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Monday 20 Nov 2017

संचार युग में संवाद की विच्छिन्नता त्रासदी है

पुष्प रंजन
जी-901, पवित्रा अपार्टमेंट्स,
वसुंधरा एन्क्लेव, दिल्ली-96,
मो. 9971749139

उ.1 जिस  फंडामेंटलिज्म (धर्मतत्ववाद) की हम बात करते हैं, दरअसल उसका सबसे पहला इस्तेमाल उन लोगों ने किया, जिनका भरोसा ईसाइयत पर था। 1876 में ‘नाइग्रा बाइबिल कांफ्रेंस’ में सबसे पहले ‘फंडामेंटलिज्म’ शब्द पर चर्चा हुई, और यह तय हुआ कि जो लोग प्रभु यीशु के बताये मार्ग पर चल रहे हैं, उन्हें ‘ क्रिश्चियन फंडामेंटलिस्ट मूवमेंट’ का प्रवर्तक मान लेना चाहिए। नाइग्रा जल प्रपात की तरह यह विचारधारा तेज़ी से फैली। अमेरिका से यूरोप, और फिर एशिया-अफ्रीका तक उन धर्मावलंबियों के बीच भी ‘फंडामेंटलिज्म’ का विस्तार हुआ, जो ग़ैर ईसाई थे।
यह दिलचस्प है कि ‘फंडामेंटलिज्म’ शब्द के अस्तित्व में आने के 81 साल पहले ‘टेररिज्म’ के बारे में चर्चा होने लगी थी। फ्रेंच गणराज्य में ‘टेरर’ शब्द का इस्तेमाल 1795 में ‘सिकारी’ नामक एक धार्मिक समूह के लिए किया गया। ‘सिकारी’ रोमन शासन के विरूद्ध फिलिस्तीन वाले इलाके़ में 66 से 73 ईस्वी तक लड़ चुके थे। सीरिया और मिस्र के पहले सुलतान सलादीन के विरूद्ध लडऩे वाले ‘इस्माइली’ और ‘निज़ारी’ को ‘धार्मिक अतिवादी’ कहा गया। ‘धार्मिक आतंकवाद’ को भी दो श्रेणियों में बांटा गया। एक, जिसका उद्देश्य राजनीतिक हो, और धर्म के सहारे अपने मकसद को हासिल करना चाहता हो। दक्षिणी सूडान और युगांडा में जोसेफ कोनी ने एक धार्मिक संगठन, ‘लाडर््स रेजीस्टेंस आर्मी’ का गठन किया था। ईसाइयत के नाम पर राजनीति करने वाले इस समूह ने हत्या, अपहरण, बाल यौनदासी बनाने जैसे जघन्य अपराध किये, जिसकी वजह से अमेरिका ने इसे आतंकी संगठन घोषित किया। बोको हराम, और आइसिस के आतंकी धर्म की आड़ में वही करते रहे हैं। दूसरा, वैसे लोग भी हैं, जो धर्म का इस्तेमाल लोगों को डराने-धमकाने, गुमराह करने, खानपान से लेकर पाठ्य पुस्तक, पहनावा तय करने, धर्मग्रंथों की ग़लत व्याख्या कर सामाजिक समरसता को समाप्त करने में लगे हुए हैं।
इससे अलहदा एक दूसरी सोच है, जिसमें ईश्वर को अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ‘यदा-यदा ही धर्मस्य’ के पीछे मूल भाव यही है कि हर युग में एक अवतार का जन्म होगा जिनके द्वारा ’अत्याचारियों’ का सर्वनाश होता रहेगा। क्या इस ‘अवतार’ के अभ्युदय का कोई वैज्ञानिक आधार है? गीता जैसा ही ज्ञान ‘हिब्रू बाइबिल’ में दिया गया है। यहूदियों के ईश्वर (गॉड ऐज ए वारियर) सभी धर्मों के अवतारों से सर्वश्रेष्ठ हैं, इसे कठोरता से मानने को कहा गया है। इस्लाम में ‘अल्लाह हो अकबर’ के पीछे लगभग यही भावना है। म्यांमार में ‘बुद्धम शरणम् गच्छामि’ का संदेश फैलाने वालों ने रोहिंग्या मुसलमानों पर कितना कहर बरपाया, इसे दुनिया ने देखा है।
