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Monday 20 Nov 2017

धर्म का सारतत्व मनुष्य को मनुष्य समझने में है

 

तेजिन्दर

डी-1/302, वी.आई.पी. करिश्मा कांपलेक्स, रेलवे क्रासिंग के पास खमारडीह, विधानसभा मार्ग,
रायपुर- 492007 (छत्तीसगढ़)
उ.1  भारतीय उपमहाद्वीप के संदर्भ में देखें तो धर्मत्वाद और आतंकवाद का रिश्ता काफी गहरा है । यह खतरनाक भी है क्योंकि यह ऊपर से उस रूप में दिखाई नहीं पड़ता जिस रूप में भीतर अपनी जड़ों में गहरे तक धंसा है। सांप्रदायिकता ही धीरे-धीरे आतंकवाद में परिवर्तित होती जा रही है, ऐसा हम स्पष्ट रूप से देख पा रहे हैं । दरअसल सांप्रदायिक सोच आतंकवाद का पहला चरण है। अपने धर्म और अपनी आस्था के प्रति श्रेष्ठताबोध सिर्फ  श्रेष्ठ होने का दंभ ही नहीं होता बल्कि दूसरों को एक तरह की हेय दृष्टि के साथ देखना भी होता है। धीरे-धीरे यही बात दूसरे के प्रति इस कदर असहिष्णु बनाती है कि यह घृणा उग्र रूप धारण करती चलती है। हम दूसरे किसी के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करना चाहते और अपने श्रेष्ठताबोध की जड़ता में अमानवीय होते चले जाते हैं, निरंकुश होते चले जाते हैं। फंडामेंटिलिज़्म का अर्थ मेरी दृष्टि में पीछे की ओर चलना है और न केवल अकेले बल्कि पूरे समाज को अपने साथ पीछे की ओर लेकर चलने का प्रयास करता है चाहे इस के लिये निरंकुशता की किसी भी हद तक क्यों न जाना पड़े। यही निरंकुशता अंतत: आतंकवाद की जननी बनती है और मनुष्य को क्रूर एवं हिंसक बनाती है ।
उ 2 वैश्विक राजनीति और आतंकवाद का रिश्ता दरअसल पूंजी तय करती है। पिछले दो दशकों में विशेष रूप से इस सारे खेल की कमान पंूजी के हाथों में है। चाहे वह भारतीय उप-महाद्वीप हो, मध्य-पूर्व एशिया हो अथवा यूरोप और अमेरिका हर जगह पंूजीवाद ने अपने कालिख सने हाथों से अपने निशान छोड़े हैं। तेल की राजनीति भी इस के पीछे है। अपना रास्ता बनाने के लिये पूंजीवाद को अगर आतंक का सहारा भी लेना पड़े तो उसे किसी तरह का गुरेज नहीं होता और पिछले वर्षों में यही किया गया है चाहे वह सीरिया का संकट हो या अन्य मध्य-पूर्व देशों का। पूंजीवाद अपने मूल व्यवहार में अमानवीय होता है इसलिये हज़ारों-लाखों बेगुनाह भोले-भाले मनुष्यों के संकट का उस के लिये कोई अर्थ नहीं होता। किसी तरह दुनिया के तमाम प्राकृतिक संसाधनों पर काबिज़ हो जाना उसका चरम उद्देश्य होता है। इस के लिये वह वैश्विक राजनीति को प्रभावित करता है और आतंकवाद का इस्तेमाल अपने लिये एक साधन के रूप में करता है। इस  तरह की राजनीति सब से पहला काम लोकतंत्र का गला घोंटने का काम करती है। वैश्विक राजनीति का एकांगी होना एकपक्षीय होना आज की विश्व राजनीति के लिये सब से बड़ा अभिशाप है।
