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Friday 24 Nov 2017

धर्मतत्ववाद किसी भी धर्म का वह स्वरूप है जो स्थूल कर्मकांडों में सिमटकर रह जाता है।

रमाकांत श्रीवास्तव
एल एफ-1/ई-8/218
कनक स्ट्रिीट त्रिलोचन नगर
(त्रिलंगा)
भोपाल-462039 (म.प्र)
मो. 9977137809

उ.1 धर्मतत्ववाद किसी भी धर्म का वह स्वरूप है जो स्थूल कर्मकांडों में सिमटकर रह जाता है। अपने को ही सत्य और श्रेष्ठ होने के भाव में भरकर जब धर्म के ठेेकेदार अपने अनुयायियों को यह संदेश देने लगते हैं कि उन्हें छोडक़र शेष सभी विधर्मी और भ्रष्ट हैं अत: उन्हें सुधारने की जरूरत है। इसी बिन्दु से आतंकवादी सोच की शुरूआत होती है। यह सोच सभ्यता, संस्कृति के लिए खतरे के रूप में तब्दील हो जाता है।
उ.2 वैश्विक राजनीति में आतंकवाद का सहारा आधुनिक युग की गर्हित और दुखद घटना है। राजनैतिक सत्ता पर काबिज होने के लिए और अपने लाभ तथा दूसरों के शोषण के लिए कुछ देशों ने नस्ल और धर्म को आधार बनाकर आतंकी समुदायों की रचना की और उसे बढ़ावा दिया। हिंसा का सहारा लेकर अमरीका, इसराइल, पाकिस्तान, चीन जैसे देशों की सरकारों ने आतंकवादी गुटों का इस्तेमाल किया है। मानवाधिकारों का दम भरने वाला अमरीका इनमें अग्रणी है। मध्येशिया के क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए सरकारों को गिराने, बनाने और मदद करने के संबंध में उसकी भूमिका जगजाहिर है। अफगानिस्तान में रूस के प्रभाव को रोकने के लिए तालिबानों की सहायता करना। ईरान और इराक के तनाव में सहायक होना अमरीका की विदेश नीति का वह हिस्सा है जिसने आतंकी गुटों को बढ़ावा दिया। आज उनकी नीति ने भस्मासुर का रूप धारण कर लिया है किन्तु अच्छा आतंकवाद और बुरा आतंकवाद उसका नया चिंतन है। पाकिस्तान आतंकी संगठनों को तैयार करता है और प्रशिक्षण देता है। काश्मीर की शांति आतंकवादियोंकी हरकतों से निरंतर भंग होती है। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में आतंकी दलों को चीन का सहयोग मिला। इस्लामिक स्टेट बनाने के पागलपन ने हिटलर की नस्लगत श्रेष्ठता के भयानक विचार से उपजी घृणा के परिणामस्वरूप हुए नरसंहार की याद दिला दी है और भी कई उदाहरण हैं जो धर्मान्धता, वैचारिक कट्टरता और आर्थिक शोषण के लक्ष्य को पूरा करने के लिए आतंकी गतिविधियों के मूल में है।
उ.3 वाम राजनीति की यह भयंकर गलती थी।  अर्थचिंतन, वर्ग चेतना, ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ के प्रचार-प्रसार के साथ दार्शनिक स्तर पर धार्मिक कट्टरता के बरक्स उदार मानवीय विचारधारा के आधार को तैयार किए बिना धार्मिक तत्ववाद, कर्मकांड और अमानवीय कट्टरता से लोहा लेना संभव नहीं है। धर्मनिरपेक्षता सामाजिक जीवन का सत्य है। धर्म और आध्यात्म मानव समाज से आबद्ध ऐसे तत्व हैं जिनका खतरनाक प्रयोग प्रतिक्रियावादी संगठन करते हैं। हमारे इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों, शिक्षाशास्त्रियों ने अपने तर्कों से कट्टर विचारों से लोहा लिया है। उनके तर्कों से किनाराकशी करके हमने गलती की है। धार्मिक कट्टरता में विश्वास रखने वाले संगठन तो भगत सिंह और विवेकानंद को ले उड़े।
उ.4,5  दार्शनिक स्तर पर जिसे दूसरी परंपरा कहा गया है उसका इस्तेमाल हमारे समाज में कारगर होगा क्योंकि वह भी हमारी परंपरा है। वह विश्वदृष्टि को समझने में भी हमारी मददगार हो सकती है।
उ.6 यह बड़ी समस्या है। इसका समाधान क्या हो सकता है, मेरे लिए कहना कठिन है। यह बड़ी वैचारिक लड़ाई है। सब कुछ पूंजीवादी ताकतों के कब्जे में होने के बावजूद विभिन्न मोर्चों पर विचार मंथन और प्रतिरोध जारी है। प्रजातांत्रिक और वाम संगठनों के नि:स्वार्थभाव से आपसी तालमेल से ही कुछ संभव है। पूंजीवाद अपने ही अंतर्विरोधों से ढह जाएगा यह समझना बड़ी भूल होगी।
उ.7  कठोर नीतियों का होना जरूरी है किन्तु केवल उससे समस्या का समाधान संभव नहीं। शिक्षा का प्रसार और व्यापक वैचारिक विमर्श से फर्क आ सकता है। कारपोरेट की ताकत कम करके आंकने वाले संगठनों को अधिक सजग और व्यावहारिक होने की जरूरत है। अधिकांश सरकारें तो बेईमान है।
उ. 8  राजनैतिक सिद्धांतों का कठमुल्लापन अपने आपमें एक निम्न प्रकार का आतंक पैदा करता है। वह गैर जिम्मेदार और अमानवीय हो जाता है। इतिहास में इसके कई प्रमाण हैं। साम्यवाद जैसे मानवीय सिद्धांत का दुरुपयोग तक हुआ। राष्ट्रवाद-राष्ट्रवाद चिल्लाने वालों का कठमुल्लापन हम देख ही रहे हैं।
उ.10 बुद्धिजीवियों की भूमिका को खारिज करने के लिए भी राजनैतिक कठमुल्लापन जिम्मेदार है। किसी हद तक वे बुद्धिजीवी भी जिम्मेदार हैं जो जनता से कटकर अपना स्वायत्त बौद्धिक संसार रचते हैं।