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Sunday 19 Nov 2017

सच को कहने का साहस चाहिए


शरद यादव

7,  तुगलक रोड,नई दिल्ली
उ.1 यह एक नया फेनोमिना है। आतंकवाद का रिश्ता धर्म से भी है। दुनिया भर में इस समय सबसे अधिक कत्लेआम इसी के आधार पर हो रहे हैं। उसी की नकल यहां भारत में भाजपा के लोग करना चाहते हैं। हिंदू धर्म में ईश्वर के अलग-अलग रूप हैं, मुसलमान या ईसाई लोग एक ईश्वर में यकीन रखते हैंं। भाजपा और आरएसएस के लोग चाहते हैं कि हिंदू भी एक रस हो जाएं। एक भगवान को ही मानें। दुनिया भर में जो झगड़े हो रहे हैं उसकी जड़ों में धर्म ही तो है।
* लेकिन पाकिस्तान और कुछ अन्य मुस्लिम देशों में खासतौर से पश्चिम एशिया के देशों में देखें तो मुसलमान ही मुसलमान को मार रहे हैं?
किसके नाम पर मार रहे हैं, धर्म के नाम पर ही ना कि तुम्हारा नहीं बल्कि धर्म का हमारा रास्ता ही सही है। कहीं शिया और सुन्नी आपस में लड़ रहे हैं तो कहीं वहाबी अपनी सर्वोच्चता साबित करने में लगे हैं। इसी तरह दुनिया के कुछ हिस्सों में इस्लाम और ईसाइयत के बीच भी वर्चस्व की लड़ाई हो रही है। भारत में भी कट्टरपंथ के नाम पर इसी की नकल करने की कोशिश की जा रही है। आगे चलकर यहां भी धर्म के रास्ते की श्रेष्ठता के नाम पर हिंदू हिंदू को मारेगा। दुनिया में अब तक जितने भी कत्लेआम हुए, वह युद्ध के नाम पर कम धर्म के नाम पर ज्यादा हुए।
उ. 2 इसमें कोई शक नहीं कि यूरोप की सभ्यता ने, इनवेंशन या आविष्कारों के चलते पूरी दुनिया पर कब्जा कर लिया। कई सदियों तक उन लोगों ने दुनिया के बहुत बड़े हिस्से पर राज किया। आज पूरी दुनिया में यूरोप की जो सभ्यता और समृद्धि है, आर्थिक ताकत है, वह इसीलिए है कि दुनिया भर में उन्होंने राज किया, अपने ज्ञान और आविष्कारों के बदौलत। दुनिया के बाकी इलाके इस मामले में पिछड़ से गए। भारत जैसे देश में तो यह इसलिए भी हुआ क्योंकि देश की बड़ी आबादी को मुख्यधारा से काटकर रखा गया। इसमें तो चाहे साहित्य हो अथवा विज्ञान, इस बड़ी आबादी को बंजर बनाने की कोशिश या कहें साजिश की गई। लेकिन अब चुनौती मिलने लगी है।
लेकिन अब दुनिया भर में सदियों से राज करते रहे लोगों को भी हर मामले में चुनौती मिलने लगी है और झगड़े बढऩे लगे हैं। इसमें विभिन्न देशों और सभ्यताओं की दूसरों पर वर्चस्व कायम करने की राजनीति या कहें रणनीति ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस मामले में भी धर्म और आतंकवाद को औजार बनाने की कोशिश की गई है। ईसाइयत और इस्लाम के बीच के संघर्ष को इस रूप में भी देख सकते हैं। यह संघर्ष या कनफ्लिक्ट आज का नहीं बल्कि सदियों पुराना है। यूरोप में क्रिश्चियनिटी और मध्य पूर्व या कहें पश्चिमी एशिया में इस्लाम का वर्चस्व जैसा है। यह भी देखें कि दोनों एक ही जगह से निकले हैं और दोनों अपने प्रभावक्षेत्र के विस्तार में लगे हैं। हालांकि सबके पीछे सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई ही है। पश्चिमी एशिया में तेल क्षेत्रों पर आधिपत्य जमाने की लड़ाई या पेट्रो डालर की बढ़ती ताकत को तोडऩा और उन्हें छिन्न-भिन्न करना भी है। अमेरिका इराक, लीबिया और सीरिया में जो कर रहा है या अतीत में जो किया इसे इसी रूप में देख सकते हैं। इराक में सद्दाम हुसैन, लीबिया में गद्दाफी से निबटने के बाद अब अमेरिका सीरिया में असद को अपनी राह का रोड़ा समझ रहा है। अफगानिस्तान में आज अमेरिका कट्टरपंथी आतंकवादी तालिबान से लडऩे की बात कर रहा है लेकिन वहां से सोवियत वर्चस्व को समाप्त करने के लिए तालिबान को खड़ा किसने किया, अमेरिका ने ही ना! बारीकी से देखें तो इसके पीछे पेट्रो डालर की राजनीति, धर्म और आर्थिक विस्तारवाद की मंशा भी है।