 आतंकवाद के बारे में अब तक समग्र और सर्वमान्य व्याख्या नहीं हो पायी है। ‘जर्नल ऑफ  ग्लोबल पीस एंड कंफ्लिक्ट’ ने जून 2014 की रिपोर्ट में चर्चा की कि पूरी दुनिया में आतंकवाद के बारे में अब तक 212 परिभाषाएं लिखी गई हैं, जिनमें से 90 ‘डेफिनिशन’ सरकारों और उनसे जुड़ी संस्थाओं ने तय की हैं। ‘धार्मिक आतंकवाद’ सबसे ताज़ा बहस के केंद्र में है, जिसमें कई सारे विषयों को रस्सी की भांति लपेट लिया गया है।
उ.2 वाशिंगटन ने तय कर लिया कि 9/11 हमला वैश्विक राजनीति और आतंकवाद के बीच उभरते रिश्ते का परिणाम था। यह सौ फीसदी सही नहीं है। उससे पहले1985 में एयर इंडिया विमान को सिख अतिवादियों ने उड़ा दिया था, जिसमें 331 लोग मारे गये थे। अफसोस कि यह अमेरिका के लिए वैश्विक आतंकवाद का विषय नहीं था। 1980 में जब सलाफी जिहादी तैयार किये जा रहे थे, तब इस पर विचार करने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि ये लोग एक दिन अलक़ायदा का रक्तबीज बनेंगे। 1988 में तोरा बोरा की पहाडिय़ों में जब ओसामा बिन लादेन और अब्दुल्ला अज्ज़म, अरब जिहादियों के साथ सोवियत संघ से मोर्चा लेने के वास्ते बंदूकें उठा चुके थे, तब तक सब कुछ ठीक था। सोवियत सेनाएं जब अफगानिस्तान से उखड़ गईं, तब भी अमेरिका के नुक्ते नजऱ से आतंकवाद का पदार्पण नहीं हुआ था। लेकिन जैसे ही वल्र्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर पर 9/11 हमला हुआ, तय हो गया कि अफगानिस्तान आतंकवाद का ‘एपीसेंटर’ था। मतलब, अमेरिका ने जो कह दिया, उसे दुनिया मान ले। बामियान से सीरिया तक एशियाई विरासत के ध्वंस होने पर क्या कभी संयुक्त राष्ट्र में बहस हुई है?
आतंक की फैक्ट्रियां चलाने वाला पाकिस्तान तर्क देता है कि जब रूस, अमेरिका, और यूरोप के समृद्ध देश दहशतगर्द तैयार कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? सऊदी अरब सुन्नी अतिवाद को ऊर्जा देने वाला सबसे बड़ा मुल्क है। उसके बरक्स शिया आतंकवाद को आगे बढ़ाने वाला ईरान, ‘हिज़बुल्ला’, ‘अल हूती’ जैसे सौ से अधिक अतिवादी समूहों का सरमायेदार बना हुआ है। आज की तारीख में सऊदी अरब, और ईरान दोनों अमेरिका के दोस्त हैं। दुनियाभर में ‘आतंकवाद’ की विवेचना करने वालों के अपने-अपने फंडे हैं। लेकिन शब्दों पर बहस की गुंजाइश को निषेध कर देना भी सरकार संरक्षित अतिवाद है। शायद इस वजह से ‘रेवोल्यूशनरी टेररिस्ट’ शब्द पर राष्ट्रव्यापी विमर्श नहीं हो पाया।
