Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

नि:शस्त्रीकरण पर जोर हो


श्रीकृष्णकुमार त्रिवेदी

 द्वीपान्तर, ला.ब. शास्त्री मार्ग, फतेहपुर (उ.प्र.) 212601,
दूरभाष- 051180-222828,

उ.1 धर्मतत्ववाद और आतंकवाद के संबंध पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि धार्मिक कट्टरता भी हिंसा को बढ़ावा नहीं देती जबकि आतंकवाद का प्रमुख अस्त्र हिंसा ही है।
उ. 2 वैश्विक राजनीति और आतंकवाद के रिश्ते की पड़ताल के लिए बहुत पीछे न जाकर विश्वयुद्धों के बाद के समय को ही लेना ठीक रहेगा क्योंकि पहले केवल युद्ध होते थे, सेनाओं के बीच, और सर्वनाशी आतंकवाद का बीज-वपन नहीं हुआ था। माक्र्सवाद से प्रभावित साम्यवाद का उदय भी जनकल्याण को लेकर हुआ था। यह अलग बात है कि ‘वर्ग-शत्रुओं’ के प्रति असहिष्णुता की भावना ने जाने-अनजाने हिंसा को बढ़ावा दिया (जिसका विस्तार नक्सलवाद तक पहुंचा।) उसके दुष्परिणाम ही सोवियत संघ जैसी महाशक्ति एवं अन्य साम्यवादी देशों के विघटन के कारण बने। आतंकवाद का उदय असंतोष के दमन, विमान-अपहरण की घटनाओं के रूप में और इजरायल के निर्माण से उपजी अरब-प्रतिक्रियाओं से हुआ।
उ. 3 हां, कुछ अंशों में तो यह गलती है। वाम राजनीति की भूल यह थी कि उसने धर्म को बिलकुल हेय मान लिया है और उसके उन्मूलन हेतु तत्पर हो गई। उसके उदार मानवीय गुणों को विकसित करने पर जोर दिया जाता तो स्थिति शायद कुछ और होती।
उ. 4 धार्मिक ग्रंथों की कट्टरताओं को ईश्वरीय आदेश मानने के भ्रम के पीछे धर्मभीरूता का दोहन है। उसे तोडऩे के उपाय प्राय: हर धर्म और सम्प्रदाय  में हुए हैं और हो रहे हैं। अपेक्षाकृत उदार समाजों ने उन्हें कम या अधिक अंशों में स्वीकार कर के सुधार भी किए हैं और कट्टरपंथियों के दमघोंटू वातावरण को नकारते हुए, उत्पीडऩ सहकर भी वे अपनी बात पर अड़े रहे हैं। इसके कुछ सत्परिणाम भी आए हैं। इसे तोडऩे का सबसे बड़ा उपाय यही है कि सभी धर्मों के उदार सिद्धांतों (जो प्राय: एक से हैं) पर जोर देकर बाह्याचार, कर्मकाण्ड आदि को गौण बनाया जाए।
उ.5 धर्म के सार तत्व को रुढि़वादिता बतलाकर मानवाधिकार का विरोधी निरुपित किए जाने से मुक्ति के लिए उन धार्मिक तत्वों पर जोर दिया जाना चाहिए जो मानवाधिकार की विचारधारा से मेल खाते हों। इसके लिए धर्म और समाज के सारे हितचिंतकों को एक मंच पर आना होगा।
उ. 6 लड़वाने वाले कोई भी हों, जब तक दो पक्ष लडऩे को उद्यत नहीं होंगे तब तक कोई भी लड़ा नहीं सकता। लडऩे-लड़ाने का यह खेल नया नहीं है। फूट डालो और राज करो तो प्राय: सृष्टि के प्रारंभ से ही चल रहा है- उसे देवासुर संग्राम कहें या और कुछ। मजे की बात यह है कि युद्ध नहीं होंगे तो शस्त्र व्यापार कैसे चलेगा! इसके समाधान के लिए गांधी-मार्ग का सहारा लेना पड़ेगा और सद्भावनापूर्ण वातावरण में उभय पक्षों को एक मंच पर लाकर वैचारिक संजीवनी देनी होगी। यद्यपि यह कार्य निकट भविष्य में संभव नहीं दिखता। प्रचार-प्रसार के साधन किसी के भी पास हों, आज के इलेक्ट्रानिक युग में चालाकियां और स्वार्थपरताएं छुपाए नहीं छुप सकतीं।
उ.7 आतंकवाद या किसी भी वाद को केवल कठोर नीतियों से खत्म नहीं किया जा सकता। यह अस्थायी, कामचलाऊ समाधान है, समस्या का शाश्वत हल नहीं। इसके उपाय खतरों की परवाह न करते हुए नि:शस्त्रीकरण पर जोर देकर विश्व शांति के लिए मनीषियों को आगे आना होगा।
उ. 8 हां, कुछ अंशों तक यह सही है। पूजा-पाठ में कोई विशेष रुचि न रखने वाले भी धार्मिक स्थलों विशेष में बलात् प्रवेश करने में अड़े हैं और वैचारिक स्वतंत्रता के नाम पर प्राय: छेडऩे का ही काम करते हैं। आतंक चाहे विचारों का हो या धर्म का, किसी का भला नहीं कर सकता। इस बात को सभी को अच्छी तरह से समझना चाहिए। सकारात्मक सोच लेकर आगे बढऩे की आवश्यकता है। उग्रता नकारात्मक विचारों से नहीं मिट सकती।
उ. 9 हां, उसे कुछ तो अलग मानना ही चाहिए। राजनीतिक सिद्धांतों का कठमुल्लापन शिक्षा के प्रचार-प्रसार से ही समाप्त हो सकता है। पढ़-लिखकर लोग इन चालाकियों को जान जाएंगे तो कठमुल्लापन की दूकानें स्वयं उठ जाएंगी।
उ.10 यह एक जटिल प्रश्न है। बुद्धिजीवियों की भूमिका को खारिज करने में सभी प्रकार के कट्टरपंथी आगे हैं। उनकी आवाजे नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है। मीडिया के भीषण कानफोड़ू प्रचार-प्रसार के बीच उदार, समन्वयवादी रचनात्मक आवाजे बहुत कुछ अनसुनी ही रह जाती हैं लेकिन यह निर्विवाद सत्य है कि सबसे और सब प्रकार से त्रस्त एवं निराश होकर मानवता अंत में इन क्षीण ध्वनियों के सहारे ही अपने भविष्य का पुनर्निर्माण करेगी और स्वस्थ होकर अपने गंतव्य को प्राप्त करेगी।