उ. 3 मैं मानता हूं कि धर्म दीर्घकाल की राजनीति है। धर्म राजनीति पर भी असर करता है, लंबे समय तक जो असर करता है, वह धर्म ही है। राजनीति अल्पकालिक जरूर है लेकिन उसे इन सब चीजों और तत्वों का इस्तेमाल कर कैसे आदमियों को अंधविश्वास और कट्टरपंथ से निकालकर धर्म के मानवीय तत्व को सामने लाया जाए, इसमें महत्वपूर्ण भूमिका लेनी चाहिए। इस काम में कला, संस्कृति, बौद्धिक सभी क्षेत्र के लोगों को योगदान करना चाहिए। मैं नहीं मानता कि यह अकेले किसी वामपंथ या धर्मनिरपेक्ष राजनीति का जिम्मा है। यह गलत व्याख्या है कि अकेले वामपंथी ही प्रगतिशील हैं। कई लोग जो दक्षिणपंथी हैं लेकिन वैज्ञानिक सोच रखते हैं। ऐसा भी नहीं है कि धार्मिक कट्टरता या इसके मानवीय रूप की चर्चा नहीं हुई है, इसे छेड़ा भी गया है लेकिन व्यापक तौर पर इसे जनता के बीच ले जाने और बहस का मुद्दा बनाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी।
उ.4  इसका तोड़ है साइंटिफिक टेंपर। अंधविश्वास की काट लोगों में वैज्ञानिक सोच और तार्किकता बढ़ाकर की जा सकती है। धर्म से जुड़ी तकरीबन सारी किताबों में अंधविश्वास भरा है। दुनिया में किसी भी धर्म की जो सबसे चर्चित किताब है और जिसकी सबसे ज्यादा तारीफ की जाती है, उसमें भी अंधविश्वास भरा है। लेकिन मैं यह नहीं कहता कि इसी कारण से वह किताब बुरी या खराब है। वह एक विशेष कालखंड में उस समय की परिस्थिति के हिसाब से समाज को बांधने और लोगों को ठीक करने के लिए, उन्हें अनुशासित करने के लिहाज से लिखी और कही गई। वह आज के समाज को बांधने के लिए कारगर होगी, यह जरूरी नहीं है। लेकिन गजब की बात है कि आज का समाज उससे ज्यादा गाइड और प्रभावित हो रहा है।
उ.5 सच को कहने का साहस चाहिए। जैसे धर्म जो है, धर्म के अंदर आपने वर्ण बनाकर रखा है। इस देश में अस्सी प्रतिशत आबादी को आपने साहित्य, संस्कृति, शिक्षा, भाषा और बोली हर तरह से मुख्यधारा से काट दिया है। ऐसे धर्म को कौन गले लगाएगा। धर्म की आलोचना होती है। इसमें कबीर हैं, भक्तिकाल के और भी कवि हैं, जिन्होंने धर्म की रुढि़वादिता और इसकी विसंगतियों को सामने लाया है। वर्ण व्यवस्था पर आधारित धर्म की जकडऩ टूटनी चाहिए।
उ.6  देखिए, इसे तो बहुत आसानी से समझा जा सकता है। कई मुस्लिम देशों में जहां सब कुछ बड़े ही सिस्टमेटिक तरीके से चल रहा था। पूरा एक सिस्टम था जिसे पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया। इसके पीछे बड़ी शक्तियां तो हैं, आखिर उन्हें इस तरह के आधुनिक हथियार कहां से मिले। उन्होंने आपस में सत्ता पर कब्जा करने के लिए धर्म की अपने-अपने तरह की अलग-अलग तरह की व्याख्या की। जिस तरह से अफगानिस्तान में सोवियत संघ को उखाड़ फेंकने के लिए अमेरिका ने तालिबान का इस्तेमाल किया ठीक इसी तरह अन्य मुस्लिम देशों में भी आइएस का इस्तेमाल कर सिस्टेमेटिक ढंग से चल रही सरकारों को ध्वस्त करने का खूनी खेल चल रहा है। इराक को किस तरह किस आरोप में युद्ध के हवाले कर तबाह किया गया लेकिन क्या कोई आरोप सही साबित हुए। वहां बनी हुई सद्दाम हुसैन की पुरानी व्यवस्था को ध्वस्त