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Monday 20 Nov 2017

शिक्षा सभी समस्याओं का समाधान है


रमेश तिवारी
64 बी, फेस 2
डीडीए फ्लैट
कटवारिया सराय
नई दिल्ली  110016
मो. 9868722444
उ.1. मेरे विचार से धर्मतत्ववाद और आतंकवाद में ढके और खुले का अंतर है। धर्मतत्ववाद को रुढि़वाद अथवा कट्टरवाद भी कहा जाता है। इन शब्दों के द्वारा हमें यह समझने की आवश्यकता है कि हमारे देश के सन्दर्भ में धर्म और राजनीति की क्या सामाजिक भूमिका अथवा स्थिति रही है। इसे स्पष्ट करने के लिए मैं स्मरण कराना चाहूंगा कि हमारे ही देश के एक विद्वान ने कहा है कि धर्म दीर्घकालिक राजनीति है और राजनीति अल्पकालिक धर्म। धर्म और राजनीति के अंतर्संबंधों को समझने के लिए मेरे विचार से इससे अधिक उपयुक्त कोई पंक्ति नहीं होगी। राजनीति में जब असहमति का बर्बर दमन करने का चलन बढ़ता है तो वह कट्टरवाद के रूप में सामने आता है। आतंकवाद में सीधे-सीधे हिंसक रास्ता अख्तियार कर अपनी मनमानी की जाती है जबकि धर्मतत्ववाद में सामाजिक जनमानस को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते हुए अपनी सभी अमानवीय गतिविधियों को न्यायोचित ठहराने की प्रवृत्ति प्रमुख रहती है। आतंकवाद में शासन व्यवस्था एवं समाज के अधिसंख्य जनमानस की भावनाओं की परवाह किये बगैर अपनी सभी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है जबकि धर्मतत्ववाद में पहले अपनी साजिशों की कामयाबी के लिए अनुकूल हवा बनाने की कोशिश की जाती है और अपने कार्यों के लिए पर्याप्त कारणों की जमीन तैयार की जाती है जिससे इनकी मंशा पर कोई शक न कर सके और यह स्वयं को न्यायोचित ठहरा सके। आतंकवाद सीधे-सीधे शब्द के प्रयोग करते ही समझ में आ जाता है इसका अर्थ मूर्त है जबकि धर्मतत्ववाद के साथ यह सुविधा नहीं है, यहाँ सबकुछ अमूर्त है। ऊपर की परत को हटाने के बाद ही आप यह जानने में सक्षम हो सकेंगे कि अपनी मूल प्रवृत्ति में आतंकवाद और धर्मतत्ववाद दोनों स्वभावत: एक जैसे ही हैं। सिर्फ नाम अथवा कहें कि चोला अलग-अलग है।
उ. 2  अपने समस्त गुण-दोषों के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज में सभी मनुष्यों के समुदाय एवं समाज हैं। इसमें सभी मनुष्यों और समाजों की अलग-अलग स्थिति होती है यह भी एक सच है। परंपरा से कुछ लोग उन्नत, कुछ मध्यम, और कुछ पिछड़े हुए दिखाई देते हैं। ध्यान रखनेवाली बात यह है कि जो भी परंपरा से उन्नत है अथवा रहा है वह अपने वर्चस्व को कभी भी खोना नहीं चाहता है। वह सदैव खुद ही समाज का दिशानिर्देशक और नियंत्रक बना रहना चाहता है। उनकी इच्छा रहती है कि उनकी मर्जी के बगैर एक पत्ता भी न खडक़े। समाज को निर्देशित-नियंत्रित करने की यह आकांक्षा ही उसमें वर्चस्व की भावना पैदा करती है। वर्चस्व की आकांक्षा ने ही नेतृत्व की ओर धकेला और मनुष्य नीति-निर्माता से होते हुए राजनीति की ओर अग्रसर हुआ है। राज को सँभालने और अपने मनोनुकूल ढंग से समाज को चलाने की आकांक्षा में जब बाधा उत्पन्न होती है तब राजनीति में अपने वर्चस्व को चुनौती देनेवाली शक्तियों पर नियंत्रण के लिए जिस रास्ते को अख्तियार किया जाता है उसी रास्ते पर आतंकवाद को स्वीकार करना पड़ता है। इसका निहितार्थ यह है कि राजनीति में अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए ही राजनीति और आतंकवाद एक-दूसरे के करीब हुए हैं। चूँकि सामाजिक-राजनीतिक-वैधानिक स्वीकृति राजनीति को प्राप्त होती है इसलिए राजनीति के पास अवसर अधिक होते हैं और वह