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Tuesday 21 Nov 2017

माक्र्सवाद संसार का सबसे उम्मीदों भरा वाद है

राजकिशोर राजन
59, एल.आई.सी.कॉलोनी, कंकड़बाग, पत्रकारनगर, पटना-20
्रउ.1 धर्मतत्ववाद और आतंकवाद के संबंध में यह कहना कि ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’ पूर्णतया सत्य नहीं है। विश्व में धर्म से जितना रक्त बहा है और युद्ध हुए हैं उतने अन्य किसी कारणों से नहीं। धर्मतत्व की व्याख्या गलत ढंग से करने वाले कट्टरपंथी उसे ही धर्म का मूल तत्व मानते हैं जबकि मानवतावादी और उदार जन उसे कट्टरवाद/आतंकवाद। बदलते वक्त के साथ धर्म तत्ववाद के मौलिक स्वरूप जिससे इस प्रकार की भ्रांतियॉं फैलती हैं उन्हें बदलना होगा। साथ ही साथ अमेरिकी वर्चस्ववाद के षड्यंत्र को तोडऩा होगा। अगर शिया-सुन्नी एक हो जाएं, उसके आधार पर बॅंटे देश, धर्मगुरू एक हो जाएं तो अमेरिका की दाल कैसे गलेगी? अगर दाल गल रही है तो सिर्फ अमेरिकी पूॅंजीवाद को कठघरे में खड़ा करना राजनैतिक शिगूफेबाजी और समस्या का अतिसरलीकरण होगा।
उ. 2 एक हजार साल से अधिक समय तक क्रूसेड यानी इस्लाम और ईसाइयत के बीच युद्ध होता रहा। बुद्ध ने कहा है तृष्णा का मूल है। दोनों धर्मों में कहीं न कहीं दुनिया को अपने रंग में रॅंगने की जबरन कोशिशें हुई हैं। गोमों केन्यारा ने लिखा है कि जब ईसाई मिशनरी अफ्रीका में आए तो उनके पास बाइबिल थी और हमारे पास जमीन। उन्होंने हमें ऑंख बंद कर प्रार्थना करने को कहा। जब हमने ऑंखें खोली तो हमारे हाथ में बाइबिल थी और उनके पास हमारी जमीन। धर्म की राजनीति और अमेरिकी/योरोपीय पूॅंजीवाद ने मिल-जुल कर वैश्विक राजनीति के साथ आतंकवाद को कहीं न कहीं जोड़ दिया है। अमेरिकी पूॅंजी की भूख ने शिया-सुन्नी आदि मामलों को सींचा, एक देश को दूसरे के विरुद्ध खड़ा किया। अब तो रूस, चीन और यूरोप के कई देश भी तेल के खेल में शामिल हो चुके हैं।
उ. 3 माक्र्सवाद ने धर्म को अफीम क्या कह दिया माक्र्सवादियों ने उस अफीम से सदा के लिए दूर रहना उचित समझा। परन्तु यह भी सच्चाई है कि दुनिया में सबसे ज्यादा खेती, उसी अफीम की होती है। माक्र्स के पूर्वज बुद्ध ने कहा है कि मध्यममार्ग सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। माक्र्सवाद संसार का सबसे उम्मीदों भरा वाद है और बदली हुई परिस्थितियों में हर प्रकार की धार्मिक कट्टरता के विरूद्ध खड़ा होना तथा साथ ही हंसुआ, कुदाल, खुरपी से अफीम की खेती नष्ट करना होगा। अफीम की खेती देख नजर घुमा लेने से यह खेती बढ़ती ही जाएगी और फिर एक दिन पता चलेगा, हम जिस जमीन पर खड़े हैं वह अफीम का खेत है।
उ. 4 संसार के लोगों को तार्किक रूप से समझना पड़ेगा कि ईश्वर ने मनुष्य की दुनिया की सृष्टि नहीं की है। अपितु मनुष्य ने सदियों से एक-एक कर उनकी सृष्टि की है। परन्तु वर्तमान में यह दुष्कर और प्राय: असंभव कार्य प्रतीत होता है। वैसे में आध्यात्मिक, शैक्षिक रूप से मनुष्य को दृष्टि सम्पन्न करना होगा। मानवतावादी विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाना होगा। यह कार्य भी कठिन प्रतीत होता है चूंकि राजनीति और धर्म की संधि हजारों साल से चली आ रही है। परन्तु कोशिश हो तो कामयाब हुआ जा सकता है।
उ. 5 धर्म वह है जिसे हम मन, वचन, कर्म से धारण करते हैं- ‘धारयति: इति धर्म:’। धर्म का यह सारतत्व मनुष्य को मनुष्य बनाता है।  जो लोग इसे रूढि़वादिता बतलाते हैं वे धर्म और रिलीजन के अंतर को नहीं जानते या जानते भी हैं तो राजनीतिक विरोध करते हैं। जिसे राजनैतिक उपकरण बना दिया गया है। धर्म का सारतत्व, मानवतावादी, अहिंसावादी, बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय है। वह रूढि़वादी कैसे हो सकता है? इससे मुक्ति पाने के लिए संकीर्णतावादी दृष्टिकोण से विचार करने वालों को धर्म के सारतत्व की शिक्षा देनी पड़ेगी, इन्हें समझना होगा कि धर्म का सारतत्व मानव विरोधी नहीं मानव हितैषी है।
उ. 6 इस प्रश्न का उत्तर देना सहज नहीं है चूंकि सोते हुए को जगाया जा सकता है, जागे को कौन जगा सकता है। पश्चिम के इस षड्यंत्र को क्या सीरिया, इराक आदि देशों के शासक बुद्धिजीवी नहीं समझते होंगे। पश्चिमी मीडिया का भले वर्चस्व हो, स्थानीय मीडिया के अलावा अल-जजीरा जैसे कई अन्य चैनल तो है। दरअसल सभ्यता के संघर्ष के साथ-साथ खाड़ी के देश हों या अन्य देशों के बीच परस्पर अविश्वास, राजनैतिक महत्वाकांक्षा आदि भी इनकी अस्थिरता के कारण हैं।
उ. 7 आतंकवाद को खत्म करने के उपाय दिखाने भर के लिए भारत सहित कई देशों ने समय-समय पर अपनाया। उनमें सफलता तो नहीं मिली अलबत्ता परिस्थति और उलझ गई। रेणू जी शब्द में यह ‘धुरखेल’ है। बुद्ध ने कहा कि घृणा को घृणा से, बैर को बैर से समाप्त नहीं किया जा सकता। आतंकवाद को आतंक फैला कर खत्म करने का प्रयास करने वाले अग्नि को और तेज प्रज्ज्वलित कर रहे हैं।
उ. 8 यह समस्या महानगरों के पढ़-लिखे संभ्रांत द्वारा सृजित की गई है। कस्बों, गांवों और छोटे शहरों में यह कुछेक अपवादों को छोडक़र नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ऐसी नकली रेडीमेड खबरें बना कर सहजता से धन कमा रही है। उसे इस विशाल देश के असंख्य बुनियादी समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है। ऐसे खबरें विज्ञापन के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। अपने देश में कई घटनाएं घटी हैं जिनका उदाहरण देना भी हास्यास्पद प्रतीत होता है।
उ. 9 राजनैतिक सिद्धांत में कठमुल्लापन, कहीं न कहीं प्रकारांतर से उस अहसज संवादहीनता की स्थिति को पुष्पित-पल्लवित करती है, जहां से उन्मादी वातावरण का निर्माण हो रहा है। हां उसे आतंकवाद से जोडऩा ऊपरी तौर पर भले संगत नहीं लगे परन्तु वास्तविकता यही है कि वह उसमें सहायक है।
उ. 10 बुद्धिजीवियों की भूमिका को कोई खारिज कर सकता है तो बुद्धिजीवी ही कर सकते हैं। आज के परिदृश्य से बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका रंगा सियार बन बैठा है, मेरूदंडविहीन, घोर अवसरवादी है।