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Sunday 19 Nov 2017

प्रत्येक युग का अपना एक शत्रु होता है

शैलेन्द्र चौहान
34 /242, सेक्टर -3, प्रतापनगर, जयपुर -302033
मो.07838897877
उ.1 वर्तमान में फंडामेंटलिज्म और आतंकवाद का सम्बंध बहुत मजबूत दिखाई दे रहा है। पश्चिम एशिया का अधिकांश हिस्सा आज आतंक की चपेट में है। जब भी दो धार्मिक सम्प्रदायों के बीच की सीमा रेखा गरमाने लगती है तो हर सम्प्रदाय के मर्म में जो धार्मिक अनुभूति है उसकी जगह ऐतिहासिक अनुभूति लेने लगती है। जैसे-जैसे हम 19वीं सदी की ओर बढ़ते हैं, पच्छिम की हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आती हैं और चिन्ता में डालनेवाले तत्व उभरते हैं। परंपरा, संस्कृति, देशभक्ति, राष्ट्रीयता - ये सारी भावनाएँ इस नई धार्मिक ऐतिहासिक पहचान के सर्वग्रासी प्रश्न से जुडऩे लगती हैं। धर्म जैसा पहले समझा गया था वैसा धर्म नहीं रह जाता, इतिहास से जो ध्वनियाँ पहले निकलती थीं, वैसी ध्वनियाँ नहीं निकलतीं। विश्व में कुछ इस्लामिक आतंकवादी संगठनों की सक्रियता के कारण आज आतंकवाद को इस्लामी संप्रदाय से जोडक़र देखा जाने लगा है। इसके कुछ ऐतिहासिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं जिन पर ध्यान देना आवश्यक है। कह सकते हैं कि आतंकवादियों की कोई जाति धर्म या संप्रदाय नहीं होता। उनका तो बस एक ही धर्म होता है- आतंक फैलाना। इस दृष्टि से किसी भी धर्म या संप्रदाय को आतंकवाद से जोडऩा उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से उस धर्म या संप्रदाय द्वारा आतंकवाद को और बढ़ावा दिया जाने लगता है। आतंकवाद के अनेक रूप हो सकते हैं, यथा- धार्मिक आतंकवाद, राजनीतिक आतंकवाद, राज्य का आतंकवाद या किसी विशेष समूह अथवा व्यक्ति का आतंकवाद आदि इत्यादि। वस्तुत: आतंकवाद कोई दार्शनिक सिद्धांत नहीं है, यह एक साधन है, जिसके मूल में किसी सामाजिक या राजनीतिक परिवर्तन की आकांक्षा निहित रहती है। यह एक हिंसक नीति है जिसमें हिंसा के माध्यम से समाज में आतंक फैलाया जाता है। आतंकवाद अपने स्वरूप और प्रकृति में विश्वव्यापी हो गया है। आतंकवादी आज विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय अलगाववादियों, उग्रवादियों, विद्रोही समूहों से गठजोड़ कर अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। एशिया से लेकर अफ्रीकी महाद्वीप में इस गठजोड़ के प्रमाण मिल रहें हैं। नव जागरण काल (रिनेसां) के महान फ्रांसीसी दार्शनिक देनी दिदरो कहते हैं कि धर्म द्वारा पागल बनाये गये लोग सबसे ख़तरनाक़ पागल होते हैं और जिन लोगों का मकसद समाज में विघटन पैदा करना होता है, वे हमेशा समझते हैं कि मौक़ा पडऩे पर ऐसे पागलों का असरदार इस्तेमाल किस तरह किया जाता हैा