प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय भूमिका अदा करती है। जबकि आतंकवाद के रास्ते पर यह व्यापक समर्थन और स्वीकृति का अभाव ही उसे राजनीति की शरण में रहने को विवश करता है। वह घोषित रूप से अथवा प्रत्यक्ष रह कर सक्रियता नहीं रख सकता। वैश्विक राजनीति के आतंकवाद के बीच पनपे और मजबूत हुए रिश्ते के पीछे भी यही मानसिकता हावी रही है। अमेरिका ने सदा इस दुनिया पर राज करने कोशिश की है और काफी हद तक सफल भी रहा है। उसके एकाधिकार को सोवियत संघ की वैचारिकता से खतरा था अत: अमरीकी कोशिशों और सोवियत संघ की कमजोरियों के कारण सोवियत संघ का विघटन हुआ और अमरीकी वर्चस्व को अपने एकाधिकार को लेकर दुश्चिंताएँ समाप्तप्राय हुईं। अमरीका ने अपने तुरुप के पत्ते के रूप में आतंक को जन्म दिया, पाला-पोसा और बड़ा किया। एक ऐसा भी समय आया जब उसका पत्ता उसके ही लिए खतरा लगने लगा। इस खतरे को दूर करने के उद्देश्य से अमरीका ने आतंक को ख़त्म करने की योजना बनायी और उसमें कामयाब भी हो गया। लेकिन समस्या यहाँ ख़त्म नहीं हुई। आतंक का एक अध्याय ख़त्म हुआ तो एक दूसरा अध्याय भी अपनी जड़ें ज़माने लगा जो आज आईएसआईएस के रूप में हमारे सामने है। इन परिस्थितयों में यह समझना उचित होगा कि वर्चस्व को बनाये रखने की भावना ने राजनीति को आतंकवाद से रिश्ता बनाने की प्रेरणा दी और जब वह अपना हित सध जाने के बाद उसे ख़त्म करना चाहता है तब तक वह इतना विकास कर लेता है कि एक की हत्या करते ही दूसरा सर जन्म लेकर अपनी उपस्थिति से सबको चौंका देता है।
उ. 3 मेरे विचार में वाम राजनीति की सबसे बड़ी खामी यही है कि उसने दुनिया को अमीर-गरीब, सर्वहारा-अभिजात्य के समूह में विभाजित तो कर दिया और अपनी प्रतिबद्धता भी निर्धारित कर दी किन्तु समाज में धर्म के चरित्र एवं सरोकारों की चर्चा करते हुए उसके उदात्त और धूमिल पक्षों की चर्चा न कर बड़ी ही संशय की स्थिति उत्पन्न कर दी है। अब भारत जैसे देश में जहां धर्म और जाति की जड़ें इतनी गहरी हैं वहां इसके कारण वाम राजनीति कई मुद्दों पर संशयग्रस्त नजर आती है जो उसके खिलाफ़ वातावरण तैयार करती है। इसलिए आपका यह प्रश्न बिलकुल जायज है। वाम राजनीति जितनी जल्दी इन गलतियों का निराकरण कर लेगा उतना ही उनके लिए (और समूचे मानव जगत के लिए भी) शुभ-संकेत होगा।
उ. 4  मेरी राय में शिक्षा सभी समस्याओं का समाधान है। इसे ‘मास्टर की’ इन्हीं अर्थों में कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों की कट्टरता को ईश्वरीय आदेश के बहाने क्रियान्वित कर मनुष्य को मनुष्य से दूर करने की, उसे पिछड़ा बनाये रखने की और अपना वर्चस्व बनाये रखने की भरपूर कोशिशें जारी हैं। हालात ऐसे हो गए हैं कि हम कब, कहाँ या किस दिशा में जाएँ, क्या पहनें, क्या खाएँ, यह भी धार्मिक ग्रंथों की कट्टरता ईश्वरीय और धार्मिक आदेश के रूप में प्रचारित करने की कोशिशें जारी हैं। ऐसी स्थिति में हमें जनमानस को संवेदनशील, समझदार और जागरूक बनाने की जरुरत है और संयमी भी। कट्टरपंथियों की साजिश का सबसे बड़ा जवाब है गंगा-जमुनी तहजीब और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की धारणा के अनुरूप समाज की सभी जीवन शैलियों को बढ़ावा देना, सामाजिक समरसता और सद्भाव का वातावरण कायम करना, और जनता को ऐसी कुटिल चालों के प्रति निरंतर सजग रखना। हमारी एकता ही उनके लिए सबसे बड़ा जवाब हो सकती है। इस एकता के हथियार से ही हम ऐसी शक्तियों को पराजित करने में कामयाब हो सकते हैं। वे हमें बाँट कर हम पर राज करना चाहते हैं और इसलिए सबको एक-दूसरे से अलग और अकेला करना चाहते हैं। हमें इन चालों से हमेशा ही सावधान रहना होगा।
