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Saturday 25 Nov 2017

लोकरंग -2016


लोकरंग सांस्कृतिक समिति, जोगिया, फाजिलनगर, कुशीनगर के तत्वाधान में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला ‘लोकरंग’ इस वर्ष 7 और 8 मई को संपन्न हुआ। इस वर्ष, इस गंवई आयोजन को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान करने में 6 प्रांतों के आये सैकड़ों लोक कलाकारों ने महत्वपूर्ण योगदान प्रदान किया। लोकरंग 2016 में झारखंड सरायकेला का छाउ नृत्य, राजस्थान का तमाशा, जो गोपीचंद-भतृहरि की कहानी पर आधारित था, मध्य प्रदेश का गुदुम्ब बाजा और शैला नृत्य, सोनभद्र का करमा आदिवासी नृत्य और गाजीपुर का गोड़उ नृत्य विशेष आकर्षण रहे ।  पटना की नाट्य टीम ‘विश्वा’ ने दोनों रात एक-एक नाटक का मंचन किया।  सात मई की रात इस टीम ने फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध रचना तीसरी कसम की नाट्य प्रस्तुति की तो दूसरी रात परदेशी राम वर्मा की कहानी ‘पकड़’ पर आधारित नाटक ‘जो घर जारै आपना’ का मंचन किया। दोनों नाटकों का निर्देशन राजेश राजा ने किया था। इसके अलावा लोकरंग सांस्कृतिक समिति के छोटे सदस्यों ने, रंगकर्मी अभिषेक पंडित के निर्देशन में ‘जीअ मोरे राजा’ नाटक तैयार कर शानदार प्रस्तुति से सभी को चौंका दिया। इसके अलावा जनगीतों के गायन से पूरे देश में चर्चा का विषय बनी पटना की संस्था, हिरावल की प्रस्तुतियां भी लोगों का मन मोहने के साथ-साथ झकझोरने को विवश किया । रोहित वेमुला की आत्महत्या पर प्रस्तुत संतोष झा का गायन इतना पसंद किया गया कि दोनों रात इसकी प्रस्तुति देनी पड़ी। इस आयोजन का उद्घाटन समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक और सुप्रसिद्ध पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा ने किया। श्री वर्मा ने लोकसंस्कृति पर मौजूदा खतरों की ओर इशारा करते हुए कहा कि देश की हवा, धरती, वायुमंडल को बचाने के लिए लोकसंस्कृति की रक्षा जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोकसंस्कृति, लोककथाएं और लोककलाएं जनता के संघर्ष और चेतना को उन्नत करते हैं। सरकारी तंत्र और कार्पोरेट प्रायोजित मीडिया, अपसंस्कृति का प्रसार पूरी ताकत से कर रहा है। ऐसे में लोकरंग जैसे छोटी लड़ाई भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसी लड़ाइयां देश के कई हिस्सों में भी हो रही हैं और यह लड़ाई बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि लोकसंस्कृति में प्रतिरोध के बीज छिपे होते हैं। ये हमें कुरीतियों के खिलाफ जागरुक करती हैं। यह आज से नहीं बल्कि सदियों से होता आ रहा है। दुनिया के किसी भी हिस्से में जनआंदोलन होता है तब लोक संस्कृति, लोककलाएं सबसे आगे दिखायी देती हैं। चाहे बिरसा मुडा का संघर्ष हो, तेभागा का आंदोलन हो, नक्सलबाड़ी आदोलन हो या भारत का स्वाधीनता संघर्ष, लोककलाएं और लोकसंस्कृति उसमें सबसे मुखर रही हैं। लोक संस्कृति हमारे संघर्ष के बैरोमीटर की तरह होती हैं। श्री वर्मा ने इप्टा के आंदोलन को याद करते हुए कहा कि इप्टा के आंदोलन ने देश की जनता को बड़े दायरे में प्रभावित किया। आज चिंता की बात यह है कि लोककलाएं  अपने को किसी तरह से जिंदा किए हुए हैं। उन्हें खाद-पानी देने की कोशिश को छीनने की कोशिश हो रही है। अफ्रीका और तीसरी दुनिया के देशों में साम्रज्यवाद विरोधी संघर्ष में सांस्कृतिक आंदोलनों और बुद्धिजीवियों की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने साम्राज्यवादियों की तीसरी दुनिया की शिक्षा और संस्कृति को अपने अनुरूप ढालने की कोशिश को नाकामयाब किया। सत्ता की कोशिशें होती हैं कि लोकसंस्कृति में जीवन को शून्य कर दे, अपंग कर दे या खत्म कर दे लेकिन वे कामयाब नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि लोकसंस्कृति की जडं़े जनता में गहरे तक पैठी हुई हैं।    

मनोज कुमार सिंह, 559 एफ., विजय विहार, राप्तीनगर, फेज-1, गोरखपुर
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