Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

आतंकवाद को वैश्विक राजनीति एक औज़ार की तरह इस्तेमाल करती है

प्रांजल धर
22, एनपीएल कॉलोनी, न्यू राजेन्द्र नगर, नई दिल्ली- 110060
मो. 09990665881

उ.1 अगर शब्दों की ताकत पर फोकस करें, तो फण्डामेण्टलिज़्म ठीक वही नहीं है, जो धर्मतत्ववाद है। धर्म में तत्व की खोज उसी तरह है, जैसे न्यायशास्त्र में सार और तत्व (पिथ एण्ड सब्सटेंस) की पड़ताल की जाती है। धर्म शब्द की उत्पत्ति धृ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है धारण करना। जैसे छाया देना वृक्ष का धर्म यानी स्वभाव है, जलाना अग्नि का धर्म है, आदि। फण्डामेण्टलिज़्म का तात्पर्य किसी धर्म के लिए कट्टर हो जाना है, असहिष्णु हो जाना है और यह बहुत संकुचित दृष्टि का मामला है। कहीं न कहीं, इसके अन्तर्गत कूपमण्डूकता वाली प्रवृत्ति शामिल हुआ करती है। धर्म पारम्परिक रूप से राष्ट्रीय पहचान का एक मुख्य हिस्सा रहा है। हर देश में अनेक समूह या समुदाय किसी एक या दूसरे धर्म में आस्था रखते दिखते हैं। उत्तरी आयरलैण्ड में प्रोटेस्टैण्ट और कैथोलिक, श्रीलंका में तमिल ईसाई और बौद्ध सिंहली, भारत में हिन्दू, मुसलमान, सिख और ईसाई तथा अन्य दूसरे धर्मों के अनुयायी रहते हैं। और इससे भी आगे मुसलमानों में शिया और सुन्नी, हिन्दुओं में आर्य समाजी, सनातन धर्मी, प्रणामी आदि। हमारे समय के एक बड़े राजनीति-विज्ञानी एण्ड्रयू हैवुड ने अपनी पुस्तक पॉलिटिकल आइडियालोजीज़ में कट्टरतावाद की परिभाषा इस तरह दी है- कट्टरतावाद यानी फ़ण्डामेण्टलिज़्म आमूल या किसी मत के मौलिक सिद्धान्तों में विश्वास है, जो प्रबल प्रतिबद्धता से जुड़ा होता है तथा जिसका प्रतिबिम्ब उनके दुराग्रही उत्साह में दिखलाई पड़ता है। फण्डामेण्टलिज़्म के निहितार्थ ये हैं कि (1) आमूल मत या उनके मौलिक नियमों में अखण्ड आस्था, (2) यह अखण्ड आस्था प्रतिबद्धता का रूप ग्रहण कर लेती है, (3) प्रतिबद्धता दुराग्रह का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार प्रतिबद्धता लगभग धर्मान्धता की सीमाओं को स्पर्श करने लगती है। अगर इस नज़रिये से देखें तो कोई भी धर्म कट्टरतावाद की शक्ल अख्तियार कर सकता है, मसलन हिन्दू, ईसाई या इस्लाम वगैरह। ध्यान रखना पड़ेगा कि एक धार्मिक व्यक्ति होना और एक कट्टरवादी होना समान नहीं है क्योंकि धर्म कट्टरवाद नहीं होता। धर्म में विश्वास का तात्पर्य किसी धार्मिक कट्टरतावाद में आस्था नहीं होती। धर्मतत्ववाद नैतिक व्यवस्था के अस्तित्व से सम्बन्धित है जिसमें एक उत्कृष्ट विश्वास (वसुधैव कुटुम्बकम) तथा एक आध्यात्मिक लक्ष्य (सर्वे भवन्तु सुखिन:) शामिल होता है। कट्टरतावाद किसी