उ.5 आपके इस प्रश्न से मैं सहमत नहीं हो पा रहा हूँ। धर्म के सारतत्व से आप का क्या आशय है? यदि मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेमभाव ही धर्म का सारतत्व हो तो यह रूढि़वादिता कहाँ से हुई? या धर्म के एक-दूसरे के प्रति विरोधी नजरिए की बात कर रहे हैं आप? यदि ऐसा है तो यह तो मानवाधिकार विरोधी ही कहा जा सकता है। लेकिन इसे कोई धर्म के सार तत्व के रूप में स्वीकार करे भी तो कैसे? धर्म की परिभाषा देते हुए कहा गया है धारयति इति धर्म:। अर्थात जो धारण करने योग्य हो वही धर्म है। धर्म की पात्रता जरुरी है कुपात्र को या विनाशकारी नकारात्मक बातों को धर्म के लबादे में पेश करने से वे धर्म नहीं हो जाएँगी। हिन्दी साहित्य के इतिहास में हम देखते हैं कि जो भक्तिकाल है उसे स्वर्णकाल कहा गया। इसका कारण यह है कि जनता के कवि जनता की पीड़ा को शब्दों में प्रस्तुत कर रहे थे। कबीर, रैदास, नानक, तुलसी, सूर, जायसी इत्यादि प्राय: कवि इसी पद्धति पर काव्य रचना कर रहे थे। तुलसीदास ने रामचरितमानस में धर्म-अधर्म को बड़े ही सामान्य शब्दों में परिभाषित करते हुए लिखा है - परहित सरिस धर्म नहीं भाई। परपीड़ा सम नहीं अधमाई।। आप देखिये इतने सामान्य और सरल शब्दों में बड़े-बड़े दार्शनिक भी धर्म और अधर्म को परिभाषित नहीं कर पाए। ऐसे अनेक उत्कृष्ट साहित्य सृजन के कारण ही इस काल को स्वर्णकाल कहा गया है। मैं इस प्रश्न को जितना समझ पा रहा हूँ उसके अनुसार यही कहना चाहूँगा कि धर्म का सारतत्व यदि मनुष्य को मनुष्य से दूर करना है तो निश्चय ही वह रुढि़वादी और मानवाधिकारविरोधी माना जाएगा। इससे मुक्ति के लिए धर्म की सही व्याख्या करनी होगी और केंद्र में मनुष्य को सर्वोपरि रखना ही होगा। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है - शोबार ओपार मानुष सत ताई ओपार केऊ नाइ। धर्म जब मनुष्य के हित की बात करेगा, उनको आजादी देगा, उनको एक-दूसरे के सुख-दु:ख में सम्मिलित होने के निर्णय की आजादी देगा तभी इन परंपरागत रुढि़वादी सोचों से मुक्ति संभव हो पायेगी।    
उ. 6 आपकी चिंताएँ बिलकुल जायज हैं। सारा खेल ही प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे और अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए किया गया है। हिंसा का जवाब अहिंसा से ही दिया जा सकता है, यह सूत्र हमें बीसवीं सदी के सर्वमान्य राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में प्रसिद्ध महात्मा गांधी ने बहुत पहले ही दे दिया है। हिंसा को हिंसा से ख़त्म करने की सोच कीचड़ से कीचड़ को साफ़ करने जैसी है जो कतई व्यावहारिक नहीं है। अब रही बात इस साजिश से आमजन को आगाह करने की जबकि प्रचार के साधनों पर भी उनका ही कब्ज़ा है। यह सवाल बड़ा ही मौजूं है और आज के संदर्भ में जो परिदृश्य रचा जा रहा है ईमानदारी से कहूँ तो इसकी काट आज व्यावहारिक धरातल पर कम से कम मुझे तो नहीं दिख रही है। लेकिन मनुष्य का जीवन जिजीविषा और उम्मीद के दो किनारों के सहारे ही निरंतर गतिमान रहता है, यह भी सच है। जिन सवालों के जवाब आज दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ रहे हैं, उनकी प्रतीक्षा धैर्यपूर्वक इस उम्मीद के साथ की जानी चाहिए कि निकट भविष्य में कोई न कोई सूरते हाल निकल कर आएगा जिसमें इन सवालों के जवाबों की चमक भी कौंधेगी। निश्चय ही परिस्थितियाँ विकट हैं किन्तु इन्हीं परिस्थितियों के मध्य कोई न कोई राह निकलेगी यह भी ध्रुवसत्य है।  