उ.2 ‘रोमैन्टिक्स ऐट वार: ग्लोरी एंड गिल्ट इन दि एज ऑफ टेररिज्म’ नामक पुस्तक में कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जार्ज पी. फ्लेचर ने आतंकवाद को एक सार्वकालिक घटना के रूप में बताते हुए कहा है कि, प्रत्येक युग का अपना एक शत्रु होता है। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान फासीवादियों ने बुरे कृत्य किये, वहीं द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान पूंजीवाद सभ्यता का शत्रु बना और आज शीतयुद्धोत्तर विश्व में आतंकवादी, हिंसा और आतंक के प्राधिकृत स्वामी बन बैठे हैं। तेल की बेहिसाब दौलत और शीत युद्ध की वजह से इस दुर्विचार को फैलने में मदद मिली। विश्व में कुछ इस्लामिक आतंकवादी संगठनों की सक्रियता के कारण आज आतंकवाद को इस्लामी संप्रदाय से जोडक़र देखा जाने लगा है। इसके कुछ ऐतिहासिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं जिन पर ध्यान देना आवश्यक है। कह सकते हैं कि आतंकवादियों की कोई जाति धर्म या संप्रदाय नहीं होता। उनका तो बस एक ही धर्म होता है- आतंक फैलाना। इस दृष्टि से किसी भी धर्म या संप्रदाय को आतंकवाद से जोडऩा उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से उस धर्म या संप्रदाय द्वारा आतंकवाद को और बढ़ावा दिया जाने लगता है। लेकिन यह भी एक सत्य है कि आतंकवाद का प्रस्फुटन पश्चिम एशिया और अफ्रीका के मुस्लिम बहुल देशों में ही अधिक दिखाई देता है। और यही क्षेत्र तेल का भी उत्पादन क्षेत्र है। इन दोनों बातों का परस्पर बहुत नजदीकी संबंध है। इस बात का पूरा लाभ पश्चिम के बड़े व्यापारी देश उठा रहे हैं। इस बात पर भी ध्यान देना आवश्यक है। आश्चर्य इस बात का है कि  9/11 की घटना के बाद भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसके अमल में कतई कोई बाधा नहीं डाली बल्कि इसने आतंकवाद को बढाने के लिए नए रास्ते खोल दिए। अफगानिस्तान और फिलिस्तीन इस बात के दो अलग-अलग उदहारण हैं। अफगानिस्तान में सोवियत संघ को नीचा दिखने के लिए अमेरिका तालिबान की मदद करता है। ओसामा को आतंकवादी होने की ट्रेनिंग देता है। वही फिलिस्तीन के खिलाफ इसराइल को लगातार सहयोग करना स्वत: एक आतंक पैदा करने वाला कदम है। ईराक को मिटाकर वहां आतंकवादियों को कदम रखने का मौका अमेरिका ने ही मुहैया कराया है। बगदाद पर आतंकवादी संगठन आइसिस काबिज हो गया है। पहले ईराक और ईरान में भीषण युद्ध चला और फिर एक लंबे अरसे से शिया और सुन्नी समुदायों के बीच झगड़ा चलता रहा। आज इराक में शिया सरकार है। सुन्नी, ईराक के चरमपंथी बन गए हैं। सद्दाम हुसैन सुन्नी थे। अमेरिका ने सद्दाम को खत्म कर दिया। अब सद्दाम के समर्थक भी चरमपंथी आईएस के साथ जुड़ गए हैं। शिया समुदाय के लोग उनके निशाने पर हैं। लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं है। जाहिर है आज इस्लाम से आतंकवाद को अलग करना अत्यंत आवश्यक है। तभी आतंकवाद का सफाया करने में इस्लाम का सहयोग मिल सकेगा। लेकिन अमेरिका जैसे राष्ट्रदोहरी नीतियां अपनाने के कायल हैं। तेल की राजनीति, हथियारों को युद्ध में प्रदर्शित कर उन्हें बेचने का अमानवीय कारोबार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का अकूत धन कमाने का लालच आतंकवाद को जन्म देता है। इराक में सर्वाधिक गुणवत्ता वाले तेल के कुएं हैं। आज अधिसंख्य तेल के कुओं पर अमेरिकी कंपनियों का प्रत्यक्ष या परोक्ष कब्ज़ा है।