भी रूप में देखा जाए, तो धर्म का विलोम है। वह धर्म का शोषण है। चाहे यह शोषण चोरी-छिपे होता हो या फिर सार्वजनिक और प्रकट रूप से। कट्टरतावाद बड़ा ही अभद्र, असहिष्णु और अमर्यादित माध्यम है, जिसके जरिये संकीर्ण सोच के कुछ लोग अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति करते हैं। राजनीतिक सन्दर्भों में कट्टरतावाद और सर्वसत्तावाद को अच्छा साथी माना जाता रहा है। उनके लिए धर्म साध्य नहीं होता, महज साधन भर होता है। आतंकवाद कई बार इसी साधन का इस्तेमाल करता है और इसी रूप में देखा जाना चाहिए धर्मतत्ववाद और आतंकवाद के सम्बन्ध को। हाँ, आतंकवाद कट्टरता की कड़ाही में हिंसा की तीखी छौंक ज़रूर लगाता है।
उ. 2 राजनीति राजनीति होती है, वैश्विक राजनीति जैसा विशेषण ठीक नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि महिलाओं का हितचिन्तन करने वाले एक बड़े समुदाय ने सिद्ध कर दिया है कि घरेलू पारिवारिक मुद्दे भी राजनीतिक हैं क्योंकि जो भी व्यक्तिगत है, वही राजनीतिक है। आधी दुनिया के मामले में यह सारा कुछ मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट, सिमोन द बोउवार, मेरी डाली और जर्मेन ग्रीयर आदि के संघर्षों के बाद आया है। राजनीति सम्भाव्य की कला (आर्ट ऑफ़  द पॉसिबल) है। महान कूटनीतिज्ञ बिस्मार्क ने भी यही स्वीकार किया है। निजी हितों को सार्वजनिक रूप दे देना ही राजनीति है। राजनीति सुलह-समझौते, बीच-बचाव और समायोजन का विज्ञान है। वैश्विक राजनीति आतंकवाद से इसी रूप में जुड़ती है। आतंकवाद को वैश्विक राजनीति एक औज़ार की तरह इस्तेमाल करती है, उसी तरह जैसे वह तेल या हथियारों को इस्तेमाल करती है। अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप यानी सन् 1979 के बाद राजनीति का रिश्ता आतंकवाद से बनने की शुरूआत होती है और इसका तथाकथित चरम ग्राफ 11 सितम्बर 2001 को अमरीका पर वल्र्ड ट्रेड सेंटर आदि पर हुए हमले पर देखा जा सकता है। समस्या आतंकवाद की परिभाषा की भी है। भारत बहुत दिनों से आतंकवाद का शिकार रहा है ताज पर हमला हुआ, सम्प्रभु संसद पर हमले की कोशिशें की गईं और हमारे देश के कई बेगुनाह नागरिक अपनी जान आतंकवादी हमलों में गँवा चुके हैं। भारत हमेशा से दुनिया के सामने प्रामाणिक तथ्य रखता रहा, लेकिन पूरी दुनिया को आतंकवाद की विभीषिका का अनुभव तभी हुआ, जब यूरोप पर हमला हुआ। खासकर अभी आईएस द्वारा फ्रांस पर किये गए हमले ने आतंकवाद की परिभाषा को लेकर पूरी दुनिया को चौकन्ना कर दिया है। राजनीतिक हिंसा, आन्तरिक विद्रोह तथा सीमापार से संचालित आतंकवाद कुछ ऐसे चिन्तनीय मुद्दे हैं, जिन पर आपका यह प्रश्न बहुत जायज है। भटके हुए नौजवानों