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Monday 21 May 2018

फरवरी अंक में प्रस्तावना में ललित जी ने हिंदी के मानक शब्दकोशों के बारे में अपना चिंतन और चिंता व्यक्त की है।

प्रो.भगवानदास जैन,  अहमदाबाद.

फरवरी अंक में प्रस्तावना में ललित जी ने हिंदी के मानक शब्दकोशों के बारे में अपना चिंतन और चिंता व्यक्त की है। आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी के हवाले से आपका यह असंतोष जायज भी है। सामान्यत: लोक में व्यवहृत अंग्रेजी  एवं अन्यान्य विदेशी भाषाओं के शब्दों की उपेक्षा भाषा के स्वाभाविक विकास और उसकी गति-प्रगति को नकारने के समान है। निश्चय ही आज बकौल आपके किसी ऐसे परिवद्र्धित, सर्वग्राही एवं सहज-सुलभ शब्दकोश की हिन्दी जगत में महती आवश्यकता है जो लोक व्यवहार में प्रचलित देशी-विदेशी भाषाओं के शब्दों से सुसमृद्ध हो। विरासत के अंतर्गत श्री श्यामसुंदर दास का आलेख हिन्दी शब्द सागर : प्रथम संस्करण की भूमिका ऐतिहासिक दृषिट से महत्वपूर्ण है। साक्षात्कार में युवा कवयित्री बाबुषा कोहली के हिन्दी के नवलेखन विषयक विचार स्वागतेय हैं। उनकी सहजता भा गई। कहींकोई कृत्रिमता या बड़बोलापन दृषिटगत नहींहोता। भवानीप्रसाद मिश्र पर वंदना अवस्थी दुबे का संस्मरण मर्मस्पर्शी है। उपसंहार में कृष्णा सोबती पर सर्वमित्रा जी की संक्षिप्त व सार्थक टिप्पणी पढ़ी। पुन:पाठ में सोबतीजी की कहानी सिक्का बदल गया पर पल्लव जी के विचार पढक़र उस कहानी को फिर से पढ़ा। शाहनी के ममतापूर्ण व्यक्तित्व के संस्पर्श और कृष्णा सोबती द्वारा चित्रित विभाजनकालीन भयावह त्रासदी के स्मरण मात्र से आंदोलित हो उठा। सोबती जी शतायु हों यही कामना है।