उनका विघ्नारोपण पसंद नहीं आया है। उसके बाद वे राय साहब के सामने पडऩे से बचने लगे। राय साहब की गालियां खाकर भी किशोर बेमजा नहीं हुए। फिर भविष्य में राय साहब की क्या, किसी भी कक्षा में बहिरंग इशारेबाजी से उन्होंने तौबा कर लिया। राय साहब के उस दिन के गर्दभाभिषेक से किशोर सचमुच वयस्क हो गए। पर अपनी किशोरवय की अंतिम गधापचीसी उन्हें आज तक याद है।
राय साहब को प्रत्येक विद्यार्थी को एक विशेषण से, एक वाक्य से परिभाषित करने की कला आती थी। दिलीप सिंह हैं- सरदार। बी.ए. दर्शन शास्त्र के विद्यार्थी। सिविल लाइंस में रहते। पूरी सजधज के साथ विश्वविद्यालय आते। उनका साफा नारंगी होता, कमीज पीली, पैंट आसमानी, टाई हरी। मोजे शायद बैंगनी। हम लोगों ने बचपन में इन्द्रधनुष के रंगों को याद करने के लिए एक सूत्र बनाया था- बैआनीहपी नाला। यदि दिलीप बचपन में हमारे साथ होता तो हमें सूत्र बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। हम लोग रोज दिलीप की आउटफिट की चेकिंग करते, कहते-यार, तेरे आउट फिट में आज लाल रंग नहीं है। कल दिलीप अपने शर्ट की जेब में लाल रंग का रूमाल खोंसकर आएंगे। राय साहब दिलीप को क्रड्डद्बठ्ठड्ढश2 ङ्खड्डद्यद्मद्बठ्ठद्द शठ्ठ ह्लद्धद्ग ह्यह्लह्म्द्गद्गह्ल कहते। मेरे लिए उनकी परिभाषा थी ड्डह्य ह्लद्धद्बठ्ठ ड्डह्य ड्ड ह्म्ड्डद्बद्य2ड्ड4 द्यद्बठ्ठद्ग केशवनंदन सिन्हा बहुत बोलता- वह राय साहब के लिए ष्टद्धड्डह्लह्लद्गह्म् क्चश3 था। उसका एक पैर अपने दूसरे पैर से थोड़ा बड़ा था- कभी-कभी वे उसे तैमूरलंग भी कहते। दर्शन शास्त्र में एम.ए. करने के पहिले राय साहब ने अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया था। दार्शनिक प्रतिपत्तियों को जब वे काव्यात्मक अंग्रेजी में व्यक्त करते तो हमें उसे दुबारा घर में पढऩे की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। वह हमें याद हो जाती और याद रही आती। यह नहीं कि हम लोगों ने राय साहब के लिए कोई निकनेम बनाया ही न हो- हर्ट बाइ शटलकाक। उनके लिए पूरा का पूरा छंद भी हमारे बीच प्रचलित था-
बुक्स टू राइट ऑफ हिम
बुक्स टू लेफ्ट ऑफ हिम
बुक्स इन फ्रंट ऑफ हिम
बालीड एंड थंडर्ड
हमारे पाठ्यक्रम में एक कविता की- चार्ज ऑफ द लाइट ब्रिगेड। उसके प्रारंभिक शब्दों के स्थान पर हम लोगों ने केवल क्चशशद्मह्य कर दिया था। और अंतिम देम के स्थान पर हिम। उनका घर क्या था- पुस्तकों का विकीर्ण आलय ही था। जहां देखो वहां किताबें। यदि सोफे पर बैठना हो तो आपको अपने लिए जगह बनानी पड़ेगी। यदि तख्त पर बैठना है तो किताबों को उठाकर तख्त पर ही दूसरी किताबों के ऊपर उन्हें रखना पड़ेगा। वे ग्रंथालय के प्रभारी आचार्य थे। यदि हमें समाचार पत्रों से किसी नई पुस्तक की सूचना मिलती तो हम राय साहब से कहते, सर, फलां पुस्तक पढऩे की इच्छा है। वे विश्वविद्यालय की ओल्ड साइट की किताबों के मालिक बतरा साहब से कहते, हफ्तेभर में किताब आ जाती। कभी-कभी राय साहब के चहेते पढ़ाकू विद्यार्थी उनके घर से ही पुस्तक पढऩे के लिए ले जाते। किताब पर कवर जरूर चढ़ा लेना, पुस्तक के कान मत ऐंठना। जिम्मेदारी की बात।