उ.3    औरतों को काबू करने के लिए कट्टरवाद का सहारा युगों से लिया जा रहा है। ‘ऑनर किलिंग’ की पहली शिकार औरत होती हैं। बाज़ दफा, भारत की वाम राजनीति कठमुल्लेपन की मज़म्मत से बचती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर औरतों पर जिस तरह के सितम ढाये जाते हैं, वाम राजनीति के लिए कभी यह पुरज़ोर बहस का हिस्सा नहीं बना। ईसाइयत के नाम पर केरल से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों तक फैले फरेब को भारतीय वाम राजनीति अनदेखा करती है। धर्म को अपनी ‘सेक्युलर राजनीतिक सुविधा’ का हिस्सा बना लेना भी हिन्दुस्तानी वामपंथ को सवालों के घेरे में ला खड़ा करता है। अन्तोनियो ग्राम्शी, इटैलियन कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक रहे थे। ग्राम्शी ने ‘बुर्जुआ क्लास बुद्धिजीवी’ और ‘सर्वहारा बुद्धिजीवियों’ के बीच फर्क किया था। ग्राम्शी के अनुसार, ‘सर्वहारा बुद्धिजीवी गांव देहात से लेकर शहरी गऱीबों की सांस्कृतिक, बौद्धिक चेतना पर विमर्श करते हैं।’ ‘सांस्कृतिक चेतना’ से ग्राम्शी का आशय यह था कि धर्म के उदार मानवीय स्वरूप पर संवाद की गुंजाइश सर्वहारा बुद्धिजीवी बनाये रखते हैं। माक्र्सवादी फलसफे में कल्चरल हिजेमनी (सांस्कृतिक आधिपत्य) की जब व्याख्या होती है, तब पता चलता है कि समाज में व्याप्त मान्यताओं, कुरीतियों का सत्ताधारी वर्ग कितनी चालाकी और क्रूरता से इस्तेमाल करता है। ग्राम्शी की अवधारणा यह थी कि अभिजात्य, या सत्ताधारी वर्ग जिस बुर्जुआ सांस्कृतिक चेतना का चोबदार बना हुआ है, उससे बड़ी लकीर सर्वहारा सांस्कृतिक आंदोलन के ज़रिये खींची जा सकती है। ग्राम्शी ने यह बात 1921 में की थी, लेकिन उसके 95 साल बाद, 2016 में लगता है जैसे इस चिंतन की ज़मीन भारत में तैयार की जा सकती है।
मुराद यह कि धर्म सिर्फ़  अफीम नहीं है, उसके सकारात्मक पक्ष भी हैं, जो समाज में सहिष्णुता, आपसी सहयोग, और विकास के दरीचे खोलते हैं। आज भारत में धार्मिक संस्थाएं लंगर चलाती हैं, अस्पताल में मुफ्त इलाज की सुविधाएं देती हैं, अनाथ बच्चों, वृद्धों को सहयोग देने के वास्ते हाथ आगे बढ़ाती हैं, स्वच्छता उसके अजेंडे में है। ऐसे में उसके सकारात्मक पक्ष को स्वीकार करने से वामपंथ को क्यों परहेज होना चाहिए? धर्म और अंधविश्वास की आड़ में जो गंदगी फैली हैं, उसे फिल्टर कर उपयोगी क्यों नहीं बनाया जा सकता?
उ.4 धार्मिक कट्टरता को ईश्वरीय आदेश के रूप में पालना कराने वालों को सबसे पहले तर्क और विवेक के ज़रिये रोका जा सकता है। 21वीं सेंचुरी, सोशल मीडिया की सदी है, जो रूढि़वाद को रोकने और अंधविश्वास को ‘एक्सपोज’ करने के वास्ते एक कारगर हथियार है। हमारा विवेक और विज्ञान, बहुत सारे ‘ईश्वरीय आदेशों’ को ख़ारिज़ करता है। ऐसा नहीं होता, तो देवदासी प्रथा अब तक होती। अब तक लोग मंदिरों में गणेश जी की मूर्ति को दुग्धपान कराते रहते। धर्म आवश्यक बुराई है, क्या यह बोलकर उसे ख़ारिज़ कर दें? अथवा, धर्म में जो आवश्यक अच्छाई वाले तत्व हैं, उसे स्वीकार करें?
सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप में आर्थोडॉक्स चर्च को जड़ से मिटा देने के लिए दो लाख से अधिक पादरी और धर्मावलंबी मौत के घाट उतार दिये गये। लेकिन इससे आर्थोडॉक्स चर्च की बुनियाद समाप्त नहीं हो गई। अगस्त 2012 में रूस में सर्वे हुआ, तो पता चला कि अब भी आर्थोडाक्स चर्च को मानने वाले लोग 41 फीसदी हैं। साथ ही सुन्नी, शिया, अहमदिया इस्लाम को मानने वाले रूसी 6.5 फीसदी हैं। जो ईश्वर में आस्था नहीं रखते, वैसे रूसियों की संख्या 5.5 प्रतिशत है। सबसे ताज़ा यूरोपियन सोशल सर्वे (ईएसएस) में बताया गया कि 46 प्रतिशत रूसी आबादी ‘नॉन रिलीजियस’ है।
7 नवंबर 1917 को अक्टूबर क्रांति हुई थी। इसके सौ साल पूरे होने में बस एक बरस बाक़ी है। अक्टूबर क्रांति का आगाज़ करने वाले उस देश में क्या धर्म जड़ से समाप्त हो गया? धर्मान्धों की संख्या और कट्टरता को कम करने के वास्ते तार्किक विमर्श और संवाद ही सबसे बड़ा हथियार है।
उ.5  इस पर हमें गर्व होना चाहिए कि दुनिया के सभी बड़े धर्मों का जन्म एशिया में हुआ। ईसाई, इस्लाम, यहूदी, पारसी, जैन, बौद्ध, हिंदू, सिख धर्मों का सारतत्व क्या हो सकता है? मानवता, अहिंसा, सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा, पेड़-पौधों से लेकर पशु, ब्रह्मंाड में विस्तृत जीवन को संरक्षित करना, यही तो धर्म का सारतत्व है। अंधविश्वास और धार्मिक कुरीतियों को सुधारने के लिए हमारे समाज में कबीर, रैदास, पेरियार ईवी रामास्वामी, अरविंदो, स्वामी विवेकानंद, राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद विद्यासागर, पांडुरंग शास्त्री आठवले, ज्योतिबा फुले जैसे सैकड़ों महापुरूष आये। इन समाज सुधारकों ने धर्म का बहिष्कार नहीं किया, उसमें व्याप्त कुरीतियों को ठीक किया। मगर, अब उल्टा हो रहा है। संत समागम में ‘मेरी कमीज़, तुम्हारी कमीज़ से ज़्यादा सफेद है’, इसे साबित करने के वास्ते अमर्यादित बहस होती है। धर्म के सारतत्व पर चिंतन कम होता है। यह फिर उन्हें अवसर दे देता है, जो धर्म के सारतत्व पर रूढि़वादिता का ठप्पा लगाकर उसे मानवाधिकार विरोधी बताने के प्रयोजन में लगे रहते हैं। मगर, इसमें दोष सिर्फ मानवाधिकार के ठेकेदारों का नहीं है।
कुछ दिन पहले संपन्न ‘सिंहस्थ अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ’ का सरकारी ढोल ख़ूब पीटा गया। अखबारों में छपे फुल पेज विज्ञापनों में बड़े गर्व से बताया गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना समापन के अंतिम दिन उपस्थित रहेंगे। यही सिंहस्थ विचार महाकुंभ का ‘यूएसपी’ था। ‘सिंहस्थ अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ’ में तीन दिनों तक किन-किन धार्मिक विषयों पर विमर्श हुआ, इसका तसव्वुर शिप्रा के तट पर लाखों की संख्या में डुबकी लगाने वाले नहीं कर सके। न ही देश की सवा अरब आबादी को इसका पता है कि सभी धर्मों के आचार्यों ने क्या विमर्श किया। संचार युग में संवाद की विच्छिन्नता, सचमुच एक त्रासदी है। भावबोध की विच्छिन्नता, राजनीतिक और धार्मिक मतभेदों को बेमानी करने के बाद ही ठीक किया जा सकता है।