उ.3 असल में धार्मिक शिक्षाओं की व्याख्या, तत्कालीन सामाजिक संदर्भों में की जानी चाहिए। हर धर्म, शांति व सद्भाव को महत्व देता है परंतु साथ ही हर धर्म में हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराने वाले तत्व भी हैं। बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि किसी धार्मिक सिद्धांत की व्याख्या कौन व किस उद्देश्य से कर रहा है। एक ही उद्धरण की कई व्याख्याएं की जा सकती हैं। इब्राहीम को अपना पूर्वज मानने वाले धर्मों में हिंसा की यत्र-तत्र चर्चा मात्र से ये धर्म, हिंसा व आतंक के प्रणेता नहीं बन जाते। हिंसा और आतंक की जन्मदाता, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ होती हैं, धार्मिक सिद्धांत नहीं। धर्मनिरपेक्षता को वामपंथी विचारधारा की मूल प्रतिज्ञाओं में से एक माना जाता है। वामपंथी दल भी अपनी धर्मनिरपेक्षता को बगैर किसी मिलावट के शत प्रतिशत शुद्ध मानते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे काफी भिन्न है। जाहिर है कि धर्मनिरपेक्षता के आदर्श पर अमल करने में अनेक दिक्कतें सामने आती हैं। इसीलिए सभी लोकतांत्रिक समाजों में जहाँ धर्मनिरपेक्षता के आदर्श को स्वीकार कर लिया गया है, अल्पसंख्यकों के अधिकार सुरक्षित करने के लिए कानूनी व्यवस्थाएँ की जाती हैं। शायद ऐसी ही स्थिति के बारे में टीएस एलियट ने अपनी मशहूर कविता हौलो मेन (खोखले आदमी) में लिखा था -विचार और वास्तविकता के बीच, गति और क्रिया के बीच, छाया गिरती है। यहाँ यह उल्लेख करना भी उचित होगा कि अन्य दलों की तुलना में वामपंथियों का रिकॉर्ड बहुत बेहतर है। लेकिन उनमें और अन्य दलों में वैसा तात्विक अंतर नहीं है जैसा वे खुद समझते हैं या जैसा अंतर होने का वे दावा करते हैं। तार्किकता के पैरोकार, अक्सर धार्मिक कट्टरता के लिए धर्म को दोषी ठहराते हैं। क्या यह सोच सही है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए सबसे पहले हमें धार्मिक कट्टरता का सही अर्थ समझना होगा। राजनेता अक्सर धार्मिक कट्टरता का इस्तेमाल अपने हितसाधन के लिए करते हैं। कट्टरपंथियों का भी हृदय परिवर्तन किया जा सकता है, बशर्ते उनसे प्रेमपूर्ण व्यवहार किया जाए, उनके दृष्टिकोण को समझा जाए और उन्हें एक वैज्ञानिक एवं वास्तविक सामाजिक ज्ञान दिया जाए।
उ.4 मनुष्य का यह नैसर्गिक स्वभाव है कि वह अपनी प्रत्येक वस्तु को श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण मानता है। धर्म के मामले में भी उसका यही स्वभाव कार्य करता है। इसके कारण वह अपने धर्म को श्रेष्ट और अन्य धर्मों को इससे हीन समझता है। इस स्वभाव का मुख्य कारण हमारी अन्य धर्मों से अनभिज्ञता है। हमें उनके सिद्धांतों, विचारों, विश्वासों, के बारे में सही जानकारी का अभाव है। हमें अपने धर्म के बारे में तो घरवालों, बड़े-बुजुर्गों, धार्मिक पुस्तकों, ग्रंथों, उत्सवों आदि के माध्यम से जानकारी मिल जाती है। लेकिन अन्य धर्मों के बारे में हमें कोई कुछ नहीं बताता है। हम अन्य धर्मों के बारे में सही जानकारी के बगैर ही सुनी-सुनाई बातों और प्रचलित भ्रांतियों के आधार उनके बारे में अपनी एक राय बना लेते हैं। क्या किसी व्यक्ति, विचार या अवधारणा के बारे में बिना जाने हुए उसके बारे में कोई राय बना लेना उचित है। एक ओर जहाँ इस्लाम एवं ईसाई धर्म क्रमश: कुरान एवं बाइबिल को एकमात्र अपना धार्मिक ग्रंथ मानते हैं तो वहीं हिन्दू धर्म में वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, गीता जैसे अनेक धार्मिक ग्रन्थ हैं। जाहिर है सभी धर्मों के धार्मिक ग्रंथों और उनकी टीकाओं तथा मनमानी व्याख्याओं ने धार्मिक लोकाचार का फैलाव किया और उनमें कट्टरता ला दी। इनकी व्याख्या लोगों ने अपने स्वार्थों के अनुसार की। संस्कार और कर्मकांड बहुत बढ़ गये। इससे पंडित-पुरोहित, मुल्ला-मौलवी, पादरी और ग्रंथियों के अलावा धार्मिक गुरुओं, बाबाओं और राजनीतिज्ञों सबने लाभ उठाया है। धार्मिक कट्टरता के विवाद के पीछे असल में पैसा और पावर ही है, चाहे वह इस्लामिक स्टेट का मामला हो, शिया-सुन्नी विवाद का हो, कैथोलिक पोप का हो, प्रोटेस्टेंट का हो या हिंदू धर्म के ठेकेदारों और उनसे लाभान्वित होने वाली सत्ता का हो। सब का छुपा हुआ मंतव्य एक ही होता है।  
अपराधशास्त्रीय नजरिये से देखें तो विश्व में आतंकवाद, उग्रवाद, अलगाववाद, क्षेत्रवाद, धर्मरक्षा के लिए क्रूर हिंसा और धार्मिक असहिष्णुता की प्रवृत्तियों का इतिहास कोई दस-बीस साल पुराना नहीं है। लोकतंत्र के आधुनिक रूप की खोज से पहले राजसत्ताएं और धर्मसत्ताएं भी युद्ध के रूप में यही प्रवृत्तियां अपनाती थीं। मानव समाज इन्हें सहस्राब्दियों से भोग रहा है।
उ.5 उत्तरी भारत में 14वीं से 17 वीं शताब्दी तक फैली भक्ति की लहर समाज के वर्ण, जाति, कुल और धर्म की सीमाएं लांघ कर सारे जनमानस की चेतना में परिव्याप्त हो गई थी, जिसने एक जन-आंदोलन का रूप ग्रहण कर लिया था। भक्ति आंदोलन का एक पक्ष था साधन या भक्त के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति अथवा भगवान के साथ मिलन, चाहे भगवान का स्वरूप सगुण था या निर्गुण। दूसरा पक्ष था समाज में स्थित असमानता का। ऊंच-नीच की भावना अथवा एक वर्ण, जाति या धर्म के लोगों का दूसरे वर्ण व जाति या धर्म के लोगों के प्रति किए गए अत्याचार, अन्याय और शोषण का विरोध। इस प्रकार संतों ने असहमति और विरोध का नारा बुलंद किया। साथ ही निर्गुण संतों ने भक्ति के माध्यम से सामाजिक भेदभाव, आर्थिक शोषण, धार्मिक अंधविश्वासों और कर्मकांडों के खोखलेपन का पर्दाफाश किया और समाज में एकात्मकता और भाईचारे की भावना को फैलाने का पुरजोर प्रयत्न किया। समानतावादी व्यवस्था में आस्था रखने वालों में कबीर, दाऊद, रज्जबदास, रैदास, सूरदास आदि आते ही हैं तो साथ ही सिख संप्रदाय के जन्मदाता नानक और उनके संप्रदाय को बढ़ाने वाले सिख गुरु भी शामिल हैं। सूफी धर्म मत से प्रभावित संत और मुल्ला दाऊद, कुतुबन, जायसी और मंझन इत्यादि को भी विस्तृत भक्ति आंदोलन में शामिल रचना उचित है। उनके विचार से प्रेम की पीर के द्वारा अपनी माशूका अर्थात् प्रियतमा के साथ मिलन अर्थात फना हो जाना भगवद् भक्ति का ही दूसरा स्वरूप था। मध्यकालीन भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता और धार्मिक सहिष्णुता का झंडा लहराने वालों में सबसे पहले कबीर का नाम लिया जाता है। लेकिन इससे पहले महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत नामदेव जिनका जन्म और प्रभ्रमण 1260-1350 का माना जाता है। और जिनके अभंग मराठी और हिंदी दोनों में उपलब्ध हैं-धार्मिक सहिष्णुता की उद्घोषणा करते हुए कहते हैं-  