उ.3  मेरी स्पष्ट राय में - नहीं । ऐसी कोई गलती वाम दलों ने नहीं की और यही कारण है कि आज भी वाम दलों की विश्वसनीयता समाज के एक खास वर्ग में बरकरार है। धर्म का उदार मानवीय रूप पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से विकृत हुआ है। लगभग हर प्रमुख धर्म के पुरोहित स्वयं को उदार घोषित करते हुए अन्य धर्मों के प्रति अधिक असहिष्णु हुए हैं । दरअसल समाज का एक बड़ा तबका वामपंथियों की अग्रगामी सोच के साथ तालमेल नहीं बैठा सका । माक्र्स का यह लोकप्रिय कथन कि ‘‘धर्म अफीम की तरह है’’, इसे काफी सपाट और उथले ढंग से समझने की कोशिश की गई और वामपंथियों पर गलत आरोप मढ़े गये। वामपंथियों से अगर कोई चूक हुई तो सिर्फ  इतनी कि वे कृषि आधारित समाज और भारतीय मध्य वर्ग के बीच एक तरह का सार्थक संवाद स्थापित नहीं कर सके। उनकी सीमाएं भी थीं। इधर मीडिया का चरित्र और आकार और व्यवहार बहुत तेज़ी के साथ बदला जिस के बीच अपना स्थान बनाने का काम वामपंथ के लिये बहुत बड़ी चुनौती थी। यह काम उन से हो नहीं सका। धर्म के कथित उदार मानवीय रूप की चर्चा न करना ही श्रेयस्कर है क्योंकि धर्म का ऐसा कोई उदार स्वरूप है नहीं ।
उ.4  मुझे सोचना पड़ रहा है कि ‘‘धार्मिक ग्रंथों की कट्टरता’’, क्या यह एक उचित शब्द है? हर धार्मिक गं्रथ में एक विशिष्ट जीवन शैली जीने की बात कही गई है और ईश्वर जो कि अमूर्त अथवा मूर्त कुछ भी हो सकता है उस के प्रति एक तरह की आस्था प्रकट करने के लिये कुछ नियम-कायदे बनाये गये हैं, जिनका आज इक्कीसवीं सदी के पूर्वाद्र्ध में मुझे तो कोई अर्थ समझ में नहीं आता। धर्म मनुष्य के शोषण का सब से आसान तरीका है। दरअसल मनुष्य जीवन की विराटता से बहुत भय खाता है और इस भय से बचने के लिये उस ने ईश्वर की परिकल्पना की और उस का सहारा लिया। धार्मिक ग्रंथ मनुष्य को ईश्वर की उपासना का छलावा भर देते हैं। धार्मिक गं्रथ अपने आप में जितने कट्टर हैं नहीं उस से ज़्यादा उनके अनुनायियों, मौलवियों, पंडितों, पादरियों और ग्रंथियों ने उन्हें बताया है। जितना क्लिष्ट इन ग्रंथों को ये लोग बनायेंगे उतनी ही उन की दुकानदारी जन समान्य के बीच चलेगी। उपाय तो यही है कि सामान्य जन के बीच एक तरह की वैज्ञानिक और सामाजिक समझ और चेतना पैदा की जाये। वामपंथी और समाजवादी कार्यकर्ता यह काम बखूबी कर सकते हैं ।
उ.5 इससे मुक्ति तो सामाजिक एवं राजनैतिक चेतना से ही संभव होगी। दरअसल धर्म के सम्मुख लोकतंत्र और सेक्यूलर ताकतों को मज़बूत करने की ज़रूरत है। धर्म का सारतत्व क्या है? यह हमें समझना होगा। धर्म का सारतत्व मनुष्य को मनुष्य समझने में है - हिंदू या मुसलमान, सिक्ख या ईसाई समझने में नहीं । जो मेरे मज़हब को मानते हैं वे मनुष्य हैं और दूसरे मज़हब को मानने वाले मनुष्य ही नहीं हैं - यह धारणा बहुत खतरनाक है। दुर्भाग्य से ऐसा हो रहा है। इस से मुक्ति तभी संभव है जब धर्म के कठमुल्लाओं से समाज को मुक्ति दिलवाई जा सके। अगर तुम नमाज़ अदा करते हो तो मैं मंदिर में जा कर आरती करता हूं। यह सिर्फ  हमारी आस्था का फर्क है। हमारी पूजा के तरीके का फर्क है। इस से हमारी मनुष्यता पर किसी तरह का फर्क नहीं पड़ता। हम दोनों एक समान मनुष्य हैं। इतनी मामूली सी बात लोगों को समझना है बस। पर हमारे पंडितों और कठमुल्लाओं ने इसे एक दुष्कर काम में बदल दिया है। धर्म के सार तत्व को ऐसी रूढिय़ों में बांध दिया है कि उस की गठानें जितनी खोलो उतनी उलझती चली जाती है। एक अच्छा धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक और सामाजिक नेतृत्व ही हमें इस स्थिति से मुक्त कर सकता है। मानवाधिकारों का विरोधी तो हमें वह धर्म बताता है जो अपने में श्रेष्ठ होने का दंभ भरता है और दूसरे मनुष्यों को कीड़े मकोड़े की तरह देखता है ।