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रजनीश से सबसे पहिले मैं राय साहब के यहां ही मिला था। रजनीश तब न आचार्य बने थे, न भगवान का विरुद ही उन्होंने अपने नाम के पहिले जोड़ा था, ओशो के गंगासागर तक पहुंचने में अभी काफी देर थी। अभी वे जबलपुर के हितकारिणी महाविद्यालय में इंटरमीडियेट के छात्र थे। 1950 में। उस समय जबलपुर में कोई विश्वविद्यालय नहीं था, वहां के सारे महाविद्यालय सागर विश्वविद्यालय से संबद्ध थे। कोई अंतरमहाविद्यालयीन वाद-विवाद प्रतियोगिता होती तो जबलपुर, नरसिंहपुर, खंडवा, मंडला के छात्र सागर आते। रजनीश चंद्रमोहन जैन भी 1950 में एक अंतरमहाविद्यालीयन प्रतियोगिता में भाग लेने जबलपुर से सागर आए थे। दुबले, पतले, छरहरे, लंबा कुर्ता, ढीली धोती, बाटा की चप्पलें, नकिया कर बोलते। मुझे याद है सागर विश्वविद्यालय के छात्रावास के सभागार में सम्पन्न उस प्रतियोगिता में जबलपुर से आए रजनीश ने अपने वक्तव्य में बार-बार यह दुहराया था कि इंसान खो गया है। वे इ•ा वा•ा बिका•ा नहीं बोल पाते थे- बोलते इज वाज बिकाज। हम लोग उनके नकियाने और इ•ा वा•ा बिका•ा की गाज गिराने पर बहुत हंसे थे पर हमारे हंसने से क्या? राजा जिसको चाहे वही सुहागिन। उस प्रतियोगिता में जो निर्णायक मंडल था, उसमें सभी सागर विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों के अध्यापक थे, अपने अपने महाविद्यालय के प्रतिभागी के साथ आए थे। उनमें से एक का नाम मुझे याद है- जयनारायण पाण्डेय, रायपुर के दुर्गा महाविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक। हम लोगों ने उनके निर्णय को सागर विश्वविद्यालय, यू.टी.डी. के विरुद्ध उनका पूर्वग्रह माना। हमारे शिक्षण विभाग के एम.ए. के अंग्रेजी के छात्र कृष्णकुमार श्रीवास्तव को दूसरा स्थान दिया गया। कृष्णकुमार बहुत अच्छे वक्ता थे, वे उसी वर्ष हजारीबाग से आए थे। मेरे परम प्रगाढ़ मित्र। हम दोनों ंजयनारायण पांडेय को कोसते हुए और रजनीश के नकियाने की नकल उतारते हुए राय साहब के यहां पहुंचे थे। राय साहब बेहद लोकप्रिय अध्यापक थे, बेहद निष्पक्ष, बेहद सम्मान्य। एक प्रकार से हम छात्रों की लोक अदालत। सर, देखिए, जिसको ठीक से इंसान खो गया है, बोलना नहीं आता, जो इ•ा वा•ा को भी बुंदेली ढंग से बोलता है- उसको फस्र्ट पोजीशन। हम यह अन्याय बर्दाश्त नहीं करेंगे। हम जब राय साहब के क्वार्टर में पहुंचे तब तक हमारी ज्वालामुखी का लावा निकलना बंद नहीं हुआ था। राय साहब के यहां नकियाने वाले, इज वाज की गाज गिराने वाले रजनीश को देखा तो हम दोनों को आश्चर्य हुआ। वहां राय साहब और रजनीश के बीच गुरु गंभीर संवाद चल रहा था। गुरुजी पूछ रहे थे- आपने अब तक किन-किन दार्शनिकों को पढ़ा है? उस छोकरे ने बिना पलकें फडक़ाए कहा था- प्लेटो से बट्रेण्ड रसेल तक सबको। अब यह तो ऊंची हांकने जैसी बात हुई न! राय साहब ने उस ढेर से हाल में