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Saturday 25 Nov 2017

धार्मिक कट्टरता

प्रभात त्रिपाठी
रामगुड़ी पारा, रायगढ़
छत्तीसगढ़-496001
उ.1 फंडामेंटलिज्म धार्मिक कट्टरता ही है। कट्टरता का सम्बन्ध आतंकवाद से एकदम ही जाहिर है। आज की तारीख में यह कट्टरता, जिस क्रूरतम हिंसा की ओर बढ़ रही है और आतंकवाद के विभिन्न रूपों को पाल पोस रही है, उसका संबंध मूलत: आधुनिक उपभोगवादी सभ्यता तथा वैश्विक हथियार उत्पादन से है। वास्तव में यह धार्मिक कट्टरता अधिकांश लोगों का अनुभव नहीं है। थोड़े से लोग जिस तरह असीम उपभोग और उत्पादन की सभ्यता बढ़ा रहे हैं, उसी तरफ  लालच के साथ बढ़ते धर्मान्ध लोगों के द्वारा आतंकवाद विकसित हो रहा है।
उ. 2 वैश्विक राजनीति और आतंकवाद का रिश्ता भी गलाकाट प्रतियोगिता वाली इस सभ्यता से जुड़ा है। प्राकृतिक संसाधनों का स्वार्थ के लिए उपयोग करने की राजनीति और अर्थनीति ही भूमण्डलीकरण के बाद सारी दुनिया में जारी है। सारा खेल तेल के भण्डार पर कब्जा करने और विश्व के बाजार पर कब्जा करने का ही है। यह एक ऐसा बाजार है, जहाँ हथियारों के व्यापार पर भी भारी पूँजी लगी हुई है। भूमण्डलीकरण के बाद इसलिए ही पूँजी की एकता की ताकत बढ़ गयी और धर्मों और समुदायों की अनेकता के झगड़े भी बढ़ गये। यह एक तरह से चरम पूँजीवाद की पराकाष्ठा है।
उ. 3 मैं इस बात से बिलकुल सहमत हूँ , कि धार्मिक कट्टरता की आलोचना नहीं करना तथा सामान्य लोगों की धार्मिकता में मौजूद मानवीय उदारता की उपेक्षा करते रहना, भारतीय वामपंथी राजनीति की एक बड़ी भूल है। वास्तव में धर्म के स्पेस को जिस तरह से भरा जाना था, वह काम प्रगतिशील राजनीति ने नहीं किया। उसने धर्म के लोकव्यवहारी रूप को आत्मसात करने और जरूरत के मुताबिक उसका रूपांतरण करने में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई। अधिकांशत: उसकी दिलचस्पी इस विषय में अकादमिक ही रही है।
उ. 4 धार्मिक ग्रन्थों की कट्टरता को ईश्वरीय आदेश मानना भी पण्डों और पुरोहितों और अब के दौर में आतंकवादियों का काम रहा है। सामान्य आदमी धार्मिक लचीलेपन को जानता और मानता है। शिक्षा के द्वारा ही संवाद के माध्यम से ऐसे भ्रमों को तोड़ा जा सकता है।
उ. 5 धर्म के सार तत्व को रूढि़वाद बताना गलत है। वास्तव में धर्म का कट्टर कर्मकाण्डी रूप ही मानवाधिकार विरोधी होता है।
उ. 6 आईएस का आतंकवाद आधुनिक राजनीति का खेल है। वह अति भौतिकवादी सभ्यता की एक बीमारी से भी अनुप्राणित है। प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपने लालच के लिए करने वाले लोगों ने ही आईएस को बढ़ाया है और अब जब भस्मासुर की तरह यह राक्षस उनके इलाके में घुस रहा है, तो चिन्ताग्रस्त हो गये हैं। इसका इलाज सिर्फ और सिर्फ  गांधी के विचार हैं।
उ. 7 आज का आतंकवाद, आतंकवाद के स्रोतों को नष्ट करने पर ही खत्म हो सकता है। वे स्रोत हैं - लालच, असीमित हथियार उत्पादन, विश्व के रहन सहन में भयंकर असमानता, प्रकृति के विनाश की तैयारी में लगी सभ्यता, इन सभी को रोके बगैर आतंकवाद से लड़ाई अस्थायी रोक की लड़ाई ही होगी।
उ. 8 असहिष्णुता भी सत्ताकामियों की ही देन है। सारी दुनिया में भौतिक तरक्की को ही विकास का लक्षण माना जाता है। सत्ताकामी इस भौतिक तरक्की के सभी स्रोतों पर कब्जा चाहते हैं। वे ही तरह-तरह की असहिष्णुता को पालते और पोसते हैं।
उ. 9 राजनैतिक सिद्धांतों में कठमुल्लापन अगर बढ़ रहा है, तो उसे भी एक तरह का आतंकवाद ही कहा जाना चाहिए। खासकर सत्ताधारी राजनैतिक के सिद्धांतों का कठमुल्लापन इसी तरह का प्रभाव पैदा करता है।
उ. 10 आज बुद्धिजीवी की स्थिति हाशिये की भी स्थिति नहीं है। लेकिन फिर भी दुनिया के बुद्धिजीवी इस कोशिश में लगे हैं, कि वे मानवता को बचाने में अपना योगदान दे सकें।