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Wednesday 22 Nov 2017

आस्तिकता और धर्म एक ही चीज़ नहीं हैं

 

राजेश जोशी
11 निराला नगर , भदभदा रोड , भोपाल 462003
 मो 094 245 79 277.
्रउ.1 धर्म एक ऐसी शक्ति संरचना है जो दुनिया के हर देश में राजसत्ता पर वर्चस्व पाने के लिये तरह-तरह से कोशिश करती है। वह अपने अनुयायियों में से कुछ को आक्रामक तत्ववादियों की तरह तैयार करती है जिससे राजनीतिक सत्ता को पाने के लिये जनता का ध्रुवीकरण करने में वह सफल हो सके । हम अपनी ही लोकतान्त्रिक प्रणाली और प्रक्रियाओं में देखें तो एक हद तक फंडामेंटलिस्ट अपनी गतिविधियों और प्रचार अभियान से ध्रुवीकरण की कोशिश में कई बार सफल हो जाते हैं और इसके राजनीतिक लाभ दक्षिणपंथी शक्तियों को प्राप्त होते हैं। इन कोशिशों के अलावा धार्मिक शक्ति संरचना राजसत्ता पर वर्चस्व पाने के लिये संगठित आतंकवाद का सहारा लेती है। धार्मिक शक्ति संरचना आर्थिक रूप से तो बहुत सम्पन्न है ही, उसके पास अपने अंध-अनुयायियों की भी बड़ी संख्या है। इन्हीं में से वे नये-नये आतंकवादियों को तैयार करती है। अनेक ऐसी साम्राज्यवादी शक्तियाँ जो दुनिया में अपना राजनीतिक और आर्थिक वर्चस्व बनाने या बनाये रखने में लगी हैं, भी आतंकवादी समूहों को मदद करती हैं बल्कि अनेक आतंकवादी समूहों को खड़ा करने का काम करती हैं, जिससे दूसरे ऐसे मुल्कों में जहां साम्राज्यवादियों का राजनीतिक वर्चस्व नहीं है वहां वे दूसरे समूहों की सत्ता पलट करवा कर अपने पि_ुओं को बिठा सकें। अलकायदा या आई एस जैसे आतंकवादी समूह अमरीका की मदद से ही खड़े हुए थे।
 उ. 2  इसका उत्तर मेरे पहले जवाब में आ चुका है ।
उ.3 धर्म जैसी शक्ति संरचना को इस तरह बांटकर देखना उसे न समझना है। धर्म अपने आप में कट्टरतावादी या उदार नहीं होता। वह बहुत सारी दीगर चीजों का अपने लिए अनुकूलन कर लेता है। जैसे वह मनुष्य की आस्तिकता और न समझ मेंं आने वाले प्राकृतिक प्रकोपों से पैदा हुए भय को अपने लिए उपयोग कर लेता है। जबकि आस्तिकता और धर्म एक ही चीज़ नहीं है। धर्म का अपना शास्त्र है। इसी तरह धर्म जनता की सामूहिक चेतना से रचे गये मिथकों को अपनी सम्पत्ति बना लेता है और उनकी बहुलता से काटकर उन मिथकों को एकांगी बना देता है। राम या कृष्ण धर्म की सम्पत्ति नहीं हैं। वह राम जैसे मिथक को उसकी तीन सौ से अधिक कथाओं से काटकर किसी एक पाठ में केन्द्रित कर देता है। इसी तरह वह दर्शन की अनेक धारणाओं को अपने लिये अनुकूलित कर लेता है। ये सभी चीजें याने दर्शन, मनुष्य की आस्तिकता, भय और मिथक के बनने या रचे जानें में धर्म की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है ।
उ.4 इसी को व्याख्या की राजनीति कहा जाता है। जब कुछ अच्छे अध्येता धार्मिक कट्टरतावादियों द्वारा की जाने वाली व्याख्याओं का विरोध करते हैं या धार्मिक ग्रंथों की सही व्याख्या की कोशिश करते हैं तो उन्हें तरह-तरह से प्रताडि़त किया जाता है यहाँ तक कि कभी-कभी मार दिया जाता है। धर्म की शक्ति संरचना अधिक शक्तिशाली होती है। प्रख्यात चिंतक असगर अली इंजीनियर को बार-बार जिस तरह की प्रताडऩा दी गयी या जिस तरह हाल ही में कन्नड़ के प्रख्यात लेखक कलबुर्गी को घर में घुस कर धार्मिक फंडामेंटलिस्टों द्वारा गोली मारी गयी, ये इसी के उदाहरण हैं। यह एक लम्बी लड़ाई है। लडऩे के सारे उपकरणों का उपयोग ज़रूरी होता है। धार्मिक कट्टरतावादियों से वैचारिक लड़ाई भी ज़रूरी है और कई बार उनसे लोकतान्त्रिक सरकारों को सैनिक कार्रवाई द्वारा भी निपटना होता है ।
उ.5  मानव अधिकार धर्म की जकडऩ से जितना मुक्त होंगे उतना ही मानवाधिकारों के पक्ष में होगा।