उ. 7 आपके इस सवाल के संदर्भ में मुझे राष्ट्रकवि दिनकर की ‘कुरुक्षेत्र’ में लिखी पंक्तियाँ याद आ रही हैं - शांति नहीं तब तक जब तक / सुख भाग न नर का सम हो / नहीं किसी को बहुत अधिक / और नहीं किसी को कम हो। युद्ध और शांति की समस्या को केंद्र में रखकर द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जिन अनुभवों से कवि गुजरा है यह काव्य उसी का परिणाम है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी तरह का असंतोष उपेक्षा से ही जन्म लेता है। यदि आप किसी के अधिकारों का हनन करेंगे, उसे अपनी दमन नीति का शिकार बनाएँगे तो विरोध तो होगा और इन विरोधों में कुछ विरोध हिंसक भी होंगे, यह तय है। सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि शासन की तरफ से सबको अपनी समस्याओं-जरूरतों को सरकार के समक्ष रखने के अवसर कराए जा रहे हैं या नहीं। उसके बाद यह भी देखना होगा कि जनता की तरफ से की गयी जायज मांगों के प्रति सत्ता-व्यवस्था का रुख कैसा है ! अपने इस प्रकार के व्यवहार से ही शासन जनता को अपने पक्ष में कर सकता है। जो आतंकवाद के रास्ते पर भटके हुए हमारे ही लोग हैं उनसे निरंतर संवाद करते हुए उन्हें समाज की मुख्यधारा में सम्मिलित करने की पर्याप्त कोशिश की जानी चाहिए। किन्तु यदि इन प्रयासों का कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं दिखाई पड़े तो हमें समाज और देश की अखंडता के हित में कठोर निर्णय भी लेने पड़ सकते हैं। इसलिए मेरी राय में शासन को खुले दिल-दिमाग वाला होना चाहिए और समाज एवं देश हित में लचीला रुख भी अख्तियार करना चाहिए। जनता के साथ निरंतर संवाद की स्थिति बनाकर हम जनभावनाओं को समझते हुए निर्णय ले सकते हैं और यह सदा ध्यान रखने की जरुरत है कि आतंक के रास्ते पर चलने वाले लोग भी हमारे ही हैं और इन्हें बातचीत से इन रास्तों से विमुख करने की हर कोशिश का स्वागत किया जाना चाहिए। यदि किसी कारणवश हमें हमारे उद्देश्यों में सफलता नहीं मिलती है और कठोर फैसले लेने की जरुरत हो तो भी हमें निजी राग-द्वेष के स्थान पर देश हित में ही ऐसे फैसले लेने की जरुरत है। इस प्रकार हम अपनी जनता में कम से कम असंतोष के अवसर उत्पन्न होने देने में कामयाब हो पाएंगे जो किसी भी शासन के दीर्घजीवी होने के लिए अनिवार्य है।     
उ. 8  निश्चित रूप से आपका सवाल और आपकी चिंताएँ जायज हैं। आप देखेंगी कि अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव में भी किस तरीके की उकसाने की बयानबाजी की जा रही है और वह  भी जनता के द्वारा नहीं बल्कि राष्ट्रपति के उम्मीदवार ट्रम्प के द्वारा। आज पूरी दुनिया में असहमति के लिए जगह निरंतर कम होती जा रही है और इसके जो दूरगामी परिणाम दिख रहे हैं वो बहुत ही चिंतित और भयभीत करने वाले हैं। दुनिया बारूद के ढेर की तरफ कदम-दर-कदम बढ़ती जा रही है। आज जो जितना उग्र और हिंसक है वह उतना ही बड़ा राष्ट्रवादी, धर्मप्रिय और देशभक्त साबित किया जा रहा है। देश कोई भी हो, प्रवृत्ति यही दिख रही है ज्यादातर हर देश में। असहिष्णुता का आलम यह है कि कोई अपनी गाड़ी दूसरे की गाड़ी से आगे निकाल ले जाए तो इसका बुरा मानते हुए लोग हत्या करने में भी संकोच नहीं करते। लोग सार्वजनिक स्थलों पर ऊल-जुलूल हरकतें करते हैं और यदि कोई भला मानुष अथवा स्त्री मना करे तो उसकी शामत आ जाती है। अपराधी से पुलिस और वकीलों का नजदीकी रिश्ता है जबकि इन्हें पुलिस से डरना चाहिए था क्योंकि पुलिस है ही इन पर नियंत्रण रखने के लिए। किन्तु होता उल्टा है, अपराधी जेल के भीतर हों या बाहर हमेशा मौज से रहते हैं और आम आदमी पुलिस से डरता है जबकि इसी आम आदमी को बल और भयमुक्त वातावरण देने के लिए पुलिस होती है। तो किताबी सच और जीवन का सच दोनों ही बड़ा विचित्र और अलग-अलग है। लोग अपनी ताकत के बल पर उग्रता को निरंतर बढ़ावा दे रहे हैं और इसे अपनी वैचारिकता और अस्मिता की जीत के रूप में देखने लगे हैं जो किसी भी समाज के लिए बहुत घातक और चिंताजनक है।     
