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Tuesday 21 Nov 2017

किसी भी धर्म-ग्रंथ में कट्टरता नहीं है


उषा वैरागकर आठले
सहा. प्राध्या. हिन्दी
किरोडीमल..शास. महाविद्यालय,
रायगढ़ (छ.ग.)
उ.1 धर्मतत्ववाद (फंडामेंटलिज्म) और आतंकवाद में गहरा संबंध है। जो लोग धर्म की वर्णवादी, रंगभेदी, वर्गवादी व्यवस्था को अपने वर्चस्व का आधार बनाना चाहते हैं, वे धर्म के अनेक नियमों और रूढि़-परम्पराओं को वर्तमान समय में भी लागू करने की घोषणा करते हैं। वे इन्हें अपने सत्ता-वर्चस्व-प्राप्ति के लिए ढाल बना लेते हैं। वे प्रगतिशील विचारों, मतों और चिंतन का विरोध करते हैं। भौतिक विकास के साथ समानता, भाईचारा और स्वतंत्रता पर विश्वास करने वाले समाज के कुछ अंग इनके वर्चस्व को अस्वीकार करते हैं, उन्हें चुनौती देते हैं और उनके धर्मतत्ववाद के मुखौटे के पीछे अंतर्निहित स्वार्थों को उघाडऩे लगते हैं। ऐसे समय में ऐसे धार्मिक कट्टरपंथी क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए आतंक फैलाने लगते हैं। वे अपनी आतंकवादी कार्यवाहियों के माध्यम से विश्व में ‘आतंकी हीरो’ के रूप में छा कर अपनी धाक जमाना चाहते हैं। धर्मतत्ववाद का फायदा अनेक लोगों को होता है। राजनीतिक तानाशाही, धार्मिक वर्चस्व, समाज को अनेक टुकड़ों में बांटकर उन पर हुकूमत करने की लालसा आतंकवाद को प्रोत्साहन देती है।
उ. 2    वैश्विक राजनीति और आतंकवाद का रिश्ता वैश्वीकरण के साथ-साथ दृढ़ हुआ है। विकसित देशों द्वारा, खासकर अमेरिका द्वारा पूरे विश्व के बाज़ार को अपनी मु_ी में रखने के प्रयासों ने प्रचलित जीवन-मूल्यों के साथ पारम्परिक अर्थव्यवस्था और राजनीति को नकारा। परिणामस्वरूप जो उथलपुथल मची और अपेक्षाकृत पिछड़े हुए समाज अपने धर्म की अतार्किक सर्वश्रेष्ठता का इज़हार करते हुए आक्रामक हुए और अन्यधर्मियों पर आतंकवादी हमलों के माध्यम से  हावी होने की कोशिश करने लगे। परस्पर नफरत की ज्वाला से मामला जटिल हो गया और इसमें संचार माध्यमों ने अतिरिक्त सक्रियता दिखाकर आग में घी झोंकने का काम किया।
उ.3    ऐसी बात नहीं है कि वाम राजनीति में धार्मिक कट्टरता और धर्म के उदार मानवीय रूप पर कोई चर्चा नहीं हुई। हाँ, यह ज़रूर है कि इसको मुख्य एजेंडा बनाकर स्पष्ट रूप से काम नहीं किया जा सका। मुझे असगर अली इंजीनियर का एक भाषण याद है, जिसमें उन्होंने कुरान की अनेक आयतें पढ़ते हुए उनमें मौजूद धर्म के उदार स्वरूप को रेखांकित किया था। वे यह काम बड़े पैमाने पर कर रहे थे। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में धार्मिक कट्टरता और धर्म के उदार मानवीय रूप पर चर्चा का अभियान छेड़े जाने की वाकई बहुत ज़रूरत है। धर्म और कठमुल्लेपन के बीच की सीमा-रेखा स्पष्ट किये जाने की आवश्यकता है।