उ.6 राजनीति विज्ञानी सैमुअल पी. हंटिंगटन अरसे तक हार्वर्ड और कोलंबिया विश्वविद्यालयों में पढ़ाते रहे। 1957 में ‘द सोल्जर एंड द स्टेट’ से लेकर 1991 में ‘द थर्ड वेव’ तक उनकी दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हुईं, मगर हंटिंगटन हिट हुए 1993 में प्रकाशित ‘द क्लैश ऑफ  सिविलाइजेशंस’ से। इस पुस्तक ने पूरी दुनिया के बौद्धिक जगत को बहस के केंद्र में ला दिया था। हंटिंगटन का मानना था कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भविष्य की लड़ाई देशों के दरम्यान नहीं, संस्कृतियों के बीच होगी, और इस्लामी अतिवाद पश्चिमी दुनिया के लिए सबसे बड़े ख़तरे के रूप में प्रस्तुत होगा। ‘द क्लैश ऑफ  सिविलाइजेशंस’ (सभ्यता का संघर्ष) जैसे लफ्ज़ का सबसे पहला इस्तेमाल 1926 में बाजि़ल मैथ्यु ने अपनी पुस्तक ‘यंग इस्लाम ऑन ट्रैक’ और उनके बाद अस्तित्ववाद के प्रणेता अल्बर्ट कामू ने 1946 में किया था।
हंटिंगटन के बीच बहस में आने की वजह उनकी पुस्तक में दुनिया का धार्मिक मानचित्र तैयार किया जाना, और यह प्रतिपादित करना था कि विचारधाराओं की समाप्ति चरम पर पहुंचते ही दुनिया भर में संस्कृति की टकराहट शुरू होगी। हंटिंगटन ने वेस्टर्न, आर्थोडॉक्स, इस्लामिक, अफ्रीकी, लातिन अमेरिकी, चीनी, हिंदू, बौद्ध, जापानी जैसी नौ संस्कृतियों में विभाजित कर दुनिया को अलग-अलग करके देखने की कोशिश की थी। हंटिंगटन ने भारत और रूस की सभ्यता को ‘स्विंग सिविलाइजेशन’(परिवर्तनशील सभ्यता) माना था, और यह भविष्यवाणी की थी कि रूस अपनी दक्षिणी सीमा पर चेचन जैसे नस्ली मुस्लिम गुटों से भिड़ता रहेगा, लेकिन उसकी पटरी ईरान से बैठेगी। हंटिंगटन का कयास था कि ‘साइनो-इस्लामिक कनेक्शन’ शुरू होगा, जिसमें चीन,  ईरान, पाकिस्तान जैसे देशों से दोस्ती गांठेगा। हंटिंगटन ने इसकी भी कल्पना की थी कि इस्लाम में जनसांख्यिकी वृद्धि विस्फोटक तरीके से होगी, और मुस्लिम बनाम गैर मुस्लिम सभ्यताओं के बीच ‘ख़ूनी सरहदें’ बनेंगी।
हंटिंगटन बस यहीं चूक गये। यह ठीक है कि मुस्लिम जनसंख्या विस्फोटक तरीके से बढ़ रही है, लेकिन क्या दुनिया भर में इस्लाम को मानने वाले एक मंच पर हैं? 7 जनवरी 2015 को पेरिस में शार्ली एब्दो पर हमले की अरब लीग और मिस्र में सुन्नी मत के सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय ‘अल-अजहर’ ने जमकर निंदा की थी। 14 नवंबर 2015 तक आईएस ने सीरिया, इराक से बाहर 23 हमले किये हैं, जिनमें से पेरिस में दो हमलों को छोड़ दें, तो बाकी 21 आतंकी वारदातें आईएस ने मुसलमान देशों में ही की हैं। जितनी बड़ी संख्या में आइसिस द्वारा मारे गये लोगों की सामूहिक कब्रें मिल रही हैं, वह कहीं से हंटिंगटन की थ्योरी को पुष्ट नहीं करती कि इस्लाम को स्वीकार करने वाले संगठित हैं।  
