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Friday 24 Nov 2017

अप्रैल-16 अंक में कई रचनाएं और आलेख ध्यान आकर्षित करने वाले हैं।

 

डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया
ए-7, फारचून पार्क, जी-3, गुलमोहर, भोपाल (म.प्र.:) 462033

अप्रैल-16 अंक में कई रचनाएं और आलेख ध्यान आकर्षित करने वाले हैं। विशेषकर महेन्द्र राजा जैन का ‘वर्धा हिन्दी शब्दकोश’ से संबंधित समीक्षात्मक पत्र। मैं इस पत्र को पाठकों के लिए उपयोगी उपकार मानता हूं, जिससे उस शीर्षस्थ संस्था द्वारा प्रकाशित शब्दकोश की कमियां एवं विसंगतियां सामने आ सकीं। जिसकी आपने पिछली प्रस्तावना में प्रशंसात्मक चर्चा की थी। आपने श्री जैन के पत्र के बारे में यह लिखा कि इससे पाठकों के बीच बहस छिड़ेगी। इस संदर्भ में यह भी विचारणीय है कि क्या यह ‘कीमती’ शब्दकोश सबके पास सहज उपलब्ध है? यहां भोपाल में ही इसकी संस्थाओं में इक्का-दुक्का जगह होने की चर्चा है। जब बड़े शहर का यह हाल है तो छोटी जगह के पाठकों की कल्पना की जा सकती है। दूसरा क्या श्री जैन का यह पत्र अथवा ‘अक्षर पर्व’ का यह अंक सर्वत्र उपलब्ध होगा? जब ‘जनसत्ता’ जैसा अखबार रायपुर जैसी प्रादेशिक राजधानी में उपलब्ध नहीं है। (जैसा कि लिखा है) तब ‘अक्षर पर्व’ सब जगह कैसे उपलब्ध होगा? दिल्ली, इलाहाबाद की बराबरी अन्य स्थानों से नहीं की जा सकती। ‘कोष’ की उपलब्धता के बिना पाठकों के मध्य प्रभूत चर्चा संभव नही ंहै जो जरूरी है क्योंकि प्रसंग महत्वपूर्ण है। चर्चा होनी  ही चाहिए। विशद चर्चा।  अब अंक की दूसरी बातें। अंक में सारंग उपाध्याय का स्व. प्रेमशंकर रघुवंशी संबंधी संस्मरण पढक़र मन भर आया। रघुवंशी जी का मेरा भी कई वर्षों से आत्मीय संबंध रहा है। वे अपनी तरोताजा रचनाएं मुझे प्राय: फोन पर देर तक सुनाते थे। प्रतिक्रिया चाहते थे। राजगढ़ (ब्यावरा) कॉलेज में हिन्दी विभाग में मेरे सहयोगी थे। समर्थ रचनाकार और मस्त स्वभाव।  श्री उपाध्याय ने कई प्रसंगों को जीवंत कर दिया।
इस अंक की सभी कविताएं उच्च स्तर की तथा भाषिक शब्दजाल से मुक्त विद्यमान जीवन को पूरी सहजता से मुखरित करती हैं। कहानियां भी काल्पनिकता से मुक्त यथार्थ से जुड़ी हैं। ‘के.पी. सक्सेना दूसरे’ तो मेरे सुपरिचित हैं।
सर्वमित्रा जी ने ठीक लिखा कि ‘इसकी जय, उसकी जय’ की बात को बहस का मुद्दा बनाना निरर्थक है। इससे किसी समस्या का हल तो होने से रहा, वातावरण अवश्य खराब होगा।