करने के बाद कोई भी कारगर व्यवस्था कायम नहीं हुई। उसको कायम करने के लिए धर्म का सहारा भी लिया जा रहा है और पेट्रो डालर की अर्थव्यवस्था को भी नियंत्रित करने की कोशिश भी हो रही है। हथियारों की आपूर्ति का खेल भी चल रहा है क्योंकि हथियार नहीं बिके तो अमेरिका और इजरायल की पूरी वार ईकोनामी ही ठप हो जाएगी। अगर युद्ध न हों तो अमेरिका और कुछ अन्य देशों की तो अर्थव्यवस्था ही चौपट हो जाएगी। इसलिए वे तो लगे ही रहते हैं, संघर्षों और तनावों को विभिन्न आधार पर हवा देने में। धर्म इस मामले में उनके लिए सबसे कारगर औजार साबित होता है।
उ.7 नहीं, पहली बात तो यह कि आतंकवाद के बहुत सारे प्रकार हैं। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में यह अलग-अलग चेहरों के साथ सामने आता है। इसके समाधान के लिए पहले तो इसके कारणों की तह में जाकर उन्हें समझना होगा और उसी के अनुरूप समाधान खोजने होंगे। कठोर नीतियों या कहें बंदूक और गोली से स्थायी समाधान नहीं निकल सकते। इस बहस के सबसे ज्यादा मुद्दे इन्सान की जिंदगी को बेहतर बनाने के हैं। इसे मानवीय आधार पर सोचने की जरूरत है। उदाहरण के लिए हिन्दुस्तान को ही लें तो यहां अस्सी फीसदी आदमी या आबादी हाशिए पर है। उसकी कोई सुननेवाला नहीं है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। बेरोजगारी बढ़ रही है। इस अस्सी फीसदी आबादी के लिए रोजगार की व्यवस्था भी नहीं है। जो लोग अंग्रेजी पढ़े लिखे हैं, उन्हें तो कहीं न कहीं रोजगार मिल भी जाता है लेकिन भारतीय भाषाओं के पढ़े-लिखे लोगों का बुरा हाल है, वे कहां जाएंगे। इन समस्याओं का समाधान किए बगैर आप कहें कि आतंकवाद खत्म हो जाएगा तो यह गलत होगा। केवल बंदूक के बल पर आतंकवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता। उनकी समस्याओं की जड़ तक जाना, समझना और उनका समाधान करना होगा। छत्तीसगढ़ में जो बगावत हो रही है, उसे आप नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद चाहे जो नाम दो, लेकिन वहां इतना शोषण हुआ है, मैं मध्यप्रदेश का रहनेवाला हूं, अच्छी तरह से जानता हूं। छत्तीसगढ़ पहले मध्यप्रदेश में ही तो था, वहां अफसर जाता था तो हर तरह का शोषण करता था। वहां व्यवस्था अपने मानवीय नहीं बल्कि अमानवीय और राक्षसी चेहरे को लेकर ग्रामीण आदिवासियों के बीच गई। इसलिए वहां जो बगावत है जिसे आप आतंकवाद, नक्सलवाद चाहे कुछ भी नाम दे दो, उसके साथ उसकी समस्याओं की जड़ में जाकर समझना और उनका समाधान करना होगा, केवल बंदूक और गोलियों से आतंकवाद का सफाया नहीं कर सकते।
उ.8  दो तरह की प्रवृत्तियां तो हमेशा से रही हैं। वैचारिक स्वतंत्रता बनाम असहिष्णुता का संघर्ष पूरी दुनिया में चल रहा है। हमारे देश में हाल के दिनों में जिस तरह से छद्म तरीके से सत्ता पोषित और संरक्षित कट्टरपंथ और उसके साथ ही असहमति और वैचारिक स्वतंत्रता को दबाने की असहिष्णुता बढ़ी है, नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसरे और कालबुर्गी जैसे कई लोगों की हत्या कर दी गई। कई लोगों को धमकियां मिल रही हैं, इसके विरोध में हमारे कई बड़े साहित्यकार, कलाकार, बौद्धिक, वैज्ञानिक, समाज के सभी तबकों से जुड़े लोग खड़े हुए। अपनी पदवियां और सम्मान लौटाए, वह मामूली बात नहीं है। इस तरह की लड़ाई पूरी दुनिया में चल रही है। अब हमारे यहां तो यह लड़ाई बड़ी तेजी से चल रही है। अब इतिहासकारों की पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं। अब भगत सिंह के बारे में एक पुस्तक को इसलिए प्रतिबंधित किया जा रहा है क्योंकि उसमें एक जगह भगत सिंह को आतंकवादी लिखा गया है। अगर उसमें कुछ गलत लगता है तो उस शब्द, वाक्य को हटा दो लेकिन पुस्तक पर प्रतिबंध क्यों। यह ठीक बात है कि इतिहास को पढ़ाते समय मौजूदा संदर्भ और जनभावनाओं का भी खयाल रखना चाहिए। अब अंग्रेज भगत सिंह को आतंकवादी मानते थे क्योंकि वह अंग्रेजों की सत्ता यहां से उखाड़ फेंकने के लिए सशस्त्र संघर्ष कर रहे थे लेकिन हमारे लिए तो वह क्रांतिकारी थे। अब पुस्तक में यह लिखा या संशोधित किया जा सकता था कि अंग्रेज भगत सिंह को आतंकवादी मानते थे जबकि भारत देश के वासी उन्हें क्रांतिकारी और शहीदे आजम मानते हैं।
उ.9 देखिए प्राय: सभी राजनीतिक दलों में बड़े पैमाने पर अंदरूनी लोकतंत्र समाप्त हो गया है। और जहां है भी तो दिखावे के लिए ही है। हम सारी चीजें नकल करते हैं यूरोप की। आप सही कह रहे हैं राजनीति में भी धार्मिक कठमुल्लापन बढ़ा है। जो लोग इसे नहीं मानते वे ढोंग करते हैं। इसके जरिए कहीं न कहीं आतंकवाद को बढ़ावा भी मिल रहा है। कठमुल्लापन को आतंकवाद से अलग करके नहीं देख सकते। कठमुल्लापन चाहे धर्म में हो या राजनीति में उसके परिणाम सकारात्मक तो नहीं ही हो सकते। आप दुनिया भर में देख लो, जहां सबसे मजबूत लोकतंत्र कहा जाता है वहां भी एक तरह के कठमुल्लापन को बढ़ावा मिलते दिख रहा है। हमारे यहां भी कट्टरपंथ और उसके विरोध की उदारवादी विचारधारा का संघर्ष साफ  दिख रहा है। हिंदुओं में उदारवादी हैं और कट्टरपंथी भी, उसी तरह से मुसलमानों में कुछ कठमुल्ले हैं तो बड़ा तबका उदारवादी भी है जो उन्हें तरजीह नहीं देता। मालेगांव और कई ऐसी आतंकवादी घटनाओं में कट्टरवादी हिंदू चेहरे भी सामने आए।
उ.10 नहीं, वैश्विक परिदृश्य को सुधारने में सबकी भूमिका होती है। देश और दुनिया के भी संदर्भ में। लेकिन बुद्धिजीवी के परिवेश और उसकी पृष्ठभूमि को भी देखा जाना चाहिए। कई बुद्धिजीवी शहरी होते हैं जबकि कुछ ऐसे भी होते हैं जो शहरी और ग्रामीण परिदृश्य को भी जानते समझते हैं। भारतीय समाज हो या कोई भी समाज हो, उसकी समझ जिस बुद्धिजीवी को टोटलिटी यानी संपूर्णता में होगी, वही देश और दुनिया के हित में लिखेगा और आगे बढ़ेगा। देश और दुनिया में भी आप देखेंगे तो जो भी पापुलर साहित्य जिसका भी हुआ अगर वह देश और समाज की संपूर्ण हकीकत से जुड़ा हुआ है तभी कारगर हुआ है। बुद्धिजीवी दो तरह के हैं। एक हैं जो देश और दुनिया के समाज और समझ से कटे हुए हैं। दूसरे वे हैं जो अपने देश और समाज ही नहीं बल्कि वैश्विक परिदृश्य को भी सही अर्थों में देखते और समझते हैं। लेकिन यह सच है कि देश और दुनिया भर में भी बुद्धिजीवियों या कहें सच को दबाने की कोशिशें आज ही नहीं सदियों से हो रही हैं। लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में यह इतना आसान नहीं है। आधुनिक तकनीक और प्रौद्योगिकी के विस्तार खासतौर से नए और सोशल मीडिया के विस्तार से अब किसी को भी दबा पाना मुश्किल है। प्रतिरोध होगा, लड़ाई होगी। बुद्धिजीवियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। भारत में ही देखें तो एक तरफ  कट्टरपंथ को बढ़ावा मिल रहा है तो जान और सम्मान को जोखिम में डालकर बुद्धिजीवियों के द्वारा उसका प्रतिरोध भी बढ़ रहा है।   
(प्रस्तुति: जयशंकर गुप्त)