को और अधिक भटकाकर आतंकवाद के प्रशिक्षण की अंधेरी कन्दरा में धकेल दिया जाता है, उनकी मगजधुलाई करके। ऐसा शक्तिशाली वैश्विक हितों की पूर्ति के लिए भी किया गया है। फिर तथाकथित एकध्रुवीय विश्व का दारोगा अपने मन से आतंकवाद को परिभाषित करता रहता है और गरीब देशों के नागरिक लोग मरते रहते हैं। असल में आतंकवाद का मतलब ही अनागरिक यानी सिविल आबादी पर हमले से है, इजऱायल या फिलिस्तीन और लेबनान जैसे देश इस दुर्भाग्यपूर्ण संकल्पना के सर्वाधिक शिकार लोगों में से हैं जहाँ महिलाएँ और बच्चे तक पूर्णत: असुरक्षित हैं। इस बात की गम्भीरता को समझकर समानतामूलक विश्व-व्यवस्था का निर्माण करना होगा, जिसमें शान्तिप्रियता के प्रति अगाध प्रेम हो।
उ. 3 गलती है। भारत का वाम भटका हुआ है। इसका एजेण्डा त्रुटिपूर्ण है। इसकी खामोशी चिन्ताजनक है। अब यह अन्याय का विरोध तीव्रता से नहीं करता। मैं यह नहीं कहता कि पूरा वाम बर्बाद है क्योंकि अभी भी कुछ वामपंथी नेताओं का काम और आचरण बोलता है लेकिन वाम ने अपने लक्ष्यों से भी अधिक महत्व सुख सुविधा को दिया है। अभी ज़्यादा दिन नहीं बीते, जब साहित्य अकादेमी के सभागार में खुद वृन्दा करात ने मेरे सामने स्वीकार किया था कि हमसे गलतियाँ हुईं हैं, और उन्हें सुधारना ज़रूरी है। तो गलतियों से अगर सीख ले लेंगे, तो आतंकवाद को समाप्त करने में मदद जरूर मिलेगी क्योंकि धर्म तो अन्तत: अफीम की तरह ही है, जो लोगों को भयानक भरम में डालकर रखता है। कई बार यह तार्किकता को कुन्द भी करता है और शोषण को जायज भी ठहराता है। किसी भी प्रकार के शोषण से मुक्ति और समतामूलक समाज के निर्माण का जतन ही वाम की कोशिश होनी चाहिए। इस बात पर ज़ोर दिये जाने की ज़रूरत है कि धर्म आदमी का निजी मामला होता है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसा होता नहीं दिख रहा है।
उ.4  शिक्षा, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों का प्रचार प्रसार करने से इस पर काबू पाया जा सकता है।
उ.5 मानवाधिकार एक संकल्पना के रूप में बहुत सराहनीय और पवित्र संकल्पना है। यहाँ सभी मनुष्यों को हासिल जीवन के अधिकार, गरिमा आदि की बात की जाती है। पर इस संकल्पना को लागू करने की प्रक्रिया दोषमुक्त नहीं है। प्राय: देखा गया है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार का मुद्दा बनाकर कुछ शक्तिशाली देश गरीब देशों के मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश करते हैं और इस हस्तक्षेप को जायज ठहराने का प्रयास किया जाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। अगर सच्ची ईमानदारी से मानवाधिकारों को लागू किया जाए तो किसे आपत्ति होगी भला?