उ.4    विश्व के किसी भी धर्म-ग्रंथ में कट्टरता नहीं है और न ही इसके लिए ईश्वरीय आदेश है। कट्टरता वाली बातें बिचौलियों या धर्म के ठेकेदारों ने बाद में अपने स्वार्थ के लिए जोड़ी हैं। हरेक धर्म का उदय मानव मात्र को आदर्श के रास्ते पर चलने के उपदेशों के साथ हुआ है। मराठी विचारक डॉ. रावसाहेब कसबे ने सभी धर्मों के उदय एवं इतिहास पर प्रकाश डालते हुए अनेक संदर्भ दिये हैं, जो धर्म के स्वरूप को तोड़मरोड़ कर वर्चस्व से जोडऩे के लिए किये जाने वाले प्रयासों को उजागर करते हैं। इस तरह के प्रयास न केवल लेखन के माध्यम से बल्कि अनेक संचार माध्यमों की मदद से किये जाने की आवश्यकता है अन्यथा संचार माध्यम तो अनेक बाबाओं और मिथकीय कथाओं को और भी चमत्कारिक बनाकर प्रस्तुत करने के बाज़ारवादी खेल में अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।
उ.5    जहाँ-जहाँ धर्म के सारतत्व को रूढि़वादिता से जोड़ा जा रहा है, वहां-वहां धर्म-ग्रंथों से मूल उद्धरण देकर इसका खंडन किया जाना चाहिए। मूल समस्या तो यह है कि धर्मग्रंथों का विस्तृत एवं गहराई से अध्ययन कौन करे? जो करता है, वह समाज को उसी काल में ले जाना चाहता है, उसके लिए समय का विकास उसी काल में ठहर गया है। धर्म का मानवशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय अध्ययन करने वालों को उसके प्रगतिशील आयामों पर चर्चा करनी चाहिए। हरेक धर्म का सारतत्व मनुष्य को मनुष्योचित आचरण की ओर प्रेरित करना ही रहा है।
उ. 6    आईएस तो आतंकवाद के माध्यम से अपने को प्रस्थापित करने में लगा हुआ है ही, परंतु वह अकेला नहीं है। अन्य धर्मों में भी अनेक छोटे-बड़े आईएसनुमा संस्करण कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे हैं। अत: विरोध सिर्फ आईएस का ही नहीं होना चाहिए, अन्य उग्रवादी साम्प्रदायिक शक्तियों की भी उतनी ही वस्तुनिष्ठता के साथ समीक्षा होनी चाहिए। आईएस विश्व आतंकवाद का अगुवा हो गया है और बाकी धर्मों के कट्टरवादी संगठन उसके समकक्ष बढऩे की होड़ में लग गये हैं। भारत में तो कट्टरवाद अनेक शक्लों में अपना कुरूप चेहरा जगह-जगह पर प्रदर्शित कर रहा है। कोई एक धर्म नहीं, सभी धर्मों में अतिवादी-उग्रवादी-आतंकवादी गुट पनप रहे हैं। चिंता की बात यह है कि उन्हें अपराध-जगत और राजनीतिक जगत से पूरा प्रोत्साहन-संरक्षण मिल रहा है।
उ.7    जी नहीं, आतंकवाद को केवल कठोर नीतियों से खत्म नहीं किया जा सकता। नीतियाँ और योजनाएँ तो नित नई-नई बन रही हैं, परंतु उनका क्रियान्वयन कहाँ हो रहा है? जो मशीनरी नीति-नियमों को लागू करने के लिए अधिकृत और जवाबदेह होती है, कई बार उसका ही आचरण संदिग्ध हो उठता है। अपने राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक स्वार्थ के लिए आतंकियों को संरक्षण एवं बढ़ावा दिये जाने का नतीजा हमारा देश भुगतता रहा है। नीतियों के कठोर क्रियान्वयन की इच्छाशक्ति पर अगर राजनीतिक भाई-भतीजावाद, वोटों की राजनीति की अंधी दौड़ और अकूत धन-सम्पत्ति की लालसा हावी न हो पाए तो आज भी अनेक प्रशासनिक अधिकारी-कर्मचारी हैं, जो ईमानदार हैं परंतु उन्हें दंडित करने की परम्परा चल निकली है अत: सिर्फ कठोर नीतियाँ बनाना हाथ में लालीपॉप थमाना है।