हिंदू पूजै देहुरा, मुस्सलमान मसीत।
नामे कोई सेविया, जहं देहुरा न मसीत।।
हिंदू मंदिर में पूजा करते हैं, मुसलमान मस्जिद में, जो (भगवान का) नाम स्मरण करता है वहां न मंदिर है न मस्जिद। हमारे देश में सुधारवादी आंदोलनों की एक सशक्त परंपरा रही है जो अब दिखाई नहीं देती। आज धर्म के नाम पर कोई टिपण्णी करना, उसका विश्लेषण करना और विवेकसम्मत मत प्रकट करना बहुत खतरनाक होता जा रहा है। यह बहुत ही भयानक स्थिति है। हमें इसे समझना होगा और जन मानस में पाखंड, कट्टरता और उन्माद व हिंसा को फैलने से रोकना होगा।  
उ.6 यह सही है और यह बेहद चिंताजनक बात है। पश्चिमी देशों में बहुत साफ़ तौर पर नस्लवादी सोच अभी भी कई स्तरों पर मौजूद है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस हर जगह नस्ली हिंसा देखने-सुनने को मिलती रहती है। जैसा कि पूर्व में कहा गया कि इसके पीछे कुछ बड़े पश्चिमी देशों के व्यवसायिक हित जुड़े हैं। आतंकवाद का प्रस्फुटन पश्चिम एशिया और अफ्रीका के मुस्लिम बहुल देशों में ही अधिक दिखाई देता है। और यही क्षेत्र तेल का भी उत्पादन क्षेत्र है। इन दोनों बातों का परस्पर बहुत नजदीकी संबंध है। इस बात का पूरा लाभ पश्चिम के बड़े व्यापारी देश उठा रहे हैं। इस बात पर भी ध्यान देना आवश्यक है। आश्चर्य इस बात का है कि  9/11 की घटना के बाद भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसके अमल में कतई कोई बाधा नहीं डाली बल्कि इसने आतंकवाद को बढ़ाने के लिए नए रास्ते खोल दिए। आभासी तौर पर आज विश्व के सभी देश आतंकवाद को समाप्त करने के लिए प्रयासरत हैं और इसके लिए एक दूसरे को सहयोग भी कर रहे हैं लेकिन इस सहयोग का उपयोग कितने सही तरीके से हो रहा है यह देखना आवश्यक है। अफगानिस्तान और ईराक में भीषण नरसंहार थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसके लिए कौन जिम्मेवार है? अफ्रीका के कई देशों में आतंक का घना साया बना हुआ है। बोकोहराम नामक आतंकी संगठन नरसंहार में लगा हुआ है। भारत में उत्तर पूर्व में बोडो उग्रवादी सीधे साधे आदिवासियों की हत्याएं कर रहे हैं। नक्सली हिंसा हो रही है। क्या यह महज एक संप्रदाय विशेष का आतंकवाद है? ये घटनाएं यह इंगित करती है कि कारण कुछ और हैं। जिन पर पूरे विश्व को विचार करना होगा। इस समस्या पर एक पूर्वाग्रह मुक्त दृष्टि से सोचना आवश्यक है।
उ.7 ब्रिक्स और जी 20 सम्मलेन में इस तरह की चिंताएं उठी हैं। यह आवश्यक है कि संयुक्त राष्ट्र पहले आतंकवाद की परिभाषा स्पष्ट करे। बल्कि अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य पश्चिमी देश भी आतंकवाद की उनकी परिभाषा स्पष्ट करें। इस तरह आतंकवाद का सफाया संभव नहीं है। आतंकवाद से निपटने के लिए विश्व स्तर पर कुछ कदम उठाना फायदेमंद हो सकता है जैसे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में आतंकवाद की रोकथाम के लिए सकारात्मक निर्णय लिए जाएँ तथा आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों का अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पूर्णत: बहिष्कार किया जाये। उनके अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय सहायता भी पूर्णत: बंद कर दी जानी चाहिए। दूसरा सकारात्मक कदम यह भी हो सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रत्येक राष्ट्र यह स्वीकार करे कि वह आतंकवाद से लडऩे के लिए प्रतिबद्ध है तथा अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए न तो आतंकवाद को बढ़ावा देगा और न ही अपने देश को आतंकवाद का आश्रय स्थल बनने देगा। अगर कोई देश जानबूझकर ऐसा करता है तो उसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मोर्चाबंदी की जानी चाहिए। यहाँ यह स्पष्ट करना भी  आवश्यक है कि मात्र ओसामा बिन लादेन, तालिबान, मुंबई हमले के आरोपी अजमल आमिर कसाब या कुछ आतंकवादी संगठनों का सफाया ‘आतंकवाद का सफाया’ नहीं है। अत: इस समस्या के  समाधान का प्रयास भी वैश्विक स्तर पर किया जाना आवश्यक है। यह संपूर्ण विश्व में अलग अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप में सक्रिय है। इसके सफाए के लिए विश्व के विभिन्न हिस्सों में मौजूद आतंकवाद के विविध स्वरूपों को पहचानना आवश्यक है।
उ.8 लोकतांत्रिक राज व्यवस्था को लगभग सारी दुनिया में अपनाए जाने के बाद मानव समाज में निश्चिंतता आई थी और पृथ्वीवासियों में उम्मीद जगी थी कि इस संत्रास से मुक्ति मिलेगी, लेकिन मत्स्य न्याय (सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट) की पारंपरिक मजबूरी में मानव समाज आज भी हिंसा में उलझा दिखता है। आश्चर्य यह कि बड़ी से बड़ी धार्मिक और नैतिक आधार वाली विचार सत्ताएं भी सह-अस्तित्व के सिद्धांत पर भरोसा नहीं कर पा रही हैं।
इतिहास पर नजर डालने पर पता चलता है कि फ्रांस में क्रांति के कारण लोकतंत्र का सिद्धांत प्रचलित हुआ। वास्तव में यह रूसो द्वारा प्रतिपादित लोक प्रभुता के सिद्धांत में निहित था परन्तु क्रांति के तीनों संविधानों में लोकतंत्र का महत्व भिन्न-भिन्न था। प्रतिक्रियावादी शक्तियां लोकतंत्र को उदारवाद और राष्ट्रवाद से अधिक खतरनाक मानती थी और इसीलिए लोकतंत्र की प्रवृत्ति का दमन कर दिया गया। यही हाल कमोबेश आज भी है। इसमें संदेह नहीं कि इस वर्ष हमारे देश में धार्मिक कट्टरवाद के चलते आतंकवाद सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।  कट्टरता का संबंध व्यक्ति की मानसिकता से है। एक ओर धर्म, नस्ल, क्षेत्रीयता और जातिवादी विचारों से आतंक पैदा किया जाता है तो वहीं कम-से-कम भारतीय लोकतंत्र में सत्ता में आई विशेष धर्म आधारित विचारधारा ने अपने विरोधियों को परास्त करने के लिए भावनात्मक आतंक का प्रचार प्रसार बहुत तेजी से और प्रभावी ढंग से किया है। और इसे वैचारिक आधार प्रदान करने की भरपूर कोशिशें जारी हैं।