उ.6 आज के समय में राजनीतिक हिंसा को फैलाने में विचारधारा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालाँकि राजनीतिक हिंसा के अनेक कारण हो सकते हैं, मसलन - आम कारण, आर्थिक कारण, राष्ट्रीय आत्म निर्धारण की संकल्पना, विचारधारा, धार्मिक व नृजातीय संघर्ष, अभिजात वर्गों के बीच राजनीतिक संघर्ष, सापेक्ष वंचना या फिर निकटवर्ती देशों द्वारा किसी देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप, जिसे जनरल एमिला माला ने फिफ्थ कॉलम की राजनीति कहा था। आईएस नामक ख़तरनाक संगठन आतंकवाद के प्रसार के लिए धर्म का सहारा ले ही इसीलिए रहा है क्योंकि धर्म के नाम पर लोगों को लामबन्द या उत्तेजित करना किसी भी अन्य पहचान जैसे नृजातीयता आदि के नाम पर लोगों को लामबन्द करने से कई गुना आसान होता है। सभ्यता के जिस संघर्ष की बात आप सैमुअल पी हंटिग्टन के शब्दों को उधार लेते हुए कह रहे हैं, वह दरअसल इस्लाम को क्रिश्चिनियटी का विरोधी बताने की एक कोशिश थी। जबकि सभी जानते हैं कि सारे धर्मों का सारतत्व एक ही होता है, फिर भी ऐसे भरम इधर खूब फैलाए गए हैं। इन भरमों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जैसे एक भरम तो यह फैलाया गया है कि इतिहास का अन्त हो चुका है (फ्रांसिस फुकुयामा)। इस भरम में यह निहित है कि अब उदार लोकतन्त्र की जीत हो चुकी है और संसार अपने एकरैखिक (लीनियर) विकास की अनवरत यात्रा में बन्द गली के आखिरी मकान तक आ पहुँचा है। यह उदार लोकतन्त्र यानी दूसरे शब्दों में कहें तो नव उदारवाद की जीत का ढिंढोरा पीटने का जतन है। मतलब यह, कि अब सोवियत संघ के विघटन के बाद साम्यवादी व्यवस्था जैसी कोई चीज़ न तो अस्तित्व में है और न ही इसके भविष्य में होने की सम्भावना है। इसी के समर्थन में विचारधाराओं के अन्त की बात (डैनियल बेल) द्वारा फैलाई गई। ये सब पूँजीवादी ताकतों द्वारा शोषण और गैरबराबरी को समायोजित करने के तरीके हैं। इन्हीं तरीकों में से एक संचार साधनों का प्रबन्धन है। यह भरम भी खूब फैलाया गया है कि समाचार माध्यमों की बहुलता बढऩे के कारण विचारों और समाचारों की विविधता बढ़ी है। जबकि असल में तो समाचार माध्यमों में स्वामित्व का ख़तरनाक किस्म का संकेन्द्रण हुआ है। भारत ही नहीं, वरन पूरी दुनिया में छोटे और मँझोले प्रेस पर अस्तित्व के जबर्दस्त संकट विद्यमान हैं और बड़े मीडिया घरानों द्वारा विलय, अधिग्रहण और एकाधिकार की प्रक्रियाएँ बढ़ती ही चली गयीं हैं। मीडिया का स्वामित्व विशालकाय समुद्रपारीय आवारा पूँजियों के हाथों में गया है, जिन्हें विकासशील देशों की जनता के हितों से कोई भी सरोकार नहीं है। उनका लक्ष्य केवल और केवल मुनाफा ही है। आपने पूछा कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इसे कैसे समझाया जा सकता है। तो इसके लिए तमाम वैकल्पिक छोटे-छोटे प्रयास करने होंगे और जनता को अपने-अपने स्तरों पर जागरूक करना होगा। बुद्धिजीवियों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।