ही आई एक किताब खींची बट्रेण्ड रसेल की ‘आन हैपीनेस’ किताब रजनीश को दी। कहा विवाह पर रसेल के विचारों से आप कहां तक सहमत हैं। छोकरे रजनीश ने किताब के पन्ने पलटे। वह पेज निकाला जिसमें रसेल ने ‘मैं वैवाहिक जीवन के पक्ष में नहीं हूं’ कहा था। उस छोकरे का आत्मविश्वास और बर्टेण्ड रसेल को कठघरे में खड़ा करने की उसकी जुर्रत देखकर हम लोग दंग थे। राय साहब को भी विश्वास नहीं हो रहा था। हथेली पर रखे आंवले को कैसे झुठलाया जाए। न मैंने राय साहब और रजनीश के बीच चल रहे संवाद में कोई भाग लिया, न ही कृष्णकुमार ने। धीरे-धीरे रजनीश के नकियाने और इज वाज बिकाज की गाज गिराने को हम लोगों ने स्वीकार कर लिया। उस दिन रजनीश के प्रथम आने को भी हम लोगों ने स्वीकार कर लिया। बाद में रजनीश हितकारिणी महाविद्यालय से बी.ए. करने के बाद सागर आ गए और राय साहब के विद्यार्थी हो गए, सागर विश्वविद्यालय को जिन कारणों से समूचे विश्व में जाना जाता है, उनमें से एक रजनीश भी हैं। रजनीश ने अपने जीवनी परक वक्तव्यों में अपने जिन गुरुओं का नाम सम्मानपूर्वक लिया है, उनमें राय साहब अनन्य हैं।
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हम दोनों रीवा जाने की तैयारी कर रहे थे। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. कमला प्रसाद ने ‘कविता और मिथक’ विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था। उन्होंने प्रगतिकामियों को तो आमंत्रित किया ही था, मित्रता के चलते सागर से मुझे और शिवकुमार श्रीवास्तव को भी बुलाया था। आप लोगों को आना ही है। इस रेखांकित आग्रह के साथ। इतने में इलाहाबाद से राय साहब का एक कार्ड आया- प्रिय कान्ति, तुम्हें इन दिनों मैं बहुत याद कर रहा हूं। आ जाओ। ठीक ऐसा ही एक कार्ड शिवकुमार श्रीवास्तव को भी मिला था। उसमें आग्रह था कान्तिकुमार को भी लेते आओ। न कारण, न कोई प्रसंग। बस आ जाओ। गुरु जी तो ऐसे कभी लिखते नहीं। उधर से शिवकुमार जी का टेलीफोन आया, इधर से मैंने उनसे बात की। तय हुआ कि बस से चलेंगे, रीवा में कमला कामरेड की गोष्ठी में भाग लेंगे और वहां से बस से इलाहाबाद। गोष्ठी हो चुकने पर हम लोग रीवा के बस स्टैण्ड पर थे। वहां हमें हिन्दी के अध्यापक और साहित्यकार अजित कुमार दिखे। गोष्ठी में भाग लेकर वे दिल्ली की बस पकडऩे आए थे। हमें देखा तो पास आए। पर ये बस तो सागर नहीं जाती। हां, यह इलाहाबाद जाती है- हम लोग इलाहाबाद जा रहे हैं। उन्हें गुरु जी के पोस्ट कार्ड की बात बताई। आ जाओ। पर इसमें न तो कोई कारण बताया है, न ही कोई प्रसंग। हमने कहा कि आ जाओ से बड़ा कारण और प्रसंग क्या हो सकता है? वे बड़े चकित। आप लोग बड़े अजीब हैं, आपके गुरुदेव भी कम नहीं। आ जाओ, यह भी कोई कारण हुआ पर हम लोग अजित कुमार जी को क्या समझाते, वे शायद समझते भी नहीं। जब हमारी बस चलने को हुई तो बड़ी मृदुता से उन्होंने कहा- आप लोगों की यात्रा के कारण और परिणाम जानने की उत्सुकता रहेगी। हम लोग जब इलाहाबाद पहुंचे तो दिन के दो बजे होंगे। कुंभ के दिन। जहां देखो, वहां मोक्षार्थियों के ठट्ट। होटलों, लाजों, धरमशालाओं, सरायों में कहीं कोई ठिकाना नहीं। एक भोजनालय में बिना भूख के भोजन किया- हम लोग सामान यहीं छोड़े जा रहे हैं शाम को उठा लेंगे। भोजनालय का स्वामी भला आदमी था- उन दिनों आतंकवादियों का कोई खतरा नहीं था। हमने सामान वहीं छोड़ा और गुरुद्वारे की ओर चले- 192, एलेनगंज। हम लोग पहिले भी एलेनगंज आ चुके थे- मकान ढूंढने में कोई दिक्कत नहीं हुई। बाहर बरांडे में दीदी मिली। हम लोग श्रीमती राय को दीदी कहते थे। उन जैसी ममतालु और वत्सल महिला मैंने आज तक दूसरी नहीं देखी। कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। दीदी ने बस इतना ही कहा- अच्छा हुआ, तुम दोनों आ गये। सर, तुम दोनों को इन दिनों बहुत याद कर रहे हैं। फिर सहसा चुप्पी। शब्दों में क्या कहें और कितना कहें- शब्द मन की चिंता और व्यग्रता को ठीक-ठीक व्यक्त नहीं करते। अपने होठों के आगे उन्होंने दाहिने हाथ की अंगुलियां घुमाई। फिर दाहिने हाथ की संकेतिका होठों पर रखीं। इस संकेत का अर्थ न मैं समझा, न शिवकुमार जी। हम दोनों बरांडे पर पड़े लंबे सोफे पर बैठ गए, बिना कुछ बोले- नि:शब्द, उदास और आशंकित। इतने में राय साहब आए- वे भी सोफे पर बैठ गए, बिना कुछ बोले- हम दोनों के बीच में। पहिले उन्होंने शिवकुमार जी की ओर देखा और अपनी दाहिनी हथेली उनकी ओर बढ़ा दी। शिवकुमार जी ने उनकी हथेली थामी और धीरे-धीरे राय साहब की खुली हथेली को अपने दोनों हाथों से सहलाने लगे। फिर राय साहब ने मेरी ओर देखा- बिना कुछ बोले अपनी बायीं हथेली मेरी ओर बढ़ाई। मैंने भी गुरुजी की बायीं हथेली थामी और अपनी दोनों हथेलियों से उसे सहलाने लगा- सोफे पर हम तीनों चुप बैठे हुए हैं- कोई कुछ नहीं बोल रहा है- सहसा राय साहब की आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। उन आंसुओं में इतनी ममता, इतना विश्वास, इतनी कृतज्ञता थी कि कुछ भी बोलना संभव नहीं था। 10-15 मिनट ऐसे ही बीते होंगे कि राय साहब के होंठ हिले- वे कुछ बोल रहे थे अस्फुट स्वरों में। फिर जब कुछ नार्मल हुए तो सुना- कह रहे थे मैं जानता था कि तुम लोग आओगे। मेरा संदेश मिले और तुम लोग न आओ- यह संभव ही नहीं था। दीदी अभी तक यवनिका के पीछे खड़ी थीं, वे अब मंच पर आईं- बोली, सर 15 दिनों से कुछ बोल ही नहीं रहे थे- बस शून्य में ताकते रहते। जैसे उनकी वाक् शक्ति समाप्त हो गई हो। आज इतनों दिनों बाद पहिली बार वे कुछ बोले हैं। भइया, अच्छा हुआ तुम लोग आ गये। मैं तो डर गई थी।
बस फिर तो सब कुछ सामान्य- कैसे आए, सामान कहां है, कब तक रुकोगे। किट्टू कैसे हैं और साधना। किट्टू शिवकुमार जी के छोटे भाई और साधना मेरी पत्नी। भीतर से राय साहब के दूसरे बेटे नीलू की पत्नी चाय लेकर आईं। दीदी वहीं खड़ी थीं- दरवाजे पर एक हाथ टिकाये। राय साहब बोले जा रहे थे- ठीक वैसे ही जैसे वे सागर में अपने क्वार्टर में हम लोगों से बोला करते थे। उनकी आंखों के आंसू अब तक सूख गए थे- वहां एक दीप्ति, एक स्निग्धता और एक तृप्ति थी।