हंटिंगटन की थ्योरी से अमेरिका, इजऱाइल और उसके मित्रों को इस्लाम के विरूद्ध माहौल बनाने में मदद मिलती है। क्योंकि मीडिया का सबसे बड़ा हिस्सा उनके कंट्रोल में है। मगर एक सच यह भी है कि इस्लाम, पिछले कई दशकों से भयानक अंतर्विरोधों से गुजऱ रहा है। एक इस्लाम वह, जो कट्टरपंथ से बाहर निकलकर पश्चिमी विचारों से तालमेल करता हुआ है, दूसरा इस्लाम वह जो हजऱत मुहम्मद के दौर के खलीफा शासन व्यवस्था को लागू करने के नाम पर ‘आइसिस’, अलकायदा, तालिबान, बोको हराम जैसे बर्बर संगठनों द्वारा नियंत्रित व गुमराह होता है। सच यह है कि ये सारे संगठन सभ्यताओं का संघर्ष नहीं कर रहे, संसाधनों पर कब्ज़ा कर रहे हैं। आइसिस दुनिया का सबसे अमीर आतंकी संगठन है, कच्चे तेल व्यापार का भट्टा बैठा चुका है। यह इस बात की पुष्टि करता है।
बोको हराम ने नाइजीरिया और उत्तर-पूर्वी अफ्रीक़ा में 17 हज़ार से अधिक हत्याएं कीं। नाइजीरिया में मुसलमानों के छतरी संगठन ‘जमातुल नसरील इस्लाम’ ने दावा किया कि बोको हराम ने ईसाइयों से अधिक मुसलमानों का नरसंहार किया है। बोको हराम ने कई ऐसे हमले किये, जब मुसलमान नमाज़ अता कर रहे थे। आइसिस ने भी इराक़ से लेकर मिस्र, यमन, सऊदी अरब तक में जितने हमले किये, उसके शिकार सुन्नी मुसलमान ज्यादा रहे हैं। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि आतंकवादियों का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन क्या इसकी निष्पक्ष रिपोर्टिंग हो रही है? पश्चिमी पूंजीवादी और यहूदी मीडिया पर यदि पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता, तो इस्लामी मीडिया भी निष्पक्ष नहीं है।
उ.7 केवल कठोर नीतियों से आतंकवाद को कुचला जा सकता, तो अफग़ानिस्तान, सीरिया, पाकिस्तान जैसे देशों से इसकी विदाई बहुत पहले हो जानी थी। आतंकवाद के बीज बेरोजग़ारी, सरकारी भ्रष्टाचार, प्रशासनिक दमन, क्षेत्रीय पिछड़ापन, जहालत के कारण अंकुरित होते हैं। इसका दुरूपयोग धर्म के ठेकेदार, सत्ता में बैठे लोग कैसे करते हैं, यह आये दिन दुनिया देखती है। बेरोजग़ारी दूर कर भ्रष्टाचार मुक्त क्षेत्रीय विकास हो, तो जहालत फैलाने वाले और जन्नत का वादा करने वाले धर्म के ठेकदार स्वत: भाग जाएंगे। इस पर कागजी योजना नहीं, अमल की ज़रूरत है।
उ.8  ईरानी डायरेक्टर माजिद मजिदी ने ‘मुहम्मद-द मैसेंजर ऑफ गॉड’, जैसी  फि़ल्म बनाई, जिसे लेकर सुन्नी मुसलमानों ने घोर आपत्ति दजऱ् की थी।  2012 में अमेरिका में एक फि़ल्म बनी ‘इनोसेंस ऑफ  मुस्लिम्स’। इस ‘सी ग्रेड फि़ल्म’ में मुहम्मद साहब को रेखांकित करते हुए दिखाया गया कि हीरो को सिर्फ़ तलवार की भाषा आती है, और ख़ून बहाने से वह प्रसन्न होता है। बहुस्त्रीगामी होने के कारण महिलाएं ‘नायक’ की फजीहत करती हैं। ऐसे प्रसंग को देखकर यदि किसी मुसलमान का ख़ून खौलता है, तो इसमें ग़लत क्या है? 