उ.6 इस प्रश्न का उत्तर अपने आप में ही अंर्तनिहित है। आईएस की क्रूरता से इस समय पूरा विश्व आक्रांत है। हमें देखना होगा कि इस संगठन के पीछे कौन सी अंतरराष्ट्रीय ताकतें काम कर रही हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका अगर पूरी गंभीरता के साथ चाहे तो आई एस का खात्मा किया जा सकता है, ऐसा मेरा मानना है। दिक्कत यह है कि दुनिया में गुटनिरपेक्ष देशों की ताकत लगातार हाशिये पर जा रही है। सोवियत संघ के लगभग पराभाव के बाद अमेरिका और उस के पि_ू कुछ पश्चिमी राष्ट्रों की ही आवाज़ बची रह गई है। शिया और सुन्नी का धार्मिक उन्माद अमेरिका के हित में जाता है और इसलिये अमेरिका चाहता है कि आईएस का प्रभुत्व बना रहे। जिन राष्ट्रों के पास तेल है या अन्य प्राकृतिक संसाधन हैं अगर वे आपस में ही लड़ेंगे तो इस का लाभ पूंजीपति ताकतों को मिलेगा। इसीलिये वे आईएस का इस्तेमाल अपने लिये एक खिलौने की तरह करते हैं और अपना हित साधते हैं ।
उ.7 यह जरूरी है कि समाज का सकारात्मक सोच वाला तबका संगठित हो और एकजुट हो कर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज़ उठाये। मेरा देश के आम आदमी की सकारात्मक सोच पर अभी भी भरोसा है। मेरा मानना है कि नकारात्मक और सांप्रदायिक सोच वालों की संख्या कम है पर वे संगठित हैं। सांप्रदायिक ताकतें झूठ का सहारा ले कर मनुष्य की मूल संवेदना का शोषण करती हैं और उसे गुमराह करती हैं। उन्होंने तमाम संचार माध्यमों को अपने कब्ज़े में ले रखा है जिस से यह तस्वीर बनती है कि देश में धु्रवीकरण पूरा हो चुका है, जबकि यह सत्य नहीं है। सोशल मीडिया पर अगर घृणा से ओत-प्रोत पोस्टिंग्स आती रहती है तो ऐसी पोस्ट भी आती हैं जो घृणा का नकार होती है और समाज के विभिन्न वर्गों को आपस में जोडऩे का संदेश देती है। हमें ऐसी सूचनाओं और गतिविधियों का संज्ञान लेना चाहिये । अंतत: शताब्दियों पुरानी टिकी हुई हमारी संस्कृति की जडं़े बहुत गहरी हैं और हमें संस्कृति की इस विश्वसनीयता को बरकरार रखना होगा। राजनैतिक प्रतिबद्धता और शासन की कठोर नीतियों से यह संभव है। अगर शासन ही इस आग में घी डालने का काम करेगा तो दुनिया की कोई ताकत हमें विनाश से रोक नहीं पायेगी।
उ.8  एक समय था, यह कहा जाता था कि विचार का अंत हो गया है। यह कुछ ही वर्ष पहले की बात है। वर्ष 1991 में नव उदारवादी अर्थव्यवस्था आने के बाद विचार पर पहला संकट आया। पर पिछले दो वर्षों में विचार का अंत विचार के आतंक में तब्दील हो गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संभवत: ऐसा पहली बार हुआ है । ‘‘नान-इश्यू’’ को ‘‘इश्यू’’ बना कर देश के मौजूदा संकट की प्राथमिकताओं से मुंह मोड़ लेना। ‘‘गाय’’ और ‘‘भारत माता की जय’’ ऐसे ही कुछ मुद्दे हैं। जो भारतीय समाज सह-अस्तित्व की भावना के साथ रहता आ रहा था उसमें विभाजन की लकीरें खींचने की कोशिश की जा रही है क्योंकि यह सत्तारूढ़ दल को लाभ पहुंचाने वाली स्थिति है। अंग्रेजों ने भी पिछली शताब्दि के दूसरे दशक में यही किया था और उसका दुष्परिणाम हम ने विभाजन के रूप में भोगा। समाज में असहिष्णुता फैलाकर यह खतरनाक खेल खेला जा रहा है। वैचारिक स्वतंत्रता का इससे बड़ा हनन और क्या हो सकता है। विश्व स्तर पर भी अमेरिका द्वारा आई एस जैसे संगठनों के माध्यम से यही खेल खेला जा रहा है।