उ.9  देखिये, सवाल तो आपका ठीक है लेकिन जहाँ तक मेरी मान्यता है कि राजनीतिक सिद्धांतों के कठमुल्लापन को आतंकवाद तो नहीं किन्तु आतंकवाद की पृष्ठभूमि के रूप में जरूर स्वीकार किया जा सकता है। राजनीतिक सिद्धांतों का कठमुल्लापन जिन हालातों की निर्मिति करता है उसकी अंतिम परिणति आतंकवाद ही है क्योंकि असहमत होने की स्वतंत्रता  और वैचारिक स्वतंत्रता दोनों का ही जघन्य रूप से दमन करती है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए दोनों ही बहुत बड़ी बाधक हैं यह तो है ही। बावजूद इन सबके आतंकवाद और राजनीतिक सिद्धांतों के कठमुल्लेपन को अलग-अलग ही समझना चाहिए दोनों एक नहीं हो सकते।
उ.10 वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में ही नहीं अपितु किसी भी वैश्विक परिदृश्य में बुद्धिजीवियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। जो भविष्य में घटित होने वाला है उसकी पहचान बुद्धिजीवी वर्तमान में ही करने में सक्षम होते हैं। बुद्धिजीवी समाज की यह जिम्मेदारी बनती है कि समाज के लिए कौन सी पद्धति (सामाजिक राजनीतिक या अन्य जो भी हों) से समाज का किस प्रकार भला अथवा बुरा होने वाला है इससे पाठकों को परिचय कराए। अब जिन विचारों की राजनीतिक पार्टियों को जनता को विभाजित कर वोट बैंक की भांति इस्तेमाल करना होता है उनका भेद न खुल जाए इसलिए उन्हें ऐसे बुद्धिजीवी समाज से सख्त नफरत होती है। बुद्धिजीवी समाज उनकी शत्रु सूची में सबसे ऊपर होता है। यह अकारण नहीं है कि देश भर के साहित्यकारों ने सम्मान वापसी के द्वारा देश की सरकार को और देश की जनता को वर्तमान के प्रति अपने असंतुष्ट होने का संकेत मात्र किया और सरकार की नींद उड़ गयी। सरकार की चिल्लाहट ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि सरकार के मन में चोर है। वरना वर्तमान सरकार ने किसी बुद्धिजीवी की कोई गाय थोड़ी खोल रखी है जिसके कारण बुद्धिजीवी उसका विरोध कर रहे हैं। सीधी बात यह है कि राजनीतिक पार्टी किसी न किसी प्रकार से लोगों को संतुष्ट कर अपनी राजगद्दी को निर्विरोध रखना चाहेगी और स्वयं को हर हाल में पाक-साफ़ सिद्ध करती रहेगी। ये शासक दल का चरित्र है इसे आप चाहें तो शासन की मजबूरी भी कह सकते हैं। जबकि बुद्धिजीवियों की हर हाल में देश की जनता को भविष्य और वर्तमान के प्रति जागरूक और तत्पर रखने की अघोषित किंतु नैतिक जिम्मेदारी है। दोनों जब अपने-अपने मार्ग पर चलते हैं तो राजनीतिक दलों की स्वार्थपूर्ति में सबसे बड़ी बाधा ये बुद्धिजीवी ही हैं। हालाँकि इन दिनों बुद्धिजीवी भी समझौते करते हुए अपने लिए निजी सुविधाएं बटोरते और समर्पण करते दिखाई देने लगे हैं। समाज में बुद्धिजीवियों की भूमिका को ख़ारिज करने के पीछे शासन की स्वार्थपरक राजनीति ही सक्रिय भूमिका अदा करती है और यह भी सच है कि कुछ प्रतिशत बुद्धिजीवी स्वयं अपनी निजी स्वार्थपूर्ति के लिए अपने ही चरित्र को दागदार बनाते हैं। समाज में एक पतनशील प्रवृत्ति का बढऩा और सामाजिक पतनोन्मुखता ही इसका एक प्रमुख कारण कहा जा सकता है।