12 सितंबर 2012 को ‘इनोसेंस ऑफ  मुस्लिम्स’, का विरोध कर रहे लोगों ने लीबिया के शहर बेंगाज़ी में अमेरिकी राजदूत और उनके तीन कूटनीतिकों की हत्या कर दी। दुनिया भर के मुसलमान देशों में दंगे की स्थिति थी। यह देखकर बात समझ में आती है कि अमेरिका में फिल्म पर प्रतिक्रिया देने के लिए 11 सितंबर का दिन क्यों चुना गया। इस फिल्म का निर्माता-निर्देशक सैम बैसीले उर्फ ‘नाकुला बैसीले’ 2013 से ही भूमिगत है। सैम ने इस ज़हरीली फि़ल्म को बनाने के फितूर में सौ और यहुदियों को शामिल किया था। प्रश्न यह है कि सैम बैसीले ने इस फि़ल्म को बनाने के वास्ते जो भी गोरखधंधे किये, उससे ओबामा प्रशासन अनजान कैसे रहा? ‘वैचारिक आतंकवाद’ को विस्तार देने में सरकारें भी शामिल रही हैं, उसके ये चंद उदाहरण हैं।
उ.9 राजनीतिक फायदे के लिए सिद्धांतों को अपने अनुरूप ढाल लेने की रवायत नई नहीं है। बाज़ दफा बर्बर कार्रवाइयों के लिए राजनीतिक संगठन, सिद्धांतों का इस्तेमाल करते हैं। पेरू का ‘शाइनिंग पाथ’ नेपाली माओवादियों के लिए कहर बरपाने का हथियार बन गया था। नेपाली माओवादियों के कंगारू कोर्ट में ‘डिक्टेटरशिप ऑफ  प्रोलिटेरियट’ का अर्थ यह निकाला गया कि पकड़े गये लोगों को गोली मार दो, और उनकी संपत्ति हड़प लो। राजनीतिक सिद्धांतों को अराजकता की तरफ  मोड़ देने का धंधा अपने यहां भी जोऱों पर है। बल्कि, पिछले दो वर्षों में धर्म के नाम पर राजनीतिक अराजकता बढ़ी है। कठमुल्ले उसका प्रत्युत्तर उसी तरह के कुतर्कों से देते हैं। रूढि़वादी सोच को आतंक के अक्स में उतार देना, उसी तरह का ब्रह्मास्त्र है, जो यहूदियों के विरूद्ध द्वितीय विश्वयुद्ध में इस्तेमाल किया गया था। ग्वांतेनामो में कैद कर लिये गये सारे लोग आतंकवादी थे, इसे सौ फीसदी सच नहीं माना जा सकता।
उ. 10बुद्धिजीवी का सबसे बड़ा वर्ग शत्रु, बुद्धिजीवी है। असहिष्णुता के खि़लाफ  जब इस देश में तमगे वापिस किये जा रहे थे, तब उसका विरोध वे तथाकथित बुद्धिजीवी कर रहे थे, जो सरकार से लाभ के पदों को लपकने की लिप्सा से ग्रस्त थे। बुद्धिजीवियों में भयानक खेमेबाज़ी है, यही इस देश का सच है। देश में ही क्यों, पूरी दुनिया में प्रज्ञा अलग-अलग खेमों में विभाजित है। ‘बौद्धिक जगत के अरस्तु’ आज भी विष का प्याला पीने को विवश हैं। षड्यंत्र मुक्त बौद्धिक समाज की कल्पना कि़स्सागोई के ज़रिये की जा सकती है। प्रतिभा का इस्तेमाल जब देश का इतिहास पलटने के वास्ते होने लगे, फिर उसकी विश्वसनीयता कहां रह जाती है ? 1915 में फ्रांज काफ्का की पुस्तक ‘मेटामारफॉसिस’ आई थी, तब यूरोप का बौद्धिक जगत हिल सा गया था। उस समय तत्कालीन तानाशाहों के दरबारी बुद्धिजीवियों को घोर आपत्ति थी कि एक इंसान को कीड़े में बदल देने की परिकल्पना काफ्का कैसे कर सकते थे। आज का बुद्धिजीवी, क्या उसी कायान्तरण से गुजऱ रहा है?