उ.8    असहिष्णुता बनाम वैचारिक स्वतंत्रता का प्रश्न सापेक्ष है। जिस समाज में हरेक व्यक्ति को वैचारिक आज़ादी प्राप्त होती है, वह सहिष्णु हो सकता है। परंतु जब कोई एक विचार/राजनीतिक दल/सम्प्रदाय पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर अपने मत/विचार/नियम दूसरों पर थोपने लगते हैं और अन्य लोगों की स्वतंत्रता का हनन करते हैं तो समाज में असहिष्णुता का विकास होता है। उदाहरण के लिए - स्त्रियों के साथ होनेवाले बलात्कार को लेकर अनेक पुरुष उनके द्वारा पहने जाने वाले परिधानों को जिम्मेदार ठहराते हैं, मोबाइल संस्कृति को जिम्मेदार ठहराकर स्त्रियों पर प्रतिबंध लगाने की बात करते हैं तो स्त्रियों का असहिष्णु होना स्वाभाविक है। अगर कोई पुरुष कम कपड़े पहने हुए घूमता है तो क्या उसे बलात्कार का शिकार होना पड़ता है? क्या इसमें स्वतंत्रता का दोहरा मापदंड नहीं है? यही बात धर्म-सम्प्रदाय के साथ भी लागू होती है। एक धर्म अपनी अतिवादी गतिविधियों को जायज़ ठहराकर दूसरे धर्म के अतिवादियों को आतंकवादी कहता है परंतु अपने अतिवादियों को महान मानता है। यह विचारों का दोहरापन है। धर्मनिरपेक्षता और सर्वधर्मसमभाव में गफलत के कारण यह समस्या पैदा हुई है। जहां तक अस्मिता का प्रश्न है, यह अस्मिता जातिवाद, सम्प्रदायवाद, लिंगवाद, धर्मवाद - पता नहीं किन-किन वादों से घिर गई है! यह वैचारिक एकाधिकार का भी संघर्ष है, जिसे वैचारिक आतंकवाद भी कहा जा सकता है। वैचारिक असमानता दिखते ही उसके साथ हिंसा करने की स्थितियाँ निरंतर सामने आ रही हैं। यह तानाशाही की ओर ले जाने के खतरे का संकेत है। अस्मिता का संघर्ष तब सामने आता है, जब अस्तित्व समाप्त होने का खतरा दिखाई देता है। यह बात किसी वैचारिक समूह, धार्मिक समूह या अन्य प्रकार के समूह पर भी लागू होती है। लोकतंत्र के मूल तत्व - स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे पर यह प्रवृत्ति कुठाराघात कर रही है, यह चिंता की बात है।
उ.9    इसे राजनीतिक सिद्धांतों में कठमुल्लापन कहा जाए या सत्तालिप्सा तथा धनलिप्सा के कारण सभी हदें पार कर जाना, सत्ता के गुरूर में भरकर ‘हम कहें और करें सो कायदा’ वाली बात कठमुल्लेपन से दो हाथ आगे है। मुझे लगता है कि अब राजनीतिक सिद्धांतों को समझने और उन पर चलने वाले लोग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। जिस तरह धर्म का सारतत्व समझने वाले लोग अत्यल्प हैं, कर्मकांड और रूढिय़ों की लीक पीटने वाले ज़्यादा, उसी तरह राजनीतिक सिद्धांतों की बात भी बेमानी हो गई है, स्वस्थ राजनीतिक मूल्यों का खात्मा हो गया है। परस्पर ‘कीचड़-उछालू’ राजनीति सर्वत्र छा गई है। ऐसे माहौल में कोई राजनीतिक सिद्धांतों की बात करता है तो वह नक्कारखाने में तूती की आवाज़ जैसी साबित होती है। यह आतंकवादी गतिविधियों का ही एक रूप है। जिस तरह आतंकवाद किसी नियम-कानून को नहीं मानता, अपने एकपक्षीय रास्ते को ही अंतिम सामाजिक यथार्थ मानकर चलता है, उसी तरह राजनीतिक सिद्धांतहीनता भी अपना प्रतिसंसार रचकर अन्य विचारों/दलों/गुटों को कुचलने को जायज़ ठहराने की कोशिश करती है।
उ.10    कठमुल्लापन बुद्धिजीवियों को अपना शत्रु मानता है क्योंकि बुद्धिजीवी के पास तर्क और ज्ञान है और वह कठमुल्लों द्वारा फैलाई अफवाहों का पर्दाफाश करता है, समाज को सामाजिक यथार्थ से रूबरू कराता है, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को खोलकर सामने रख सकता है इसीलिए बुद्धिजीवियों को ही खारिज करने की कोशिशें तेज़ हो रही हैं। छद्म बुद्धिजीवियों को अग्रिम पंक्ति में बैठाने का अभियान जोर-शोर से हो रहा है।