उ.9  नहीं बिल्कुल नहीं । कठमुल्लापन तो आतंकवाद की जड़ में है। पिछले दो वर्षों में हम ने यह स्पष्ट रूप से देखा है। राजनैतिक दलों में सिर्फ दक्षिणपंथी दल ही ऐसे हैं या जो जाति/संप्रदाय पर एकाग्र हैं उनमें कठमुल्लापन बढ़ा है। मूल दिक्कत इन दलों में कठमुल्लापन बढऩे की नहीं बल्कि जो धर्मनिरपेक्ष उदार दल हैं उनके कमज़ोर पड़ जाने की है। दुर्भाग्यजनक स्थिति हमारे यहां यह है कि धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दल आपस में बंटे हुए हैं। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने उन्हें एक करने से रोक रखा है। यही कारण है कि दक्षिणपंथी दलों को सडक़ लगभग खाली मिल गई और उन्होंने कठमुल्लों के कंधों पर अपने हाथ रख दिए। इन कठमुल्लों को अपने धार्मिक हित इतने प्रिय होते हैं कि उन्हें पाने के लिये आतंकवाद का सहारा लेने को वे एक तरह के पुण्य का काम समझते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को कमज़ोर करने की एक साजि़श है। भारत के अंदर उठने वाले हर विरोध को बाहर से हवा मिलती है । मेरी दृष्टि में राजनैतिक सिद्धांतों में जिस तरह का कठमुल्लापन बढ़ रहा है उस से आतंकवाद की गतिविधियों को किसी भी रूप में अलग कर के नहीं देखा जा सकता।
उ 10 हमारे समय का सब से बड़ा संकट विचारहीनता का संकट है। मनोरंजन के नाम पर जो कुछ भी मीडिया द्वारा हमारे समक्ष परोसा जाता है उस का एकमात्र लक्ष्य मनुष्य के सोचने समझने की ताकत को कुंद कर देना है। ऐसा नहीं है कि अच्छी फिल्में नहीं बनतीं या फिर अच्छा लिखा नहीं जा रहा है पर इनको सामान्य जन के बीच लाने के जो तमाम साधन हैं वे पूंजीपतियों के पास  हैं जो भ्रामक सूचनाओं का मायावी संसार रचते हैं। बुद्धिजीवियों की भूमिका को लगभग गौण कर दिया गया है। आश्चर्य होता है जब टेलीविजऩ के पर्दे पर क्रिकेट के बारे में या फैशन के बारे में बात होती है। वह एक अलग समाज है जिसे प्रमुखता दी जाती है। साहित्य, कला और लोककलाओं का कहीं नामोनिशान  तक नजऱ नहीं आता। समाज में बढ़ती गरीबी, भूख और असमानता का कोई उल्लेख नहीं। उल्लेख होता भी है तो सिर्फ  राजनैतिक कारणों से सिर्फ किसी राजनैतिक दल को ऊंचा या नीचा दिखाने के लिए। असमानता और भूख के खिलाफ कोई सामूहिक आवाज़ सुनाई नहीं पड़ती। बुद्धिजीवियों की भूमिका को बहुत सीमित कर दिया गया है या कहें कि नगण्य कर दिया गया है। पूंजीवाद ने समय के इस दौर में अपने डैने कुछ इस तरह फैलाये हैं कि जो जरूरी है वह दृष्टि से ओझल हो गया है। इस खतरनाक स्थिति के लिये सिर्फ  और सिर्फ पूंजीवादी ताकतें ही जि़म्मेदार हैं जो अपनी बात को अमली जामा पहनाने के लिये अतीतजीवी सांप्रदायिक सोच वाली राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसी संस्थाओं का सहारा लेती हैं ।