उ.6 मैंने शुरू में ही कहा कि यह राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई है। अफगानिस्तान में समाजवादी सत्ता को उलटने के लिये अमरीकी साम्राज्यवाद की शै पर ही अलकायदा का जन्म हुआ और आईएस भी अमरीकी कोख से ही पैदा हुआ आतंकवादी गिरोह है। इसलिए धर्म के संदर्भ में नहीं साम्राज्यवादी राजनीति के संदर्भ में इन सभी गतिविधियों की व्याख्या की जानी चाहिए। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के बीच तनाव हो या एक ही धर्म के दो समुदायों के बीच का तनाव हो ये सभी नकली तनाव हैं जो दक्षिणपंथी राजनीतिक शक्तियों के जरिये खड़े किये जाते रहे हैं और किये जा रहे हैं। साम्राज्यवाद तेल और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा करने के लिये नकली आरोपों के सहारे युद्ध थोप रहा है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आतंकवाद को बढ़ावा भी दे रहा है। इसमें साम्राज्यवादी देशों की शस्त्र-कम्पनियों की भी भूमिका काम करती रही है। लेकिन आतंकवाद जब स्वयं शक्तिशाली हो जाता है तो वह उन्हीं शक्तियों के प्रति बूमरेंग हो जाता है, जिन्होंने उसे पैदा किया था और तब साम्राज्यवाद को उसके कुछ समूहों को सामयिक तौर पर खत्म करने का निर्णय लेना पड़ता है। इससे ऐसा भ्रम पैदा होता कि साम्राज्यवाद आतंकवाद का विरोधी है जबकि यह उसी की संतान है ।
  उ.7 आतंकवाद के साथ बातचीत कोई बहुत कारगर उपाय नहीं रही है। ऐसे प्रयास पहले किये गये हैं। अन्ततोगत्वा उसके खिलाफ़  एक सख्त  कार्रवाही करनी ही होती है। लेकिन आतंकवाद को पैदा करने वाली साम्राज्यवादी शक्तियों के खिलाफ़  भी एक विश्वव्यापी जनमत तैयार करके उस पर दबाव बनाये जाने चाहिए जिससे वह आगे से इस तरह की शक्तियों का समर्थन करना और उन्हें मदद करना बंद करे। साम्राज्यवाद की इन कोशिशों पर जब तक लगाम नहीं लगेगी आतंकवाद से छुटकारा नहीं हो सकता ।
 उ.8 यह नई लड़ाई नहीं है। असहिष्णुता और वैचारिक स्वतंत्रता के बीच समय-समय पर हमेशा ही विवाद होता रहा है। वर्तमान में दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी जैसे लेखक चिंतकों की हत्या और उसके बाद लगातार साम्प्रदायिक तनाव, दादरी में की गयी एक गरीब अल्पसंख्यक की हत्या और फिर रोहित वेमुला को आत्महत्या के लिये बाध्य करना और फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष पर झूठे आरोप लगाकर उसे गिरफ्तार किया जाना। गोमांस खाने और नहीं खाने का विवाद, देशभक्ति और देशद्रोह जैसे विवाद और अब भारतमाता की जय बोलने का विवाद ये सारे विवाद वैचारिक स्वतंत्रता के विरूद्ध असहिष्णुता का एक माहौल बनाकर राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की जा रही है ।
अस्मिता का सवाल अगर दमित वर्ग या लिंग से जुड़ा है तो वह महत्वपूर्ण हो सकता है और उससे नया वैचारिक माहौल बन सकता है। बना भी है। दलित, आदिवासी और स्त्री विमर्श इसी के परिणाम हैं। इसलिए असहिष्णुता के मुद्दे से इसे जोड़ कर नहीं देखा जा सकता।
उ.9 राजनीतिक कठमुल्लापन उन्हीं राजनीतिक शक्तियों में पहले से है और कुछ बढ़ा भी है जो राजसत्ता पर कब्ज़ा करने के लिये हमेशा से ही साम्प्रदायिकता का और धार्मिक शक्ति संरचना का उपयोग करती रही हैं। आतंकवाद से उनके नाभिनालबद्ध संबंध हैं चाहे वे आतंकवाद का विरोध करते हुए जान पड़ते हों।
उ.10 किसी भी देश में दो तरह की सत्ताएं होती हैं। एक राजनीतिक सत्ता और दूसरी बौद्धिक और सृजनात्मक सत्ता। बौद्धिक सत्ता किसी भी समाज के बौद्धिकों और सृजनशील रचनाकारों द्वारा अर्जित की गयी सत्ता है। यह सत्ता बिना किसी शोर-शराबे के समाज की व्यापक चेतना को निर्मित करने का काम करती है। इसे आसानी से समझना मुश्किल है। लेकिन जनता का सहज बोध और बौद्धिक सत्ता द्वारा निर्मित व्यापक चेतना किसी भी जनविरोधी ताकत को उलट देने की सामथ्र्य रखती है। भारतीय संदर्भ में आपातकाल और एनडीए की अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकारों का अप्रत्याशित हश्र इसी का उदाहरण है। दिल्ली और बिहार के चुनाव भी इसको समझने का उपाय हो सकते हैं। बुद्धिजीवियों की भूमिका को सत्ता हमेशा ही खारिज़ करती है क्योंकि वह उससे डरती है। मीडिया वह चाहे इलेक्ट्रानिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया उसका भी एक बड़ा हिस्सा सरकार की कृपाओं पर आश्रित होने के कारण बुद्धिजीवियों की भूमिका को कमतर करके आंकने का काम करता है। हिंदी भाषा में काम करने वाला मीडिया बहुत अधिक संख्या में दोगली भूमिका निभाता रहा है ।