उ. 7 आमतौर पर यह कहा जाता है कि कमज़ोर राज्य (वीक स्टेट्स) आतंकवाद के लिए उर्वर भूमि उपलब्ध कराते हैं। इसीलिए राज्य को तो मजबूत होना ही पड़ेगा। खासकर तब, जब विदेशी ताकतें आतंकवाद को बढ़ावा देती हों। हालाँकि कठोर नीतियों के बिना आतंकवाद को समाप्त करना बहुत कठिन है लेकिन तथ्य बताते हैं कि कठोर नीतियों की अपनी सीमा है। कोई भी कठोर नीति सच्चा इंसान नहीं पैदा कर सकती, नैतिकता नहीं पैदा कर सकती या शान्तिपूर्ण विश्व व्यवस्था उत्पन्न नहीं कर सकती। चर्चिल ने एक बार कहा था कि हम शान्ति चाहते हैं और इसीलिए हमें युद्ध करना पड़ता है। तो कठोर नीतियों के अलावा अन्य नीतियों का सहारा भी लिया जा सकता है, मसलन- शोषण, गरीबी, भुखमरी और गैरबराबरी की समाप्ति, प्रत्येक को गरिमा का उचित अधिकार, समानता का प्रसार आदि। रोटी, कपड़ा और मकान के अलावा सडक़, बिजली, पानी और स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजग़ार को सुनिश्चित करके विक्षोभों को कम किया जा सकता है।
उ. 8 यह दुर्भाग्य है कि सारे धर्मों में असहिष्णुता बढ़ी है लेकिन हमारे संचार माध्यमों का कहना है कि कुछ अमुक-अमुक धर्मों में ही असहिष्णुता बढ़ी है। विचारों के आतंक को बढ़ाने के क्रम में मीडिया ने अजीबोगरीब छवियाँ गढ़ी हैं और हितानुकूल और मनचाहे विचारों का गलत प्रक्षेपण किया है। अस्मिता के संकीर्ण पक्षों को उत्तेजित करने के दोष से मीडिया मुक्त नहीं है, चाहे वह पश्चिमी मीडिया हो या पूर्वी।
उ. 9 राजनीतिक सिद्धान्त दुनिया और व्यवस्था को सँवारने के लिए होते हैं, कठमुल्लापन के लिए उसमें मेरे विचार में जगह नहीं होती।
उ. 10 बुद्धिजीवी शब्द एक खास अर्थ में नया है और यह बीसवीं सदी में उस सन्दर्भ में अस्तित्व में आया है, जिस अर्थ में यह आज प्रयुक्त होता है और जिस अर्थ में आपके इस प्रश्न में इस्तेमाल किया गया है। अभी बहुत समय नहीं बीता जब जेल की भयंकर सजा काटने वाले एन्तोनियो ग्राम्शी ने बताया था कि वैचारिक प्राधान्य को तोडऩे में बुद्धिजीवियों की क्या भूमिका हो सकती है। उन्होंने जो बताया था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि बुद्धिजीवी दो प्रकार के होते हैं यानी पारंपरिक और आंगिक। जहाँ पारंपरिक बुद्धिजीवी स्वयं को वर्ग निरपेक्ष मानते हैं और जटिल वर्ग सम्बन्धों की वस्तुनिष्ठ विवेचना का दावा करते हैं। दूसरी ओर पूँजीवादी व्यवस्था के अपने आंगिक बुद्धिजीवी होते हैं, इसीलिए परिवर्तनकामियों को भी अपने आंगिक बुद्धिजीवी बनाने होंगे जो प्रताडि़त समूह में से निकलेंगे। ध्यान रखना होगा कि औपचारिक शिक्षा प्रणाली जिन बुद्धिजीवियों को पैदा करती है, वो स्थापित व्यवस्था को बनाए रखने में और इसकी त्रुटियों को छिपाए रखने में विश्वास रखते हैं। इस चीज़ को बदलना चाहिए, तभी वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में वर्चस्व को तोड़ा जा सकेगा, चाहे वह किसी देश का वर्चस्व हो या पूँजीवादी अमानवीय व्यवस्था का वैचारिक वर्चस्व। बुद्धिजीवी शोषण की अधिरचनाओं और नागरिक समाज की विसंगतियों को सामने ला सकते हैं और अनेक व्यतिक्रमों को दूर कर सकते हैं ताकि समतामूलक समाज की रचना की जा सके। एक ऐसा समाज जिसमें सभी को एक गिना जाए, किसी को एक से अधिक न गिना जाए। जहाँ संगठित हित वास्तविक स्वतंत्रता पर ग्रहण न लगाते हों। जहाँ संविधान की मौलिक भावना का सच्चा पालन होता हो। जहाँ गांधी जी के शब्दों में कहें, तो देश (बल्कि दुनिया) के सबसे गरीब आदमी को भी लगे कि यह देश (बल्कि दुनिया) उसका भी है। बुद्धिजीवियों ने भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में स्वतन्त्रता आन्दोलनों को समर्थन दिया है, उपनिवेशवाद की समाप्ति में योगदान दिया है और देश-दुनिया के मानसिक-वैचारिक विकास में योगदान दिया है।