हम लोग शाम को इलाहाबाद से सागर वापिस लौट आए। कुंभ की भीड़ में न ट्रेन का टिकट मिला, न बस में जगह। बस स्टैण्ड पर सहसा किसी की आवाज आई- प्यारे भाई। प्यारे भाई यानी शिवकुमार श्रीवास्तव। बस का कंडक्टर कह रहा था- प्यारे भाई, गंगा नहाने आए थे क्या? चलिये मेरी बस सागर जा रही है। जगह तो बिल्कुल नहीं है पर मेरी सीट पर आप दोनों की जगह निकल आएगी। शिवकुमार जी सागर बस कंडक्टर यूनियन के अध्यक्ष थे। सागर के सभी बस कंडक्टरों के चहेते। उनके प्यारे भाई। हां प्यारे भाई, हम लोग गंगा स्नान के लिए ही आए थे। हमारा कुंभ स्नान पूरा हुआ। कुंभ स्नान तो पूरा हुआ पर मेरे मन में एक फांस थी जो मुझे बेचैन कर रही थी। शिवकुमार जी भी कम बेचैन नहीं थे। यह क्या चीज थी जो हमारे गुरु को इस कदर परेशान कर रही थी? ऐसा हतवाक्, ऐसा निश्चेष्ट, ऐसा अनमना तो हमने उन्हें सागर में कभी देखा ही नहीं था। उस समय तो नहीं पर बाद में पता चला कि उन्होंने जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी वह उनके जीवन में, इलाहाबाद में घटित हुआ। कृतघ्नता। राय साहब का एक छात्र था। सविता। जब राय साहब सागर से इलाहाबाद जा रहे थे तब वह भी उनके साथ गया था। वहीं आपके साथ अपना शोधकार्य पूरा करूंगा। कुछ दिन तो सब कुछ ठीक रहा, सागर जैसा ही। पर धीरे-धीरे इलाहाबाद की विभागीय राजनीति ने सविता को डस लिया। राय साहब अभी विभागीय अध्यक्ष नहींहुए थे। एक महिला अध्यक्ष थीं। विभागीय तदर्थ नियुक्ति के सारे अधिकार अभी उन्हीं के पास थे- सविता उनके साथ हो लिये- राय साहब के घनघोर विरोधी हो गये। ब्लो, ब्लो दाऊ विंटर विंड, दाऊ आर्ट नाट सो अनकाइंड एज मेंस इन्ग्रेटीट्यूड। इस कृतघ्नता ने राय साहब को तोड़ दिया। क्या जीवन में जो कुछ भी किया, वह सब व्यर्थ था। शायद हां, शायद नहीं। देखते हैं शिवकुमार और कान्तिकुमार को लिखते हैं। पता चल जाएगा। पता चला, उन्होंने जो कुछ भी किया था, वह व्यर्थ नहीं था- सभी सविता नहीं होते। कम से कम उन दिनों सागर में तो नहीं ही थे। अब हो गए हैं। मनुष्य की प्रकृति।
जब मैंने कुछ दिनों बाद अजित कुमार जी को अपनी इलाहाबाद यात्रा का वृत्तांत दूरभाष पर सुनाया तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। आज भी ऐसे गुरु और ऐसे शिष्य हो सकते हैं, विश्वास नहीं होता। पर अजित कुमार जी, इसमें अविश्वसनीय क्या है? आप भी हम लोगों के साथ उन दिनों सागर, विश्वविद्यालय की बैरकों में रहे होते तो आपको भी न आश्चर्य होता, न अविश्वास। पर दिल्ली या इलाहाबाद तो सागर नहीं है, सागर भी कभी वैसा ही हो जाएगा, जैसे दिल्ली या इलाहाबाद हैं, तो कोई क्या कर लेगा। पर 1956 तक सागर, सागर था, आत्मीयता के वैभव से समृद्ध और आप्लावित। कृतघ्नता आज जैसी सामान्य, सर्वग्रासी और सर्वोपरि लगती है वैसी उन दिनों नहीं थी। मैंने राय साहब के अनुभव से एक बात सीखी, कृतघ्नता से पराभूत मत अनुभव करो, कुछ होते हैं जो प्रकृत्या कृतघ्न होते हैं पर सभी तो ऐसे नहीं होते।