उ.9 भगत सिंह का मानना था कि जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोडऩे के लिये एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत होती है, अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिये यह जरूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताजा की जाये, ताकि इन्सानियत की रूह में हरकत पैदा हो। कट्टर विचारधारा वाले लोग अपनी बात/सोच पर बराबर अडिग बने रहते हैं, इसके विपरीत उदारवादी सोच वाले लोगों की सोच में लचीलापन होता है, जिसके चलते कुछ उदारवादी सोच वाले लोग अपनी ही सोच के अच्छे और बुरे होने पर संशय करने लगते हैं। फलत: वो बहुत बार अपनी ही बात से मुकर जाने का विचार/मन बना लेते हैं। इस तरह कट्टर विचारधारा/मानसिकता वाले लोग उदारवादी सोच वालों के विचारों से प्रभावित ही नहीं होते हैं। उलटे उदारवादी सोच वाले लोग ही कट्टर विचारधारा वाले लोगों से प्रभावित होने लगते हैं। सांप्रदायिकता, कट्टरपंथ, धार्मिक उन्माद, घृणा और हिंसा से संचालित राजनीति अलग-अलग समय अंतराल में अपना नया ‘नायक’ तलाशती है, जो पहले वाले से ज्यादा आक्रामक, उन्मादी, ध्रुवीकरण की राजनीति में ज्यादा माहिर और एक साथ कई नकाब ओढऩे की कला में पारंगत होता है। नया ‘नायक’ भी पुराने ‘नायक’ की पाठशाला का ही छात्र होता है और उसी के संरक्षण में आगे बढ़ता है। यहां सफलता की कुंजी इस तथ्य पर आधारित होती है कि पहले वाली आक्रामकता से अधिक आक्रामक व्यक्ति ही धर्मांध लोगों के बीच अधिक पॉपुलर हो सकता है और चुनाव में जीत दर्ज करा सकता है।
उ.10 बुद्धिजीवी समुदाय के ईमानदार लोगों की निजी लड़ाइयों या पूरे समुदाय की निहायत न्यायसंगत लड़ाइयों को समाज के आम लोगों का समर्थन मिलना तो दूर, उनकी हमदर्दी तक हासिल नहीं होती। यदि आप बुद्धिजीवी समुदाय के ही किसी व्यक्ति से इस प्रश्न का उत्तर पूछें तो वह या तो इसके लिए हमारे देश की जनता की पिछड़ी हुई चेतना और अशिक्षा या जाहिलपन और कूपमण्डूकता को जिम्मेदार ठहराता नजर आयेगा, या यह कहेगा कि जब बुद्धिजीवी समुदाय या एक ही पेशे में लगे हुए बुद्धिजीवी ही एकजुट नहीं हैं तो आम जनता की बात क्या की जाये। सोचने की बात है कि हमारे समाज के बुद्धिजीवियों का जो हिस्सा ईमानदार है, वर्तमान नग्न-निरंकुश उपयोगितावादी संस्कृति का शिकार नहीं हुआ है, ‘जैसी बहे बयार, पीठ तैसी तब कीजे’ के जीवन दर्शन को पचा नहीं पाया है वह अपनी जिन्दगी, आदर्शों और सिद्धान्तों की लड़ाई में अकेला क्यों है? वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों में नौकरशाहों और शेयर खरीदने एवं शोध चुराने वाले कथित वैज्ञानिकों के बीच ईमानदारी से शोध में लगा हुआ एक वैज्ञानिक घुटता हुआ पागलपन या आत्महत्या के मुकाम तक जा पहुँचता है। और यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक आम बात है। बहुत सारे शोध छात्र अपने शोध-निर्देशकों के घरेलू नौकर जैसी जिन्दगी बिताते हैं। उनके शोध-पत्रों पर बिना किसी योगदान के सबसे ऊपर उनके शोध-निर्देशक महोदय का नाम छपता है और यहाँ तक कि उनके कई शोध सीधे-सीधे अकादमिक डकैती के शिकार हो जाते हैं। सुप्रसिद्ध व्यंगकार हरिशंकर परसाई के शब्दों में कहें तो इस देश के बुद्धिजीवी शेर हैं, पर वे सियारों की बरात में बैंड बजाते हैं। जाहिर है सत्ता संस्थानों और व्यवस्था के साथ-साथ बुद्धिजीवी अपनी निष्प्रभावी भूमिका के लिए स्वयं जिम्मेवार हैं क्योंकि इनमें से अधिकतर फैंस पर बैठे नजर आते हैं।  विडम्बना यह कि न वे जनता के साथ शामिल होते हैं न ही ईमानदार बुद्धिजीवी के साथ।